Book Title: Patli Putra ka Itihas
Author(s): Suryamalla Maharaj
Publisher: Shree Sangh
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - શ્રી યશોવિજયજી જૈન ગ્રંથમાળા દાદાસાહેબ, ભાવનગર, Benese-2020 : 5270008 वन्देवीरम* पुत्रका इतिहास पुE AIMIL लेखक-- खरतर गच्छाधिराज जं० यु० प्र० वृ० भ० श्री पूज्यजी श्रीजिनरत्न सरिजी महाराजके शिष्य पं० प्र० यति श्री सूर्यमलजी महाराज। प्रकाशक श्री संघ पटना प्रथम वार मूल्य || www.umar van handlar.com Shree sudharmaswami Gyanthandar-Umara Surat Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रोमज्जैनाचार्य जं० यु० प्र०वृ० भ० श्री पूज्यजी श्रीजिनरल सूरिजी महाराज । han Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री महाकाल कर - श्रीन श्रम भजी महाराज का मामला सादर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रोमज्जैनाचार्य जं० यु० प्र०वृ० भ० श्री पूज्यजी श्रीजिनरत्न सूरिजी महाराज। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara. Surat www.umaragyanbhandar.com Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रातम्मरणीय पूज्यपाद, श्रीगुरुजी महाराज जं० यु०प्र० पृ० मट्टारक श्री १००८ श्रीपूज्यजी श्रीजिनरल सूरिजी महाराज कर कमलोंमें सादर समर्पित । सूर्यमल पतिः Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ <<<<<<<<<<<< पुस्तक मिलने के पते सेठ सङ्गलचन्द शिवचन्द चौक झाबक · बाजार, पटना सिटी जैन श्वेताम्बर, नवयुवक समिति नं० ३१ बांसतल्ला गली, कलकत्ता । बाब बुधसिंह जौहरी, ठि० बाड़ेकी गली, पटना सिटी । MERELEASESSES Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ श्रीः ॥ भूमिका कहने की कोई आवश्य कता नहीं हैं, कि माज कल सभ्य संसार पुस्तके महत्व तथा उपयोगिताको समझने लग गया है और उसकी दृष्टि पुस्तकोंका प्रणयन एवं प्रकाशनकी ओर आकृष्ट हुई है एवं नित्य नयी नयी पुस्तकोंका माविर्भाव हो रहा है। सबसे अधिक हर्ष की बात यह है, कि इन दिनों अधिक पुस्तकें सामाजिक धार्मिक तथा ऐतिहासिक लिखी जा रही है, यह देश के लिये भावी उन्नति तथा सौभाग्यका सूचक है। ___यह प्राकृत पुस्लक (पटनेका इतिहास ) जिसके विषय में मैं दो पक शम्द लिखनेको प्रस्तुतु हुमा हं यह ऐतिहासिक पुस्त. कंके लेखक...३१...पांशतल्ला गल्ली जैन पोसालके अध्यक्ष जैन गुरु पं०७० श्रीमान् सूर्यमलजी यति है और प्रकाशक श्री संघ पटना है। यद्यपि यह पुस्तक आकारमें बहुत छोटी होनेके कारण इस पुस्तकमें इतिहास को बहुत सी मावश्यकीय गति लिखी न जासकी है तो भी यह पुस्तक बहुत उपयोगी तथा विशेष भादरणीय है। इस पुस्तकमें सभी बातें उपयुक्त तथा प्रामाणिक लिखी हुई है व्यर्थ तथा अनावश्यक एक भी बात नहीं है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (ख) देखनेसे स्पष्ट विदित होता है, कि लेखकने. अन्वेषण करनेमें सभी सम्प्रदायके अनेक ग्रन्थोंको भली भांति अवलोकन करके विषय चुननेका बहुत बड़ा प्रयास किया है। इस पुस्तकमें प्रधानतः जैन समाजके विषयमें तो सभी पति लिखी हुई हैं तथापि अन्य समाजके लिये भी यह पुस्तक अति उपकारी है कारण कि लेखक महोदयने अन्य समाजकी भी अनेक आवश्यकीय तथा छिपी हुई बातोंपर प्रकाश डाला है। पुस्तकके अन्त्यमें परनेका भौगोलिक विवरण तथा प्राकृतिक दृश्य वर्णन सर्वसाधारणके लिये लामदायक हैं। बल्कि पटने की यात्रा करनेवालोंके लिये तो यह पुस्तक डायरीका काम दे सकती है। इस पुस्तकके सहारे मनुष्य बिना किसीसे पछे ताछे आनायास पटनेके दर्शनीय स्थानों पर पहुंच सकते हैं। अस्तु यतिजी महोदयका इस प्रकार को पुस्तक लिखनेका उद्योग एवं परिश्रम प्रशंसनीय, अनुकरणीय तथा श्लाघनीय है। कि मधिक विषु। माघ कृ० १४१ पाण्डेय जयनारायण शर्मा का व्या० तीर्थ सं० १६८ . . . Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ श्री: ॥ वक्तव्य उस परमाराध्य अपने इष्टदेवजीकी कृपासे मैं आज आप महानुभावोंके सन्मुख पाटलिपुत्र "पटनेका इतिहास" नामकी एक छोटी परमोपयोगी पुस्तक लेकर उपस्थित हुभा हूं। ____ मर्वमाधारण जानते हैं, कि प्रयोजनमनुदिश्य पामरो पिन प्रवर्तते ___ कोई भी मनुष्य किसी न किसी प्रोयजनको लेकर ही किसी कामको करनेके लिये प्रस्तुत होता है, योंही नहीं इम पुस्तकके लिखनेका मुख्य प्रयोजन यही है, कि वर्तमान पटना मगर जो किमी दिन जैन श्रावक समुदायसे प्रति पूर्ण भरा हुआ था।माजममयकं फेरसे वहां जैनियोंकी संख्या बहुन हो कम है। मोमी जैनियों के प्राचीन कीर्तिस्तम्भ अनेक श्री जिनमन्दिर मखमी जैनियोंके अस्तित्वको मूमित कर रहे हैं। उनमें भी मन्दिर जीर्ण हो जानेके कारण गिरने योग्य है। उनका जीणोधार करनेका विचार पटने के जैन मंघने किया है। किन्तु यह काम बहुत पहा है अपना सम्पूर्ण जीन भ्रातृ वर्ग इस कार्यमें योगदान न देगें केवल पटना निवामो जैन भाइयोंसे होगा असम्भव नहीं मोकठिन अवश्य है। मनएव उन मंघने परनेका संमिम इनि. हाम लिगने के लिये मुझे बाध्य किया कारण कि विनजाने नही होही प्रीति प्रीति विना नहीं होहो प्रतीनी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मैंने भी इस पवित्र कार्यके करने में अपना पुण्योदय समझा और प्राचीन इतिहासके अनुसंधानमें लग गया। एक तो पटना ऐसाही स्थान है जहांके एक एक विषयों को लेकर भी लिखा जाय तो अनेक बड़ी बड़ी लम्बी चौड़ो पुस्तके हो सकती हैं दूसरे ऐतिहासिक पुस्तक लिखनेका अपने जीवन में प्रथम अवसर है इसलिये अनेक कठिनाइयोंका सामना करना पड़ा है। यद्यपि मैं इस पुस्तकके निर्माणमें केवल मालाकार ( माली ) काही अनुशरण किया है तो भी इतिहासको वाटिकामें घुल कर पुष्प चुनने में अपनी यथा बुद्धि कोई कसर नहीं रखी है। इस पुस्तकमें लिवा कामके व्यर्थ एक भी बात नहीं रखा गया हैं। इस पुस्तकके पढ़नेसे केवल पटने की प्राचीन अवस्था काही ज्ञान नहीं बल्कि भव्य भावनायुक्त महापुरुषों के सच्चरित्रले पाठक आत्मकल्याण भी कर सके इस पर भी पूर्ण ध्यान दिया गया है । किन्तु इसमें मैं कहाँ तक सफल हुआ हूं यह पाठक ही विचार करेंगे। मुझे पूर्ण आशा है कि जैन समाज इस पुस्तककी अवश्य अपनावेगी तथा श्रद्धा और प्रेमके साथ इस पुस्तकको आद्योपान्त अध्ययनकर अलभ्य लाभ उठावेगी और जिस उद्देशको लेकर यह पुस्तक लिखो गयो है उसको सिद्धि में भी पूर्ण सहायता करेगी । अस्तु मैं श्रीमान् बाबू पूर्णचन्द्रजी माहर एम० ए० एल० एल० बो.. को हार्दिक धन्यवाद देतो हूं इन्होंने परिशिष्टपर्व नामकी पुस्तक प्रदान करके इस पुस्तकके निर्माणमें बहुत कुछ सहायता की है। तदनन्तर सारस्वत क्षत्रिय विद्यालयके अध्यापक श्री.पं० जयनारायणShree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [ ६ ] जी पाण्डेय काव्य व्याकरण तीर्थ महोदयका मी अतिशय कृतज्ञ हूं और धन्यवाद देता हूं जिन्होंने अपना अमूल्य समय देकरतथा असोम परिश्रम उठाकर संशोधनादिके द्वारा इस पुस्त कको सर्वाङ्गसुन्दर बनाने में योगदान दिया है। पुनः सर्वतो भावेन श्रीसंघ पटनाको कोटिशः धन्यवाद देता हूं, जिसने इस पुस्तके प्रकाशित करने में अपना द्रव्य सदुपयोगमें व्यय करके पुण्योपार्जन किया है जो कि अन्यस्थानीय संघोंके अवश्यानुकरणीय है । मैं सेठ दापवन्दना श्रावक नया श्री बाबू बुधसिंहजो जोहरीको अनेक बार धन्यवाद देता ह और उनका विशेष आभारी इन महानुभावोंने ही इस पुस्तकके निर्माणमें प्रोत्साहन नथा प्रकाशनमें पूर्ण यत्न किया है बल्कि इनके ही विशेष आग्रहसे मैं इस पुस्तक लिखने में प्रयत्न शील हुआ हूं। इसके अतिरिक्त मैं उन मब महानुभावोंको हार्दिक धन्यवाद देता है जिनके द्वारा इस पुस्तक लिखने में मुझे किसी भा प्रकारका महाना प्राप्त हुई है। मंने अपना यथा बुद्धि पटनेके जानने योग्य प्राचीन तथा नवान ऐतिहामिक वृत्तान्त इस पुस्तकमें प्रायः संक्षेपमें अवश्य लिम्न दिये हैं तथामिविरक कठिन होने के कारण सम्भव है किम्बल विशेग्में जुटी रह गया होगो नया पूर्ण सावधानीसे मंशोधन करनेगर भी दृष्टि दोषसे कहीं कहीं भूलं रह गयी होंगी उन्हें पाठक क्षमा करेंगे एवं त्रुटियोंकी सूचना दे अनुगृहीत करेंगे जिससे द्वितीय संस्करणमें उनका सुधार दिया जाय । यदि मजन गण इस पुस्तकको भी पहिली पुस्तकोंके समान अपनायेंगे तो आशा है कि मप्रिय वर्णमें अन्य नवीन पुस्तक लेकर समाजके सम्मुख हपस्थित होऊंगा। सूर्यमल ति Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 16 F1Em Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन गुरू पं० प्र० सूर्यमलजी यतिः। वलकत्ता। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara. Surat www.umalagyan nende Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन गुरू पं० प्र० सूर्यामलजी यतिः। कलकत्ता। Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ श्री जिनाय नमः ।। ॐ वन्दे वीरम् छ (मङ्गला चरण) वदनकान्तिविभाजितदिमुख, मुनिजनोच्चयसेवितपङ्कज । भवभृतांभवभावविभासक, विभर मे जिनवीर सुवाञ्छितम् ॥ १ ॥ ___ मङ्गल जनक सुख शान्ति-जलके प्रभुप्तधन घन लाइए । करुणाद्र हो कारुण्यकी धारा प्रभो वरसाइये कर ज्ञान सूर्योदय सकृतिपथ ज्योतिमें प्रभु लाइए । अब ह्रास सीमा हा चुकी सुविकाश माग दिखाइये ।। १ । पटनेका संक्षिप्त विवरण । * गध देशका शिरोभूषण पटना नामका नगर बिहार म प्रान्त में गारथी नदीके दक्षिण नटपर स्थित है। प्राचीन काल में यह नगर पहुन विस्तृन मोर अत्यन्त ऐश्वर्यशाली था। कपियोंकी वर्णमासे मालूम होता है, किमिमी दिन यह नगर बहुमूल्य रसाबित मध्य भवनों, बोपन-मनीष Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लिक ( २ ) उद्यानों, विमानोपमीय देवमन्दिरों तथा चैत्यालयोंसे विभूषित इन्द्रपुरी अमरावती एवं कुबेरपुरी अलका को भी मात कर रहा था। ___ यहाँके निवासी रोग-शोक, दुःख-दारिद्य्, भय और वाघासे रहित थे एवं सदा लोकातिशायी-स्वर्गीय सुखोंका उपभोग करते थे। इसी नगरमें ब्रह्मचारी कुलावतंश अतिधारा-व्रत-पालक महात्मा स्वामी स्थूल भद्रजीका जन्म तथा महामान्य सुदर्शन सेठको केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। अतएव यह नगर जैनियोंके लिये परम पवित्र तीर्थ स्थान हैं ही; किन्तु जैनेतर वैदिक बौद्ध, सिक्ख आदि अन्यान्य सम्प्रदायवालोंका भी प्रधान धर्म स्थान है । क्योंकि कोई ऐसा धर्म या सम्प्रदाय नहीं हैं जिसका प्रचार यहाँ किसी दिन चरम सीमा तक न पहुँचा हो और न कोई ऐसा समाज ही है, जिसमें जाति-हितैषी, पारदर्शी, तत्व. ज्ञानी, सिद्ध पुरुषोंका आविर्भाव न हुआ हो। यही कारण है, कि प्रत्येक सम्प्रदायके ग्रन्थोंमें इस महानगरके बिषयमें प्रचुर उल्लेख मिलते हैं। सभी समाजके विद्वानों ने इस नगरकी वर्णनामें कलम उठायी और अपने जन्म तथा पाण्डित्यको सफल बनाया है। सुदूर प्राचीन कालमें यह नगर कुसुमपुर, पुष्पपुर और पाटलिपुत्रके नामसे विख्यात था; किन्तु इस समय केवल 'पाटलिपुत्र' या 'पटना' के नामसे ही प्रसिद्ध है। कोई कोई कहते हैं, कि मुसलमानोंके शासन कालमें इसका नाम अजिमाबाद.भी था, किन्तु इर.का विशेष प्रमाण नहीं मिलता। अतएक.. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३ ) यह नगण्य है। क्तमान समयमें इस नगरका क्षेत्र-फल...१८ वर्ग मील और जन-संख्या १६५१९२ है। यह विहारकी राजधानी मोर व्यापारका स्थान है। यहां बहुतसे इतिहासप्रसिद्ध प्राचीन दर्शनीय स्थान है, जिन्हें देखने के लिये बहुत दूरदूरसे लोग आते हैं। इसका विशेष विवरण 'पटनेका दृश्यवर्णन' शीर्षक लेख में लिखा जायेगा। पटनेका निर्माण-काल सुप्रसिद्ध पाटलिपुत्र (पटना) का निर्माण कब और किसने किया, यह ठीक-ठीक बतलाना कठिन ही नहीं, असम्भव भी है। क्योंकि कवि कालिदासने अपने रघुबंश नामक महाकाव्यक ठेसके श्लोक २४ वें इन्दुमतीके स्वयंबर को वर्णनामें अनेन चंदिन्छसिगृह्यमाणं पाणिं वरं ण्यन कुरु प्रवेश प्रासाद वातायन संश्रितानां नेत्रोत्सवं पुष्प पुगङ्गानानाम् पुष्णपुरके नामसे पटनेका उल्लेख किया है। स्वयंवरा महारानी इन्दुमतीका विवाह मर्यादा पुरुषोतम श्रीराचन्द्र के पितामह महागजा मजके साथ दुभा था। इससे पारामन्द्रज़ो के शासन काल पूर्वमे पाटलिपुत्रका होना निश्चय है। इसके पनिरिक महामाप्यमें "अनुशाणं पाटली पुत्रम् महाARA "जामन्दकी चाणक्य के द्वारा माहित होनेकी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ४ ) भावष्य वाणी की हुई है। दण्डिने अपने गद्यकाव्यके दशकुमार चरित्रमें “अस्ति मगध देश शेषरीभूताः पुष्पपुरी नाम नगरी” विशाखदत्तने मुद्राराक्षस नामक नाटममें “सखे विराधगुप्त वर्णयेदानिं कुसुमपुरबत्तान्तम्" विष्णुशर्माने हितोप-देश नामक नीति-ग्रन्थमें "अस्ति भागीरथीतीरे पाटलीपुत्रनामधेयं नगरम्" आदि भिन्नर ग्रन्थों में पटनेका उल्लेख कियापाया जाता है। इससे समयका निश्चय करना असम्भव होते हुए भी यह निश्चित है, कि यह प्रसिद्ध नगर बहुत प्राचीन और परम पवित्र स्थान है। अस्तु जैन-शास्त्रानुसार पटनेका निर्माण-काल श्रीमहावीर स्वामीके समकाल है। इससे कुछ न्यूनाधिक ३००० वर्ष स्थिर किया जा सकता है । इस महानगरको मगधाधिपति राजा श्रेगिकके पौत्र राजा उदायीने बसाया था। वैदिक-शास्त्र (ब्रह्माण्ड पुराण अ० ११६में)भी इस राजाका प्रमाण मिलता है:“उदायी भविता तस्मात् त्रयोविंश समानुपः ।स वै पुरवरं राजा पृथिव्यां कुसुमाह्वयं गंगायः दक्षिणे कुले चतुस्त्र करिष्यति ।" इसका प्रमाणे इस प्रकार है ! "मगधान्तर्गत चम्पापुरी नामकी नागरीमें राजा श्रेणिकका पुत्र कुणिक य करता था। यह बड़ाही दानी और धर्माता Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ५ ) राजा हुमा। इसके उदायी नामका पुत्र दुआ, जो बल, प्रताप स्था सञ्चरित्र-पालनमें उस समय अद्वितीय था। कालक्रमसे राजा कुणिकने इस असार संसारको त्यायकर स्वर्गारोहण करनेपर उसका पुत्र उदायी राज्यासनपर आसीन हुआ। अप्रतिम ऐश्वर्य प्राप्त करनेपर मी पिताकी मृत्युके शोकसे राजा उदायी सदा उदास रहता था। सम्पूर्ण राज्यमें अखण्ड आशाप्रवर्तन पर भी मेघाच्छन्न सूर्यके समान राजा उदायीका मुख निरप्रभ ( निस्तेज) सा रहता था। राजाकी ऐसी शोचनीय दशा देखकर एक दिन मन्त्री आदि प्रधान पुरुषोंने उनसे उदासी का कारण पूछा। राजाने आँखों में मांसू भरकर बड़े ही विनीत मावसे कहा,-"जब मैं इस ननरमें अपने पिताके क्रीडास्थानोंको देखता हूँ, तब मेरा हदय भर आता है और मुझे बड़ी व्यथा होती है। क्योंकि मेरे हृदयमें पिताजी इस प्रकार बस गये है, कि जब मैं राज-समा, गज-सिंहासन, स्नान, भोजन, शयनादिके स्थान देवता, बट स्मरण हो आता है, कि इन्हीं स्थानेर पिताजी मुझे अपनी गोद में लेकर पैठते थे, स्नान-भोजन आदि करते थे। इससे मेरा हदय समुद्रके समान उछलने लगता है मोर साक्षात् पिताजी देख पड़ते है। ऐसी अवस्थामें पिताजीके देखते हुए राज-चिन्होंको धारण यह सर्वथा अनुचित है मौर विनय गुणका भंग होता है मतपय इस राज भवन में रहकर मेरे यस शोक दूर होना एकान्त मसम्भव सा प्रतीत वा है।" मा सदायोंके मुलसे इस प्रकार शोक एवं सन्तापसे Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भरे हुए बत्रन सुन कर स्वामी हितेउछु राज कर्मके प्रवीण मन्त्री वर्गने कहा,-."स्वामिन ! इप्टका वियोग होनेपर संसार में किसे दुःख नहीं होता? और माता-पिता सदा किसके जीते रहते हैं ! आपके पिता श्रीकुणिक महाराजकी भी उनके पिता श्रेणिकके मरनेपर यही अवस्था हुई थी; परन्तु जब उनका वित्त राजगृह-नगरमें स्थिर न हुआ, तब उन्होंने यह चम्ग-नगरी बसायी यी और यहाँ रहकर अच्छी तरह राज्य-पालन किया था। इसलिये आपका भी यदि यहाँ रहकर शोक दूर न हो, तो माप भी कहीं अच्छी जगह तलाश कराकर नवीन नगर बसाइये और वहीं राजधानी बनवाये। यह सुनकर राजा उदायोने ऐसा ही किया नैमित्तियों ( ज्योतिष विद्या जाननेवालों) को बलाकर आज्ञा दे दी कि नवीन नगर बसानेके लिये कहीं अच्छो भूमि देखो। राजा उदयीको आज्ञा पाकर नौमित्तिक प्रदेश देखनेके लिये यत्र-तत्र जंगलोंमें निकल पड़े। अनेक स्थानोंको देखते हुए वे गंगा नदीके किनारे एक रमणीय स्थानमें जा पहुंचे। उन्होंने वहांपर पुष्पोंसे लहलहाया सघन छायावाला एक 'पारलि' -वृक्ष देखा। उस मनोहर वृक्षको देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए और अपने विद्या. बलसे विचार किया, तो उनके ध्यानमें आया, कि यह नवोन नगर बमाने-योग्य अति श्रेष्ठ भूमि है। यहाँ राजधानी बनानेसे राजाको स्वयमेव ही सम्पदाएं प्राप्त होतो रहेंगी। सब नैमित्तिकोंने मिलकर यही निर्णय किया और राजाके पास जाकर कहा, "राजन् ! हमने बहुत स्थान देखें, परन्तु गंगा-नदीके Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ७ ) तटपर एक ऐसा रम्य स्थान है, कि यदि वहां नगर बसाया जाये, सो राज्यकी वृद्धि होगी और प्रजाको मो एवं प्रकारका सुख होगा।" उन्हीं नैमित्तिकों से एक वृद्ध नैमित्तिकने पाटलिवृक्षकी उत्पत्तिके विषय में निम्नलिखित (उपाख्यान) कथाका वर्णन किया। पाटलि बक्षकी उत्पत्ति तथा । अनिका पुत्राचार्यका चरित्र। इसी मगध-देशमें मथुरा नामके दो नगर थे; एक उत्तर मथुरा और दूसरा दक्षिण मयुरा कहलाता था। ये दोनोंही मगर बड़े रम्य तथा समृद्ध थे। उत्तर मधुरामें देवदत्त नामका एक ऐश्व. र्यशाली यणिक रहता था। एक दिन वह वागाके निमित दक्षिण मयुगमें गया। यहां भी जयसिंह नामका एक पणिक रहता था। यह धन-धान्यसे युक्त प्रसिद्ध व्यक्ति था। देवदत्तके यहाँ कुछ दिन रह जानेपर उसकी जयसिंहके साथ गाढ़ी मित्रता हो गयी। जयसिंह पत्रिका नामकी एक परम सुन्दरी कुमारी बहिन थी। एक दिन जयसिंहने देवदासको भोजन करने लिये अपने यहाँ निमन्त्रित किया। दोनों मित्र एक साथ ही मोमन करने के लिये अपने-अपने मासमपर है। उनके 8 जानेपर अनिका सुन्दर सुन्दर बन्न नया पहुमूल्य मलमासे मलंकन होमपने माई तथा इनके मित्र दोनोंदेपालमें भोजन परोसकर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat ___www.umaragyanbhandar.com Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८ ) आप पंखा करने लगी । उस समय अन्निकाका अलौकिक सौन्दर्य देखकर देवदत्तका मन इस प्रकार विवश हुआ, कि भोजनका स्वाद भी कुछ मालूप नहीं हुआ; किन्तु मित्रता किसी प्रकारका फ़र्क न आ जाये, इसलिये भावको छिपाकर स्थिरता से जीमता रहा । भोजन कर लेनेके बाद जय सिंहसे रुख़सद पाकर देवदत्त अपने मकानपर चला गया; परन्तु उसका मन मयूर वहीं नृत्य करता रहा । वह अपने मनोगत दूसरे दिन देवदत्तने अपने एक वृद्ध नौकरको जयसिंहके पास अग्निकाके साथ विवाह सम्बन्धका प्रस्ताव करनेको भेजा । उस समय वृद्ध नौकरने वहाँ जाकर बड़े नम्र तथा गम्भीर बचनोंसे अम्निकाका विवाह देवदत्तके साथ करनेके लिये जयसिंह से कहा । जयसिंह उसकी बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और बोले, – “देवदत्तको मैं अच्छी तरह जानता हूँ। वह सर्व - कला का जानने वाला रूप-गुण-सम्पन्न और कुलीन व्यक्ति है । ऐसा वर मिलना बड़े ही सौभाग्यकी बात है; किन्तु दुःख यही है, कि वह परदेशी है और मेरी बहिन मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्यारी है। उसका क्षणभर के लिये भी अलग होना मेरे लिये असहा है । देवदत्त के साथ विवाह करदेनेपर मुझे वाध्य होकर देवदत्त के साथ उसे भेज देना पड़ेगा यह मुझसे नहीं हो सकता । अतएव यदि देवदत्त सदा के लिये मेरे घर रहना मंजूर करें, तो मैं खुशी से उनके साथ अपनी बहिन का विवाह कर दे सकता हूँ । नौकरके द्वारा देवदत्तको यह बात मालूम हुई। उसने ; Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ६ ) जयसिंहके घरपर रहना मंजूर कर लिया। जयसिंहने भी बड़ी धमधामसे अपनी वहिन “अन्निका" का देवदत्तके साथ विवाह कर दिया। विवाहके गद वे दोनों दम्पति परस्पर प्रेममें लीन हो. Rinाकि सुखोंको मोगते हुए बहुन समय दक्षिण मथुरामें हो व्यतीत किया। एक दिन अचानक देवदत्तके माता-पिताओंका भेजा हुआ एक पत्र माया,जिसे पढ़कर देवदत्तके नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लगी, किन्तु कहीं अनिका देख न ले, इसलिये रुमालसे मपने नेत्रोंको पोंछ लेते थे। तो भी अनिका अपने पतिके उदास मुख मण्डलको देखकर ताड़ गयी, कि आज कुछ न कुछ प्राण प्यारे पतिको दुःख अवश्य हुआ है। अतएव वह आप भी अश्रुपूर्णनेत्रोंसे कहने लगी, - "स्वामिन् ! आज आपकी ऐसी दशा क्यों है? यह पत्र किसका है। यह पत्र भी कोई माधारण नहीं, मालम पड़ता: क्योंकि इसके देखनेसे आपकी आँखोंसे आंसुओंकी धाग बह रही है। और वह आँसू भी हर्णके नहीं, बोदके देख रहते हैं। अतएव आप शीघ्र कहिये. कि इसमें क्या रहस्य है?" यह सुन देवासने कुछ उत्तर नहीं दिया: गलिक मुंह नोचा कर लिया। इसपर अनिकाने और भी उत्कष्ठा से देवदत्तके हाथ से उस पत्रको ले लिया और स्वयं बांचना शुरु किया। उस पत्र लिखा था: -- "भावां हि चक्षुविकलो,चतुरिन्द्रियतांगतो। जराजजरसर्वागावासन्नयमशासना।। