Book Title: Jinsutra Lecture 15 Manushyo Satat Jagrat Raho
Author(s): Osho Rajnish
Publisher: Osho Rajnish
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंद्रहवां प्रवचन मनुष्यो सतत जाग्रत रहो For Private & P enal Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 000 सत्र सीतंति सुवंताणं, अत्था पुरिसाण लोगसारत्था। तम्हा जागरमाणा, विधुणध पोराणयं कम्म।।३९।। जागरिया धम्मीणं, अहम्मीणं च सुत्तया सेया। वच्छाहिवभगिणीए, अकहिंसु जिणो जयंतीए।।४०।। / पमायं कम्ममाहंसु, अप्पमायं तहाऽवरं। तब्भावादेसओ वावि, बालं पंडितमेव वा।।४१।। न कम्मुणा कम्म खवेंति वाला, अकम्मुणा कम्म खवेंति धीरा। मेघाविणो लोभमया ववीता, संतोसिणो नो पकरेंति पावं।।४२।। जागरह नरा! णिच्चं, जागरमाणस्स बड्डते बुद्धी। जो सुवति ण सो धन्नो, जो जग्गति सो सया धन्नो।।४३।। जह दीवा दीवसयं पइप्पए सो य दिप्पय दीवो। दीवसमा आयरिया, दिप्पंति परं च दीवेति।।४४।। Www.jainelibary.org Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तिन-सूत्रों का सार आज के सूत्रों में है-जिन साधना है—इतना डुबा देता है कि कोई बचता ही नहीं, पीछे लकीर भी की मूल भित्ति; जिनत्व का अर्थ। नहीं छूट जाती है। साधक अपने को जगाता है-इतना जगाता परमात्मा की खोज में दो उपाय हैं। एक उपाय है: है कि जागरण की ज्योति ही रह जाती है, कोई जागनेवाला नहीं उसमें ऐसे तल्लीन हो जाना कि तुम न बचो; उसमें ऐसे लीन हो | बचता। हर हालत में अहंकार खो जाता है—चाहे परिपूर्ण रूप जाना कि लीन होनेवाला बचे ही नहीं-जैसे सागर में नमक की | से तल्लीन होकर खो दो और चाहे परिपूर्ण रूप से जागकर खो डगली डाल दें, खो जाती है, स्वाद फैल जाता है, लेकिन कोई | दो। इन दो अतियों पर परिणाम एक ही होता है। इसलिए भक्त बचता नहीं। दूसरा मार्ग है : खोना जरा भी नहीं; जागना ! इतने | और ज्ञानी, प्रेमी और साधक सभी वहीं पहुंच जाते हैं। मार्ग का जागना कि जागरण ही शेष रह जाये, जागनेवाला न बचे। बड़ा फर्क है, मंजिल का जरा भी फर्क नहीं है। पहला मार्ग बेहोशी का है, दूसरा मार्ग होश का है, लेकिन राह जुदा, सफर जुदा, रहजनो-रहबर जुदा दोनों के भीतर सार बात एक है कि तुम न बचो। इसलिए तुम्हें | मेरे जुनूने-शौक की मंजिले-बेनिशां है और। रामकृष्ण जैसे उल्लेख महावीर और बुद्ध के जीवन में न मिलेंगे, | महावीर से पूछो तो वे कहेंगेः राह जुदा, सफर जुदा, कि रामकृष्ण परमात्मा का नाम लेते-लेते बेहोश हो गये, कि | | रहजनो-रहबर जुदा! यह मेरी राह अलग, इस राह की यात्रा घंटों बेहोश पड़े रहे। कभी-कभी दिनों होश में न लौटते। और | अलग; इतना ही नहीं, मेरी राह पर लूटनेवाले और पथ-प्रदर्शक जब होश में आते तो फिर रोने लगते और कहते कि मां! यह भी अलग! लुटेरे भी मेरी राह के अलग हैं। स्वभावतः होंगे। कहां मुझे बेहोशी की दुनिया में भेज रही हो? वापिस बुला लो! क्योंकि जहां होश साधना है, वहां लुटेरे अलग होंगे। वहां वही उसी गहन बेहोशी में मुझे वापिस बुला लो! मुझे संसार का होश | लुटेरे बन जायेंगे जो भक्ति के मार्ग पर पथ-प्रदर्शक होते हैं। नहीं चाहिए। मुझे तुम्हारी बेहोशी चाहिए! | जहां होश को गंवा देना है, मस्ती में डूब जाना है, जहां परमात्मा ऐसा उल्लेख महावीर के जीवन में असंभव है; कल्पना में भी की शराब पी लेनी है-वहां जो सहयोगी है, वह महावीर के नहीं लाया जा सकता; महावीर की जीवन-सरणी में बैठता मार्ग पर लुटेरा हो जायेगा। महावीर के मार्ग पर जो सहयोगी है, नहीं। गिर पड़ना बेहोश होकर, यह तो दूर; महावीर एक पैर भी वह महावीर के मार्ग पर लुटेरा हो जायेगा। महावीर के मार्ग पर नहीं उठाते बेहोशी में; हाथ भी नहीं हिलाते बेहोशी में; आंख | जो सहयोगी है, पथ-प्रदर्शक है, राहबर है, वह भी की पलक भी नहीं झपते बेहोशी में। पर लुटेरा हो जायेगा। लेकिन इन दोनों विपरीत दिखाई पड़नेवाले मार्गों के बीच में | ध्यान भक्ति के मार्ग पर लटेरा हो जायेगा; वहां प्रार्थना कुछ सेतु हैं। वह सेतु स्मरण रखना। भक्त अपने को डुबा देता | पथ-प्रदर्शक है। महावीर के मार्ग पर प्रार्थना लुटेरा हो जायेगी; 323 | Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सूत्र भागः1 वहां ध्यान पथ-प्रदर्शक है। लेकिन मंजिल पर जाकर सब मिल याद काम नहीं आती। जाते हैं। क्योंकि पहुंचना उस जगह है जहां तुम अशेष भाव से, | स्वप्न की दशा से बाहर होने के दो उपाय हैं। या तो सुषुप्ति में कुछ भी बचे न, परिपूर्ण रूप से मुक्त हो जाओ। डूब जाओ। रामकृष्ण और भक्तों ने सुषुप्ति का उपयोग किया है इसे भी खयाल में ले लेना। साधारणतः हम सोचते हैं, मैं मुक्त स्वप्न से मुक्त होने के लिए। महावीर और बुद्ध और पतंजलि ने हो जाऊंगा, तो ऐसा लगता है कि मैं तो बचूंगा-मुक्त होकर जागृति का उपयोग किया है स्वप्न से मुक्त होने के लिए। लेकिन बचूंगा। लेकिन जो गहरे उतरने की कोशिश करेंगे या जिन्होंने | असली बात स्वप्न से मुक्त होना है। या इस किनारे या उस सच में ही समझना चाहा है-मैं मुक्त हो जाऊंगा, इसका केवल किनारे, यह मंझधार में न रह जाओ! इतना ही अर्थ होता है कि 'मैं' से मुक्त हो जाऊंगा। 'मैं' भाव ___ महावीर के ये सूत्र जागरण के सूत्र हैं। इनका सार-भाव है: चला जायेगा। 'मैं' भाव जहां तक है वहां तक मुक्ति नहीं है। जागो! जहां 'मैं' भाव विसर्जित हो जाता है, वहीं मक्ति है। 'मैं' भाव मैंने सुना है, एक आदमी भर-दुपहर भागा हुआ शराबघर में को विसर्जित करने के दो उपाय हैं : या तो डुबा दो, या जगा लो। आया। उसने कलारिन से कहा कि एक बात पूछने आया हूं। ऐसा समझो, पतंजलि ने योग-सूत्रों में मनुष्य के चित्त की तीन बड़ा बेचैन और परेशान था। जैसे कुछ गंवा बैठा हो, कुछ बहुत दशायें कहीं हैं। एक है सुषुप्ति। एक है जाग्रत। एक है स्वप्न। खो गया हो। जिस दशा में हम साधारणतः हैं, वह स्वप्न की दशा है; कामना ‘एक बात पूछनी है : क्या रात मैं यहां आया था?' की, विचारणा की, ऊहापोह की, हजार-हजार वासनाओं की। 'जरूर आये थे।' स्वप्न की दशा है। इस स्वप्न की दशा के दोनों तरफ एक-एक | 'कई लोगों के साथ आया था?' दशायें हैं: एक सुषुप्ति की और एक जागृति की। इस स्वप्न की 'कई लोगों के साथ आये थे।' दशा से मुक्त होना है। इस स्वप्न की दशा में ही तुमने स्वप्न देख 'सबको शराब पिलवाई थी, खुद भी पी थी?' लिया है कि तुम हो। यह तुम्हारा स्वप्न है। या तो सषप्ति में खो 'जरूर पिलवाई थी और पी थी।' जाओ. जहां स्वप्न न बचे या जाग्रत हो जाओ, जहां स्वप्न के वह आदमी बोला, 'शक्र खदा का। सौ रुपये चकाये थे?' बाहर आ जाओ। उसने कहा, 'बिलकुल चुकाये थे।' तो स्वप्न के बीच में हम खड़े हैं। स्वप्न यानी संसार। इसलिए उसने कहा, 'तब कोई हर्जा नहीं।' तो शंकर उसे माया कहते हैं। वह स्वप्न की दशा है। वहां जो वह बड़ा प्रसन्न हो गया। उस कलारिन ने पूछा कि मैं कुछ नहीं है, वह हम देख रहे हैं। और वहां जो है, वह हमें दिखाई समझी नहीं, बात क्या है? उसने कहा, 'मैं तो यही सोच रहा था नहीं पड़ रहा है। वहां हम जो देख रहे हैं, वह हमारा ही प्रक्षेपण | कि सौ रुपये कहीं गंवा बैठा। इसलिए ही परेशान था।' है। वहां जिसमें हम जी रहे हैं, वह हमारी ही कामना, हमारी ही बेहोश आदमी भी सोचता है कि कहीं गंवा तो नहीं बैठा! आशा, हमारी ही भावना है। सत्य से उसका कोई संबंध नहीं। लेकिन बेहोशी में कमाओगे कैसे, गंवाओगे ही! चाहे शराब वह हमारी निर्मिति है। पीने में गंवाये हों, चाहे किसी बगीचे की बैंच पर भूल आये तुमने स्वप्न में देखा! स्वप्न देखते समय तो ऐसा ही लगता है होओ। शायद बगीचे की बैंच पर भूल आना ज्यादा बेहतर था; कि सब सच है; ऐसा ही लगता है कि कुछ भी असत्य नहीं है। सौ रुपये ही गंवाते, कम से कम होश तो न गंवाया होता! लुट सुबह जागकर पता चलता है कि अरे, एक सपने में खो गये थे, जाना बेहतर था, यह तो लुट जाने से बदतर दशा है। पर वह इतना सत्य मालूम पड़ा था! आदमी बोला, 'शुक्र खुदा का! मैं तो डर रहा था कि कहीं रुपये रोज-रोज तुम सपना देखे हो, रोज-रोज सुबह पाया है कि गंवा तो नहीं बैठा।' असत्य है। फिर भी जब रात घनी होती है, फिर नींद में डूब जाते जिंदगी के अंत में अधिक लोग ऐसी ही दशा में पाते हैं। सोचते | हो, फिर सपना तरंगित होने लगता है, फिर भूल जाते हो, वह हैं, कहीं जिंदगी गंवा तो नहीं बैठे! लेकिन कितने ही बड़े मकान ain Education International Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ष्यो, सतत जाग्रत रहो बनाकर छोड़ जाओ और कितने ही धन की राशियां लगा जाओ, | जाये और तुम जगत को खुली आंख से देख लो-आंख जिस इससे क्या फर्क पड़ता है? पर सपनों की पर्त न हो; आंख जिस पर सपनों की धूल न हो; जिंदगी तो गई और गई। जिंदगी तो राख हो गई। मकान बना ऐसे चैतन्य से दर्पण स्वच्छ हो और जो सत्य है वह झलक आये, खंडहर बनेंगे। बड़ी दौड़-धूप की थी, बड़ी तिजोड़ियां जाये तो तुम्हारी जिंदगी में पहली दफा, वह यात्रा शुरू होगी छोड़ आये-कोई और उनकी मालकियत