Book Title: Jain Katha Sangraha Part 02
Author(s): Kalyanbodhivijay, 
Publisher: Jinshasan Aradhana Trust

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Page 129
________________ आरामसोहाकहा। । नमो सिरिसिद्धचक्काणं। श्री प्रेम-भवनभान-पद्म सदरुभ्यो नमः सिरिजिणिंद-गुरुवेयावच्चोवरि ॥ आरामसोहाकहा ॥ इहेव जम्बूरुक्खालंकियदीवमज्झट्ठिए अक्खंडछक्खंडमंडिए बहुविहसुहनिवहनिवासे भारहे वासे असेसलच्छिसंनिवेसो अत्थि कुसट्टदेसो । तत्थ पमुइयपक्कीलियलोयमणोहरो उम्गविग्गहुव्व गोरीसुंदरो सयलधन्नजाईअभिरामो अत्थि बलासओ नाम गामो । जत्थ य चाउद्दिसि जोयणपमाणे भूमिभागे न कयावि रुक्खाइ उग्गइ । इओ य तत्थ चउव्वेयपारगो छक्कम्मसाहगो अग्गिसम्मो नाम माहणो परिवसइ । तस्स सीलाइगुणपत्तरेहा अग्गिसिहा नाम भारिया, ताणं च परमसुहेण भोगे भुंजताणं कमेण जाया एगा X दारिया, तीसे 'विजुप्पह'त्ति नाम कयं अम्मापियरेहि-जीसे लोलविलोयणाण पुरओ नीलुप्पलो किंकरो, पुन्नो रत्तिवई मुहस्स वहई निम्मल्ललीलं सया । नासावंसपुरो सुअस्स अपडू चंचूपुडो निज्जरा, रूवं पिक्खिय अच्छरासुवि धुवं जायंति ढिल्लायरा ॥१॥ १ चंद्रः। २ शक्रः। ३ शिथिलादराः ।

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