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( १० ) आयुष्मन्नपिजीवन्तौ कुलीनस्त्वं पदृचसे । तदेहयुद्वापयदृशावाबयोरुदतोसतोः ।। अर्थात् - तेरे वियोग से हम चक्षुविहोन हो, चौरिन्द्रियपनको • प्राप्त हो गये तथा बुढ़ापेसे निर्बल होकर यमराजके समीप आ गये हैं । हे आयुष्मन् ! हे कुलीन ! यदि तू हमें जीता हुआ देखना चाहता है, तो शीघ्र आकर हमारे नेत्रोंको शान्त कर ।" :.. अन्निका पत्रको वाँचकर बोली, -- स्वामिन्! आप इस ज़राली बातपर इतने शोकातुर क्यों हो रहे हैं ? आप इसकी कुछ भी चिन्ता न करें। मैं अभी जाकर अपने भाईको समझा देतो हूँ । आपका मनोरथ पूर्ण हो जायेगा | यह कहकर अनिका चली गयी और शीघ्रहो अपने भाईके - पास पहुँचकर बोली, “भाई ! आप विवेकी होकर ऐसा क्यों कर रहे हैं ? आपका बहनोई अपने कुटुम्बके बियोग में दुखी हो रहा है और मैं भी अपने सास-ससुर के दर्शन किया चाहती हू । इसीलिये आप उन्हें अपने घर जानेकी आज्ञा दे दीजिये। यदि वे अपनी प्रतिज्ञासे बंधे रहनेके कारण न भी जायेंगे, तो मैं अवश्य जाऊँगी ।" जयसिंहने जब अन्निकाका ऐसा बचन सुना तब किसी प्रकार अपने मनको धैर्य देकर उसने अपने बहनोईको घर जानेकी आज्ञा दी । आज्ञा पाकर देवदत्तने भी बड़ी प्रसनता के साथ अपनी प्राण प्यारी अन्निकाको साथ लेकर उत्तरमथुराकी यात्रा की । अनिका उस समय आसन्न प्रसवा थी । अतएव मार्ग में ही समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त एक दिव्य Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ११ ) - पुत्र-रन उससे उत्पन्न हुआ। उस पुत्रको देखकर दोनों दम्पतीके वर्षका पार न रहा । देवदत्तने विचारा कि घर जानेपर इस नव जान पुत्रका नाम रखा जायेगा: पर उसके साथ के लोग उसे अनिका-पुत्र कह कर पुकारने लगे । थोड़े दिनोंमें देवदत्त सकुशल अपने नगरमें पहुँचा। और माता-पिता के सामने विनोत मासे खड़ा होकर बोला, – “यह आपकी पुत्रवधू तथा यह शिशु मापका पौत्र है ।" यह सुनकर उसके पिता परम प्रसन्न हुए, उन्होंने लड़केका मस्तक चूमा और वड़े हर्ष के साथ पौत्रका नाम 'सन्धीरण' रक्षा यद्यपि उसका नाम सन्धीरण रखा गया; पर पूर्व अभ्यासके कारण लोग उसे अन्निका पुत्र ही कहते थे । वह चालक बनपनसे ही बड़ा सुशील और सचरित्र था । और कभी कभी संसारकी असारतावर भी विचार किया करता था । युवाबस्था प्राप्त करते ही संसारसे उसका मन विरक्त हो गया। एक दिन उसने अपने माता-पिता मादिसे भाज्ञा लेकर श्रीजयसिंदाखार्य के पास जाकर दीक्षा ग्रहण कर ली । थाड़ हो दिमोंमें उस महात्माने निरतिचार चारित्रसे अपने संबित कर्मरूप कांटेको नूरकर तपकर अग्नि से कर्मरूप मलको मस्मकर दिया और धुत पारग तथा ज्ञान-दर्शन चारित्र में परिणत हो गया। इसके बाद गुरु महाराजने भी इन्हें योग्य सहर आचार्य पदसे विभूविन किया । एक दिन श्रीअग्निका पुत्रावार्य विहार करते हुए गंगा सीर पर "पुष्पमत्र" नामक नगरमें पहुँचे । उस नगर में पुष्प केतु वामका राजा राज्य करता था । उसको रामो का नाम दुष्यनको Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( १२ ) था। वह बड़ी ही साध्वी एवं पतिपगयणा थी। कुछ दिनोंके बाद पुष्पवतीके गर्भसे एक साथ दो सन्तान पैदा हुई, जिनमें एक लड़का और एक लड़की थी। पुष्पके तुने बड़े हर्षसे दोनो सन्तानोंका नामकरण संस्कार किया। लड़केका नाम 'पुष्पचल' और लड़कीका नाम 'पुष्पचला' रखा। ये दोनों शिशु चन्द्रकलाके समान दिनोंदिन बढ़ने तथा परस्पर असीम प्रेमसे रहने लगे। इन दोनेके असीम प्रेमको देखकर राजाने विचारा कि यदि मै अन्यत्र इनका विवाह-सम्बन्ध कराकर वियोग कराऊंगा, तो ये अवश्य वियोगको सहन न कर प्राण त्याग देंगे। अतएव यही उचित है, कि इन दोनोंमें ही विवाह-सम्बन्ध स्थापित करा दें और उन्हें अपने ही घर रखें। स्नेहमें डूबे हुए. राजाने कृत्याकृत्यका कुछ भी विचार न कर अपने पुत्र-पुत्री 'पुष्प चूल' और 'पुष्प चला' का परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध करा दिया। पुष्पकेतुकी रानीने उसे बहुत मना किया, कि आप ऐसा अनुचित कार्य न करें; किन्तु राजाने उसकी एक भी न सुनी। विवाह हो जाने के बाद वे दम्पती नितान्त रागवान् होकर परस्पर गृहस्थ धर्मका अनुभव करने लगे। कुछ दिनोंके बाद 'पुष्पकेतु' परलोकका अतिथि हो गया। पीछे गनीने अकृत्यसे निवारण करनेके लिये पुष्पचूल और पुष्पचूलाको बहुत कुछ समझाया; किन्तु राज्याभिषेक हो जानेके कारण 'पुष्पचूल' स्वतन्त्र हो गया था एवं पुष्पचूलाके साथ उसका अत्यन्त राग था, इसलिये उसने अपनी माताका कहा न माना। जब पुष्पवतीसे यह अकृत्य Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ देखा न गया, तब उसने किसी जैन साध्वीसे दीक्षा ग्रहण करली और घोर तपस्याओंके द्वारा अपना शरीर त्याग कर देवलोकमें जा बसी। कुछ दिनों के बाद पुष्पवतीका जीव-देवताने मवधिझानसे अपने पुत्र-पुत्रीको अकृत्यमें जुड़े देखकर मनमें विचारा, कि ये इन अकृत्योंसे घोर नरकको वेदनाओंको सहेंगे। यह विचार कर 38 देवताने पुपचूलाको स्वप्नमें नरक तथा स्वर्गका दृश्य दिखाना शुरू किया, कि इन दृश्यों को देख वे अकृत्योंसे बचें और दुर्गतिके भागी न बनने पावें। इन स्वप्नोंको देख, पुष्पचूलाने आर्यसे चकित हो, अपने स्वप्नका वृतान्त अपने पतिसे कहा। एक दिन राजाने अन्निका पुत्राचार्यको अपनी सभामें बुलवाया और उनसे स्वर्ग और नरकका स्वरूप पूछा। भन्निका पुत्राचार्य्यन यथार्थ वैसाही स्वर्ग और नरककका स्वरूप वर्णन किया, जैसा कि पुष्प चलाने स्वप्नमें देखा था। पूप्पचलाने हाथ जोड़कर आश्चर्यसे पूछा,-जैसे स्वर्गक सुख मैने स्वप्नमें देखें है, वे किस कर्मके प्रभावसे प्राप्त हो सकते है ?" ___ गुरु महाराज बोले,-"भद्र : सुदेव सुगुरु और सुधर्मके प्रति श्रदा होने तथा जैन-धर्मकी दीक्षा ग्रहण करनेसे स्वर्गापवग सुख मिलते हैं।" इस पानको सुनकर पुष्पचलाको संसारसे वैराग्य हो गया मतपत्र हाथ जोड़कर वह गुरु महाराजसे बोली, - __ "भगवन् ! ये मपने पतिसे पूछकर मापके श्रीचरणों में दीक्षा प्रहण करगी।" Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - आचार्य महाराज 'तथास्तु' कहकर अपने स्थानपर चले गये। और रानी पुष्पचूलाने अपने पतिके पास जाकर दीक्षा ग्रहण करनेका आग्रह किया। राजाने कहा,___“एक तरहसे मैं तुम्हें दीक्षा ग्रहण करनेकी आज्ञा दे सकता हूँ, अन्यथा नहीं, वह यह है, कि दीक्षा लेकर हमेशाही तुम मेरे घर अन्न-जल ग्रहण करो, दूसरेके घर न माँगो, तो मैं आज्ञा ___रानीने यह बात मजूर कर ली और बड़े हर्षसे अग्निका पुत्राचार्यके पास जा दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद पुष्प चला गुरुमहाराजको दो हुई शिक्षाको भलि-भाँति ग्रहण करती हुई गुरु महाराजकी पर्युपासना करने लनी। एक दिन मुक्ति सम्पदाका निदान भून केवल ज्ञान पुष्पचूलाको प्राप्त हो गया; किन्तु केवल ज्ञान होनेपर भी वह गुरु महाराजकी वैसी ही भक्ति करती रही, जैसी पहले करती थी। केवल-ज्ञानको धारण करनेवाली साध्वी पुष्पचला गुरु महाराजके बिना कहे, उनकी इच्छाके अनुसार भोजनादिका प्रबन्ध कर दिया करती थी। इससे गुरु महाराज बहुत ही आश्चर्य किया करते थे। एक दिन पुष्पचला वृष्टि होते समय गौचरी लेकर आ रही थी। जब वह उपाश्रयमें आ गई, तब गुरु महाराजने देखकर कहा,-"भद्र श्रुतज्ञानको पढ़कर एवं जान कर भी तूने यह क्या किया ? बरसातमें साधु-साध्वोको मकानसे बाहर निकलने की मनाई है। इसलिये तुझे ऐसा करना उचित न था।" । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( १५ ) पुष्पवला बोली,-"महाराज! जिस रास्ते अचित (अपकाय) पानी पड़ता था, उस रास्तेसे मैं गौचरी लेकर आयी हूँ। इस. लिये जिनागमके अनुसार कोई अनुचित नहीं; क्योंकि उसमें इस पातका प्रायश्चित भी नहीं है।" पुरीश्वर बोले,-"भद्र ! अमुक रास्ते सवित (भएकाय ) पानी और अमुक रास्ते अवित ( अपकाय ) पामो बरसता है, यह शान तुझे किस तरह हुआ? कारण, कि यह बात बिना अतिशय केवल मानके नहीं मालूम हो सकती।" पुष्पचूलाने कहा,-"महारज ! मुझे आपकी कृपासे केवल झान प्राप्त हुआ है। इसीसे मैं सब कुछ जानती हूं।" ___ यह सुनकर भाचार्य महाराजके मन में केवल ज्ञान प्राप्त करने. की लालसा उमड़ आयी और वे सोचने लगे कि देखे, मुझे इस भवमें केवल ज्ञानकी प्राप्ति होता है या नहीं ? पुष्पचूला इस बातको समझ गयी, और बोली,-“हे मुनिपाव! माप अधीर न हों गंगा नदी उतरते हुए आपको भी इसी भव केवल ज्ञान प्राप्त होगा । यह सनकर भावार्य महाराज गंगा उतरने के लिये कुछ लोगो के संग चल पड़े। वंजा नायपर मार हुए तो वे जिम और गैठे थे, उसी मोरसे नाव दूग्नेको हो जाती थी। इसीलिये वे उन सब मादमियों के बीच में गैठ गये। तातो सारी नाव ही बने लगो। यह देखकर हम सब लोगोंने विचारा कि इस साधु महरजरे ही कारण ना डूब रही है। प्रतएव इस महारमाको, Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( १६. ) समय ही गंगाकी भेंट कर दो। यह सोचकर उन लोगोने आचाय महाराजको गंगा में फेंक दिया । उस समय जलके भीतर एक -ली खड़ी हो गयी और उसपर आचार्य महाराजका शरीर लटक गया । आवार्य महाराज शरीरकी चिन्ता छोड़, ( क्षपक श्रेणी क्षमा मात्र ) पर आरूढ़ हो गये । और ( अन्तकृत ) अन्त केवल - ज्ञान लाभ करके शुक्ल ध्यानमें स्थित हो निर्वाणको प्राप्त हो गये । अग्निका पुत्राचार्यका शरीर जल जन्तुओंने छिन्न-भिन्न कर दिया और उनकी खोपड़ी जल-प्रवाहसे बहती हुई गंगा के किनारे आ लगी । एक दिन दैवयोगसे उस खोपड़ीके अन्दर पाटलि वृक्षका बीज आ पड़ा और वह बीज खोपड़ी के अन्दर ही अंकुरित हो गया । आज वही वृक्ष इस विशालताको प्राप्त हो गया है, जिसे देखते ही मनुष्यों का चित्ताकर्षित होता है तथा केवल ज्ञानी महात्माकी • खोपडीमें उगने से यह वृक्ष बड़ा पवित्र है । इसलिये यहाँ नगर बसाओ। आपको सब प्रकारसे कुशलता और समृद्धी प्राप्त होगी इस (उपाख्यान) कथाको सुनकर राजाने बड़े हर्ष के साथ नैमित्तिकों का कहना मंजूर किया। और उन्हें मान दान देकर सभासे विदा किया। इसके बाद शीघ्रही नौकरोंको उस जगह नगर बसाने योग्य ज़मीन नाप ठीक करनेकी आज्ञा दी। उन्होंने नौकरोंको अच्छी तरह समझा दिया, कि ज़मीन इस तरह ठीक करो, कि जिसमें वह पाटलि-वृक्ष नगरके ठीक बीचोबीचमें भा Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( १७ ) जाये । नौकरोंने राजाको आज्ञाके अनुसार जमोन नापकर उसमें ऐसा मनोहर नगर बसाया, जो अपनी सौन्दर्य-सम्पत्तियोंसे स्वर्गको भो मात कर रहा था । नगरका मध्यभाग देवविमान को निरस्कृत करनेवाले देव-मन्दिरों, इन्द्रकी सभाको लजित करने. वाले राजमन्दिरों और अन्य भाग पुण्यशालाओं, दानशलामों, गठशालाओं और औषधालयों से अलंत एवं विभूषित था। इस अनुपम विशाल नगरका नाम विशाल पाटलि-वृसके मात्रयमें होने के कारण "पालि-पुत्र" रखा गया । राजाने एक शुभ मुहूर्त में अपना प्रजाके साथ उस नगरमें प्रवेश किया। मौर रितवियोगको भूलकर सुम्न पूर्वक राज्य करने लगा। राजा पड़ा हो देवगुरुमक, प्रजागला तथा प्रतापी था। उसके सामने अन्य राजन्यवर्ग अत्त प्राय हो गये। राजा उशयोके प्रचण्ड शासनस हुपर छोट-छाट राजाका नाकमें दम आ गया था, इसलिये म लोग राजा उदायासे द्वंव रखने लगे। एक दिन दायाने किपा अक्षम अगवग 7 खरिडरे राजाका राज्य छोन लिया। और उ अग्ने राज्य से निकाल दिया। वह शशि गजा अपने परिवार के माथ वहां से भाग निकला। यह तया उमका परिवार तो कालक्रम वश परलोक सिधार गये, किन्तु उमका एकमात्र पुत्र पत्र गया, जो उब्जेनमें भाकर माधिपनिकी सेवा करने लगा। उस समय उनापितिमी त्रा उदायोके विरुद्ध था। यह बात उस राष 8 गरी। मौका पाकर उसने उबनाधिपति Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( १८ ) आपकी सहायता हो, तो मैं उदायीको ख़ाक में मिला दूं। यह सुनकर उज्जनका राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उस राजपुत्रसे कहा,-कि यदि तू यह काम कर सके, तो फिर पूछना ही क्या है? किन्तु मेरी समझमें तो यह बिल्कुल असम्भव है। क्योंकि ऐसा कौन है, जो राजा उदायोके प्रजापाजलमें अपने आप शरीर... रूप तृणकी आहुति देनेका साहस करे ? तो भी यदि तू कहता है, तो मैं तेरी सहायता करनेको हर प्रकारसे बैयार हैं। इस प्रकार वह राज-पुत्र उज्जैनाधिपतिकी अनुमति पाकर पाटलि. पुत्रनगरमें आकर उदायी राजाके यहाँ (भृत्य) नौकरीका काम करने लगा । जबसे उसने नौकरी करनी शुरू की,तभीसे वह बरा-- बर अपने (अभीष्ट)मनो इच्छाकी सिद्धिकी चेष्टा करता रहा, किन्तु राजा उदायीको एकान्तमें पाना तो दूर रहा, उनके दर्शन भी नहीं हुए। अन्तमें जब इस प्रकारसं अपना मनोरथ पूर्ण होते न देखा, तब उसने दूसरे उपायका अवलम्बन किया। उसने देखा कि राजाके अन्तःपुरमें आने जानेके लिये जैन मुनियाँको कोई रुकावट नहीं है। अतएव उस धूर्त राज-पुत्रने अन्दर प्रवेश करनेके लिये जैन साधुओंके स्वामी आचार्य महाराजके पास जाकर बड़ाही भक्ति-वैराग्य दिखाकर दीक्षा ग्रहण की। राजाउदायी अष्टमी, चतुर्दशी आदि पर्वतिथियों में पोषध ब्रत किया करते थे। और उस दिन माचार्य महाराज उदायीवो धर्म सुनाया करतेथे । एक दिन राजा उदायीने पौषध किया था। भाचार्य महाराजने सन्ध्याके समय राज-पुरीमें जानेका विचार Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( १६ ) किया। आचार्य महाराजको रात्रिमें राजाके पास रहना पड़ता था। इसलिये जब कभी जाते, तो अपने साथ सबसे अधिक विश्वास पात्र साधुको भी ले जाते थे इस बार उन्होंने उस नये साधु (धूर्त राज-पुत्र) को ही सबसे अधिक विश्वासी समझा क्योंकि उसका वैराग्य और क्रिया देखकर उन्हें उसपर पूरा विश्वास हो गया था । अतएव उन्होंने उसे ही साथ चलनेको कहा । आचार्य महाराजका बचन सुन वह मायाचारी श्रमण मन-ही-मन में परम प्रसन्न हुआ भक्तिका नाट्य दिखाता हुआ आचार्य महाराजकी और अपनी उपधि उठाकर आचार्य महाराजके साथ हो गया। आचार्य महाराजके राजकुल में पहुंचनेपर प्रतिक्रमण आदि किये जानेके बाद राजा उदायी बहुत देरतक उनसे धर्म चर्चा करता रहा। जब रात अधिक बीत गयी, तब आचार्य महराज और राजा उदायी दोनों अपने-अपने (संस्थारक) बिछोने पर सो गये, किन्तु उस धूर्त साधुको निद्रा नआयी क्योंकि " निद्रापि नेति भीतैव रौद्रध्यानवतां नृणाम्।” जब आधी रात बीत गयी, तब उस दुरात्मा साधुने अर्थात् रजोहरण (मोघा ) में से एक तीक्ष्ण छुरी निकाली और उसीसे राजा उदयीका गला काट डाला। और पहरे दारोंसे जंगल जाने का बहाना कर के राजकुलसे बाहर निकल गया। थोड़ी देरके बाद जब माचार्य महाराजकी नींद खुली, और उन्होंने इस महान महत्वको देखा, तब उनका हृदय भर आया । उन्होंने कातर इष्टिसे साधुकी भोर देखा; किन्तु उसका तो यहाँ पर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २०) 'घता भी नहीं था; केवल उसके (संस्थारक) बित्तरेके पास लहू ने भरी हुई एक छोटी सी तेज़ छुरी पड़ी हुई थी । यह देखकर उनको विश्वास हो गया, कि यह पैशाविक कार्य उसी सांधुका है इससे वे चिन्ता समुद्र में डूब गये । आचार्य महारज सोचने लगे कि मैंने जो उस दुष्टको दोक्षा दी तथा विश्वास करके , उले राजकुल में लाया, यही मेरी भूल हुई। अतएव इसके लिये मैं हो दोष हूँ। अब मेरे लिये यही उचित है, कि आत्मत्याग करके प्रवचनका जो उड्डाह होनेवाला है, उसकी रक्षा करू; क्योंकि प्रातःकाल इस अदर्शनीय दृश्यको देखकर सब लोग इस कुकृत्यका कलङ्क मेरे ही ऊपर रखेंगे । ऐसा सोचकर आचार्य महाराजने उसी छुरीको अपनी गर्दनपर भी फेर ली, जिसने राजा उदायीके प्राणोंका अपहरण किया था । सच है, महात्मा मानकी रक्षा के लिये अपनी आत्मा तक दे डालते हैं । प्रात:काल होनेपर शय्यापालक जब पौषधशाला में आये और उस अमङ्गलको देखा, तब उनका शरीर काँप उठा । उन्होंने चिल्लालोगों को पुकारा। फिर तो कहना ही क्या था? शीघ्र सब के सब राज पुरुष वहाँ आ इकट्ठे हुए। राजा उदायी और आचार्य महाराजको लाशें देखकर सबका ही कलेजा कांप उठा, - तथा सबने मिलकर यही निश्चय किया, कि इस मर्मभेदी अका एडको उसी छोटे मुनिने किया है। पीछे यह बांत सर्वत्र फैल गयी सम्पूर्ण राजकुल में हाहाकार मच गया। कोई तो उस साधुके विषय में अनेक तर्क-वितर्क करने और उस दुष्टको भला बुरा कहने कर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २१ ) लगे, कोई आचार्य महाराज और राजाका गाढ़ धर्म-प्रेम, पारस्परिक प्रीति और विश्वासका स्मरण करके अश्रुधाग बरसाने लगे। थाड़ो देरको चारों ओर निस्तब्धता (चिन्ता) सी छा गयी। पीछे मन्त्री-सामन्तोंने उस पापात्माको पकड़नेके लिये चारों तरफ घुड़सवार भेजे, परन्तु उसका कहीं भी पता न लगा। शोक विहल मन्त्रिीवर्ग राजा और मावार्य महाराजकी(औधदैहिक क्रिया) अग्निसंस्कार करनेके वाद धर्म-पूर्वक शासन चलाने लगे । राजा उदायोको मारकर वह दुष्ट शीघ्रही उज्जयिनी नगरी में चला गया और जैनाधिपतिसे उदायीके मरनेका सब हाल कह सुनाया यह सुनकर अवन्तीतिने दयाकी दृष्टिसे उसकी ओर देखकर कहा,-"अरे दुष्ट ! जब तू इतने दिनोंतक दीक्षा ग्रहण करके रात-दिन समता-प्रधान साधुओंके पास रहकर और हमेशा धर्माग्देश सुनकर भी शान्त न हुआ, तथा ऐसा दुष्कर्म करनेसे पीछे न हटा, तब तू मेरा क्या भला करेगा! जा, मुंह काला काके मेरे राज्यसे निकल जा। इस प्रकार कह उज्जनाधिपतिने निरस्कार पूर्वक उसे अपने राज्यसे निकाल दिया। m Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २२ ) राजानन्द तथा उनके मन्त्री कल्पकका विवरणा । राजा उदायीके स्वर्गारोहण करनेके बाद न तो उनके कोई सन्तान थो, न कोई निकट सम्बन्धी हो था, जो उनका उत्तरावि-कारी बनाया जाता; अतएव राज्य कायम रखनेके लिये पाँत्र दिव्य राजकुलमें फिराये। पंच दिव्य इन्हें कहते हैं:- पद हस्ती प्रधान अश्व, जलकुम्भ, छत्र और नामर । (उस समयकी यह प्रभा थी, कि जब कभी ऐसी सन्देह युक्त टेढी समस्या उपस्थित होती तब पाँच दिव्य छोड़े जाते और वे दिव्य यस्तुएँ जिसे स्वीकार करतीं, उसीको यह कार्य भार सौंपा जाता था । इसी नियम के अनुसार पांच दिव्य फिराये गये थे । ) ज्योंही वे नगर में फिर रहे थे, त्योंही वे सामनेसे पालकी में बैठा हुआ एक मनुष्य आता दिखाई दिया। उसे देखकर पद दस्तीने उसके मस्तककोजलपूर्णकुम्भ से अभिषेक किया और सूँड़से उठाकर उसे अपने मस्तकपर बैठा लिया । और दिव्योंने भी अपना-अपना कार्य 'दिखलाकर उसे स्वीकार किया। जैन शास्त्र के अनुसार यह भाग्यवानू पुरुष वेश्या की कुक्षिसे जन्मा हुआ नापितका पुत्र था और इसका नाम नन्द था । उसने एक दिन स्वप्न में पाटलिपुत्र नगरको अपनी आँखों से (वेष्ठित) लिपटा हुआ देखा | नींद खुलने 1 पर वह स्वप्नोंपाध्याके पास गया और स्वप्नके विषयमें पूछा । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २३ ) उपाध्वारने उस उत्तम स्वप्नका वृत्तान्त सुन बड़ी प्रीति पूर्वक नन्दको मपनी लड़की ब्याह दो और उसने लयामरणांसे अलं. हा करके पालकीमें ठाकर, नगर-यात्रा करानेके लिये निकाला ज्या, किदियोंसे मुलाकात हो गयी। (किन्तु भन्यान्य शास्त्रोक मनसे नन्द शुद्ध क्षत्रिय वंशका गजा था। ) पश्चरन दिग्योंक स्वीकार कर लेनेपर मन्त्रियों तथा नगर वासी महापुरुषोंने मिल र सानन्द मन्द' को महोत्सव पूर्वक राज्याभिषेक किया। भगवान् महावीर स्वामी के निर्वाणसे ६० वर्ष बाद राजा उदायीकी राजधानीका मालिक यह पहला नन्द हुआ। उसी नगरमें कपिल नामका एक ब्राह्मण रहता था, उसके एक वालक पैदा हुआ। नाम संस्कार दिन कपिलने माने पुषका नाम कल्पक रखा। जब वह बालक विद्याभ्यास करने के योग्य दुमा, नर कपिलने उसे विद्याभ्यास कराना शुरू किया। प्रज्ञावान् होनेसे पल्पक थोड़ेही समयमें शाला तथा दक्ष हो गया कलाकबग्नसे ही जितेन्द्रिय मोर नेकनियत था। जतएर सर्वसाधारण मनुष्यों को दूष्टि में यह प्रामाणिक गिना जाता था। कुछ दिन बाद माता-गि स्वर्गवास रोनेपर कलाक सब प्रकारले स्वान्त्र हो गया। उस समय पारलिपुत्र में यह के समान विद्वान् गुणवान मोर पस दूसरा कोई न था। इस. लिये वह समस्त नगरवासियोन पूज्यपा। एक दिन राजा ममने की बड़ी प्रशंसा सुनो। मतपत रामाने पस्थित और विमान समझकर कलाकको राम-समाने पुलावा त्या Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २४ ) प्रधान मन्त्रीका पद ग्रहण करनेकी उससे प्रार्थना की। कलाक बड़ा सन्तोषी तथा निर्लोभी था। अतः उसने राजाकी प्रार्थना सुनकर यह उत्तर दिया, कि महाराज! मैं अपने निर्वाह मात्रके सिवा अधिक परिग्रह रखना मनसे भी नहीं चाहता। अतएव मै अमात्य पदवी ग्रहण नहीं कर सकता । इस प्रकार राजा नन्दकी (अवज्ञा) नाफरमानी करके वह अपने घर चला गया। कल्पकका इस प्रकारका उत्तर सुन, राजा नन्दका चित्त क्रोधसे भर गया, किन्तु कल्पकको प्रधान मन्त्री बनाने की लालसा उसके मनसे दूर न हुई । इसके लिये वह नाना प्रकारके प्रपञ्च रचने लगा, जिससे वह इस पदको स्वीकार कर ले। दैवात् एक दिन कल्पक नन्दके प्रपञ्चमें फंस गया। और क्रोधके आवेशमे एक धोवीकी हत्या कर डाली। पीछे राजदण्डके भयसे स्वयं ही राजसभामें जाकर उपस्थित हुआ। उस समय सभाके सदस्य भी प्राय. उपस्थित न थे। इस प्रकार बिना बुलाये कल्पक राजसभामें आया देख, राजा नन्द बहुत प्रसन्न हुए और शिष्टाचारके बाद फिर उसे प्रधान मन्त्रीका पद ग्रहण करनेका आग्रह करने लगे। कल्पक बड़ा दक्ष और अवसरका जानकार था। अतएव उसने उसी वक्त राजाका कहा मान लिया तथा प्रधान मन्त्रीकी मुद्रा. धारण कर राजा नन्दके बराबर बैठ गया। राजाने कल्पकका बड़ा आदर किया और उस दिनसे उसको गुरुके समान सकमने समा। राजाके मनमें बहुत दिनोंसे कई बातोंकी शंकायें थीं। ढन शंकाओंको निवारण करनेवाला अब तक कोई पण्डित बसे Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २५ ) महीं मिला था। अब इस अवसरको प्राप्त करके राजा अपने को धन्य समझता हुआ उन शंकाओंके बारेमें कलाकसे पूछने लगा और कल्पक भी अपनी योग्यता अनुसार गजाकी शंकाओको ( निल)दूर करने लगा। इस प्रकार दोनों में हार्दिक मैत्री हो गयी राजा और मन्त्री दोनों परस्पर मानन्द अनुभव करते हुए सुख पर्वक रहने लगे। कल्पकके मन्त्री पद स्वीकार करनेपर राजा नन्दकी राज्य लक्ष्मी दिन पर दिन बढ़ने लगी. और उनका प्रताप दसों दिशाामें फैल गया। सारांश यह, कि कल्पकके मन्त्री पद पर आसीन हानपर राजा और प्रजा दोनों सुखी तथा प्रसन्न रहते थे किन्तु एक आदमी बहुतही दुःखी था और वह पहला प्रधानमन्त्री था जो पदसे भ्रष्ट होने के कारण इादिसे उसका हदय कुम्हार के भावेके समान भीतर ही भीतर जलता रहता था। अतः कल्पकको नीचा दिखाने तथा फिरसे अपनेपदको पानेके लिये वह (अनपरत यम) पूरी कोशिश करने लगा। किसीका परिश्रम व्यर्थ नहीं बाता खिर उसका भी परिश्रम सफल इमा। उसकी कूटनीतिने राजा नन्दका माधा बना दिया। दुर्भाग्यवश राजाने विना कुछ समझ मन्त्री पल्पकको सपरिवार परकर मनवाने कंधकर दिया और उन लोगोंकवाने-पीने के लिये गुत ही कम मन जल दिये जानेकी व्यवस्था कर दी।कत्सककेकैदोनेकी बात जब पारों तरफ फैल गयी, तर शत्रु राजामोंके मानम्मको सीमा नसी। सा अपनी-अपनी सेना मुखिकर.पालि. पुषको घेर लिया। यह मस देवकर या महानगर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २६ ) और मारे घबराहटके उसका हृदय कांपने लगा। इस समय राजाको कल्पक की उपयोगिता याद आयी। और वह उसके लिये व्याकुल हो उठा। वह बार-बार यही कहता, कि आज यदि कल्पक होता, तो राजधानीकी यह दुर्दशा कदापि नहीं होती। इसलिये भव भी उस अन्ध कूपमें देखना चाहिये,कि कल्पक जीता हैं या नहीं। ऐसा सोचकर राजाने नौकरोंको आज्ञा दी, कि जल्दी खबर लाओ कि कूपमें कल्पक जीता है या नहीं राजाकी आज्ञा पाकर (भृत्यों) नौकरोंने उस कुएमें प्रवेश कर कल्पकको बाहर निकाला। उस समय उसकी अवस्था बडी ही शोचनीय हो -रही थी। उसका सारा शरीर पीला पड़ गया था और हिलनेडोलने या चलने फिरनेकी भी उसमें शक्ति न थी; किन्तु उसे जोवित देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और पालकी में बैठा कर वह उसे किलेमें ले आये। उचित चिकित्सा तथा खान'पान का उपयुक्त प्रबन्ध करके शीघ्रही कल्पक को भला चुंगा बना लिया। अच्छे हो जानेपर कल्पक शत्रु राजाके मन्त्रीसे 'मिला और संकेतके द्वारा बात चीत की। यद्यपि शत्रुके मन्त्रिने कल्पकके भावको भलिभाँति न समझ सका तथापि उसकी तीव्र बुद्धि और तेज शक्तिके सामने ठहर न सकनेके कारण वह अपने राजाको राजा नन्दकी राजधानीसे लौटा लेगया ! कल्पककी बुद्धिके प्रभावसे विपक्षी राजाओंके चले जानेपर राजा नन्दने उस चाल बाज पुराने मन्त्रीको उचित शिक्षा देकर, निकाल दिया और कल्पकके ऊपर पूर्ववत पूज्यभाव रखने लगा। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २७ ) श्रीस्थूल भद्र मन्त्री कल्पकने कारागारसे मुक्त होने पर फिर अपनी शादी कर ली थी। अतएव उसके पुत्र-पौत्रादि सन्तति बहुत हो गयीं थीं। कल्यककी मृत्युके बाद भी उसके वंशज ही नन्द बंशके राजाओंके मन्त्रि पद पर मासीन रहे। क्रमशः राजा नन्दकी गद्दीपर जब माठ नन्द-राजा हो नुके तब परम प्रतापी नवम नन्द राजा हुआ और उनका मन्त्री उसी कल्पकके वंशका शकडाल हुआ। शकडाल भी बड़ाही बुद्धिमान, धार्मिक नथा कल्पक केही समान सघगुण लंकृत था। इसके दो पुत्र हुए। बड़ेका नाम स्थल भद्र और छोटेका श्रीयक था। स्थल मद्रजी विनयादि गुणयुक्त तो थे, हो किन्तु इनकी पुद्धि बड़ी स्यूल थी मोर श्रीयक माता-पिताका पक्क तीक्ष्ण बुद्धि तथा पदुत बहा चतुर था। वह बराबर अपने पिताके साथ राज-समामें जाया करता था। इसलिये बड़े होने पर उसे राजा नन्दने विश्वास पात्र मोर प्रीति पात्र समभकर अपने मंगरक्षकले पद पर नियुक्त किया। स्थूलमद्रजी का चित विषय वासनाकी भोर विशेष मुका रहता था। मतः उसी मगर नेपाली एक कोश्या नामक वेश्यासेप्रेम हो गया। चोर रात-दिन सो कोमा बेवाले पर बने लगे। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २८ ) पाटलिपुत्र नगग्में उसी समय एक वर रुचि नामक ब्राह्मण रहता था। वह व्याकरर्णादि सब शास्त्रोंमें बड़ा कुशल और कविता बनाने मेंबड़ा दक्ष था। प्रति दिन राज-सभामें जाता और अपनी बनायी हुई कविताओंको सुनाकर राजाका मनोरञ्जन किया करता था किन्तु राजाकी ओरसे पारितोषिकमें कुछ भी नहीं मिलता था। राजाकी इच्छा थी कि मन्त्री जब इनकी प्रशंसा करें, तब पारितोषिक द; पर मन्त्री कभी ऐसा नहीं करते थे। यह बात कविको मालूम हो गयी। उसने मन्त्रीके घर जाकर उनकी पत्नीकी सेवा--शUषाकी और राजसभामें अपनी कविताओंकी प्रशंसा मन्त्रीके द्वारा करानेकी उनसे कोशिशकी आखिर स्त्रीके कहनेसे मन्त्रीने एकदिन राजसभामें वर रुचिकी कविताकी प्रशंसा की। उस दिनसे नित्यप्रति वर रुचिको एक सौ आठ स्वर्णमुद्राएं (मुहरें) दी जाने लगीं। कुछ दिन बाद इतना अधिक (व्यय)खर्च मन्त्री शकडालको पसन्द नहीं आया और उसने अनेक उपाय करके राज दर बारसे मुहरोंका दिया जाना बन्द करा दिया जिस दिन से वर रुचीका यह अपमान हुआ, उस दिनसे वर रुचिने मन्त्री शकडालका (छिद्रान्वेषण) करना शुरू किया। दैव योगसे उसी अमय मन्त्रीके छोटे पुत्र श्रीय- कका बिबाह होने वाला था। इस अवसरपर मन्त्री राजानन्दको अपने घरवुलाकर उनका सम्मान करना चाहते थे। इसी उद्देश्यसे उन्होंने छत्र, चमर तथा अनेक उत्तमोत्तम शस्त्र तैयार करा रहे थे। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( २६ ) यह वात एक दासीके द्वारा वर रुविको मालूम होगयी। वस फिर क्या था? उसने झट ९क श्लोक बना कर शहरके कितनेही लड़कों को याद करादिया। वह श्लोक इस प्रकारथा "नवेत्ति राजा यह सा शकडालः करिष्यति । व्यापाद्य नन्द तद्रोज्ये श्रीयक स्थापयिष्यति।" अर्थात्-जो शकहाल करने वाला है, सो राजा नहीं जानना। नन्दको मारकर उसके राज्यार अपने पुत्र श्रीयक का स्थापित करेगा। नगरके लड़कोंने यह बात सारे शहरमें फेला दी। परम्परासे राजाके कानतक भो जा पहुंची। इस बानके मुननेसे गजाके मनमें मन्देह हो गया और उन्होंने पता लगाने के दिये मन्त्रीके घर पर अपने नौकरों को भेजा। नौकरोंने शकडालके घर जाकर शस्त्रों को बनाते देखा और जो कल देखा, मो वैसेही गजामे कह दिया। यह मुगकर गजाका मन मन्त्रीको मोरसे एकदम फिर गया। राज ममा मन्त्रोके मानेपर रामा ने मारे कोरके उसके माय बात करनी तो दूर, उसकी मोर देखा तक नहीं। मन्त्री बड़ा बुद्धिमान था। वह पाट समय गया कि मात्र जमा किपोने राजासे मेरो पालो पायी है, इसी से गजा कुरित दुमा है। राजाको प्रतिकृज देवरल शीती परपला माया और मरने पुत्र भीयाना-पसी दुश्मने राजाका मन मेरी तरफमे फेर दिया। बसपा पनि Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३० ) शीघ्र उपाय न किया गया, तो मेरे सहित समस्त कुटुम्बका नाश हो जायेगा। इस संकटसे बचनेका एक मात्र उपाय यही है, कि मैं ज़ब राज सभा में जाकर राजाको प्रणाम करू, तब तुम तल-वारसे मेरा सिर काट डालना और यों कहना, कि राजा या स्वामीका अभक्त पिता भी मार डालने योग्य है । ऐसा करने से मेरे सिवा सारा कुटुम्ब बच सकता है। पहले तो श्रीक ऐसा निर्दय कार्य करनेसे बहुत हिचकिचाया और उसने आँखों में आँसू भरकर अपने पिता से कहा, कि आप ऐसा नीचाति नीच अत्यन्त गर्हित कर्म करनेकी मुझे आज्ञा न दीजिये, परन्तु अन्त में मन्त्री के बहुत कुछ समझाने-बुझाने पर उसने वैसाही करना स्वीकार कर लिया । और भरी समामें अपने पिताका सिर काट डाला । यह हालत देखकर सभा के सब लोग काँप उठे इसी समय राजाने बड़े मीठे बचनोंसे श्रीयकसे कहा, हे वत्स ! तूने यह क्या दुष्कर्म किया ?" इसपर श्रीक बोला, – “स्वामिन्! जब आपके मनमें यह आया, कि अमुक आदमी हमारा अपराधी हैं, तो आपके भक्तों कों उचित है, कि उसे उसी समय शिक्षा दें।" यह सुन, राजा नन्द श्रीयककी प्रशंसा करता हुआ बोला,“श्रीयक! सर्वाधिकार सहित इस प्रधान मुद्राके योग्य तू ही है। अतएव इस मुद्राको ग्रहण कर ।” श्रीयकने विनय पूर्वक राजासे कहा, "स्वामिन पिताके समान मेरे बड़े भाई स्थूलभद्रजी विद्यमान हैं। उनके रहते मैं कैसे इस Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ __ ( ३१ ) मुद्राका अधिकारी हो सकता हूं ?" ___ राजाने स्कूल मद्रको बुलवाकर उसे प्रधान मन्त्रीको मुद्रा देनेको कहा। स्थल भद्र भी विचार कर उत्तर देनेको प्रतिज्ञा कर लौट आये और एकान्तमें बैठकर विचारने लगे। उस समय अकस्मात् उन्हे वैराग्य आ गया। मन्त्री पदकी कौन कडे, उन्हे भूपतिका पद भी दुःखदायी दिखने लगा। सारा संसार दु:बसे मरा है। इसलिये अब आत्मोद्धारका प्रयत्न करना चाहिये। ऐसा विचार कर स्थूलभद्रजीने वहाँ बैठे-ही गैठे सिरके केशोंका लोय कर डाला। और उनके पास जा रत्न-कम्मल था, उसे बोल उसकी रस्सियोंस ( मोघा) रजोहरण बना लिया। इसी वेशसे राज-समामें जाकर उन्होंने राजासे कहा,- 'मैने लोच कर लिया है" यह कहकर और राजाको (धर्म लाम) भासारवाद देकर स्थूलभद्र राजसमासे चलेगये। विरक्तसे परिपूर्ण हो, महात्मा स्थलभद्रने श्रीसंभूति विजयजी भाचार्यके पास जाकर सामायक पारन कर विधि पूर्वक दीक्षा ग्रहण कर ली। वे उसी दिनसे निरति बार चारित्रका पालन करते हुए विचरने लगे। एक दिन कई साधुमाने भावार्य महाराजके पास भाकर पातुर्मास व्यतीत करनेके विषय में मानी-अपनी इच्छा प्रकट की। डिसीने कहा कि मैं चार मासतक माहारका त्याग कर कायो. रसर्ग ध्यानसे सिंहकी गुफाके दरवाजे पर चातुर्मास व्यतीत करना चाहता है। किसीने कहा कि मैं तिलिस विलपर मौर विसीने मेरो भासनसे कुएं की मनपरहकर बातुर्मास Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३२ ) व्यतीत करनेकी आज्ञा मांगी गुरु महाराजने भी सबको योग्य समझकर प्रत्येककी इच्छा के अनुसार आज्ञा दे दी। तब श्रीस्थूल भद्रजी महाराज भी गुरु महाराजसे विनय पूर्वक बोले,-"भगवन्! मैं पाटलिपुत्र में रहनेवाली कोशानामक वैश्याकी चित्रशालामें रह कर षट् रस भोजन करता हुआ चातुर्मास पूर्ण करूँ, यही मेरा अभिग्रह है। गुरु महाराजने इन्हें भी आज्ञा दे दी। और मुनिगण अपने-अपने अभीष्ट स्थानपर चले गये। और उन महात्माओंके तपके प्रभावसे सिंहादि पशु सब शान्त हो गये। इधर श्रीस्थूलभद्रजी जब कोशा वेश्याके मकानपर गये, तो कोशाने दूरसेही श्रीस्थूलभद्रजी को देखकर विचारा कि ये प्रकृतिसे सुकुमार हैं। अतएव चारित्रका बोझ इनसे सहन न हो सका, अतः ये चले आ रहे है। कोशा ऐसा विचारकर हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी और स्वागत पूर्वक बोली,-स्वामिन् ! तन, मन, धनसब आपका हैं। आज्ञा दीजिये, मैं क्या करूं।" श्रीस्थूभद्र बोले,-मुझे और कुछ न चाहिये, तेरी उस चित्र शालाको भावश्यकता है। मुझे वहीं चातुर्मास रहना है।" वेश्याने बड़े हर्षके साथ इस बातको स्वीकार किया, और मुनिजी वहाँ रहने लगे। कोशा भी श्रीस्थलभद्रके षट् रस आहार कर लेनेपर उन्हें संयमसे विचलित करने के लिये सोलहोंगार करके चित्रशालामें आकर अनेक प्रकारसे हाव-भाव दिखाने लगी, कभी पहले समयमें बारह बरसतक श्रीस्थूलभद्रजीने कोश्याके मकानपर रहकर उसके साथ जो विषय-सुख भोगा था, उसकी कितनी ही Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३३ ) गुप्त बातों की याद करा कर वह उन्हें माहित करना चाहती थी, किन्तु महा धैर्यवान् श्रीस्थूलभद्रजी चलायमान न हुये, बल्कि कोश्या वेश्याके हाव-भाव से दिन-दिन श्रीस्थूलभद्रजीके हृदयमें ध्यानानि देदीप्यमान होती गयी । उस समय सही संयोग कामदेवको उद्दीपन करने वाले थे । एक तो वर्षाकाल, दूसरे चित्रशालाका मकान, तीसरे कोश्याका अनुपम रूप और काम चंष्टाएं - इतने साधन होने पर भी उन महामुनिके मनका भाव ज़रा भी विचलित न हुआ । तब तो कोश्या बहुत ही शर्मिंदा हुई और हाथ जोड़कर अपनी कुचेष्टाके लिये क्षमा प्रार्थना की। वर्षाकाल व्यतीत होनेपर वे तीनो मुनि और श्रीलभद्र घोर अविग्रहोंको पूरा करके गुरु महाराजके पास माये । गुरु महाराजने मीभर मुनियों के आने पर थोड़ार मोर स्थूलभद्रजीके माने पर एकदम मासनसे उठकर स्वागत किया। उन्होंने उन तीनों मुनियों को दुष्करकारक મો स्थूलमद्रजीको दुष्कर दुष्कर कारक कह कर सम्बोधन किया। इस प्रकार स्थूलभद्र जी को प्रतिष्ठा सब मुनियोंसे अधिक हुई तथा चारित्र पाठन में तो ये उस समय भद्वितीय हो गये । इसके बाद श्रीस्थूलभद्रजी तीव्र तपस्याएं करते और मोक प्रकारके अभिग्रहों को धारण करते हुए पृथिवीतलवर विचरने मे । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३४ ) * चन्द्रगुप्त चरित्र Oo राजा नन्दके बाद पाटलिपुत्रके राज्यासनपर महा प्रतापी चन्द्रगुप्त राजा हुए। एक समय राजा नन्दकी सभामें चाणक्य नामका एक ब्राह्मण धन पानेकी इच्छासे आया और राजाके सिंहासनपर बैठ गया। उस आसनपर राजा नन्दके सिवा और कोई न बैठता था। राजाके भद्रासनपर चाणक्यको बैठा देख, (परिचायक ) नौकरने पृथक् एक आसन बिछा दिया और विनय पूर्वक कहा, कि आप उस आसनसे उठकर इसपर बैठ जाइये, किन्तु चाणक्यने राज्यासन कोन छोड़ा बलिक उस दूसरे आसनपर अपना कम-एडलु रख उसे भी रोक दिया। इस प्रकार नौकरोंने कई आसन विछाये, पर उसने उनपर भी दण्ड तथा माला आदि वस्तुएँ रख दी और उन सबको भी रोक दिया। इसपर नौकरोंने मारे क्रोधके कुछ ऊंच-नीच शब्द कहते हुए चाणक्यको अपमानके साथ उतार दिया। इस अपमान में चाणक्य मारे क्रोधके आग हो गया और उसकी आँखे लाल हो गयीं। उसने अपनी शिखाको खोल भरी सभामें प्रतिज्ञा की, कि जब तक इस अन्यायी और अभिमानी राजा नन्दको राजगिद्दीसे न उतार लँगा, तबतक इस शिखाको न बाँधंगा। ऐसी भीषण प्रतिज्ञा करके वह चला गया और Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३५ ) राजा नन्दको उन्मूलित करनेका यन करने लगा। चाणक्यने राजा नन्दकी गद्दीपर चन्द्रगुप्त नामक एक बालकको बैठानेका पूर्ण संकल्पकर लिया और वह उस बालकको अपने साथ रखने लगा। चन्द्रगुप्तके सम्बन्ध अनेकानेक मत-भेद हैं। जैनशालके अनुसार चन्द्रगुप्तका जन्म मयूर पोषकके वंशमें हुआ था। इस की कथा इस प्रकार है: जब चाणक्य राजा नन्दको ( उन्मूलन ) उखाड़नेकी प्रतिज्ञा कर पाटलिपुत्र-नगरसे बाहर निकल गया; तब वह राजगद्दी पानेक योग्य मनुष्यकी बोज करने में लग गया । एक दिन घूमता-फिरता चाणक्य परिव्राजक वेशमें मयूर पोषकोंके प्राममें जा पहुंचा। उस ग्रामक सरदार की एक लड़की गर्भवती थी। उस गर्भवतीको यह इच्छा हुई कि चन्द्रमाको पी जाऊ; परन्तु इस इच्छाका पूण होना असम्भव था। और उसका पूर्ण न होना भी हानिकर था, क्योंकि वेद्यक शास्त्रका मत है, कि यदि गर्मवती को इच्छा पूर्ण न की जाये, तो गर्भ नट हो जाये या अयोग्य बालक पैदा हो इसलिये उस लड़कीके कुटुम्ब बड़े व्याकुल थे। इसी समय चाणक्य कहाँ पहुचा। मयूर पोपकोंने चाणक्यको सब हाल कह सुनाया। उनकी बात सुनकर चाणक्यने कहा, “यह काम है, तो यहा ही दुष्कर: पर यदि तुम मेरा कहा मानो तो मैं इम गर्भवती की इच्छाको पूर्णका सकताई।" मयूर पोषकोंने कहा.-"आप जो कुछ कहें, हम करने को तैयार है।" अब चाणक्यने कहा कि 'तुम इस कन्याके गभसे उत्पन होनेवाले Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३६ ) बच को मुझे दे देनेकी प्रतिज्ञा करो ।” उस कन्याके पिताने लड़की की जीवन-रक्षा के विचारसे वैसाही करना स्वीकार किया । खाणक्यने बड़ी खूबी और युक्तिके साथ चन्द्रमाके बिश्वसे प्रतिबिम्बित एक थाली दूध उस लड़कीको पिला दिया । यह काम इस खूबी से किया गया, कि उस लड़कीको पूरा विश्वास हो गया, कि मैंने चन्द्रमाको पी लिया । इच्छा पूर्ण हो जानेपर यथा समय उस कन्याके गर्भसे चन्द्रमाके समान सौम्य और -सूर्यक समान तेजस्वी पुत्रका जन्म हुआ । चन्द्रमाको पात करनेकी अभिलाषा करने वाली मातासे जन्म ग्रहण करनेके - कारण माता-पिताने उस बालकका नाम चन्द्रगुप्त रखा। चंद्रगुप्त दिन-दिन चन्द्रकलाके समान ही बढ़ने लगा और कुछ ही दिनमें बड़ा हो गया । अपने पड़ौसके लड़कोंके साथ वह गांव के चाहर चला जाता और अनेक तरह की क्रीड़ा करता था। उसके खेल अन्य लड़कोंके समान नहीं होते थे । वह किसीको हाथी, किसीको घोड़ा, किसीको सैनिक और किसीको सेनापति और आप राजानकर शासन करता था । एक दिन संयोग वश चाणक्य अचानक वहीं चले भाये मौर चन्द्रगुप्त को ५.