Book Title: Gyansarashtakam
Author(s): Yashovijay
Publisher: Vadilal Mohakambhai Vakil
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________________ मानसारे परिग्रहाष्टकम् व्याख्या-बागमकथिताचारस्य पालकः शास्त्रस्य वेत्ता आगमोपदेशकः शास्त्रे यस्यैकाऽद्वितीया दृष्टिरस्ति एतादृग महायोगी परमपदं लभते // 8 // // इति चतुर्विशतितम शास्त्राष्टकम् // 2OVIGermalaeolale // अथ पञ्चविंशतितमं परिग्रहाष्टकम् // न परावर्त्तते राशे-र्वक्रतां जातु नोज्झति / परिग्रहग्रहः कोऽयं, विडम्बितजगत्त्रयः॥१॥ व्याख्या-यो धनानां राशितो नैव परावर्तते कदापि कुटिलतां न जहाति जगत्त्रयं विडम्बितं येनैतादृशः कोऽयं परिग्रहरूपो ग्रहोऽस्ति / सर्वग्रहेभ्यः परिग्रहग्रहो बलीयानस्ति, अस्य गतिनै कश्चिजानाति // 1 // / परिग्रहग्रहावेशा-दुर्भाषितरजःकिराम् / श्रूयन्ते विकृताः किं न, प्रलापा लिङ्गिनामपि // 2 // व्याख्या-परिग्रहरूपग्रहान्तःप्रवेशात् दुर्भाषितरूपां धूलि प्रक्षिपतां जैनवेशधारिणामपि विकारवन्तः प्रलापाः असम्बद्धवचनानि किन यन्ते, अपि तु श्रयन्त एव, तर्हि अन्येषां का कथा कथनीया // 2 // यस्त्यक्त्वा तृणवद्वाह्य-मान्तरं च परिग्रहम् / उदास्ते तत्पदाम्भोज, पर्युपास्ते जगत्त्रयी // 3 // व्याख्या-यो मुनिः तृणवद्धनधान्यादिकं बाह्यं परिग्रह, मिथ्यात्वादिकमान्तरं च परिग्रहं त्यक्त्वा उदासीनः सन् IVJIONacaeracrasalevaaca // 120 //

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