Book Title: Jain Vidya 12
Author(s): Pravinchandra Jain & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 48
________________ 36 जनविद्या-12 होनेवाले स्पर्शादि पर्याय को उत्पन्न करने की सामर्थ्य रूप से जो 'अण्यन्ते' अर्थात् कहे जाते हैं, वे अणु कहलाते हैं। (5.25) भेद संघातानां द्वितीयनिमित्तवशाद्विदारणं भेदः-अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग इन दोनों प्रकार के निमित्तों से संघातों के विदारण करने को भेद कहते हैं । (5.26) संघात पृथग्भूतानामेकत्वापत्तिः संघातः-पृथग्भूत पदार्थों के एकरूप हो जाने को संघात कहते हैं । (5.26) उत्पाद चेतनस्याचेतनस्य वा द्रव्यस्य स्वां जातिमजहत उभयनिमित्तवशाद् भावान्तरावाप्तिरुत्पादनमुत्पादः मत्पिण्डस्य घट पर्यायवत्-चेतन और अचेतन द्रव्य अपनी जाति को कभी नहीं छोड़ते । फिर भी उनमें अन्तरंग और बहिरंग निमित्त के वश प्रति समय जो नवीन अवस्था की मिट्टी के पिण्ड की घड़ेरूप परिवर्तन की तरह जो प्राप्ति होती है, उसे उत्पाद कहते हैं। (5.30) व्यय पूर्वभावविगमनं व्ययः-पूर्व अवस्था के त्याग को व्यय कहते हैं । (5.30) ध्रुव ___ अनादिपारिणामिकस्वभावेन व्ययोदयाभावाद् ध्र वति स्थिरीभवतीति ध्र वः । ध्र वस्य भावः कर्म वा ध्रौव्यम्-जो अनादिकालीन परिणामिक स्वभाव है, उसका व्यय और उदय नहीं होता किन्तु ध्र वति अर्थात् स्थिर रहता है, इसलिए उसे ध्रुव कहते हैं । ध्र व का भाव या कर्म ध्रौव्य कहलाता है। (5.30) तभाव तद्भावः इत्युच्यते । कस्तद्भावः । प्रत्यभिज्ञानहेतुता । तदेवेदमिति स्मरणं प्रत्यभिज्ञानम् । तदकस्मान्न भवतीति योऽस्य हेतुः स तद्भावः । भवनं भावः । तस्य भावस्तद्भावः । जो प्रत्यभिज्ञान का कारण है वह तद्भाव है, 'वही यह है' इस प्रकार के स्मरण को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। वह अकस्मात् तो होता नहीं, इसलिए जो उसका कारण है, वही तद्भाव है । उसकी निरुक्ति 'भवनं भावः' तस्य भावः तद्भावः इस प्रकार होती है । (5.31) अपित अनेकान्तात्मकस्य वस्तुनः प्रयोजनवशाद्यस्यकस्यचिद्धर्मस्यविवक्षया प्रापितं प्राधान्यमपितमुपनीतमिति यावत्-वस्तु अनेकान्तात्मक है । प्रयोजन के अनुसार उसके किसी एक धर्म की विवक्षा से जब प्रधानता होती है तो वह अर्पित या उपनीत कहलाता है । (5.32) स्निग्ध बाह्याभ्यन्तरकारणवशात् स्नेहपर्यायाविर्भावात् स्निह्यतेऽस्मिन्निति स्निग्धः- बाह्य

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