सी चेष्टाएँ देखकरः बड़े आश्चर्यमें पड़ गये और लड़कोंसे पूछा, कि "यह लड़का किसका है ।" बनाता लड़कोंने कहा, – “यह एक परिव्राजकका पुत्र है; क्योंकि जब यह गर्भ में परिब्राजक.को देने की ( प्रतिज्ञाकर ली है।" था, तभी इसके माता-पिता तथा नामाने इसे एक Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat 1 www.umaragyanbhandar.com Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ य ( ३७ ) ब्रोंकी पाते सुनते ही चाणाय समक गवा, किर तो कही बालक है, जिस गर्भवती माताकी इच्छा मैंने पूर्ण की थी। चाणक्यने उस लड़के को पास बुलाकरहा,-"तेरे मातापिताने मुझे समर्पण किया है, वह पखिाजक मैं ही। बा, तू मेरे साथ चल। यह बामों की नकल सा करता है। पल, मैं तुझे सचा राज्य कर राजा बनाऊँ। ___अन्य लोगोंके मतसे चन्द्रगुप्त मुरा नामकी दाजीके गर्मसे उत्पन्न राजा नन्दका ही पुत्र था। इसीसे मोर्यके नामसे भी चन्द्रगुप्त प्रसिद्ध है। जब चाणक्य राजा नन्दकी समासेमामानित होकर बला, तब उसने नन्द वंशका(मुलोछेद) बड़से उखाड़मेको प्रतिक्षाके साथ साथ यह भी कहा कि जो कोई इस समय इस समासे उठकर मेरे साथ चलेगा, उसीको मैं पाटलिपुत्रके राज्या. समपर प्रतिष्ठित करूगा। यह सुनकर चन्द्रगुमने, जो उसी समामें सथा, सोचा कि मैं किसी प्रकार राज्यका अधिकारी को नहीं पर कदाचित इस प्रामणके द्वारा राज्य पा जाऊं इस प्रकार विचार कर वह उस बड़ा दुमा और सबके देखतेदेखते पाणपके साथ हो लिया। चाणक्य गुप्तको अपने साथ लेकर पाटलिपुत्रसे विदा हुमा और एक ही दिनों में उसने अपनी द्विता नीति निपुणता बारार्ज रामाबोको मिला किया। उनको मिलाकर सो पारमिपुत्पर ईरानी और राजा मदकोस परिवार, समसार कराके बनासको पारलिपुत्रका रामा पाकिस्त Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३८ ) बड़े प्रतापी राजा हुए। अपने शासन कालमें इन्होंने भी बड़ा यश प्राप्त किया। चन्द्रगुप्तके ऐहिक लीला संवरण करके परलोक चले जानेपर उसके पुत्र बिन्दुसार पाटलिपुत्रके राजा हुए। बिन्दुसारके बाद उनके पुत्र अशोक राज्यगद्दीपर आसीन हुए। ये बड़े ही धर्मात्मा, विद्याप्रेमी प्रजा पालक थे। उन्होंने अपने शासन कालमें अनेक शिलालेख, स्तम्भ तथा स्तूप प्रतिष्ठित किये थे। इनके गुण गानसे भारतीय इतिहास आज भी ओतप्रोत है। अशोकका पुत्र कुणाल था। वह दोनों आँखोंका अन्धा था। अतएव उसका पुत्र (अशोकका पौत्र) सम्प्रति नामक अशोकके पश्चात पाटलिपुत्रके राजा हुए। ये बड़े पराक्रमी, पुण्यात्मा तथा शूर-बोर थे। थोड़े हो दिनों में इन्होंने सारे भूमण्डलको अपने आधीन कर लिया और इन्द्रके समान अपने प्रजावर्गका पालन करने लगे। इसी ससय भयंकर दुष्काल पड़ा। इससे साधु लोग यत्र-तत्र निर्वाहके योग्य स्थानोंको चले गये। इससे पठन-पाठन न होनेके कारण वे पठितं विषयों को भी भूलने लगे। जष द्वादशवर्ष व्यापो दुष्काल बीत गया, तब पाठलिपुत्र नगरमें समस्त संघने मिलकर श्रुत झानका मिलान किया, तो ग्यारह मंग मिले; किन्तु बारहवां अङ्ग दृष्टिबाद न मिला। व्यवच्छेद हो गया था। उस समय नेपाल-देशके मार्गमें चतुर्दश दूर्वधर श्रुत केवलो श्रीमद्राहु स्वामी विचरते थे। संघने साधु समुदायको पढ़ाने के लिये श्रोभद्र बाहुजीको बुलाने के लिये दो मुनियोको भेजा, किन्तु उस Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ३६ ) समय भद्रगजो महाराजने महाप्राण नामक ध्यानकी मराधना माराम की हुई थी। अतएव उन्होने साधनोंसे कहा, कि इस समय में पाटलिपुत्र नहीं जा सकता, किन्तु यदि कुछ बुद्धिमान साधु यहां भावें, तो किसी प्रकार मैं कुछ समय निकालकर प्रतिदिक सात पावनाएं दे दिया करूंगा: साधुोंने माकर संघसे यह बात कही और संघने इसे स्वीकार करके स्थूल भद्रादि पांच सो बुद्धिमान साधुओंको दृष्टिबाद पढ़नेके लिये श्रीभद्रबाहुजी माचार्य के पास भेजा। भाचार्य महाराज सबको पढ़ाने लगे। थोड़ी बांचना मिलनेके कारण साधुमोकामन न अमा। अतएक एक कालबाद स्थूलमद्रजीके सिवाय सब साधु लोट आये। भव भावार्य महाराजका सबसमय अकेला श्रीस्थलमद्रजीको ही मिलने लगा। ये महा प्रज्ञावान् भी थे। मंतएव शीघ्र ही चतुदेश पूर्वधर हो गये। भगवान श्रीमहावीर स्वामीके मोक्ष हो गये वाद एक सौ सत्तर वर्ष व्यतीत होनेपर श्रीमद्रबाहु स्वामीने माचार्य पदपर श्रीस्थलमद्रजीको विभूषित किया और उन्हें अपने पर निविष्ट करके स्वर्ग सिधार गये। भाचार्य श्रीस्थलमद्रजीके दो शिष्य थे, जिनमें बडेका नाम भार्यमहागिरिमौर बोटेका माम भार्यसुहस्ती था। ये दोनों ही बरे पवित्र चारित्रवाले भवभोरु मोर धर्म रक्षक थे। प्रशावान होनेसे थोडेही समय में उन दोनों ने गुरु महाराजसे दशपूर्वकी विया पढ़ की। एक दिन अपनी मायुको पूर्ण हुमा समनार महात्मा श्रीस्थूलमदीन दोनों शिष्योंको भाचार्य पद देकर समाधि स्र्म तिथि Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ४० ) होगये। ये दोनों आचार्य अपने अपने गच्छके साथ पृथ्वीपर विचरने लगे । राजा एक दिन वे दोनों ही भाचार्य बिहार करते हुए पाटलिपुत्र नगरमें पधारे। यहां उन्हें राजा सम्प्रतिसे भेंट हुई। आर्य सुहस्ती सूरि महाराजको बन्दना करनेके लिये महलसे उत्तरे और ज़मीनपर मस्तक टेक कर बन्दनाकी पीछे धर्मके विषय में आचार्य महाराज से कुछ प्रश्न किये। उन प्रश्नोंका उत्तर दे देनेके बाद भाचार्य महाराजने राजाके पूर्व जन्म की कथा कह सुनायी। आचार्य महाराज से अपने पूर्वभवका वृतान्त सुनकर राजा हाथ जोड़कर बोले, - "भगवन् ! आज दिन मैं जिन विभूतियोंका उपभोग कर रहा हूं, वह सब आपकी ही कृपाका फल हैं। अतएव आप मुझे धर्मपुत्र- शिक्षाले अनुगृहीत करें ।” भगवन् आर्य सुहस्तीसूरिने उन्हें धर्म में दृढ़ रहनेका आदेश दिया । उस दिनसे राजा सम्प्रति परम श्रावक बन गए। और अपने नगरको देवालयों चैत्यालयों, भोजनालयों, औषधालयों, विद्यालयों, तथा दानशालाओंसे विभूषित कर दिया। इसी समय आर्य महागिरि और आर्य सुहस्तीसूरिमें परस्पर विवाद हो जाने के कारण एक ही समाचारी वालोंके पृथक-पृथक दो मार्ग हो गये । यहाबीर स्वामीने पहले हो कह दिया था, अस्तु । “मदीये शिष्य सन्ताने स्थूलभद्र मुनेः परं । पत्प्रकर्षा साधनां समाचारी भविष्यति ।" ... Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ा उपर्युक उपाख्यानोंसे स्पष्ट है, कि पाटलिपुत्र बहुत ही प्राचीन और जैन धर्मका केन्द्र है। यदि कहा जाये कि पारलिपुष जैन धर्मके विशेष विकाशके लिये ही स्थापित हुआ था, तो कोई मत्युक्ति न होगी। पाटलिपुत्र ही एक स्थान है, जहां परम प्रतापी जैन धर्मावलम्बी उदायीसे सम्पति पर्यन्त राजामोंका शासन पीढ़ीदर पीढ़ीतक अविच्छिन्न कायम रहा। भोर स्थूलमद्रजीक समान सर्व एवं सेठ सुदर्शनके समान केवल ज्ञान भोर महापुरुषोंका जन्मस्थान तथाज्ञान-विकाशका एकमात्र पाटलिपुत्र ही है। ___ राजा अशोकके समयमें सर्वसे प्रथम प्रीसका राजदूत मेगास्थनीड़ पाटलिपुत्र में भाया था। उसके बाद विदेशियों का मावा-गमन प्रारम्भ हो गया। तदनन्तर चन्द्रगुप्तके समय बहुत विशेष गया। महम्मद गौरीके भागमनके पूर्व और सम्प्रति राजाके पश्चात् और भी कितने हो हिन्दू राजामाने पाटलिपुत्रका शासन किया था किन्तु पीछे पाटलिपुत्र में मुसलमान बादशाहोंका मधिकार हो गया। मुसलमान बादशाहोंमें शेयशाहने पाटलिपुत्रकों पटने के नामसे बदल दिया, जो भाजतक पटनेके ही नामसे प्रसिब। पटनेका भन्तिम मुसलमान शासकमवाय मीरकासिम था। उसने सन् १७६३० में मारेक साब बुर दिया। युद्धमें माशोंकी विजयदुई मोर सबसे प्रथम पटका अधिकार पकिस साहब हाय गता। पीसियाकामी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [ ४२ ] से वृटिश गवर्नमेण्टके हाथमें आया। अङ्रेजोंके हाथमें आनेपर पटने में सर्वत्र शान्ति रही; किन्तु एक बार सनू १८५७ ई० को पटनेमें फिर युद्ध की आग प्रज्वलित हुई थी, जो आज सिपाही बिद्रोहके नामसे विख्यात है। यद्यिपि यह बिद्रोह भयंकर रूप धारण करके भारतके अनेक अञ्चलमें फैला; किन्तु सबका केन्द्र पटना ही था। अतएव इतिहासमें सिपाही विद्रोहके विषयमें पटनेका ही विशेष उल्लेख है। भूतपूर्व राजाओं तथा धर्म एवं धर्माचार्योंके अनेक स्मृतिचिन्ह पटनेमें थे, किन्तु आज वे सब नष्ट भ्रष्ट हो गये। जो टूटेखण्डरकुछ (भग्नावशेष) बचे हैं, उनकी दशाभी बहुतही शोचनीय है। जिस किसी उपायसे अवशिष्ट प्राचीन स्मृतिकी रक्षा करना इस समय नितान्त आवश्यक तथा मनुष्यमात्रका परम मर्त्तव्य होना चाहिये। क्योंकि इस समय जब कि प्रत्येक जाति और समाज अपना प्राचीन गौरव प्राप्त करनेके लिये उत्सुक हो रही है, जो एक मात्र प्राचीन स्मृति चिन्होंकी रक्षा करना तथा उन्हें आदर्शके आधारपर भावी उचति की ओर अग्रसर होना ही उपयुक होगा। अन्यथा पूर्ण गौरव प्राप्त करनेके लिये सारे परिश्रम और यत्न शशकटङ्ग ( खरगोशके सींग)को ढढ़नेके लिये जङ्गल-जङ्गल घूमनेके समान व्यर्थ एवं कष्टदायक होनेके अतिरिक और कुछ नहीं होगा। सबसे बढ़कर जैन स्मृतियोंकी दशा खराब हो रही है। इसका प्रधान कारण पटने में जैनियोंकी कमी तथा धनका अभाव है। अतएव अन्य देश-देशान्तरोंके Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन भाइयोंको तन-मन-धनसे उपयुक पुण्यकार्यमें हारा पटाकर यश प्राप्त करना चाहिये, नहीं तो यदि शीघ्र उस मोर ध्यान नहीं दिया जायेगा, तो वे स्मृतियां भी दर्शनीय न रहकर केवल स्मरणीय ही रह जायेंगी। पटनेका भौगोलिक