करेगा। तुम्हारे हाथ जो जिनत्व की यात्रा है। तब तुम जीतने की तरफ चलने लगे। तो खाली हैं। इससे तो बेहतर होता कि तुम बैठे ही रहते और | सपने में तो हार ही हार है। तुमने कुछ न किया होता, तो कम से कम तुम उतने पवित्र तो रहते जिन यानी जीतने की कला। जिनत्व यानी स्वयं के मालिक हो जितने जन्म के समय थे। यह तो सारी आपाधापी तुम्हें और भी जाने की कला। हमने और सबके तो मालिक होना चाहा अपवित्र कर गई। यह तो तुम और भी शराब से भरकर विदा हो है—धन के, पत्नी के, पति के, बेटे के, राज्य के, साम्राज्य रहे हो। यह तो तुम और जहर ले आये। | के-हमने और का तो मालिक होना चाहा है, एक बात हम भूल जिंदगी से कमाया तो कुछ भी नहीं, एक नयी मौत और कमाई, गये हैं, बुनियादी, कि हम अभी अपने मालिक नहीं हए। और फिर जन्मने की वासना कमाई। यह कोई कमाना हुआ? जिसे जो अपना मालिक नहीं है, वह किसका मालिक हो सकेगा! वह तुम जिंदगी कहते हो, महावीर उसे स्वप्न कहते हैं। और जिसे गलामों का गलाम हो जायेगा। तुम जागरण कहते हो, वह जागरण नहीं है; वह सिर्फ खुली / पहला सूत्रः आंख देखा गया सपना है। सीतंति सुवंताणं, अत्था पुरिसाण लोगसारत्था। हम दो तरह के सपने देखते हैं : एक, रात जब हम आंख 'इस जगत में ज्ञान सारभूत अर्थ है।' बंदकर लेते हैं; और एक तब जब सुबह हम आंख खोल लेते इस जगत में बोध सारभूत अर्थ है। अवेयरनेस! हैं। लेकिन हमारा सपना सतत चलता है। महावीर के हिसाब से सीतंति सुवंताणं, अत्था पुरिसाण लोगसारत्था। सपने से तो तुम तभी मुक्त होते हो, जब तुम्हारा मन ऐसा तम्हा जागरमाणा, विधुणध पोराणयं कम्म।। निष्कलुष होता है कि उसमें एक भी विचार की तरंग नहीं उठती। 'अतः सतत जागते रहकर पूर्वार्जित कर्मों को प्रकंपित करो। जब तक तरंगें हैं, तब तक स्वप्न है। जब तक तुम्हारे भीतर कुछ जो पुरुष सोते हैं, उनका अर्थ नष्ट हो जाता है।' चित्र घूम रहे हैं और तुम्हारे चित्त पर तरंगें उठ रही हैं--'यह हो। जीवन में हमारे भी अर्थ है, कोई मीनिंग है। हम भी जाऊं, यह पा लूं, यह कर लूं, यह बन जाऊं'-तब तक तुम चाहते हैं। हां, हमारे भी कुछ बहाने हैं। अगर आज मौत आ स्वप्नों से दबे हो। फिर तुम्हारी आंख खुली है या बंद, इससे जाये तो तुम कहोगे, 'ठहरो! कई काम अधूरे पड़े हैं। न मालूम बहत फर्क नहीं पड़ता। तुम बेहोश हो। महावीर के लिए तो होश कितनी यात्राएं शुरू की थीं, पूरी नहीं हुई। ऐसे बीच में उठा तभी है, जब तुम्हारा चित्त निर्विचार हो। लोगी तो अर्थ अधूरा रह जायेगा। अभी तो अर्थ भरा नहीं। तो जागरण का अर्थ समझ लेना। जागरण का अर्थ तुम्हारा | अभी तो अभिप्राय पूरा नहीं हुआ। रुको।' जागरण नहीं है। तुम्हारा जागरण तो नींद का ही एक ढंग है। सिकंदर, नेपोलियन साम्राज्य बनाने में जीवन का अर्थ देख रहे र कहते हैं जागरण चित्त की उस दशा को, जब चैतन्य तो हैं। कोई कछ और करके जीवन का अर्थ देख रहा है। लेकिन हो लेकिन विचार की कोई तरंग में छिपा न हो; कोई आवरण न महावीर कहते हैं: इस जगत में बोध सारभूत अर्थ है। और कुछ रह जाये विचार का; शुद्ध चैतन्य हो; बस जागरण हो। तुम देख भी नहीं-न धन, न पद, न प्रतिष्ठा। रहे हो और तुम्हारी आंख में एक भी बादल नहीं तैरता--किसी 'जो पुरुष सोते हैं उनका यह अर्थ नष्ट हो जाता है।' कामना का, किसी आकांक्षा का। तुम कुछ चाहते नहीं। तुम्हारा अर्थ तुम्हारे भीतर है और तुम्हीं सो रहे हो तो अर्थ का जागरण कोई असंतोष नहीं है। तुम जैसे हो, उससे तुम परम राजी हो। कैसे होगा? तुम्हारे जागने में ही तुम्हारे जीवन का अर्थ जागेगा। एक क्षण को भी तुम्हारा यह राजीपन, तुम्हारा यह स्वीकार जग मेरे पास अनेक लोग आते हैं। वे कहते हैं, जीवन का अर्थ 325 Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सूत्र भागः1 HRUITREAM क्या है? जैसे कि अर्थ कोई बाहर रखी चीज है, जो कोई बता दे | चाहता हूं; अन्यथा खाली-खाली मालूम पड़ रहा है। मेरे ऊपर कि यह रहा। जैसे तुम पूछो, सूरज कहां है, कोई बता दे कि वह | कोई उत्तरदायित्व नहीं है।' धनी घर का लड़का है। सब सुविधा रहा आकाश में! है। 'खाली-खाली मालूम हो रहा हूं। शादी कर लूंगा तो कुछ लोग पूछते हैं, जीवन का अर्थ क्या है? भरापन हो जायेगा।' जैसे अर्थ कोई बनी-बनाई, रेडीमेड वस्तु है, जो कहीं रखी है। अभी अमरीका में एक आदमी पर मुकदमा चलता था, क्योंकि और तुम्हें खोजनी है। उसने सात आदमियों को गोली मार दी थी-अकारण, जीवन में अर्थ नहीं है। अर्थ तुममें है! और तुम जागोगे तो | अपरिचित अजनबियों को! ऐसे लोगों को जिनका चेहरा भी जीवन में अर्थ फैल जायेगा। और तुम सोये रहोगे तो जीवन | उसने नहीं देखा था, पीछे से। सागर-तट पर कोई बैठा था, निरर्थक हो जायेगा। फिर इस निरर्थकता के खालीपन से बड़ी | उसने पीछे से आकर गोली मार दी। एक ही दिन में सात आदमी घबड़ाहट होती है, तो आदमी झूठे-झूठे अर्थ कल्पित कर लेता मार डाले। बामुश्किल पकड़ा जा सका। पकड़े जाने पर है। वे सहारे हैं, सांत्वनाएं हैं। तो कोई कहता है, बच्चों को बड़े अदालत में जब पूछा गया कि तूने किया क्यों? क्योंकि इनसे करना है। लगा रहता है, व्यस्त रहता है। क्योंकि जब भी कोई तेरी कोई दुश्मनी न थी; दुश्मनी तो दूर, पहचान भी न थी। अर्थ नहीं मालूम पड़े बाहर, तो भीतर की निरर्थकता मालूम होती तो उसने कहा कि मेरा जीवन बड़ा खाली-खाली है; मैं कुछ है। बच्चों को बड़े करना है। तुम्हारे पिता भी यही करते रहे, | काम चाहता था; किसी चीज से अपने को भर लेना चाहता था। उनके पिता भी यही करते रहे। ये बच्चे बड़े किसलिए हो रहे मैं चाहता हूं कि लोगों का ध्यान मेरी तरफ आकर्षित हो। और हैं ये भी यही करेंगे। ये भी बच्चे बड़े करेंगे। वह काम हो गया। अब मुझे फिक्र नहीं, तुम फांसी दे दो! इसका मतलब क्या है? प्रयोजन क्या है? अगर तुम्हारे पिता | लेकिन सब अखबारों में मेरा फोटो भी छप गया, सभी अखबारों तुमको बड़ा करते रहे और तुम अपने बच्चों को बड़ा करते रहोगे, में नाम भी छप गया। आज हजारों लोगों की जबान पर मेरा नाम तुम्हारे बच्चे उनके बच्चों को बड़ा करते रहेंगे, तो इस बड़े करने है, यह तो देखो! का प्रयोजन क्या है? इस सतत सक्रियता का अर्थ क्या है? | लोग कहते हैं, बदनाम हुए तो क्या, कुछ नाम तो होगा ही। इसमें कुछ अर्थ तो नहीं है। यह तो तुम्हें भी कभी-कभी झलक राजनीतिज्ञों में और अपराधियों में बहुत फर्क नहीं है। जाता है। | राजनीतिज्ञ समाज-सम्मत व्यवस्था के भीतर नाम को कमाने की धन ही इकट्ठा कर लोगे तो क्या होगा? अंततः आती है मौत! चेष्टा करता है। अपराधी समाज-सम्मत व्यवस्था नहीं खोज सब हाथ खाली हो जाते हैं। सब छिन जाता है। जो छिन ही पाता, समाज के विरोध में भी कुछ करके नाम पाने की आकांक्षा जायेगा, उसे पकड़-पकड़कर क्या होगा? लेकिन कम से कम करता है। इसलिए अगर कोई रातनीतिज्ञ बहुत दिनों तक बीच में कुछ अर्थ है, प्रयोजन है—इस तरह की भ्रांति तो पैदा हो राजनीति को न पा सके तो उपद्रवी हो जाता है, क्रिमिनल हो जाता जाती है। है, अपराधी हो जाता है। क्योंकि मूल आकांक्षा है: लोगों का लोग अजीब-अजीब अर्थ पैदा कर लेते हैं। ध्यान आकर्षित करना। मूल आकांक्षा है। लोगों को लगे कि मैं एक युवक मेरे पास आया। अपनी प्रेयसी को लेकर आया कुछ है; दुनिया कहे कि तुम कुछ हो, तुम्हारा कुछ अर्थ है। तुम और उसने कहा कि मुझे विवाह करना है। मैंने कहा कि अभी ऐसे ही आये और चले नहीं गये; तुमने बड़ा शोर मचाया। तेरी उम्र बीस साल से ज्यादा नहीं है, अभी इतनी जल्दी बोझ क्यों तुम्हारा आना एक तूफान की तरह था। दुनिया को तुम्हारे ऊपर लेता है? अभी दो-चार-पांच साल और मुक्त रहकर गुजर ध्यान देना पड़ा। सकते हैं। इतने उत्तरदायित्व लेने की अभी जरूरत कहां है? | तुमने कभी खयाल किया? तुम वस्त्र भी इसीलिए पहनते हो अभी तू स्कूल में पढ़ता है! थोड़ा रुक! पढ़ लिख ले। ढंग-ढंग के कि ध्यान पड़े, कोई देखे। स्त्रियां देखीं, नयी उसने कहा, 'उत्तरदायित्व लेने के लिये ही तो विवाह करना | | साड़ियां पहनकर आ जाती हैं तो बड़ी बेचैन रहती हैं, जब तक 326 Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मनुष्यो, सतत जाग्रत रहो कोई पूछ न ले, कहां खरीदी; जब तक कोई साड़ी का पोत न देखे के बीच से अपने गांव पहुंच गई। . और प्रशंसा न कर दे। - तुमने कभी खयाल किया है कि तुम कितने उपाय करते हो कि तुमने वह कहानी तो सुनी होगी। बड़ी पुरानी कहानी है कि एक किसी तरह लोगों का ध्यान आकर्षित हो जाये। अर्थ नहीं है औरत ने अपने घर में आग लगा ली थी और जब लोग आये तब जीवन में तो तुम झूठे अर्थ पैदा करने की कोशिश करते वह हाथ ऊंचे-ऊंचे उठाकर चिल्लाने लगी कि हे परमात्मा! हो-कोई कह दे कि 'तुम बड़े सार्थक हो! तुम जो कर रहे हो नष्ट हो गई, मर गई, लुट गई! तब किसी औरत ने पूछा, 'अरे! वह मूल्यवान है! तुम बड़ा ऊंचा काम कर रहे हो!' तुमसे कोई ये कंगन तो हमने देखे ही नहीं, कब बनवाये?' उसने कहा कि कुछ भी करवा ले सकता है, बस तुमसे यह कहलवा दिया जाये