Book Title: Jinabhashita 2006 10
Author(s): Ratanchand Jain
Publisher: Sarvoday Jain Vidyapith Agra
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिनभाषित वीर निर्वाण सं. 2533 भगवान् श्री शान्तिनाथ जी (विक्रम सं. १११२) श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, शान्तिनगर भोजपुर (रायसेन) म.प्र. आश्विन-कार्तिक, वि.सं. 2063 अक्टूबर, 2006 मल्य 10/wwjainelibrary.org Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य - स्तुति आचार्य श्री विद्यासागर जी अरहंत परमेष्ठी आचार्य पद को पृथक् ग्रहण न करके साधु पद के अंतर्गत ही रखा के बाद आचार्य परमेष्ठी गया है। आचार्य तो साधु की ही एक उपाधि है, जिसका विमोचन मोक्ष-प्राप्ति के पूर्व होना अनिवार्य है। जहाँ राग का थोड़ा भी अंश सिद्ध परमेष्ठी को यहाँ शेष है, वहाँ अनन्त पद की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसीलिये ग्रहण नहीं किया गया, क्योंकि साधना में लीन साधु की वंदना और तीन प्रदक्षिणा आचार्य उपयोगिता के आधार पर ही महत्त्व द्वारा की जाती है। दिया जाता है। जैनेतर साहित्य में भी भगवान से बढ़कर गुरु मैंने अभी दो दिन पूर्व थोड़ा विचार किया इस बात पर कि की ही महिमा का यशोगान किया है। भगवान् महावीर अपने साधनाकाल में दीक्षा के उपरान्त बारह वर्ष गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पाय। तक निरन्तर मौन रहे। कितना दृढ़ संकल्प था उनका। बोलने में बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय।। सक्षम होते हुये भी वचनगुप्ति का पालन किया। वचनव्यापार 'बताय' शब्द के स्थान पर यदि ‘बनाय' शब्द रख रोकना बहुत बड़ी साधना है। लोगों को यदि कोई बात करनेवाला न दिया जाय, तो अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि गुरु शिष्य को मिले,तो वे दीवाल से ही बातें करने लगते हैं। एक साधु थे। नगर से भगवान् बना देते हैं। इसीलिये उन्हें तरणतारण कहा गया है। बाहर निकले इसलिये कि कोई उनसे बातें न करें, किन्तु फिर भी गरु स्वयं तो सत्पथ पर चलते हैं. दसरों को भी चलाते हैं। एक व्यक्ति उनके साथ हो गया। और बोला “महाराज, मझे अपने चलनेवाले की अपेक्षा चलानेवाले का काम अधिक कठिन जैसा बना लें। मैं आपकी सेवा करता रहूँगा। आपको कोई न कोई है। रास्ता दूसरों को तारता है, इसलिए वह तारण कहलाता है। सेवक तो चाहिए अवश्य सेवा करने के लिये।" साधु बड़े पशोपेश पुल भी तारण है। किन्तु रास्ता और पुल दोनों स्वयं खड़े रह में पड़ गये। आखिर बोले, "सबसे बड़ी मेरी सेवा आप ये ही करो जाते हैं। गरु स्वयं भी तैरते हैं और दसरों को भी तैराते हैं। कि बोलो नहीं। बोलना बन्द कर दो।" बोलनेवालों की कमी नहीं इसलिए उनका महत्त्व शब्दातीत है। आचार्य उस नौका के है, प्रायः सर्वत्र मिल जाते हैं। मुझे स्वयं भी एक ऐसी घटना का समान हैं, जो स्वयं नदी के उस पार जाती है और अपने साथ सामना करना पड़ा मदनगंज, किशनगढ़ में। ब्रह्मचर्य अवस्था में