Book Title: Jain Vidya 12
Author(s): Pravinchandra Jain & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 31
________________ आचार्य पूज्यपाद का लक्षण और व्युत्पत्तिपरक दृष्टिकोण - डॉ. रमेशचन्द जैन आचार्य पूज्यपाद अपरनाम देवनन्दि जैन परम्परा के प्रमुख प्राचार्यों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं । उन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया । ये सुप्रसिद्ध दार्शनिक, वैयाकरण, ज्योतिषी और प्रतिष्ठाशास्त्री थे । अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ सर्वार्थसिद्धि में जो तत्त्वार्थसूत्र पर वृत्तिग्रन्थ के रूप में है उन्होंने अनेक शब्दों के लक्षण और व्युत्पत्तियाँ दी हैं । ये लक्षण और व्युत्पत्तियाँ परवर्ती साहित्यकारों के लिए आदर्श बनीं और अनेक लेखकों ने उनका अनुसरण किया । उदाहरणार्थं सर्वार्थ सिद्धि प्रथम, द्वितीय तथा पञ्चम अध्याय के लक्षण और व्युत्पत्तियाँ दी जाती हैं मोक्ष - सम्यक O निरवशेषनिराकृतकर्म मलकलङ्कस्याशरीरस्यात्मनोऽचिन्त्यस्वाभाविकज्ञानादिगुणमव्या बाघसुखमात्यन्तिकमवस्थान्तरं मोक्ष इति (पृ. 1 ) - जब श्रात्मा कर्ममल - कलङ्क और शरीर को अपने से जुदा कर देता है, तब उसकी जो अचिन्त्य स्वाभाविक ज्ञानादिगुणरूप और अव्याबाधसुखरूप सर्वथा विलक्षण अवस्था उत्पन्न होती है उसे मोक्ष कहते हैं । ( प्रस्तावना) सम्यगित्यव्युत्पन्नः शब्दो व्युत्पन्नो वा । प्रशंसा – सम्यक् शब्द अव्युत्पन्न अर्थात् रौढ़िक और - चतेः क्वौ समचतीति सम्यगिति । अस्यार्थ व्युत्पन्न अर्थात् व्याकरण - सिद्ध है । जब

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