नासमझ, पहले ही पूछ लेती तो घर में आग क्यों लगानी पड़ती! कि तुम कोई बड़ा काम कर रहे हो, बड़ा ऊंचा, बड़ा महत्वपूर्ण! यह गांव भर की राह देखती रही, कंगन बनाये हैं, कोई पूछेगा! इस जगत में बोध के अतिरिक्त और कोई अर्थ नहीं है। और किसी ने न पूछा। जितने अर्थ तुम खोजते हो, उन सब से तुम्हारी बेहोशी घनी होती जब झोपड़े में आग लगी और आग की रोशनी उठी और कंगन है, बढ़ती है, जागरण नहीं आता। चमकने लगे और वह हाथ उठाने का मौका आया कि अब 'जो पुरुष सोते हैं उनके अर्थ नष्ट हो जाते हैं। अतः सतत चिल्ला-चिल्लाकर, हाथ हिला-हिलाकर वह कह सकती जागते रहकर पूर्वार्जित कर्मों को प्रकंपित करो।' पुरानी आदतें पड़ी हैं बहुत, उनको हिलाओ, डुलाओ, ताकि तुम जरा अपने पर गौर करना। हम सभी कंगन दिखाने निकले | उनसे छुटकारा हो सके, वे ढीली हो जायें! बड़ा बहुमूल्य वचन हैं, चाहे घर में आग लगाकर भी दिखाना पड़े। लेकिन ऐसा न हो है: 'अतः सतत जागते रहकर पूर्वार्जित कर्मों को प्रकंपित कि हम ऐसे ही विदा हो जायें, किसी को पता भी न चले कि कब करो।' हिलाओ-जैसे वृक्ष को कोई हिलाये और उसकी जड़ें आये, कब चले गये, कब उठे, कब बैठे, कब जन्मे। इस कंगन उखड़ जायें। अब पानी मत सींचो और! ऐसे ही क्या कम दुख दिखाने को लोग कहते हैं, अरे! कुछ नाम कर जाओ। कहते हैं, | भोगा है। ऐसे ही क्या कम भटके हो। पानी मत सींचो! लेकिन कुछ नाम छोड़ जाओ इतिहास में। तो तैमूरलंग और चंगेज़ और जो हमें जगाता है, वह दुश्मन मालूम पड़ता है, क्योंकि वह नादिरशाह इतिहास में नाम छोड़ जाते हैं, हजारों लोगों को आग हिलाता है। लगवाकर, हजारों लोगों को काटकर। __ आस्पेंस्की ने अपनी किताब 'इन सर्च आफ द मिरेकुलस' कहते हैं, एक वेश्या तैमूर के शिविर में नाचने आयी थी। जब अपने गुरु गुरजिएफ को समर्पित की है, तो उसमें लिखा है: वह रात जाने लगी तो वह डरती थी, क्योंकि रास्ता अंधेरा था। 'गुरजिएफ के लिए-जिसने मेरी नींद को तोड़ दिया।' और कोई दस-बारह मील दूर उसका गांव था। तो तैमूर ने कहा, लेकिन जब कोई तुम्हारी नींद तोड़ता है तो सुखद नहीं मालूम घबड़ा मत। उसने अपने सैनिकों से कहा कि इसके रास्ते में होता। जब कोई तुम्हारी नींद तोड़ता है तो तुम्हें लगता है दुश्मन। जितने गांव पड़ें, आग लगा दो! थोड़े सैनिक भी झिझके कि यह इसलिए जगत में नींद तोड़नेवाले सदा दुश्मन मालूम पड़े। जरा अतिशय मालूम पड़ता है। एक मशाल से ही इसको सुकरात को हमने ऐसे ही जहर नहीं पिला दिया था, और न पहुंचाया जा सकता है! लेकिन तैमूरलंग ने कहा, 'इतिहास याद | जीसस को हमने ऐसे ही सूली पर लटका दिया, न हमने महावीर नहीं रखेगा मशाल से पहुंचाओगे तो। पता रहना चाहिए आने को ऐसे ही पत्थर मारे और कान में खीलें ठोंके। यह अकारण ले हजारों सालों को कि तैमूरलंग की वेश्या थी, कोई साधारण नहीं था। ये लोग नींद तोड़ रहे थे। ये अलार्म की तरह थे। तुम वेश्या न थी। उसके द्वार में, दरबार में नाचने आयी थी। कोई जब मजे से सो रहे थे और सुबह का आखिरी सपना देख रहे थे, आठ-दस छोटे-छोटे गांवों में, जो रास्ते में पड़ते थे, आग लगा | तब ये बीच में आ गये और उन्होंने उपद्रव मचा दिया कि जागो! दी गई। गांव में लोग सो रहे थे, उनको पता भी नहीं था, आधी तुम्हारा भाव तो इन दो पंक्तियों में प्रगट हुआ है। रात–ताकि रास्ता रोशन हो जाये। वेश्या उन जलती हुई लाशों न अजा हो, न सहर हो, न गजर हो शबे-वस्ल 327 | Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सूत्र भाग : 1 क्या मजा हो जो किसी को न जगाए कोई। जैसे व्यक्ति जितनी देर सोयें, उतना ही उपद्रव कम! आप तो न अजा हो-न तो मस्जिद में कोई अजान पड़े; न सहर सोये ही रहें।' हो-न सुबह हो, न सूरज ऊगे; न गजर हो-न कोई मंदिर में महावीर कहते हैं, धार्मिकों का जागना श्रेयस्कर है; अधार्मिकों घंटियों को बजाये; मिलन की रात! क्या मजा हो जो किसी को का सोना श्रेयस्कर है। क्योंकि अगर अधार्मिक सक्रिय हो उठे, न जगाये कोई! | तो अधर्म ही करेगा। महावीर यह कह रहे हैं कि अधार्मिक का तो सोने में हमारी बड़ी आतुरता है। जिसको हम सुख कहते हैं, शक्तिहीन होना अच्छा है; धार्मिक का शक्तिशाली होना अच्छा अगर तुम गौर से पाओगे तो वह एक मधुर सपना देखने से ज्यादा है। महावीर यह कह रहे हैं, धार्मिक के पास बल हो तो धर्म नहीं है। जिसको हम सुखी जिंदगी कहते हैं, वह ऐसी जिंदगी है, घटेगा; अधार्मिक को पास बल होगा तो अधर्म घटेगा, वह कुछ जिसमें मधुर स्वप्नों का काफी जाल है। जिसको हम दुखद न कुछ उपद्रव करेगा। राजनीतिज्ञ बीमार रहें तो अच्छा है; जिंदगी कहते हैं, वह भी सपनों की ही जिंदगी है; उसमें सपने अस्पतालों में रहें तो अच्छा है। ठीक हुए कि वे कुछ उपद्रव दुख से भरे हैं, नाइटमेयर जैसे हैं। करेंगे। बिना उपद्रव किये वे रह नहीं सकते हैं। उपद्रव के लिए लेकिन सपना तो सपना है। तुम सुखद सपने देखकर भी एक अच्छे-अच्छे नाम देंगे। उपद्रव को सजायेंगे, शंगारेंगे। उपद्रव दिन मर जाओगे तो क्या होगा? को क्रांति, स्वतंत्रता, समानता, साम्यवाद, न मालूम क्या-क्या इसलिए महावीर कहते हैं, अर्थ बाहर नहीं है; अर्थ तो तुम्हारे नाम देंगे। लेकिन बहुत गहरे में उपद्रव की आकांक्षा है। खाली भीतर की ज्योति के प्रज्वलित हो जाने में है। तुम्हारी रोशनी | वे बैठ नहीं सकते। तुम्हारे जीवन को भर दे और सपनों को तितर-बितर कर दे। और महावीर व्यंग्य कर रहे हैं। वे यह कह रहे हैं, अधार्मिक सोये तुमने अब तक पूर्व जन्मों में जो अर्जित कर्म किये हैं, जिनके | रहें तो ठीक; धार्मिक जागे। कारण जड़ें मजबूत हो गई हैं सपनों की, जिनके कारण सपने इसलिए महावीर की पूरी प्रक्रिया यह है कि तुम जागो भी, साथ सत्य मालूम होते हैं, जिनके कारण जो नहीं है वह बहुत ही साथ तुम धार्मिक भी होते चलो; धार्मिक होते चलो और साथ वास्तविक मालूम हो रहा है-उनको हिलाओ, प्रकंपित करो! ही साथ जागते भी चलो। अन्यथा शक्ति भी गलत हाथों में उन जड़ों को तोड़ो और उखाड़ो! पड़कर खतरनाक सिद्ध होती है। ऐसा ही तो हुआ है, विज्ञान ने 'धार्मिकों का जागना श्रेयस्कर है और अधार्मिकों का सोना शक्ति सोये हुए आदमियों के हाथ में दे दी। ऐसा नहीं है कि श्रेयस्कर है।' बड़ा बहुमूल्य वचन है! महावीर कहते हैं, पहली दफा वैज्ञानिकों को अणु की शक्ति का पता चला है। धार्मिकों का जागना श्रेयस्कर है और अधार्मिकों का सोना महावीर भी अणुवादी थे। जैन-दर्शन दुनिया का सबसे प्राचीन श्रेयस्कर है। अणुवादी दर्शन है। आइंस्टीन और रदरफोर्ड ने जो इस सदी में नादिरशाह के जीवन में भी ऐसा उल्लेख है। उसने एक सूफी पाया है, वह जैन कोई पांच हजार साल से कहते रहे हैं कि पदार्थ फकीर को पूछा, क्योंकि वह खुद बहुत आलसी था और सुबह | अणुओं का समूह है, पदार्थ अणुओं से बना है। दस बजे के पहले नहीं उठता था। रात देर तक नाच-गान अणु का सिद्धांत जैनियों का प्राचीनतम सिद्धांत है। और चलता, शराब चलती, तो सुबह दस-बारह बजे उठता। उसने जैसे-जैसे विज्ञान साफ होता जा रहा है, वैसे-वैसे पराने शास्त्रों एक सूफी फकीर को पूछा कि मेरे दरबारी मुझ से कहते हैं कि के अर्थ साफ होते जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि अणु-शक्ति को इतना आलस्य ठीक नहीं है, तुम क्या कहते हो? उस सूफी | खोज लिया गया था। संभवतः महाभारत का अंत अणुशक्ति से फकीर ने महावीर का यह वचन दोहराया मालूम होता है; क्योंकि ही हुआ। लेकिन फिर एक बात समझ में पूरब को आ गई कि बिलकुल यही वचन उसने दोहराया। उसने कहा, आप तो अगर | जब तक लोग सोये हुए हैं, इतनी शक्ति उनके हाथ में होना बिलकुल सोयें चौबीस घंटे तो अच्छा है। नादिरशाह थोड़ा खतरनाक है; उसका दुरुपयोग होगा। शक्ति उसके हाथ में होनी चौंका। उसने कहा, 'तुम्हारा मतलब?' उसने कहा, 'आप चाहिए, जिसके भीतर सदभाव पहले आ गया हो तो फिर ठीक 328 Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ MEANIRAM मनुष्यो, सतत जाग्रत रहो है। नहीं तो शक्ति का तुम करोगे क्या? तुमने लार्ड बेकन का क्योंकि तुम कहोगे, अब सुविधा मिली, अब दौड़-धूप न रही, प्रसिद्ध वचन सुना होगा-पावर करप्ट्स एंड करप्ट्स धन हाथ आ गया-अब घर बैठकर गीत गुनगुना लें। अब तक एब्सोल्यूटली-कि शक्ति जिनके हाथ में है वह लोगों को तो मजदूरी करनी पड़ती थी, गड्ढा खोदना पड़ता था, समय व्यर्थ व्यभिचारित कर देती है और परिपूर्ण रूप से व्यभिचारित कर होता था, शक्ति व्यय होती थी-गीत गाने का अवसर कहां देती है। लेकिन वह वचन सत्य होते हुए भी पूर्ण सत्य नहीं है। था! अब गीत गाने का अवसर मिला है। शक्ति किसी को व्यभिचारित नहीं करती। शक्ति केवल तुम्हारे ___ तो धन अगर सम्यक हाथों में पड़े तो शुभ है; असम्यक हाथों भीतर जो व्यभिचार पड़ा था, उसे प्रगट करती है। में पड़ जाए तो अशुभ है। इसलिए तुम मेरी बात खयाल रखना। तुम देखते हो, एक आदमी के पास कुछ भी नहीं है तो वह मैं तुमसे यह नहीं कहता कि धन छोड़ो। धन में क्या रखा है? शराब नहीं पीता; वह शराब के