विवरण तथा प्राकृतिक दृश्य पटना बिहार प्रदेशके मगध प्रान्तमें गड़ाके दक्षिण तटपर अवस्थित है। यहां ई० आई० रेलवेके तीन मुख्य स्टेसन शहरके अन्दर हैं: (१) पटना सिटी (बेगमपुर,) (२)(गुलज़ार बाग,) (३) पटना जंकशन। इसके उत्तर गड़ा, दक्षिण जल्ला नाम की एक छीउल नदी, पूर्वामें पुन-पुन नदी-पश्चिममें शोणम या गंगाजी एक नहर है। इसका क्षेत्रफल ऐसे तो बहुत जियादा है, किन्तु मुख्य मट्ठारह वर्ग मील है-नब मोल लम्बा मोर दो मील चौड़ा है, जो इस समय पूर्व और पश्चिम दरवाजे के नामसे प्रसिद्ध है। यहां की लोक-संख्या कुछ न्यूनाधिक १६ ११६२१ [भीस्थूलभद्र श्वामी तथा सुदर्शन सेठके मंदिर] पहा नियोंके मन्दिरोंमें सबसे प्राचीन, तथा प्रधान परम पुरुष श्रीस्थूलमानी मोर श्रीसुदर्शन सेठी यो गरि Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ४४ ) बागमहल्ले में मशहूर हैं। यहां प्रत्येक वर्ष देश देशान्तरोंसे अनेक नर-नारी जैन यात्री दर्शनके लिये भाते हैं। इन मन्दिरी को निर्माण प्रणालीके देखनेसे उनकी प्राचीनता साफ साफ जाहिर होती है। ये दोनों स्थान जिस प्रकार भव्य है, उसी प्रकार ज्ञान और उत्साहको बढ़ाने वाले हैं। इन स्थानोंके देखनेसे हृदयमें स्वभावता: एक अनिर्वचनीय भाव उत्पन्न होता है। यदि वह भावस दाके लिये स्थिर रह जाये, तो फिर क्या पूछना मनुष्य वास्तविक मनुष्य हो जाये। इतिहास प्रेमियों के लिये ये दोनों स्थान जैन-इतिहासकी बहुमूल्य सामग्री हो जाती है। इनके अतिरिक्त डंका कूचा बाडेकी गली आदि महल्लों में जैनियोंके अनेक देवालय तथा चैत्यालय हैं, जो इस समय छिन्न भिन्न तथा मलिन दशामें पड़े हैं। श्री बडी पटन देवीजी और छोटी पटन देवी ये दोनों स्थान भी बहुत प्राचीन तथा हिंदुओंके परम पूज्य तथा आराध्य है। इनकी बनावट से भी प्राचीनता टपकती रहती है। एक चौकसे कुछ पूर्व स्वनाम-विख्यात महल्ले में है और दूसरा महाराज गञ्ज नामक महल्ले में है। . श्रीकाली मंदिर-यह स्थान छोटी पटनदेवीके समीप है। यह स्थान कितना प्रावोन है, यह कहा नहीं जा सकता किंतु परम सिद्ध तथा रमणीक है। श्री गोपीनाथजीका मंदिर- यह स्थान भी बहुत प्राचीन और मन्य है, किन्तु उसकी प्रतिमा प्राचीन नहीं है। बीचमें कमी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ४५ ) किसी कारणले प्रतिमाका परिवर्तन हुआ है। ऐसा जान पड़ता है । श्री भागम कुआं और शीतलास्थान - यह बहुत हो सिद्ध परम पवित्र एवं बहुत प्राचीन स्थान है। कुआं बहुत विशाल है। लोगोंका विश्वास है कि आगम कुआंके जलका स्पर्श मात्र करनेसे कई प्रकारके रोग निर्मूल हो जाते हैं। अतएव अनेक कठिन बीमारीयोंमें उक्त कुएं का जल व्यवहार और सेवन किया जाता है। हिन्दू लोग उसे अनादि तथा स्वयंभूत मानते हैं, किन्तु कई एक ऐतिहासिकों का मत है, कि इसका निर्माण सम्राट अशोक के समयमें हुआ था। जो भी हो, यह स्थान अति प्राचीन है, इसमें सन्देह नहीं । चैत्रसे आषाढ़ तक चार महीनों के प्रत्येक कृष्ण पक्षकी अष्टमीको यहां मेला लगता हैं, जो बसिमवराके नामसे ख्यात है । इस अवसर पर नगर -भरके माबाल-वृद्ध नर-नारी यहां उपस्थित होते हैं। मौर दर्शन पूजनादिके द्वारा मामोद-प्रमोद करते हैं। यह स्थान भी बहुत ही जीर्ण-शीर्ण हो गया था, किंतु बीस वर्ण हुए, कि बिहार सरकार के द्वारा इसका जीर्णोद्धार किया गया है। जीर्णोद्वार के समय ठेकेशरको वढ़ी कठिनाईका सामना करना पड़ा था । पूर्ण परिश्रम तथा वह करनेपर मो तीन दिन तक पानी निकालनेवाली मशीन न चल सकी थी । पीछे बहुत पूजा-पाठ मोर अनुनय बिनय करनेपर मेशीन चलने लगी। माढ दिन तक दिन-रात मेशीनके पक्रनेपर मिट्टी निका Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ४६ ) लनेका काम शुरू हुआ, तो प्रतिदिन सवेरे ५ बजेसे १० बजे तक मेशीनचलायी जाती, १० बजेसे ५ बजे सायंकालतक मिट्टी निकाली जाती, उसके बाद १० बजे रात तक फिर मेशीन चलायी जाती थी । इस प्रकार लगातार तीन महीने तक अन वरत परिश्रम करने पर कुएं के निम्न तलतक सफाई न हो सकी और न उसकी गहराईका ही पता चला । तब लाचार सफाईका काम बंदकर मरम्मतका काम प्रारम्भ करना पड़ा । सफाई करते समय हजारों पुरातन सिक्के एवं अन्यान्य कितनी ही चीजें निकलीं। लोटा आदि पात्रोंकी तो कोई गणना ही न थो इस प्रकार कई हज़ार की सम्पत्ति विहार - सरकारको उस कुएंसे प्राप्त हुई थी । यह स्थान गुलजार बागके प्रधान जोन तोर्थ कमल दहके समीप ही स्वनाम ख्यात महले में अवस्थित हैं । . इसके अतिरिक्त अन्यान्य कितने ही हिंदुओं के देव मंदिर तथा तीर्थस्थान पटने में हैं, जहां समय- समयपर वारुणि आदि नामोंसे मेले लगते तथा लोग उनके दर्शन-पूजन से अपनी आत्माओं को पवित्र करते हैं । श्री हरमन्दिर – यह सिक्खोंका परम तीर्थस्थान हैं। सिक्खों के सर्वतीर्थो में इसका दूसरा नम्बर है । यहाँ सिक्ख गुरु श्रीगोबिन्द सिंहका जन्मस्थान कहा जाता है । यहाँ ग्रन्थ साहब चक्रा दण्ड और खड़ाऊ का दर्शन यात्रियोंको कराया जाता है, इस मदिर के भीतर एक कतरा अनेक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है, जो यात्रियोंको दिखलाया जाता है। यहां इतनी लम्बी-लम्बी तलवारे Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ४७ ) तया में है, उतनी बड़ो और लम्बी माजकल ही देखने या सुनने में नहीं पातीं। इनके अतिरिक अन्यान्य अल-शस्त्र भो बहुत बड़े भाकारके है। ये सब शस्त्रास्र बिनके हैं और यहा क्यों रखे गये है, इत्यादि बाते पहनेपर उनका पूरा-पूरा वृत्तान्त वहांके महन्त बहुत सम्मानके साथ लोगोंको सुनाते है.। सिक्वका विश्वास है, कि गुरु गोबिन्द सिंह फिर एक बार यहां आयेंगे। उस समय मन्दिरके भीतर रखो हुई सलवार मापसे आप ऊपरको उठ जायेगी तथा कुएंका जल सारोसे मीठा हो जायेगा। अगरेज भी इस स्थानको सम्मान की दृष्टिसे देजते हैं। प्रायः इस स्थानके प्रबन्धकी देख-रेखका भार मंशतः यहांके प्रधान जजके ऊपर भी रहता है। इसकी शाखा और भी कई नगरों में है। कलकत्ते में हरिसन् रोडकी बड़ा संगत इसकी शाखा है। यह स्थान भाऊगंज महल्लेके पास स्वनाम धन्य महल्ले में है। . इमक अतिरिक्त मनी संगत, नून गोला की संगत पशिम दरवाजको मंगत आदि कई स्थान सिपवा तथा नानक शाहियों के है, जो परम भव्य तथा प्रभावोत्पादक है।। मुस्लिम-स्मारक-मुसलमान पादशाहों तथा सिद्ध फकीरों (प्रालिम, पीर, औलिया के भी कितने ही स्मारक स्थान है। जैसे-पत्थरकी मसजिद की दरगाह, पक्को दरगाह, त्रिपोलिया, छोटी मथनी यदा मगनी आदि। ये:सब स्थान शहरके अनेक महलोंमें हैं। मुसलमान इन स्थानोंको बड़े भादरसे देखते हैं। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ४८ ) मुसलमान फकीरों में अन्तिम सिद्ध फकीर टिकिया साईमा उसकी प्रसिद्धी बहुत है अपने तपोवलसे इस फकीरने ऐसे-ऐसे आश्चर्यजनक कार्यकर दिखाये जिनकी चर्चा भाज दिन भी पटमा. निवासी बराबर कियाकरते हैं। इस फकीरको हुए अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं—अन्दाज एक सौ वर्षके लगभग हुए है। ___ अगरेजी सम्राज्य–'गोल-घर' यह पटनेकी पश्चिमी सीमाके अन्तमें अवस्थित है। इसकी उंचाई, मोटाई, तथा परिधि बहुत ही अधिक है और देखने योग्य है। यह सन् १७८४ ई० में अकाल-निवारणके लिये इस्ट इण्डिया कम्पनीके द्वारा निर्माण कराया गया था। इसके अतिरिक सन् १८५७ ई० के सिपाही विद्रोहमें आहत अङ्गरेजोंका स्मारक (कब्रस्तान) है, जो आज भी गिरजाके मामसे प्रसिद्ध है। __ आधुनिक दृश्यों में हाईकोर्ट तथा लाट साहबका निवासस्थान अत्यन्त मनोरम और दर्शनीय स्थित है। इस प्रकार जैन शासम-कालसे अबतक प्रत्येक जाति, धर्म और समाजके स्मारक चिन्होंसे अलंकृत एवं विभूषित पाना-नगर मनुष्य मात्रका गौरव स्थान है। मतएष मनुष्य मात्रका कत्तय है, कि सर्व तो भावसे अपनी स्मृतियोंको इतिहासके एक बड़े भारी अंशको नष्ट होनेसे बचाकर सुरक्षित रखें तथा पटनेको पवित्र तीर्थस्थान समझकर समय-समयपर यथा बोग्य सहायता प्रदान करके धार्मिक एवं आर्थिक विषयों में उन्नतिकी भोर अप्रसर करना चाहिये। इतिशम् । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [ ४६ ] उपसर्गाः वयं यान्ति छिद्यन्त विघ्नबल्लयः मनःप्रसन्नतामेति पूज्यमानेजिनेश्वरे ॥ १। जो क्षुद्र भी इसको समझ प्रेमाई हो अपनायेंगे पर तुछ शिक्षापर अहो वे ध्यान निज ले जायेंगे पढ़कर न चुप होगे करेंगे कार्यमें परिणत इसे हम भी उफलता सत्य समझ गे अहा अपनी इसे ओ३म् शान्तिरम्तु शुभमस्तु ॥ ७ .CO Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [विज्ञापन ] मैं अपने धर्मबन्धुओं को यह भी सूचित कर देना चाहता हूं कि दोपमालिका पूजन तथा पर्यात्रण कर्त्तव्य आदि पुस्तकोंके प्रथम संस्करण समाप्त हो चुके है । और द्वितीय संस्करण निकालने का विचार हो रहा है यदि कोई सज्जन गण अपना द्रव्य इस सदुपयोग में लगाकर पुण्योपार्जन करना चाहें तो मुझे आपना नाम तथा स्थान देकर अनुग्रहित करें तो उनके नामसे ही समस्त पुस्तकोंके संस्करण तयार कराके अ... बितीर्ण कराये जायें । अब मैंने विवाह पद्धतिके सिवाय १५ संस्करण और लिखने प्रारम्भ करदिये हैं जो सज्जन इनको अपने नामसे अमूल्य वितीर्ण करा कर अपना द्रव्य सदुपयोग में लगा सम्यक्त की पुष्टि तथा धार्मिक लाभ लेना चाहें वह मुझे सूचित करें । जैन धर्मका महत्व नामक पुस्तक अब मेरे पास नहीं हैं जो सज्जन मंगाना चाहें वह नीचे लिखे पतेसे मंगाले । श्रीयुतबाबूचांदारामजी मेला रामजी जैनी ठि० छतरहह बाज़ार अन्दर पाकदरवाजा मुलतान सिटी [ पंजाब ] धर्म हितैषी सूर्यमल यतिः Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ શોવિ पावनभर मुद्रक-भोलानाथ टण्डन : नारायण प्रस 14 मदनमोहन चटर्जी लेन, कलकत्ता। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com