Book Title: Jain Vidya 12
Author(s): Pravinchandra Jain & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 94
________________ सप्ततच्च (सप्ततत्त्व) -रचनाकार:प्रज्ञात अनुवादक की ओर से अपभ्रंश आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी है । 'वर्तमान में हमारे देश भारत में जितनी भी देशीय भाषाओं का प्रचार प्रसार है उन सबका उद्गम अपभ्रंश भाषा से ही हुआ है' यह भाषाविदों द्वारा अब निर्विवाद रूप से स्वीकार कर लिया गया है अतः इन भाषाओं के गहन अध्ययन और उनके विकास की कड़ियों को परस्पर जोड़ने के लिए अपभ्रंश भाषा का ज्ञान होना आज की एक महती आवश्यकता है। इसी से अपभ्रंश भाषा का महत्त्व स्पष्ट है। अपभ्रंश भाषा इस देश में 1000 एक हजार वर्ष के लगभग प्रचलित रही। इससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इसमें कितना विशद साहित्य रचा गया होगा। अब तक शोध-खोज के आधार पर जितना साहित्य उपलब्ध हुआ है वह तो उक्त अनुमान के आधार पर आटे में नमक जितना भी ज्ञात नहीं होता और प्रकाशित/मुद्रित साहित्य तो नगण्य सा ही है । जो भी साहित्य अब तक मुद्रित हुआ है उनमें विशाल रचनाओं का बाहुल्य है जिनके स्वाध्याय, अध्ययन-मनन के लिए पर्याप्त समय और श्रम की आवश्यकता है । ऐसी लघु रचनाएँ तो उनमें बहुत ही कम हैं जो अपभ्रंश भाषा के अध्येताओं के लिए उपयोगी हों तथा उन्हें कुछ धार्मिक तथा सांस्कृतिक जानकारी भी प्रदान कर सकें। इस दृष्टि से प्रस्तुत रचना का अपना एक विशिष्ट स्थान है । यह रचना इस क्षेत्र के पाण्डुलिपि संग्रह के एक गुटके में प्राप्त हुई है । इसकी वेष्टन सं. 253 तथा आकार 26X11 से.मी. है । इसमें और भी कई रचनाएं हैं। कुछ अपभ्रंश भाषा की भी हैं जिनमें से चुनड़िया, आनन्दा, नेमीसुर की जयमाल प्रादि कुछ रचनाएं इसी संस्थान से सानुवाद प्रकाशित हो चुकी हैं। इस रचना की प्रतिलिपि उक्त गुटके में

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