खिलाफ है। फिर कल अचानक तुम्हारे हाथ बदलने चाहिए। तो जो धन को छोड़कर भाग जाते लाटरी हाथ लग जाती है, फिर वह शराब पीने लगता है। अब हैं-तथाकथित त्यागी–वे केवल अवसर को छोड़कर भाग वह भूल जाता है सब शराब की खिलाफत। तो लोगों को ऐसा | रहे हैं; बीज का क्या होगा? बीज तो भीतर है। वह तो साथ ही लगता है कि धन ने इसे भ्रष्ट किया। बात गलत है। धन न होने चला जायेगा। फिर वे धन से डरने लगेंगे, क्योंकि उनको बात से यह अपने को समझाता था, अंगूर खट्टे हैं। पीना भी चाहता समझ में आ जायेगी, तर्क साफ हो जायेगा कि धन हाथ आया तो पीता कहां से? तो नीति के, धर्म के वचन दोहराता था। अब कि उपद्रव शुरू होता है। लेकिन धन कहीं उपद्रव ला सकता जब धन हाथ में आ गया, सब भूल गया। है? चांदी के ठीकरे उपद्रव ला सकते हैं? तब तो चांदी के इस देश में ऐसा हुआ। स्वतंत्रता-संग्राम के दिनों में जो लोग ठीकरे आत्मा से भी ज्यादा बलवान हो गये। चांदी के ठीकरे बड़े त्यागी-तपस्वी मालूम पड़ते थे, वे कोई त्यागी-तपस्वी थे उपद्रव नहीं ला सकते-उपद्रव तुम्हारे भीतर पड़ा है। नहीं। क्योंकि परीक्षा तो तब है जब शक्ति हाथ में आई। जब इसलिए मैं कहता हूं, वास्तविक त्यागी की परीक्षा संसार के शक्ति हाथ में न थी तब तो कोई भी त्यागी-तपस्वी होता है। जब भीतर है, बाहर नहीं। भगोड़े की बात और है, लेकिन वास्तविक शक्ति हाथ में आई, राज्य रूपांतरित हुआ और तथाकथित त्यागी की परीक्षा संसार के भीतर है। वहीं पता चलेगा। जो त्यागी-तपस्वी सत्ताधारी बने, तत्क्षण त्याग-तपश्चर्या सब महल में रहकर फकीर की तरह रह जाये—वहीं पता चलेगा। समाप्त हो गई। लगेगा शायद सत्ता ने उन्हें भ्रष्ट किया। नहीं, जो स्त्री-पुरुषों के बीच रहकर अकेला रह जाये—वहीं पता सत्ता ने केवल अवसर दिया, तो जो भ्रष्ट होने के बीज भीतर पड़े चलेगा। जहां सब साधन थे, लेकिन फिर भी जो अकंपित थे उन पर वर्षा हुई। बीज तो थे ही। क्योंकि तुम्हारा धन तुम्हें रहे—वहीं पता चलेगा। कैसे भ्रष्ट कर सकता है, अगर तुम्ही भ्रष्ट होने को पूर्व से तैयार इसलिए अगर कोई मुझसे पूछे कि त्याग की अगर परम प्रतिमा न थे? तुम सिर्फ धन की प्रतीक्षा कर रहे थे। धन आ गया, | बतानी हो, तो मैं महावीर को न बताऊंगा, मैं कृष्ण को संयोग मिल गया; अब रुकने की कोई जरूरत न रही। अब बताऊंगा। महावीर परम त्यागी हैं, लेकिन परीक्षा की सीमा के रुके, वह बिलकुल पागल है। अब तक रुके थे, वह तो कारण बाहर हैं। परीक्षा कभी भी नहीं हुई। जहां उपद्रव खड़ा होता है, यह था कि अपनी पहुंच के बाहर थे अंगूर। इसलिए कहते थे, वहां से दूर हैं। लेकिन कृष्ण परीक्षा से भी गुजर गये हैं। मैं जनक खट्टे हैं। अब नसेनी हाथ लग गई, अब कौन रुकेगा! अब को बताऊंगा। साम्राज्य है। सारा साम्राज्य का जाल है। और रुकना असंभव है। उसके बीच बाहर हैं। सत्ता हाथ में आते ही लोग भ्रष्ट हो जाते हैं इसलिए नहीं कि तो मैं तुमसे भागने को नहीं कहता। और महावीर का भी वचन सत्ता भ्रष्ट करती है, बल्कि इसलिए कि सत्ता अवसर देती है। तो | तुम ठीक से समझो, तो वे भी जागने को कह रहे हैं, भागने को जो तुम्हारे भीतर छिपा था वह प्रगट हो जाता है। अगर तुम्हारे नहीं कह रहे हैं। हां, यह हो सकता है कि जागकर तुम्हें यहां भीतर काव्य छिपा था, हाथ में सत्ता आते ही काव्य प्रगट होगा। रहना अर्थहीन मालूम पड़े, जैसा कि महावीर को मालूम पड़ा। 329 www.jainelibrar.org Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - - Boos जिन सूत्र भागः1 Jaya और तुम्हारी स्वाभाविक नियति तुम्हें दूर वन और उपवनों में ले किया जा सकता है तब कर्म नहीं होगा। जाये कि पहाड़ों में ले जाये, तो ठीक है। लेकिन, तुम संसार को | समझो। तुम अपने बच्चों में लिप्त हो, राग में डूबे हो। तुमने छोड़कर नहीं जा रहे हो। तुम्हारे छोड़ने में कोई प्रयास नहीं है। | बड़ी महत्वाकांक्षाएं बच्चों के कंधों पर रख दी हैं। तुम जो नहीं तुम सहज अपने स्वभाव के अनुकूल, जो तुम्हें ठीक पड़ रहा है, | कर पाये जिंदगी में, चाहते हो तुम्हारे बच्चे कर लेंगे। अगर उस तरफ जा रहे हो। इसमें फर्क है। | मां-बाप बेपढ़े-लिखे हों तो बच्चों को बुरी तरह पढ़ाते-लिखाते एक आदमी जो बाजार को छोड़कर भागता है, जो बाजार से हैं। क्योंकि उनकी एक कमी रह गई, वह खलती है। कम से डरकर भागता है, उसका अभी बाजार में अर्थ खोया नहीं है। कम अपने में न हो सकी, अपने बच्चों में पूरी हो जाये। जो अगर अर्थ खो जाये तो डर कैसा? और एक आदमी, जो बाजार मां-बाप जिंदगी भर तड़फते रहे, किसी बड़े पद पर न हो सके, वे में अर्थ पाता ही नहीं, इसलिए चला जाता है। ये दोनों जाते हुए अपने बच्चों को पहले से ही तैयार करते हैं कि हम तो चूक गये, मालूम पड़ेंगे, लेकिन दोनों के भीतर क्रांतिकारी फर्क है। तुम मत चूक जाना! अब तुम बच्चों को तैयार कर रहे हो जीवन ऐसा समझो कि एक रस्सी पड़ी है। तुम गुजरे पास से, तुमने के युद्ध के लिये। यह एक स्थिति है। सांप समझ लिया और तुम भागे। तुम पूरब की तरफ जा रहे थे, फिर एक दूसरा आदमी है। उसके भी बच्चे हैं। लेकिन जागा तुम पूरब की तरफ ही भागे, लेकिन घबड़ाकर भागे। क्योंकि हआ आदमी है। जागते ही 'मेरे हैं, यह तो खयाल समाप्त हो सांप में तुम्हें भय मालूम पड़ा। फिर एक और आदमी आ रहा जाता है; 'बच्चे हैं, यह खयाल रह जाता है। 'मेरे हैं', यह तो है। उसने भी गौर से देखा और उसे सांप नहीं दिखाई पड़ा, रस्सी प्रमाद का हिस्सा है, मूर्छा का हिस्सा है। ही दिखाई पड़ी। उसको भी पूरब जाना है, वह भी पूरब जा रहा | मेरा क्या है? खाली हाथ हम आते हैं, खाली हाथ हम जाते है। लेकिन जो घबड़ाकर भागा है उसमें और जो रस्सी को | हैं। और बच्चे मेरे क्या हो सकते हैं? भला मेरे द्वारा आये हों, मैं देखकर जा रहा है, बुनियादी फर्क है। दोनों एक ही दिशा में जा | मार्ग बना होऊं; लेकिन आये तो कहीं अज्ञात से हैं। मेरे चौराहे रहे हैं। लेकिन जो भाग गया है उसके भागने के पीछे अभी से गुजरे होंगे, इससे मेरे नहीं हो जाते। मेरे पास हैं, इससे मेरे अंधकार है, अंधेरा है, अज्ञान है। और जो जागकर जा रहा है, | नहीं हो जाते। मेरे शरीर का सहारा लेकर बड़े हो रहे हैं, इसलिए उसके जाने में प्रकाश है, ज्योति है। | मेरे नहीं हो जाते। मेरे जीवाणु के माध्यम से प्रगट हुए हैं, 'इस जगत में ज्ञान आदि सारभूत अर्थ हैं। जो पुरुष सोते हैं | इसलिए भी मेरे नहीं हो जाते। उनका अर्थ खो जाता है। सतत जागते रहकर पूर्वार्जित कर्मों को चैतन्य की अपनी यात्रा है। ये जो बच्चे तुम्हारे पास हैं, ये भी प्रकंपित करो। धार्मिकों का जागना श्रेयस्कर, अधार्मिकों का | अपनी-अपनी यात्रा से आये हैं। इस जीवन में संयोग...तुमसे सोना श्रेयस्कर है। ऐसा भगवान महावीर ने वत्स देश के | गुजरे हैं, तुम्हारे नहीं हैं। राजा-शतानीक की बहन जयंति से कहा था।' | तुमने कभी खयाल किया! बाल तुम्हारे शरीर से जुड़े हैं, काट 'प्रमाद को कर्म (आस्रव) और अप्रमाद को अकर्म (संवर) देते हो; फिर तो तुम्हारे नहीं रह जाते! नाखून काट देते हो, फिर कहा है। प्रमाद, होने से मनुष्य अज्ञानी होता है; प्रमाद के न होने तो तुम्हारे नहीं रह जाते! बच्चा जैसे ही पैदा हो गया, मां की देह से ज्ञानी होता है।' के बाहर आ गया-तुम्हारा क्या रह गया? 'मेरा'-भाव 'प्रमाद को कर्म...' प्रमाद यानी मूर्छा। प्रमाद यानी गिर जाये, ममत्व गिर जाये-फिर तुम बच्चों की फिक्र कर देते सोया-सोयापन। प्रमाद, जैसे कोई भीतरी नशे में तुम पड़े हो। हो, उनकी साज-संवार कर देते हो; लेकिन इस साज-संवार में 'प्रमाद को कर्म कहा है...।' अब कोई राग नहीं है। और इस साज-संवार के द्वारा तुम अपनी तुम जो भी कर रहे हो, उसका सवाल नहीं है—तुम क्यों कर | महत्वाकांक्षाओं को, अपने अहंकार को, अपनी अतृप्त रहे हो, उसका सवाल है। अभीप्साओं को पूरा नहीं करना चाहते। तुम बच्चों को साथ दे यही करना और ढंग से भी किया जा सकता है, जागकर भी देते हो कि ठीक है, संयोग मिल गया, तुम असहाय हो; मुझसे 330 ain Education International Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मनुष्यो, सतत जाग्रत रहो बन सकता है, मैं कुछ कर देता हूं। लेकिन तुम कहते हो, तुम्हें | भी दौड़ नहीं रुकती! अब उन रुपयों का कुछ भी नहीं कर जो होना हो तुम वही होना; मेरी मत सुनना। मैं तो असफल सकते। अब कुछ भी बचा नहीं है, जो उनसे खरीदा जा सके; हुआ ही हुआ; अब मैं तुम्हें और खराब न कर जाऊंगा। जो भी खरीदा जा सकता था वह सब खरीद लिया, लेकिन फिर एक बात, अगर मां-बाप थोड़े भी जाग्रत हों, तो निश्चित भी दौड़ जारी रहती है। यह कोई विक्षिप्त दौड़ है। यह कोई करेंगे-वे बच्चों को सजग कर देंगे कि हमने तो जिंदगी गंवाई पागलपन है। इस पागलपन से जो मुक्त हो जाता है, उसके कर्म ही गंवाई, तुम मत गंवा देना! कृपा करके हम जैसे तो बनना ही बांधते नहीं। उसके कर्म प्राकृतिक कर्म हो जाते हैं, नैसर्गिक कर्म मत और कुछ भी बन जाना; क्योंकि यह तो हमने होकर देख | हो जाते हैं। लिया। इस होने से तो कुछ भी न पाया। | प्रमाद को इसलिए महावीर कर्म कहते हैं। करने को कर्म नहीं सोया हुआ बाप उलटी कोशिश करता है। वह कहता है, मेरे कहते, करने में जो बेहोशी है उसको कर्म कहते हैं। यह थोड़ा जैसे! बच्चे उससे थोड़े भिन्न होने लगते हैं तो वह नाराज होता सोचने जैसा है। यह सूत्र बड़ा बहुमूल्य है। तुम क्या करते हो, है। वे प्रतिकृति होने चाहिए। वे ठीक मेरी प्रतिमा होने चाहिए। यह सवाल नहीं है-तुम होश में रहकर करते हो कि बेहोश 'मेरे' हैं, तो उनके माध्यम से किसी तरह का अमरत्व खोजा रहकर करते हो। यह तो कर्म की बड़ी अनूठी व्याख्या हुई। 