Book Title: Jain Vidya 12
Author(s): Pravinchandra Jain & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 35
________________ जैनविद्या-12 23 पर्यायाथिक पर्यायोऽर्थः प्रयोजनमस्येत्यसौ पर्यायार्थिकः—पर्याय जिसका प्रयोजन है, वह पर्यायार्थिक नय है । (1.6) निर्देश निर्देशः स्वरूपाभिधानम्-किसी वस्तु के स्वरूप का कथन करना निर्देश है । (1.7) स्वामित्व स्वामित्वमाधिपत्यम्-स्वामित्व का अर्थ आधिपत्य है । (1.7) साधन साधनमुत्पत्तिनिमित्तम्-जिस निमित्त से वस्तु उत्पन्न होती है, वह साधन है । (1.7) प्रधिकरण- अधिकरणमधिष्ठानम्-अधिष्ठान या आधार अधिकरण है । (1.7) स्थिति स्थितिः कालपरिच्छेद:-जितने काल तक वस्तु रहती है, वह स्थिति है । (1.7) विधान विधानं प्रकार:-विधान का अर्थ प्रकार या भेद है । ( 1.7) सत् सदित्यस्तित्वनिर्देश:-सत् अस्तित्वसूचक है । (1.8) संख्या संख्या भेदगणना--संख्या भेदों की गणना को कहते हैं । (1.8) - सख्य क्षेत्र क्षेत्र निवासो वर्तमानकालविषयः–वर्तमानकालविषयक निवास को क्षेत्र कहते हैं । (1.8) स्पर्शन तदेव स्पर्शनं त्रिकालगोचरम्—त्रिकाल-विषयक निवास को स्पर्शन कहते हैं । (1.8) अन्तर अन्तर विरहकालः-विरहकाल को अन्तर कहते हैं । (1.8) भाव भावः प्रौपशमिकादिलक्षण:-ौपशमिकादि भाव हैं । ( 1.8) अल्पबहुत्व अल्पबहुत्वमन्योन्यापेक्षया विशेषप्रतिपत्तिः–एक दूसरे की अपेक्षा न्यूनाधिक का ज्ञान करने को अल्प-बहुत्व कहते हैं । (1.8)

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