Book Title: Jain Vidya 12
Author(s): Pravinchandra Jain & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 39
________________ जैन विद्या - 12 ऋजु सूत्र ऋजुं प्रगुणं सूत्रयति तन्त्रयतीति ऋजुसूत्र:- जो ऋजु अर्थात् सरल को सूत्रित अर्थात् स्वीकार करता है, वह ऋजुसूत्र नय है । ( 1.33) शब्दनय लिङ्गसंख्यासाधनादिव्यभिचारनिवृत्तिपरः शब्दनय: – लिङ्ग, संख्या और साधन आदि व्यभिचार की निवृत्ति करनेवाला शब्दनय है । ( 1.33 ) समभिरूढ़ - नानार्थसमभिरोहणात्समभिरूढ़ : - नाना अर्थों का समभिरोहण करनेवाला होने से समभिरूढ नय कहलाता है । ( 1.33 ) एवंभूत येनात्मनाभूतस्तेनैवाध्यवसाययतीति एवंभूतः - जो वस्तु जिस पर्याय को प्राप्त हुई है, उसी रूप निश्चय करानेवाले को एवंभूत नय कहते हैं । ( 1.33) उपशम 27 आत्मनि कर्मणः स्वशक्तेः कारणवशादनुद्भूतिरुपशमः- - आत्मा में कर्म की स्व शक्ति का कारणवश प्रकट न होना उपशम है । (2.1 ) क्षय मिश्र - उदय क्षय प्रात्यन्तिकी निवृत्तिः कर्मों का आत्मा से सर्वथा दूर हो जाना क्षय है । (2.1 ) उभयात्मको मिश्रः-- उभयरूप भाव मिश्र है । (2.1) द्रव्यादिनिमित्तवशात्कर्मरणां फलप्राप्तिरुदयः - - द्रव्यादिनिमित्त के वश से कर्मों के फल का प्राप्त होना उदय है । (2.1 ) परिणाम द्रव्यात्मलाभमात्र हेतुकः परिणामः - जिसके होने में द्रव्य का स्वरूपलाभमात्र कारण है, वह परिणाम है । (2.1) श्रपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, श्रदयिक, और पारिणामिक उपशमः प्रयोजनमस्येत्योपशमिक : एवं क्षायिकः क्षायोपशमिक: पारिणामिकश्च । (2.1 ) प्रौदयिकः क्षायोपशमिक - सम्यक्त्व अनन्तानुबन्धिकषाय च तुष्टयस्य मिथ्यात्वसम्यङ् मिथ्यात्वयोश्चोदयक्षयात्सदुपशमाच्च सम्यक्त्वस्य देशधातिस्पर्द्धकस्योदये तत्वार्थश्रद्धानं क्षायोपशमिकं सम्यक्त्वम् - चार अनन्तानुबन्धी कषाय, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन छह प्रकृतियों के उदयाभावी क्षय और सदवस्थारूप

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