5 मैं तो मिट जाऊंगा. लेकिन मेरी प्रतिमाएं छुट | प्रम जायेंगी। कोई सिलसिला मेरा जारी रहेगा। ___ ‘पमायं कम्ममाहंसु, अप्पमायं तहाऽवंर।' कर्म तो वही हैं। कबीर भी कपड़ा बुनते हैं, बाजार में बेचने तो जाग जाओ, कर्म तो तब भी जारी रहेगा। आखिर महावीर जाते हैं। गोरा कुम्हार मटकियां बनाता है, बाजार में बेचता है। भी जाग गये, फिर भी तो कोई चालीस साल जीवित रहे, कर्म तो रैदास जिंदगी भर जूते बनाते रहे। लेकिन कुछ फर्क हो गया। किया ही; उठे भी, सोये भी, भोजन भी किया, उपवास भी कबीर अब भी कपड़ा बनाते हैं, लेकिन अब इसमें कोई व्यवसाय | किया, ध्यान भी किया, मौन भी किया, बोले भी, चुप भी नहीं है। अब इससे कुछ धन कमा लेकर धन के ऊपर सांप रहे-सब कर्म चलता रहा। लेकिन यह कर्म अब बांधता नहीं बनकर बैठ जाने की आकांक्षा नहीं है। जरूरी है; रोटी के लिए, है। अब इस कर्म में कोई तंद्रा नहीं है, अब कोई मूर्छा नहीं है। कपड़े के लिए कर लेते हैं। आवश्यक है, कर लेते हैं। इसमें अब यह सोये-सोये नहीं हो रहा है, यह जागकर हो रहा है। अब कोई वासना नहीं है। __ जैसे ही तुम जागते हो, जीवन शुद्ध जरूरतों पर आ जाता है। जरूरत और वासना के भेद को समझना। जरूरतें तो सभी की जो गैर-जरूरी है, उसकी पकड़ नहीं रह जाती। ऐसा समझो कि / जरूरतें तो जीवन का अंग हैं। वासनाएं आज अचानक तम्हें खबर मिले कि पना में भूकंप होने को है और विक्षिप्तताएं हैं। वे कभी पूरी नहीं होती। और उनका जीवन की | तुम्हें थोड़ी-सी ही चीजें बचाकर निकलने का मौका है, और तुम किसी जरूरत से कोई संबंध नहीं है। कोई आदमी सम्राट होना सारा घर का सामान इकट्ठा कर लो, और सोचो कि क्या बचायें चाहता है, इसका जीवन की जरूरत से क्या संबंध है? हां, और क्या छोड़ें। तुम चकित होओगे यह जानकर और यह भूखा रोटी मांगता है, यह समझ में आता है। नंगा कपड़ा चाहता विचार तुम्हारे मन में जरूर आयेगा कि यह इतना व्यर्थ का है, यह समझ में आता है। लेकिन कोई आदमी सम्राट होना सामान इकट्ठा क्यों किया। इसमें बहुत थोड़ा ही काम का होगा चाहता है। अब यह सम्राट होने से किसी भी जरूरत का कोई जो तुम ले जा सकोगे। और जब तुम चुनने लगोगे, तुम्हें खुद ही संबंध नहीं है। समझ में आयेगा, दस में से नौ चीजें तुम खुद ही छोड़े दे रहे हो। तुम्हें प्यास लगी है. पानी चाहिए। तुम धप में खड़े हो, छप्पर | लेकिन इनको इकट्ठा करने में बड़ा समय व्यतीत किया। इनको चाहिए-समझ में आता है। लेकिन धन का एक ढेर इकट्ठा करने में पागल की तरह दौड़े। इनको इकट्ठा करने में लगा-लगाकर तुम उस धन के ढेर पर बैठे रहो, यह बात रुग्ण जीवन की बड़ी संपदा खोयी और कूड़ा-कर्कट इकट्ठा किया। है, यह विक्षिप्त है। अरबों रुपये हो जाते हैं लोगों के पास, तब इसको ले जाने के क्षण में, तुम खुद ही सोचोगे कि इसमें 3311 Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सत्र भागः / बहुत-सा तो ऐसा है जो ले जाने योग्य नहीं है। हड़बड़ाहट पैदा होती थी। ऐस्कीमों की जीवन-व्यवस्था में एक प्रक्रिया है, बड़ी बहुमूल्य तुम साइकिल चलाते हो, लेकिन शायद ही तुम किसी है! काश, सारी दुनिया में कभी हो जाये तो बड़े काम की हो! साइकिल चलानेवाले को ठीक चलाते देखो, क्योंकि अगर ठीक ऐस्कीमों, जैसे यहां वर्ष में दीवाली आती है, ऐसा उनका एक कोई चला रहा हो तो पैर के पंजे पर जोर देना काफी है। पूरे शरीर दिन आता है— उत्सव का दिन। उस दिन उनके पास जो भी हो, को तनाव देने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन साइकिल क्या जो व्यर्थ होता है, वह बांट देते हैं। इसका बड़ा परिणाम होता | चला रहे हैं, पूरा शरीर तना हुआ है। फिर थक जाते हैं। फिर है। घर खाली, शुद्ध, साफ हो जाते हैं। और इसका दूसरा | ऊब जाते हैं। परिणाम यह होता है कि जब सालभर बाद व्यर्थ को बांट ही देना | जिंदगी में जरा गौर करो! जो काम जितने से हो सकता हो है तो वे व्यर्थ को इकट्ठा भी नहीं करते; क्योंकि वह फिजूल है, उतना तो जरूरी है; उससे रत्तीभर भी ज्यादा डालना मूर्छा के वह सालभर बाद बंट जाना है। उसके लिए दौड़-धूप कौन करे! | कारण हो रहा होगा। वह साइकिल सवार जानता ही नहीं कि तो एस्कीमों का घर अत्यंत जरूरत, अत्यंत आवश्यक पर क्या कर रहा है। उसे याद ही नहीं है कि वह क्या कर रहा है। जो निर्भर है। और तुम ऐस्कीमों को जितना संतोषी पाओगे, किसी काम रत्तीभर से हो सकता था, जो सई से हो सकता था, वहां को न पाओगे। पर मौत के दिन तो सभी कुछ छूट जाना है; तलवार लिए बैठे हो। खुद को लहूलुहान कर लिया है, दूसरों थोड़ा भी न ले जा सकोगे। अगर थोड़ा मौत का स्मरण बना रहे को लहूलुहान कर रहे हो। और सुई तो सी देती कपड़े को, तो तुम व्यर्थ की दौड़-धूप छोड़ दोगे।। तलवार और फाड़ देती है। जो काम सुई से होता है वह तलवार तुम अपने सौ कर्मों को जरा गौर से देखना; उसमें से नब्बे तो से हो नहीं सकता। चुपचाप गिराये जा सकते हैं, जिनके लिए कोई कारण नहीं है। सम्यक जीवन चाहिए! दो छोटे बच्चे बात कर रहे थे। एक बच्चा कह रहा था कि मेरी महावीर कहते हैं, 'प्रमाद को कर्म, अप्रमाद को अकर्म कहा मा अदभुत है! वह किसी भी विषय पर घंटों बोल सकती है। है। प्रमाद के होने से मनुष्य अज्ञानी होता है। और प्रमाद के न दूसरा बोला, यह कुछ भी नहीं है। मेरी मां बिना विषय के घंटों | होने से मनुष्य ज्ञानी हो जाता है।' सम्हालो थोड़ा। जीवन की क्या, दिनों बोल सकती है। विषय के घंटों क्या, विषय की कोई | गंध को व्यर्थ गंवाए दे रहे हो। जरूरत ही नहीं है। कहीं की रहेगी न आवारा हो कर __ तुम जरा खयाल रखना, तुम जितना बोल रहे हो, उसमें से | यह खुशबू जो फूलों ने कांटों पे तौली। कितना जरूरी था, कितना तुम छोड़ सकते थे। तुम जो कर रहे | बड़ी मुश्किल से खुशबू आती है। बड़ी मुश्किल से! बड़ी हो, उसमें से कितना जरूरी था, कितना छोड़ा जा सकता था! जद्दोजहद से! जरा देखो तो बीज से लेकर फूल तक की यात्रा, धीरे-धीरे अपने जीवन को व्यवस्था दो! होश लाओ! जहां कितनी कठिन है ! करीब-करीब असंभव है। चलकर पहुंचा जा सकता है, वहां दौड़कर क्यों पहुंच रहे हो? कितनी अड़चनें हैं। कितने अवरोध हैं। पहले तो बीज टूटे न मैं विश्वविद्यालय में शिक्षक था, तो मैंने देखा कि परीक्षा में टूटे; टूट जाये तो ठीक भूमि मिले न मिले; ठीक भूमि भी मिल से हैं, लेकिन पूरा शरीर खिंचा है। तो मैं | जाये तो कोई पानी दे न दे, कोई पानी भी दे, सूरज की रोशनी पड़े उनसे कहता कि जब तुम हाथ से लिख रहे हो तो दो अंगुलियों पर न पड़े; कोई बच्चा उखाड़ दे पौधे को; कोई जानवर खा जाये या जोर पड़े, यह तो समझ में आता है; लेकिन यह पूरा शरीर अंगूठे कोई कुत्ता अपना पेशाब-घर बना ले! करोगे क्या? हजार से लेकर सिर तक तुम तने हुए क्यों हो? किन्हीं-किन्हीं बाधाएं हैं! तब कहीं वृक्ष खड़ा हो पाता। तब कहीं फूल आते। विद्यार्थियों को बात समझ में आई और वे शरीर को शिथिल कांटों पर तौल-तौलकर गंध पैदा करनी पड़ती है। छोड़कर लिखे। और बाद में उन्होंने मुझे कहा, यह आश्चर्य की कहीं की रहेगी न आवारा हो कर बात है! हम नाहक शक्ति खो रहे थे और उसकी वजह से यह खुशबू जो फूलों ने कांटों पे तौली। 332 Main Education International Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मनुष्यो, सतत जाग्रत रहो -और फिर होता क्या है परिणाम? सिर्फ आवारा होकर | झंझटें खड़ी हो जाती थीं। भटक जाती है। तुम जरा सोचो! तुम्हारी जिंदगी की कितनी झंझटें तुम्हारे मनुष्य होना बड़ी लंबी यात्रा है। इस देश में हम कहते रहे हैं, | बोलने के कारण खड़ी हो गई हैं! घर आये, कुछ बोल दिए पत्नी चौरासी करोड़ योनियां! अनंत-अनंत काल, यात्रा करते-करते, | से। तब खयाल में नहीं था कि यह बोलने का क्या परिणाम निखारते-निखारते यह फूल खिला है, जो मनुष्य है, जिसको हम होगा। जब बोला था तो कोई भाव भी न था बुरा; लेकिन बोले, मनुष्य कहते हैं। यह मनुष्यता का फूल खिला है। और अब तुम फंसे। तुम भी बेहोश हो। तुम बेहोशी में बोल गये। पत्नी ने कर क्या रहे हो? यह गंध आवारा हुई जा रही है। यह ऐसे ही बेहोशी में सुना। उसने कुछ का कुछ सुना। लड़ने-झगड़ने पर व्यर्थ भटकी जा रही है और खोई जा रही है। इतने श्रम से जिसे खड़ी हो गई। अब तुम लाख समझाते हो कि यह मेरा मतलब न पाया है, उसे तुम ऐसे चुपचाप बेहोशी में गंवाए दे रहे हो। था, इससे क्या होता है? अब मतलब न था, यह समझाने के 'अज्ञानी साधक कर्म-प्रवृत्ति के द्वारा कर्म का क्षय होना मानते | लिए तुम कुछ बोल रहे हो, उसमें से भी पत्नी कुछ पकड़ेगी। हैं: किंतु वे कर्म के द्वारा कर्म का क्षय नहीं कर सकते। धीर पुरुष अब यह सिलसिला कहां अंत होगा? अकर्म...