Book Title: Kangda Jain Tirth
Author(s): Shantilal Jain
Publisher: Shwetambar Jain Kangda Tirth Yatra Sangh

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Page 61
________________ ( ३४ ) तीर्थयात्रा करने का आमन्त्रण दिया । इस प्रकार सन् १९४६ का भी तीर्थयात्रा का कार्यक्रम पिछले दोनों वर्षों की अपेक्षा अधिक रोचक रहा । इस वर्ष पंजाब के दूसरे शहरों से भी भाई बहिनें शामिल हुए। इस वर्ष यात्री-संख्या लगभग ६५ हो गई। इसके बाद प्रतिवर्ष होली के दिनों में यात्रा का कार्यक्रम अविच्छिन्न रूप से चालू हो गया और प्रतिवर्ष इसकी संख्या वृद्धि पाते सैकड़ों तक पहुंच गई और पंजाब के अच्छे अच्छे मान्य प्रतिष्ठित व्यक्ति भी इन संघों में शामिल होने लगे और तीन दिनों के लिये भगवान् को पूजा, सेवा, स्तवन कीर्तन आदि से आत्म-आनन्द का लाभ उठाने लगे। भगवान के पूजन की बोलियां होकर अष्ट प्रकारी पूजा रचाई जाती और चौदश के रोज जयजयकारों के मध्य में श्री मन्दिर जी पर ध्वजारोहण होने लगा। भावुक यात्री उत्सव के खर्चे के लिये अपने धन को देकर अपनी कमाई का सार्थक बनाते रहे । यह सारा कार्यक्रम होश्यारपुर के उन्हीं युवकों के कन्धों पर रहा और उनके सहयोग में और भी सज्जनों ने हाथ बटाना प्रारम्भ कर दिया। कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिये अच्छे अच्छे संगीतकारों और वक्ताओं को बुलावा भेजा जाने लगा। इस तरह प्रतिवर्ष रौनक में वृद्धि होने लगी। ___ फलतः इन युवकों ने भारी जिम्मेवारी को अनुभव करते हुए अपने होश्यारपुर के सकल श्रीसंघ की सहानुभूति और सहयोग लेने की इच्छा प्रकट की जिस पर सकल श्रीसंघ ने सन् १६५१ में तारीख २७ फर्वरी की अपनी एक मीटिंग में श्री कांगड़ा तीर्थ की वार्षिक क्रमबद्ध यात्रा को चालू रखने के लिये एक कमेटी नियत कर दी जिसका नाम "श्री श्वेताम्बर जैन कांगड़ा तीर्थयात्रा संघ होश्यारपुर" रक्खा गया Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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