Book Title: Jain Vidya 12
Author(s): Pravinchandra Jain & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

View full book text
Previous | Next

Page 30
________________ 18 चिदानंद स्वरूप की उपलब्धि योगेन, दृषदः स्वर्णता मता । योग्योपादान द्रव्यादि स्वादि- सम्पत्ता वात्मनोऽप्यात्मता मता ॥ 2 ॥ दोहा - स्वयं पाषारण सुहेतु से, स्वयं कनक हो जाय । सुद्रव्यादि चारों मिलें, आप शुद्धता थाय ||2|| जैनविद्या - 12 अर्थ – योग्य उपादान के संयोग से पाषाणविशेष जिस प्रकार स्वर्णरूप परिणत हो जाता है वैसे ही यह आत्मा भी सुद्रव्य, सुक्षेत्र प्रादि की प्राप्ति पर ग्रात्मत्व को प्राप्त कर लेता है । - पूज्यपाद : इष्टोपदेश

Loading...

Page Navigation
1 ... 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114