Book Title: Kangda Jain Tirth
Author(s): Shantilal Jain
Publisher: Shwetambar Jain Kangda Tirth Yatra Sangh

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Page 98
________________ ( ६७ ) ५. माननीय सुशर्मा गजा, आज तेरा यश गाते हैं श्रीमान् नरेन्द्रचन्द्र और रूपचन्द्र मन भाते हैं 'नाहर' अपनी पुण्य भूमि को हम ने शीश झुकाना है आज कांगड़ा की चोटी पर ध्वज अपना लहराना है तर्ज (जागृति ) – आओ बच्चो तुम्हें दिखायें...... ........ बहनो भाइयो तुम्हें सुनाएँ कथा एस अस्थान की ॥ इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती है भगवान की । आदीश्वर भगवान २. पराक्रमी राजा सुशरमचन्द्र ने यह मन्दिर बनवाया था । दूर दूर से संघ प्रभु के दर्शन करने आया था । यहाँ की जनता ने मिल करके जैनधर्म अपनाया था । सुन लो यह सब बातें अपने गौरव और अभिमान की । ....... २. स्वर्ग समान यह सुन्दर नदिया प्रभु चरणों में बहती थी । बल स्वाती इठलाती आवे सब के मन को भाती थी । ती निज सखियों को अपने साथ मिलाती थी। ती प्रभु व्याकुल रहती थी, गावे भगवान की ....... के चरणों में आने को हरदम कल कल करती शोर मचाती स्तुति ३. पर्वत की चोटी पर मंदिर सब के मन को भाया है, नीला अम्बर इस मंदिर पर करता अपनी छाया है, बादल के संग आँखमचोली चन्दा खेलने आया है तारों के संघ चांदनी ने इस मंदिर को दीपाया है, देवी देवता फुल बरसाते प्रतिमा पर भगवान की ....... Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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