Book Title: Jain Vidya 12
Author(s): Pravinchandra Jain & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 43
________________ जैन विद्या - 12 इन्द्रिय स्पर्शन रसन वीर्यान्तराय मतिज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलाभावष्टम्भादात्मनास्पर्श्यतेऽनेनेति स्पर्शनम् — वीर्यान्तराय और मतिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से अंगोपाङ्गनामकर्म के प्रालम्बन से आत्मा जिसके द्वारा स्पर्श करता है वह स्पर्शन इन्द्रिय I (2.19) घ्राण स्पर्श रस चक्षु - चष्टे अर्थान्पश्यत्यनेनेति चक्षुः - जिसके द्वारा पदार्थों को देखता है, वह चक्षु इन्द्रिय है । (2.19) श्रोत्र गन्ध इन्द्रस्य लिङ्गमिन्द्रियम् - इन्द्र के लिङ्ग को इन्द्रिय कहते हैं । वर्ण शब्द स्पृश्यत इति स्पर्श :- जो स्पर्श किया जाता है, वह स्पर्श है । रस्यत इति रसः – जो स्वाद को प्राप्त होता है, वह रस है । गन्ध्यत इति गन्धः – जो सूंघा जाता है, वह गन्ध है । वर्ण्यत इति वर्णः -जो देखा जाता है, वह वर्ण है । शब्दद्यतः इति शब्दः – जो शब्दरूप होता है, वह शब्द है । ( 2.20 ) श्रुतज्ञानविषयोऽर्थः श्रुतम् - श्रुतज्ञान का विषयभूत अर्थ श्रुत है । (2.21 ) ग्रहगति विग्रहो देहः । विग्रहार्था गतिविग्रहगतिः । अथवा विरुद्ध ग्रहो विग्रह व्याघातः । कर्मादानेऽपि नोकर्मपुद्गलादाननिरोध इत्यर्थः । विग्रहेण गतिर्विग्रहगतिः – विग्रह का अर्थ देह है । विग्रह अर्थात् शरीर के लिए जो गति होती है वह विग्रह गति है । अथवा विरुद्ध ग्रहको विग्रह कहते हैं जिसका अर्थ व्याघात है । तात्पर्य यह है कि जिस अवस्था में कर्म के श्रुत 31 रस्यतेऽनेनेति रसनम् - जिसके द्वारा स्वाद लेता है । वह रसन इन्द्रिय है । (2.19 ) घ्रायतेऽनेनेति घ्राणम् – जिसके द्वारा सूंघता है, वह घ्राण इन्द्रिय है । (2.19) श्रूयतेऽनेनेति श्रोत्रम् - जिसके द्वारा सुनता है, वह श्रोत्र इन्द्रिय है । (2.19 )

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