Book Title: Divya Jivan Vijay Vallabhsuriji
Author(s): Jawaharchandra Patni
Publisher: Vijay Vallabhsuriji Janmashatabdi Samiti

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Page 79
________________ श्रद्धांजलियां गुरुदेवकी अन्तिम यात्राका जुलूस अत्यन्त ही विशाल था। लाखों लोगोंने अन्तिम दर्शन करके अपनको भाग्यशाली बनाया। सबकी आंखोंमें प्रेमाश्रु थे। विश्वभरके समाचारपत्रोंमें दिव्य संतके देहावसानके समाचार प्रकाशित हुए और आकाशवाणीसे दिव्यात्माको भावभीनी श्रद्धांजलियां अर्पित की गई। गुरुदेवको विश्वका महान संत, देशप्रेमी, विश्वमित्र, दरिद्रनारायण तथा महान विभूति कहा गया। वे वास्तवमें पुरुषोत्तम थे। आचार्यदेवका समाधि-मंदिर भायखला (बम्बई) के जैन मंदिरके प्रांगणमें स्थित है। वास्तविक मंदिर तो जनमनमें निर्मित है। जर्मन विद्वान डा०फेलिक्ष (Felix Vayli): “आधुनिक समयके सबसे महान जैन गुरु स्वर्गीय श्री विजयवल्लभसूरि, जिनका कुछ मास पूर्व बम्बईमें स्वर्गवास हुआ, मेरी जानकारीमें एक ही ऐसे जैन साधु थे, जिन्होंने सांप्रदायिकताका अन्त करनेका प्रयास किया।" (Times of India, 22-6-1955) आगमप्रभाकर मुनिराज पुण्यविजयजी : “ऐसे युगावतारी पुरुष संसारमें जन्म लेकर सतत कर्तव्यपरायण जीवन पूर्ण कर स्वर्ग सिधारते है तथा समस्त विश्वको कर्तव्यके प्रति जागृत करते हैं।" भारतके वित्तमंत्री श्री यशवंतराव चव्हाण : “सद्गत आचार्यश्रीकी समाज व राष्ट्रकल्याण-कामनाको देखकर मुझे बड़ी खुशी होती है।" ___ आचार्य तुलसी : “ उनकी समन्वयमूलक भावना मेरे हृदयमें ज्यादा गहरी बनी और उनके प्रति मेरी जो आदरभावना थी उसमें वृद्धि हुई।" श्री मोरारजी देसाई : भूतपूर्व उपप्रधानमंत्री : “आचार्य वल्लभसूरिजीके जीवनकी मुझ पर उत्तम छाप पड़ी है। जैनोंको दानवृत्तिको आचार्यश्रीने शिक्षाक्षेत्रमें मोड़ दी। उन्होंने जाति और धर्मका भेदभाव नहीं माना। उनकी समाजसुधारकी प्रवृत्ति अत्यन्त ही प्रगतिशील थी। इन्होंने खादीके वस्त्र पहिने और दारुबंदीके कार्यक्रम में पूर्ण सहकार दिया।" . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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