(संवर या निवृत्ति) के द्वारा कर्म का क्षय करते हैं। थोड़ा सोचो, तुम्हारी जिंदगी की कितनी विपदाएं कम न हो मेधावी पुरुष लोभ और मद से अतीत तथा संतोषी होकर पाप जायें, अगर तुम थोड़े चुप रहो! सोच के बोलो! अत्यंत. जरूरी नहीं करते।' हो तो बोलो। जैसे एक-एक शब्द के लिए मूल्य चुकाना पड़ेगा, 'अज्ञानी साधक कर्मप्रवृत्ति के द्वारा ही कर्म का क्षय सोचते इस तरह बोलो। तुम न केवल यह पाओगे कि तुम्हारे बोलने में हैं...।' वे सोचते हैं, कर्म को काटना है तो और कर्म करो। बल आ गया, तुम यह भी पाओगे कि तुम्हारे बोलने के कारण ज्ञानी साधक कर्म के द्वारा कर्म का क्षय नहीं मानते। अड़चनें कम हो गईं; न तुम अपने लिए पैदा करते हो, न औरों के 'अकर्म के द्वारा...' अकर्म का क्या अर्थ है? पहला—जो लिए अड़चनें पैदा करते हो। और तुम्हारे जीवन में एक प्रसाद व्यर्थ कर्म हैं उन्हें जाने दो। त्याग करने को नहीं कह रहा अभिव्यक्त होना शुरू हो जायेगा। क्योंकि जो चुप रहता है, हूँ-बोध से समझो कि व्यर्थ हैं, वे अपने से गिर जायेंगे, चले उसके पास ऊर्जा इकट्ठी होती है। बोल-बोलकर तुम उसे चुकता जायेंगे, विदा हो जायेंगे। तुम्हारा लगाव टूट जायेगा। थोड़ा | कर लेते हो। जागकर अपने जीवन-चर्या को गौर से देखते रहो: सुबह से रात | अकर्म की तरफ पहला कदम है : व्यर्थ कर्म के प्रति जागो। तक क्या कर रहे हो? उसमें क्या-क्या व्यर्थ है? तो पहले व्यर्थ | फिर, जो सार्थक बच रहे—बचेगा, कुछ तो बचेगा; क्योंकि को जाने दो। यह पहला कदम होगा कि धीरे-धीरे तुम व्यर्थ को | जब तक जीवन है, कुछ कर्म रहेगा, जीवन कर्म है—फिर जो हटा दो। और तुम नब्बे प्रतिशत व्यर्थ पाओगे। यह मैं सार्थक बचे, उसके प्रति साक्षी-भाव रखकर करो, कर्ता रहकर अतिशयोक्ति नहीं कर रहा हूं। निन्यानबे प्रतिशत पाओगे। नब्बे मत करो। ऐसे करो जैसे तुम करनेवाले नहीं हो। भूख लगी है प्रतिशत कह रहा हूं, ताकि तुम एकदम से घबड़ा न जाओ। शरीर को, तुम आयोजन कर देते हो; लेकिन तुम भूख से भी दूर एक मित्र को मैंने कहा कि तम दिन में इस तरह बोलो, जैसे कि हो, आयोजन से भी दूर हो। न तो भूख तुम्हें लगी है और न हर शब्द के लिए मूल्य चुकाना है; जैसे टेलीग्राम कर रहे हो; आयोजन तुम करते हो। तुम अकर्ता-भाव में डूबे रहते हो। तुम | जैसे एक-एक शब्द के लिए मूल्य चुकाना पड़ेगा। उन्होंने कुछ कहते हो, साक्षी हूं, देखता हूं। शरीर को भूख लगती है, रोटी दिन प्रयोग किया और मुझे आकर कहा, यह बड़ी हैरानी की बात जुटा देता हूं। प्यास लगती है, सरोवर के पास चला जाता हूं। है। तब तो दस-बीस शब्दों से ही दिन में काम हो जाता है। जहां | | लेकिन तुम अब फर्ता नहीं हो। 'हां' और 'ना' कहने से भी काम हो जाता है, वहां पहले मैं यह जो कर्ता-भाव का चला जाना है और साक्षी-भाव से, कितना बोले जा रहा था! और इसके बड़े लाभ हुए, उन्होंने जागकर, अप्रमाद से कर्म को करना है-उसको महावीर अकर्म कहा। क्योंकि कुछ गलत बोलकर, कुछ व्यर्थ बोलकर हजार कहते हैं। अकर्म का मतलब तुम यह मत समझना कि कुछ न 3331 : Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सूत्र भाग: 1UETERESARIRI करना; जैसा कि जैन मुनियों ने समझ लिया है। अकर्म का अर्थ | मुसीबत। भारी खर्च का मामला है। तो बड़े मुनियों को छोटे यह नहीं है कि तम बस बैठ गये। क्योंकि तुम्हारे बैठने से भी | गांव तो बुला ही नहीं सकते। कोई उपाय नहीं है। क्योंकि उतना क्या होगा? खर्च कौन उठायेगा? एक संन्यासी मुझे मिलने आये। काश्मीर में एक शिविर मैंने | अब यह थोड़ा सोचना! अगर तुम खाली बैठ गये तो तुम्हारी लिया था। उसके पहले ही वे मुझसे मिलने आये थे, तो मैंने जरूरतें कोई और पूरी करेगा। लेकिन जब तक जरूरतें उनसे कहा कि अच्छा हो काश्मीर आ जायें। उन्होंने कहा, यह | हैं-और तब तक जरूरतें है जब तक जीवन है तो कर्म तो जरा मुश्किल है। चलो, मैंने कहा, जाने दो। बंबई में जहां मैं | जारी रहेगा। यह कर्म दूसरे के कंधे पर रख देने से, यह दूसरे के था, जहां वे मिलने आये थे, मैंने कहा, कल सुबह फला-फलां कंधे पर रखकर गोली चलाने से तुम बचोगे न। इसमें तुम पर जगह, कुछ मित्र ध्यान करने को इकट्ठे हो रहे हैं, वहां आ दोहरा पाप लग रहा है। तुम जो कर रहे हो वह तो कर ही रहे हो जाओ। उसने कहा, यह भी बड़ा मुश्किल है। मैंने कहा, | और इस आदमी के कंधे पर रख रहे हो। इस आदमी को भी तुम मुश्किल क्या है? मैं समझू। तो उन्होंने कहा, मुश्किल यह साधन बना रहे हो। यह भी गलत है। है—उनके साथ एक सज्जन और थे—कि मैं पैसा खुद नहीं जो करना है जरूरी, वह करना। फिर साक्षी-भाव रखना। रखता; पैसे को छूने का मैंने त्याग कर दिया है। तो टैक्सी में शरीर की जरूरत पूरी कर देनी है। जरूरत से ज्यादा की आकांक्षा बैठना पड़े, तो पैसे की तो जरूरत पड़ेगी। ट्रेन में बैठना पड़े तो नहीं करनी है। मूल जरूरत पर रुक जाना है। और जो भी हो रहा पैसे की जरूरत पड़ेगी। तो ये सज्जन को साथ रखना पड़ता है। है, उसके प्रति साक्षी-भाव रखना है। जहां इनको सुविधा हो, वहीं मैं आ सकता हूं। और कल इनको 'धीर पुरुष अकर्म के द्वारा कर्म का क्षय करते हैं। मेधावी पुरुष सुविधा नहीं है। तो मैंने कहा, यह भी बड़ा मजा हआ। पैसा तुम लोभ और मद से अतीत तथा संतोषी होकर पाप नहीं करते।' इनकी जेब में रखे हुए हो...। यह तो उलझाव और बढ़ गया। | मेधावी! महावीर उन्हीं को मेधावी कहते हैं, इंटेलीजेंट, जो तुम समझ रहे हो, तुम पैसा नहीं छूते। तुम सोच रहे हो, तुम पैसे साक्षी होने में समर्थ हैं। और मेधा मेधा नहीं। जिसको तुम से मुक्त हो गये। तुम पैसे से मुक्त नहीं हुए, इस आदमी से और मेधावी कहते हो, वह तुम जैसा ही है—मूछित। हो सकता है, बंध गये। इससे तो पैसा ही ठीक था, अपने ही खीसे में रख किसी दिशा में कुशल है। कोई तकनीक उसने सीख लिया है। लेते, अपने ही हाथ से निकाल लेते। इसके हाथ से तुम कहते हो, कोई चित्रकार है बड़ा मेधावी; क्योंकि तुम जैसा निकलवाया। काम तो तुम्हारा ही होना है। बिना पैसे के भी नहीं चित्र बनाते हो, उससे बहुत अच्छा चित्र बनाता है। लेकिन होता, यह भी तुम्हें पता है। तो यह किसको धोखा दे रहे हो जीवन का चित्र तो तुम जैसा बना रहे हो, वैसा ही वह भी बना तुम? यह तुम्हारे हाथ में ऐसी कौन-सी खराबी है या तुम्हारे हाथ रहा है। तुम कहते हो, कोई कवि है, बड़ा मेधावी। क्योंकि जो में ऐसा कौन-सा गुण है, जिसके कारण अपने हाथ को बचा रहे| तुम नहीं कह सकते, जो तुम नहीं गा सकते, वह गा देता है। हो, इसका हाथ डलवा रहे हो? तुम अगर पाप कर रहे हो तो ठीक है। लेकिन जीवन का अंतिम चित्र तो तुम्हारे जैसा ही वह कम से कम अकेले ही कर रहे थे; अब तुम इससे भी करवा रहे बना रहा है। उसमें कोई फर्क नहीं है। क्रोध तुम्हें है, उसे है। हो। तुम पर दोहरा जुर्म होगा। तुम फंसोगे बुरी तरह। तुम यह लोभ तुम्हें है, उसे है। मत्सर तुम्हें घेरता है, उसे घेरता है। मत सोचो कि तुम त्यागी हो। महावीर कहते हैं, जिसने जीवन के चित्र को और जीवन के अब जैन मुनि है। बैठ गया है दूर सिकुड़कर। वह कहता है, | गीत को सम्हाल लिया, जिसने वहां बुद्धिमत्ता का उपयोग कर हम कुछ नहीं करते। लेकिन कोई उसके लिए रोटी कमायेगा। | लिया, वही मेधावी है; बाकी सब मेधा तो कहने की मेधा है। कोई उसके लिए वस्त्र कमायेगा। लज्जते-दर्द के ऐवज दौलते-दो जहां न लूं जो बड़े जैन मुनि हैं, उनको लोग बुलाने में गांव में डरते हैं; | दिल का सकून और है, दौलते-दो जहां है और। क्योंकि उनका गांव में आने का मतलब हैः सारे श्रावकों की | सारे संसार की संपत्ति भी मिलती हो उस आदमी को जिसने 334 | Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ध्यो, सतत जाग्रत रहो . थोड़े मन की शांति जानी, तो वह लेने को राजी न होगा। दो तुम्हारा स्वरूप है, उसकी झलक कभी-कभी मिल ही जाती है। लोकों की भी संपत्ति मिलती हो..। कितने ही आकाश में बादल घिरे, आकाश कभी न कभी दो लज्जते-दर्द के ऐवज दौलते-दो जहां न लूं।। बादलों के बीच से दिखाई पड़ ही जाता है। यह जो सत्य की खोज में पीड़ा उठानी पड़ती है, इस पीड़ा के तो खयाल रखना, तुम भी कभी-कभी जागते हो; हालांकि बदले भी अगर दुनिया की सारी संपत्ति मिलती हो, दोनों दुनिया तुम उसका कोई हिसाब नहीं रखते, क्योंकि तुम प्रत्यभिज्ञा नहीं की मिलती हो, तो भी न लूं। | कर पाते कि यह क्या है। तुम उसे कुछ और-और नाम दे देते दिल का सकन और है, दौलते-दो जहां है और। वह दिल की हो। कभी ऐसा होता है कि अचानक खड़े हो तुम, सुबह का शांति कुछ बात और है। वह कुछ संपदा और है। एक बार सूरज ऊगा, पक्षियों ने गीत गाया-और एक बड़ी गहरी