Book Title: Antardvando ke par
Author(s): Lakshmichandra Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 167
________________ 1042 1044 158 1571 161 176 342 देवेन्द्र सि० देव 484 परिशिष्ट । दिवाकरनन्दि 1050 अ0 1100 1041 मू० दे० पु० । इस लेख से यह गुरुक्रम विदित होता है देवेन्द्र सि० देव दिवाकरनन्दि 52 53 भानुकीत्तिमुनि - प्रभाचन्द्रसि०देव मेषचन्द्र ० देव मलधारिदेव शुभचन्द्र देव सि० मु० 170 __1039 मू० दे० । पोय्सल राजसेट्टि ने इनसे दीक्षा ली। 174) 1041 इनकी एक शिष्या ने पट्टशाला (वाचनालय) स्थापित कराई। ये 136 1043 विष्णुवर्धन नरेश की रानी शान्तलदेवी के गुरु थे। उनके निर्माण 162 1045 कराये हुए सवतिगन्धवारण मन्दिर के लिए इन्हें ग्राम आदि के दान 1050 दिये गये थे। " लेख के लेखक वोकिमय्य के गुरु। 136 ____1043 ये मुल्लूर निवासी थे (मुल्लूर कुर्ग में है) । नृपकाम पोय्सल के आश्रित एचिगात के गुरु थे। 176 176 - 54 55 चारुकीत्ति देव कनकनन्दि 131

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