Book Title: Anusandhan 2015 08 SrNo 67
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 48
________________ जून २०१५ - बुध नयविजय गुरु राजइ जी, सीस श्रीजसविजय गाजइ जी । सीस तत्त्व जंप धरी नेह जी, ध्याओ गिरुओ गुरु एह जी ॥७॥ ५. विजयप्रभसूरिभास कास्मीरी मनमां धरी, अति ऊलटी हे वाणी दिओ सार कि । थुणसुं श्रीतपगछधणी, मुझ हियड हे अति हर्ष अपार कि ॥१२॥ मजरो हमारो मानयो, गुणवंता हे श्रीविजयप्रभसूरि कि । मुख दीठइ हे दुख नासह दूरि कि.... श्रीविजयदेवसूरीसनि, पाटि प्रगट्यो हे अभिनवो दिणंद कि । गुरुदरिसन सहु वांछतां प्रह ऊठी हे नमइ सुरनरवृंद कि ॥२॥ गुरुमुख पूनिमचंदलो, देखी हरखइ हे भविकचकोर कि । जेहन जेहसुं प्रीतडी, मेह देखी हे हरखड़ जिम मोर कि ||३|| चंदमुखी सरिखी भली, मृगनयणी हे मननई उल्लास कि । सोल शिणगार सजी करी, टोल टोलइ हे गाइ गुरुगुणभास कि ||४| सिवगणसा सुत सुंदरु, मात भाणी हे सिलई सिरदार कि । वीरकुंमर जेणइ जनमिआ सुखकारी हे तपगछ जयकार कि ॥५॥ सोहम - जंबू सारिखो, गुरु पाम्यो हे मई पुण्यपसाय कि । नित नित ऊठी जेहना पाय नमतां हे आणंद थाय कि ||६|| पंडितमांहि पुरंदरु, श्रीनयविजय हे गुरुजी सुखकार कि । सीस श्रीजस चूडामणी, तस सेवक हे तत्त्वविजय जयकार कि ||७|| ॥ इति श्रीविजयप्रभसूरिभास संपूर्ण ॥ ॥ दूहा ॥ चूकइ सहट किस्या ते साजन, सज्जन ते जे सहट मलइ । ते सज्जन किम मानइ, कह्या पछी कथन गलइ ॥ गणि श्रीतत्त्वविजयलिपीकृतमस्ति श्राविकाहीरबाइपठनार्थम् ॥ शुभं भवतु ॥ शुभवासरे ॥ * * * ९१ १. सरस्वती । ९२ अनुसन्धान-६७ बाई मदेकवरती बार व्रतनी दीप - - सं. मुनि धर्मकीर्तिविजयजी गणि सं. १८८४ नी सालमां पं. धनविजयजी, माणेकविजयजी पासे बाइ मदैकवर नामना श्राविकाए सम्यक्त्व सहित बार व्रत ग्रहण करेलां. ते बार व्रतनी नोंध धरावता हस्तलिखित ओळियाना आधारे प्रस्तुत सम्पादन थयुं छे. नोंधमां ते ते व्रतनी अन्तर्गत उपयोगी अनेक वातो प्राप्त थाय छे. अनुसन्धानमां आ पूर्वे घणी गद्यात्मक पद्यात्मक प्राकृत गुर्जर बार व्रतनी नोंध प्रकाशित थयेली छे. ते श्रेणिमां ज आ ओक टीपनो उमेरो थाय छे. १९मी सदीनी आ टीप धार्मिक, भाषाकीय, सांस्कृतिक जेवी अनेक दृष्टि अध्ययन-योग्य जणाय छे. अथ बारे व्रतनी टीप कंचित् लिख्यते । अथ समकीतनो वीचार देव श्रीवीतराग अढारे दोष रहित, चउत्रीस अतीसय, पांत्री वांणी गुणें करि सहित. तेना च्यारे न (नि) खेवा साचा करी सदहूं, गुरु सुसाधु मुनीराज पांच माहाव्रतना पालणहार, सतावीस गुणें करि सहित, द्रव्य - खेत्र-काल- भावें करि संयमना खप करता ते गुरु कही सदहूं. धरम श्रीकेवलीनो परुप्यो. सरव जीवने सुखदाई. दयामुल, आज्ञामुल साचो करी सदहूं. ए त्रण तत्त्व साचां सदहूं. द्रव्यलिंगी यथासगते मोक्षमारगना दाता जाणी नमुं नमावुं कुदेवकुगुरु-कुधरम परिहरु परिहरावूं. हरी-हर-भ्रमा-विष्णवादिक देव तरण तारण जाणी न नमुं - नमावूं. दाक्षणे लोकीक कारणे परनी अनुजाईई परवसे कतोहलादिक कारणे जेणा. गोतरदीवी, भेरव, खेत्रपालादिक देवता इहलोक अरथें तथा धरम सहाय्य अरथें मांनवा-पुजवांनी जेणा. दिन प्रतें सती जोगवाई सती सगतें देवदरसण करवूं. मारगें चालतां तथाकारणें जेणा, परवसे जेणा. मास प्रतें दिन ५ गुरु वांदवा. कारणें परवसें जोगवाई न बनें तो जेणा दिन प्रतें नोकरवाली १ नोकारनी गणुं न गणाई

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