शांति जिसके मन में उसकी भनक पड़ गई, फिर सब फीका हो जाता और सुकून तुम्हें मिला! तुम सोचते हो शायद सुबह के सौंदर्य के है। मेधावी पुरुष लोभ के कारण धर्म नहीं करता। कोई स्वर्ग | कारण, सूरज के कारण, पक्षियों के गीत के कारण। नहीं। पाने के लिए धर्म नहीं करता, न भय के कारण, नर्क से बचने के यद्यपि पक्षियों के गीत, सुबह के सूरज और खुले आकाश ने | लिए धर्म नहीं करता। मेधावी पुरुष तो पाता है कि वातावरण दिया, उस वातावरण में क्षणभर को तुम अवाक रह जितना-जितना जागरण आता है, उतना-उतना आनंद आता है। गये, क्षणभर को विचारधारा बंद हो गई, क्षणभर को बादल जागरण में ही छिपा है आनंद। आनंद जागरण का फल नहीं है; यहां-वहां न हिले, बीच में से थोड़ा-सा आकाश, भीतर का आनंद जागरण का स्वभाव है। ऐसा नहीं है कि पहले जागरण | आकाश दिखाई पड़ गया। मिलता है, फिर आनंद मिलता है—जागरण में ही मिल जाता | कभी किसी के प्रेम में मन शांत हो गया। कभी संगीत सुनते है। इधर तुम जागते चले जाते हो, उधर आनंद की नई-नई समय। कोई कुशल वीणा-वादक वीणा बजाता हो और उसके पुलक, नई-नई किरण, नया-नया नृत्य भीतर होने लगता है। तार बाहर कंपते रहे और भीतर, तुम्हारे भीतर भी कुछ कंपा; इस अहद में कमयाबिए-इन्सां है कुछ ऐसी वीणा बंद हुई, तुम्हारे भीतर भी कुछ क्षणभर को बंद हो गया। लाखों में बामुश्किल कोई इन्सां नज़र आया। एक गहन शांति तुम्हें अनुभव हुई। लाखों लोग हैं, आदमी कहां! लाखों आदमियों में कभी। लेकिन तुम सोचोगे, शायद यह वीणा-वादक की कुशलता के एक-आध आदमी नजर आता है। क्योंकि आदमी का जो कारण है। यद्यपि उसने निमित्त का काम किया, लेकिन वस्तुतः बुनियादी लक्षण है, जागरण, वह दिखाई नहीं पड़ता। पशु हैं, घटना तुम्हारे भीतर घटी। उन्हें भी भूख लगती है तो खोजते हैं; कामवासना जगती है तो | ऐसे जीवन में तुम्हें कई बार क्षण मिलते हैं; लेकिन तुम उनके कामवासना की तृप्ति करते हैं। पशुओं को भी लोभ दे दो तो | कारण गलत समझ लेते हो। राजी हो जाते हैं, भय दे दो तो राजी हो जाते हैं। कुत्ते को | जब भी तुम्हें शांति मिलती है तो भीतर कुछ प्रकाश पैदा होता मारो-पीटो तो जैसा करतब करना हो, कर देगा। लोभ दो, रोटी है, उसके कारण ही मिलती है। एक बार यह समझ में आ जाये के टुकड़े डालो, तो तुम्हारे पीछे जी-हजूरी करता फिरेगा। अगर तो फिर तुम बाहर के कारणों को नहीं जुटाते; फिर तुम भीतर की मनुष्य भी ऐसे ही लोभ और भय के बीच ही आंदोलित हो रहा ही जागृति को सम्हालने में लग जाते हो। है, तो फिर मनुष्य और पशु में भेद क्या है? ऐ काश हो यह जज्बए-तामीर मुस्तकिल मनुष्यता उसी दिन प्रारंभ होती है जिस दिन तुम्हारी वृत्तियों से चौंके तो हैं खराबिए-ख्वाबे-गरां से हम। पीछे एक जागरण का स्वर, एक जागरण का स्रोत पैदा होता है। काश! निर्माण का यह अवसर थोड़ा स्थायी हो जाये। गहरी जागते ही तुम मनुष्य बनते हो, उसके पहले नहीं। और ऐसा भी नींद से चौंके तो हैं, लेकिन फिर कहीं हम नींद में न खो जायें। नहीं है कि कभी-कभी तुम न जागते होओ। ऐसा भी नहीं है कि ऐसा रोज होता है। तुम्हारी नींद भी टूटती है, लेकिन फिर तुम जागने के क्षण कभी-कभी अचानक न आ जाते हों। क्योंकि जो | नींद में खो जाते हो। 335 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ E जिन सूत्र भागः1 ऐ काश हो यह जज्बए-तामीर मुस्तकिल साथ चाहिए। शास्त्र से यह न हो सकेगा। किसी जागे हुए का चौंके तो हैं खराबिए-ख्वाबे-गरां से हम। साथ चाहिए! तुम सोये हो तो कोई जागा हुआ ही तुम्हें जगा हो सकती है। यह निर्माण की क्षणभर को आई हुई दशा स्थायी सकता है। शास्त्र को तुम रखे रहो, तुम उसका तकिया बना हो सकती है। | लोगे। शास्त्र क्या करेगा, अगर तुम तकिया बना लोगे? तुम लेकिन तुम्हें स्थायी करनी पड़े। इसे दोहराना पड़े। इसे उस पर ही सिर टेककर और आराम से सो जाओगे, शास्त्र क्या बार-बार आमंत्रित करना पड़े। जब भी समय मिले, अवसर करेगा? कोई तीर्थंकर चाहिए! मिले, फिर-फिर इस भाव-दशा को जगाना पड़े-ताकि इससे महावीर कहते हैं: वही है आचार्य जो जागा हुआ है, जिसका पहचान होने लगे; ताकि इससे संबंध जुड़ने लगे; ताकि आचरण जागृति से निष्पन्न है। जैसे एक दीये से और दीप जल धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर यह प्रकाश का स्तंभ खड़ा हो जाये। जाते हैं, सैकड़ों दीप जल जाते हैं; फिर भी जो दीप जल रहा था, 'मनुष्यो सतत जागते रहो। जो जागता है, उसकी बुद्धि बढ़ती वह तो दीप्त ही रहता है, उसका कुछ खोता थोड़े ही है। यही तो है। जो सोता है, वह धन्य नहीं है। धन्य वही है, जो सदा जागता आध्यात्मिक संपदा की महिमा है। बांटो, बंटती नहीं। दिए चले जाओ, चुकती नहीं। जीवन की और सभी संपदाएं बांटने से कम जागरह नरा! णिच्चं जागरमाणस्स बढ़ते बुद्धी। होती चली जाती हैं। इसलिए जीवन की और सभी संपदाएं जो सुवति ण सो धन्नो, जो जग्गति सो सया धन्नो।। आदमी को कंजूस बनाती हैं, कृपण बनाती हैं। सिर्फ जो जागता है वह धन्य है। मनुष्यो, सतत जागते रहो। जो | आध्यात्मिक संपदा ऐसी संपदा है कि बांटो, बंटती नहीं। एक जागेगा उसकी मेधा बढ़ती है। जो सोता है उसकी मेधा सो जाती दीये से जलाये जाओ हजार दीये, कुछ ऐसा नहीं कि पहले दीये है। जो जागता है उसका भाग्य भी जागता है। जो सोता है उसका | की जिससे ज्योति जलाई थी, अब ज्योति कम हो गई। ज्योति का भाग्य भी सो जाता है। जागरण की पराकाष्ठा ही भगवत्ता है। दान तुम्हें कम नहीं करता। ज्योति का दान एक ज्योतिर्मय संघ इसलिए मैंने कहा, भगवान का अर्थ है : जिसका भाग्य पूरा जाग का निर्माण करता है। गया; जिसने अपने भीतर कोई कोना-किनारा सोया हुआ न ऐसे महावीर ने हजारों दीये जलाये; जिन-संघ का निर्माण छोड़ा, जिसने अंधेरे की कोई जगह न छोड़ी। हुआ। ऐसे बुद्ध ने हजारों दीये जलाये; बुद्ध-संघ का निर्माण उठ कि खुर्शीद का सामाने-सफर ताजा करें हुआ। लेकिन फिर धीरे-धीरे जब जीवित पुरुष खो जाता है, नफसे-सोख्त-ए-शाम औ सहर ताजा करें! वचन शास्त्र में संगृहीत हो जाते हैं, लोग शास्त्रों का तकिया बना उठ कि खुर्शीद का सामाने-सफर ताजा करें लेते हैं। उठो कि सूरज की यात्रा पर चलें! यह सूरज कोई बाहर का पड़ा था सूना सितार दिल का, हुई अचानक यह जाग तुमसे सूरज नहीं-यह भीतर के जागरण का सूरज है। जो जिंदगी रोग बन चुकी थी, बन गई है आज राग तुमसे। 'जैसे एक दीप से सैकड़ों दीप जल उठते हैं, और वह स्वयं भी हजारों लोगों ने महावीर के पास ऐसा अनुभव किया। दीप्त रहता है, वैसे ही आचार्य दीपक के समान होते हैं। वे स्वयं जो जिंदगी रोग बन चुकी थी, बन गई है आज राग तुमसे प्रकाशवान रहते हैं और दूसरों को भी प्रकाशित करते हैं।' पड़ा था सूना सितार दिल का, हुई अचानक यह जाग तुमसे। _ 'जह दीवा दीवसयं'-जैसे दीये से दीया जल जाता है, दीप ध्यान रखना, एक बड़ा गहरा सिद्धांत इस सदी में कार्ल से दीप जले, ऐसे किसी जाग्रत पुरुष को खोजो, जिसके पास गुस्ताव जुंग ने खोजा। उसे उसने सिनक्रानिसिटी कहा है। तुम्हारे भीतर भी जागरण की आकांक्षा जगे; जिसके पास तुम्हारे | कठिन है उसका अनुवाद। अर्थ यह है कि अगर एक व्यक्ति के भीतर भी जागने की परम वासना जगे; जिसके पास तुम्हारे भीतर भीतर कोई घटना घटे, एक व्यक्ति की वीणा बजे, तो उसके पास भी संक्रामक हो जाये और तुम भी सोचने लगो, विचारने लगो, जो भी आयेगा, उसकी वीणा पर भी वैसी ही झनक शुरू हो प्रयास करने लगोः 'कैसे नींद को तोड़ें!' किसी जागे हुए का जायेगी। उसे भी याद आ जायेगी किसी सोये हुए राग की। उसे 336 Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RABELLER HINTUN मनुष्यो, सतत जाग्रत रहो म भी अपना स्मरण आना शुरू होगा। इसमें कार्य-कारण का लगी। कुछ पक्षियों के कंठों में कोई प्यास जग उठती है, कोई सिद्धांत नहीं है। ऐसा नहीं है कि महावीर की मौजूदगी के कारण गीत अपने से फूटने लगता है! तुम जागते हो। जागरण तो तुम्हारा स्वभाव है; महावीर की सूरज की मौजूदगी...