Book Title: Gyansarashtakam
Author(s): Yashovijay
Publisher: Vadilal Mohakambhai Vakil

View full book text
Previous | Next

Page 96
________________ कानबारे माध्यस्था DICASSOCIATIONAL तद्रहितं यथा स्यात्तथा स्थीयतामिति / मनोवत्सो युक्तिगवी, मध्यस्थस्यानुधावति / तामाकर्षति पुच्छेन, तुच्छाग्रहमनःकपिः // 2 // ____ व्याख्या मध्यस्थपुरुषस्य मानसरूपो वत्सः युक्तिरूपां गामनुगच्छति, तुच्छाग्रहवतः पुंसः चित्तरूपो मर्कटः तं पुमांस | | पुच्छेन आकर्षति, यत्र युक्तिः स्यात् तत्र मध्यस्थस्य चित्तं समागच्छेत्, कदाग्रहिणस्तु चित्तं युक्ति कदर्थयेत् // 2 // | नयेषु स्वार्थसत्येषु, मोघेषु परचालने / समशीलं मनो यस्य, स मध्यस्थो महामुनिः // 3 // व्याख्या-वस्वाभिप्राये सत्याः अन्यनययुक्तिखण्डने च निष्फलाः ये नया तेषु नयेषु यस्य मनः पक्षपातरहितसमानखभावं धत्ते स महामुनिः मध्यस्थोऽस्ति / | नियनियवयणिजसच्चा, सव्वणया परवियालणे मोहा / ते पुण ण दिइसमयो, विभयह सच्चेव अलिए वा // (सन्मति. का. १,गा 28) सर्वे नयाः स्वखवक्तव्ये सत्याः सन्ति अन्यस्य वक्तव्यखण्डने असत्याः सन्ति, किन्तु अनेकान्तसिद्धान्तविज्ञः तेषु | नयेषु अयं सत्यः अयमसत्यः इत्येवं न विभजते // 3 // स्वस्वकर्मकृतावेशाः, स्वस्वकर्मभुजो नराः / न रागं नापि च द्वेष,. मध्यस्थस्तेषु गच्छति // 4 // ___ व्याख्या-खस्वकर्मसु कृताग्रहाः स्वस्वकर्माधीनाः स्वस्वकर्मणां फलस्य भोक्तारो ये सन्ति तेषु मानवेषु मध्यस्थाः पुमांसः | रागद्वेषौ नाप्नुवन्ति // 4 // तेषु कर्मोदयेषु ( नरेषु ) मध्यस्थः समचित्तः न रार्ग न घष गच्छति / कीरशा नराः ? वे स्वे कर्मणि कृत आवेशो acar CONTACTOSTOGOSTICA // 8 //

Loading...

Page Navigation
1 ... 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 153 154 155 156 157 158 159 160 161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174 175 176 177 178 179 180 181 182 183 184