ऐसी तीर्थंकर की मौजूदगी; ऐसे अवतार मौजूदगी के कारण भूला हुआ, बिसरा हआ याद आ जाता है। की मौजूदगी, मसीहा की मौजूदगी, पैगंबर की मौजूदगी: ऐसे जो होता है, वह तो तुम्हारे भीतर ही होता है, वह महावीर के बिना किसी व्यक्ति की मौजूदगी जिसका दीया जल रहा है अकंपित। भी हो सकता था; लेकिन महावीर की मौजूदगी में सरलता से हो ऐसा क्षण अगर कहीं मिलता हो तो उसे चूक मत जाना। तुम्हारा जायेगा। जैसे एक दीया जला हो और दूसरा दीया जले हुए दीये | मन हजार तरकीबें खोजेगा चूकने की। इसी मन के कारण तो तुम को देखकर इस स्मरण से भर जाये कि मैं भी दीया हूं, मैं भी जल महावीर को भी चूके, बुद्ध को भी चूके, कृष्ण को भी, क्राइस्ट सकता हूं। जैसे एक बीज फूटा हो और दूसरे बीज के भीतर भी को भी। तुम चूकते ही चले गये हो। चूकने की तुम्हारी आदत अकुलाहट पैदा हो जाये कि मैं भी फूट सकता हूं। बन गई है। सब दांव पर लगा देना अगर कभी तुम्हें, कहीं भी इसलिए सत्संग का पूरब में बड़ा मूल्य रहा है। सत्संग | किसी के सान्निध्य में ऐसा लगे की यहां दीया जला है, तब सब कीमिया है, रसायन, अल्केमी। सत्संग का अर्थ है किसी ऐसे दांव पर लगा देना। यह जुआरियों का काम है। यह अंधेरे में आदमी के पास होना, किसी ऐसे आदमी की उपस्थिति में होना, उतरना है। साहस और श्रद्धा! लेकिन दांव पर लगा देना। जो जागा है। तो धीरे-धीरे बिना कुछ किये तुम्हारे भीतर भी कोई | क्यों? क्योंकि अगर खोया तो क्या खोयेगा? तुम्हारे पास नया राग उठने लगेगा। तुम अचानक पाओगे, कोई नींद टूटने कुछ है ही नहीं खोने को। अगर मिल गया तो सब मिल लगी, कोई पर्ते हिलने लगीं। जायेगा। अगर खोया तो कुछ भी खोया नहीं। लेकिन तुम्हारे मरहबा ऐ जज्बए-खुद ऐतबादी मरहबा पास जो है, तुम उसे अभी बहुत कुछ समझते हो। वो हिला तूफां का दिल, किश्ती रवां होने लगी। मैंने सुना है, शिवपुरी के पास एक विराट कवि सम्मेलन का किसी ऐसे व्यक्ति के पास तुम्हारे भीतर पड़ा हुआ आयोजन हो रहा था। कुछ कवि एक कार में बैठकर वहां जा रहे आत्मविश्वास जिसे तुम भूल गये हो, जग आयेगा। शाबाश! | आत्मविश्वास की दृढ़ता, शाबाश! कवियों में से बोला एक, 'भैया! तुम्हारे गांव जा रहे हैं, कवि मरहबा ऐ जज्बए-खुद ऐतबादी मरहबा! सम्मेलन में भाग लेने। हमारे पास धरा क्या है? कुछ कविताएं शाबाश! तुम अपने भीतर ही अनुभव करोगे, कुछ सोया ही सुना सकते हैं। तो सुन लो।' डाकुओं ने उन्हें ग्यारह रुपये जगने लगा। तुम अपनी ही पीठ थप थपाओगे। दिये और कहा, 'महाराज! कविता आप गांव में ही सुनाना और वो हिला तूफां का दिल, किश्ती रवां होने लगी। जरा देर तक सुनाना तो ठीक रहेगा। हमें अभी दुनिया में और भी और जरा-सा तुम्हारे भीतर तूफान हिल जाये कि नाव जो पड़ी काम करने हैं। है जन्मों-जन्मों से किनारे वह रवाना हो जाये, किश्ती चल पड़े। महावीर अगर तुम्हारे द्वार पर आकर तुम्हें गीत भी सुनाने को सत्संग में गुरु कुछ करता नहीं, सिर्फ उसकी मौजूदगी...। राजी हो जायें तो भी तुम कहोगे, ‘महाराज! किसी और को मौजूदगी भी कुछ करती नहीं-मौजूदगी से कुछ होता है। सूरज खोज लो, अभी हमें दुनिया में बहुत और काम करने हैं। ये कुछ एक-एक फूल को पकड़कर खोलता थोड़े ही है; ऊगा ग्यारह रुपये दक्षिणा ले लो हमें छोड़ने की। यह कविता कहीं इधर, फूल खिलने लगे। और सुना देना।' वो हिला तूफां का दिल, किश्ती रवां होने लगी। महावीर के चरणों में तुमने फूल चढ़ाये—वे ग्यारह रुपये हैं कि कुछ सूरज सुबह ऊगकर एक-एक पक्षी के द्वार पर दस्तक तो महाराज! आप शांत रहो। हमें बख्शो / अभी हमें दुनिया में देता नहीं कि गाओ, प्रभात की बेला आ गई! गीत गुनगुनाओ! और बहुत काम पड़े हैं। लेकिन सूरज ऊगा-वो हिला तूफां का दिल, किश्ती रवा होने | लेकिन इस दुनिया में जरा गौर से देखना, क्या काम तुम कर Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सूत्र भार रहे हो? और जिस दुनिया में तुम इतने उलझे हो, वहां तुम क्या शोरगुल मचा रहे थे। तो वह उनसे परेशान था, बाधा पड़ रही खोज रहे हो? मेरे देखे तो सभी लोग परमात्मा को खोज रहे हैं। थी। तो वह खिड़की पर गया। उसने कहा कि तुम यहां क्या कर कुछ लोग गलत जगह खोज रहे हैं, कुछ लोग ठीक जगह खोज रहे हो, पागलो! नदी की खबर है, एक बड़ा राक्षस आया है। रहे हैं। कुछ लोग ऐसे दरवाजों पर खोज रहे हैं जहां दीवालें हैं, बड़ा विकराल है। बड़ा भयंकर है! ऐसा कभी देखा नहीं गया। दरवाजे नहीं हैं, कुछ लोग ठीक दरवाजों पर दस्तक मार रहे हैं। / _मैं तुमसे कहता हूं, वेश्या के घर पर भी जो आदमी दस्तक देता उसका इतना कहना था कि वे बच्चे तो भागे सरपट नदी की है वह भी परमात्मा की खोज में ही वहां गया है। क्योंकि वेश्या तरफ। रबाई ने सोचा कि ठीक, झंझट मिटी। वह अपना आकर के द्वार पर भी वह आनंद की तलाश में गया है और आनंद फिर पढ़ाई-लिखाई में लग गया। लेकिन थोड़ी ही देर में उसने परमात्मा की तलाश है। जिसने शराबघर में शराब पीकर | देखा, सारा गांव नदी की तरफ जा रहा है। उसने खिड़की पर बेहोश...नालियों में गिर पड़ा है, वह भी परमात्मा की ही तलाश खड़े होकर देखा, पूछा, 'भाइयो! कहां जा रहे हो?' लोगों ने में गया था। क्योंकि आनंद की खोज परमात्मा की खोज है। कहा कि 'अरे तुम्हें पता नहीं अभी तक? नदी के किनारे एक लेकिन गलत जगह। कोई और मधुशाला खोजनी थी, जहां राक्षस आया हुआ है। बड़ा विकराल है! हरे रंग का है। अदृश्य अंगूरों की सुरा ढाली जाती है! कहीं और पियक्कड़ होना बड़े-बड़े दांत हैं।' जो रबाई ने बताया भी नहीं था, वह भी सब था, पियक्कड़ ही होना था तो! कहीं किसी रामकृष्ण के पास उन्होंने बताया। रबाई ने कहा, ठहरो। मैं भी आया। रबाई ने डूबना था पीकर! अपने मन में कहा कि अरे बात तो मैंने ही गढ़ी है। पर उसने कहीं भी तुम खोज रहे हो, तुम्हारी खोज कुछ भी हो, तुम्हारा कहा, कौन जाने, सच ही हो! बहाना कुछ भी हो, अगर तुम गौर से देखोगे तो तुम पाओगे, _दूसरे को धोखा देते-देते आदमी खुद को भी धोखा दे लेता है। आनंद की तलाश में निकले हो। अगर इतना तुम्हें समझ में आ कौन जाने, सच ही हो! कुछ हर्जा भी क्या है जाने में! देख ही जाये तो बहुत कठिनाई न बचेगी। फिर तुम्हारे पास एक कसौटी लेना चाहिए! हो गई कि 'जहां मैं खोज रहा हूं, वहां आनंद मिल सकता है?' तुम कहते कुछ और हो, चाहते कुछ और हो, सोचते कुछ और कितनी बार तो वहां गया हूं, सदा खाली हाथ लौटा हूं। कुछ हो। तुम्हारा जीवन तुम्हारे ही हाथ से पैदा की गई उलझनों में खोकर लौटा हूं, पाकर तो कुछ भी नहीं लौटा। कुछ और दीन उलझ गया है। होकर लौटा हूं। कुछ और दरिद्र होकर लौटा हूं। भिक्षा-पात्र | एक भिखारी मुल्ला नसरुद्दीन को देखकर चिल्लाया, 'बड़े बड़ा भला हो गया हो, हृदय का पात्र भरा तो नहीं। मियां! भूखा हूं, कुछ पैसे दे दो तो खाना खा लं।' मल्ला ने आनंद खोज रहे हो, यह स्पष्ट हो, तो कसौटी हाथ में रहेगी। दयावश बगल के हलवाई की दुकान पर ले जाकर उसे खाना तो तुम जांच लेना। जैसे सोना जांचता है सुनार, पत्थर पर कस खिलवा दिया। खाना खाकर भिखारी बड़ा नाराज होता बाहर लेता है; आनंद पर कसते जाना, कसते जाना। तुम पाओगे, निकला और बड़बड़ाया, 'अजीब मजाक है! पिक्चर देखने के जिंदगी, जिसको तुम जिंदगी कहते हो, कोई भी उस आनंद के लिए तो दो रुपये चाहिए, वे तो जुटते नहीं, खाना सुबह से पांच पत्थर पर सोना साबित नहीं होती। तभी तुम सुन सकोगे किसी लोग खिला चुके।' जाग्रत पुरुष के वचन, किसी जिन-पुरुष के वचन। मगर तुम मांगते खाना हो, देखना पिक्चर है! लेकिन तुम अपने को धोखा दे रहे हो। तम मांगते कुछ हो, तुम जिंदगी में जरा गौर से देखना, तुम क्या मांग रहे हो? मांगना कुछ और चाहा था, करते कुछ हो, बताते कुछ हो। दूसरों | क्योंकि तुम जो मांग रहे हो, वह मिल जायेगा। तब तुम को ही धोखा देते हो, ऐसा नहीं है; खुद को भी धोखा दे लेते हो। पछताओगे। न मिला तो पछताओगे। मिल गया तो मैंने सुना है, एक यहूदी रबाई दूसरे दिन के सुबह के लिए पछताओगे। क्योंकि मांगा तुमने कुछ और था और चाहा कुछ अपना प्रवचन तैयार कर रहा था और बाहर कुछ आवारा बच्चे और था। फिर उस भिखारी को तो पता भी था अपनी चाह का, 338 Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मनुष्यो, सतत जाग्रत रहो तम्हें अपनी चाह का भी कोई पता नहीं। इस बेहोशी को तोड़ो। ठीक-ठीक साफ कर लो, क्या चाहना है, ठीक-ठीक दिशा खोज लो, कहां खोजना है? और दो ही दिशायें हैं, ज्यादा उलझन नहीं है। या तो आदमी बाहर की तरफ खोजता है या भीतर की तरफ खोजता है। बाहर की तरफ खोजकर तुमने देख भी लिया है। थोड़ा भीतर को भी मौका दो! और ध्यान रखना, सांसारिक आदमी को तो एक ही अनुभव है-बाहर की तरफ का; धार्मिक आदमी को दोनों अनुभव हैं-बाहर का भी, भीतर का भी। इसलिए धार्मिक आदमी की बात जरा गौर से सुन लेना। इसलिए महावीर की, कृष्ण की, बुद्ध की बात को जरा गौर से सुन लेना। तुम जहां खोज रहे हो वहां तो उन्होंने भी खोजा था। नहीं पाया। फिर उन्होंने वहां खोजा जहां तुमने अभी नहीं खोजा है। और वहां पाया। तो एक बार थोड़ा-थोड़ा समय, थोड़ी-थोड़ी शक्ति निकालो। तेईस घंटे संसार को दे दो, एक घंटा स्वयं के लिए बचा लो। जिस आदमी के पास अपने लिए एक घंटा भी नहीं है, उससे बड़ा दरिद्र कोई भी नहीं है। उसे ध्यान कहो, प्रार्थना कहो, जो कहना हो कहो, लेकिन एक घंटा अपने लिए बचा लो। तुम आखिर में मरते वक्त पाओगे कि बाकी तेईस घंटे व्यर्थ गये, वही एक घंटा असली बचाया हुआ सिद्ध हुआ। और वह एक घंटा तुम्हारे तेईस घंटों को जीत लेगा, हरा देगा। क्योंकि जब तुम्हें रस आने लगेगा, रसधार बहेगी, तो फिर तुम कैसे धोखा दोगे अपने को? जब असली सिक्के दिखाई पड़ने लगेंगे तो नकली सिक्कों के धोखे में तुम आओगे कैसे? तोड़ो इस बेहोशी को। और तुम्हारे बिना तोड़े कोई और तोड़ न सकेगा। उठ कि खुर्शीद का सामाने-सफर ताजा करें। -उठो! थोड़ा आत्मविश्वास जगाओ! मरहबा ऐ जज्बए-खुद ऐतबादी मरहबा वो हिला तूफां का दिल, किश्ती रवां होने लगी। आज इतना ही। 339 ]