अन्यों को भी पार लगाती है। एक स्थान पर बैठकर मैं सूत्रजी पढ़ रहा था। एक बूढ़ी माँ आईं और भगवान् महावीर की वाणी गणधर आचार्य की मुझसे कुछ पूछने वहीं बैठ गयीं। मैं मौन ही रहा, परन्त धीरे धीरे अनुपस्थिति होने से छियासठ दिन तक नहीं खिरी। आचार्य । वहाँ और भी कई मातायें आकर बैठने लगीं और दूसरे दिन से मुझे ही उस वाणी को विस्तार से समझाते हैं। वे अपने शिष्यों को वह स्थान छोड़ना पड़ा। विविक्त शय्यासन अर्थात् एकांतवास भी आलम्बन देते हैं, बुद्धि का बल प्रदान करते हैं,साहस देते हैं। करते साहसोते । एक तपा एक तप है, जिसे साधु तपता है, इसलिए कि एकान्त में ही अन्दर जो उनके पास दीक्षा लेने जाये, उसे दीक्षा देते हैं और अपने से काआवाज सुनाई पड़ता हा बालन की आवाज सुनाई पड़ती है। बोलने में साधना में व्यवधान आता है। भी बड़ा बनाने का प्रयास करते हैं। वे शिष्य से यह नहीं आचार्य कभी भी स्वयं को आचार्य नहीं कहते। वे तो दूसरों कहते - "तु मझ जैसा बन जा", वे तो कहते हैं - "त को बड़ा बनाने में लगे रहते हैं, अपने को बड़ा कहते नहीं। कोई भगवान् बन जाय।" और उन्हें कहे, तो वे उसका विरोध भी नहीं करते और विरोध मोक्षमार्ग में आचार्य से ऊँचा साधु का पद है। आचार्य करना भी नहीं चाहिए। गाँधीजी के सामने एक बार यह प्रश्न आया। अपने पद पर रहकर मात्र उपदेश और आदेश देते हैं, किन्तु एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला, “महाराज, आप बड़े एक साधना पूरी करने के लिये साधु पद को अंगीकार करते हैं। चतुर हैं, अपने आप को महात्मा कहने लग गये।" गाँधीजी बोले, चतुरह, अप मोक्षमार्ग का भार साधु ही वहन करता है। इसीलिये चार "भैया मैं अपने को महात्मा कब कहता हूँ। लोग भले ही कहें, मुझे मंगल पदों में, चार उत्तम पदों में और चार शरण पदों में क क्या ? मैं किसी का विरोध क्यों करूँ?" 'समग्र' (चतुर्थ खण्ड) से साभार Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रजि. नं. UPHIN/2006/16750 अक्टूबर 2006 सम्पादक प्रो. रतनचन्द्र जैन कार्यालय ए/2, मानसरोवर, शाहपुरा भोपाल- 462039 (म.प्र.) फोन नं. 0755-2424666 सहयोगी सम्पादक पं. मूलचन्द्र लुहाड़िया, (मदनगंज किशनगढ़) पं. रतनलाल बैनाड़ा, आगरा डॉ. शीतलचन्द्र जैन, जयपुर डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत प्रो. वृषभ प्रसाद जैन, लखनऊ डॉ. सुरेन्द्र जैन 'भारती', बुरहानपुर शिरोमणि संरक्षक श्री रतनलाल कंवरलाल पाटनी (आर. के. मार्बल) किशनगढ़ (राज.) श्री गणेश कुमार राणा, जयपुर प्रकाशक सर्वोदय जैन विद्यापीठ 1/205, प्रोफेसर्स कॉलोनी, आगरा-282002 (उ.प्र.) फोन : 0562-2851428, 2852278 सदस्यता शुल्क 5,00,000 रु. शिरोमणि संरक्षक परम संरक्षक संरक्षक आजीवन वार्षिक 51,000रु. 5,000रु. 500 रु. 100 रु. एक प्रति 10 रु. सदस्यता शुल्क प्रकाशक को भेजें। मासिक जिनभाषित प्रवचन: आचार्य स्तुति अन्तस्तत्त्व स्तवन : मुनि श्री योगसागर जी • श्री पुष्पदंत-स्तवन • श्री शीतलनाथ-स्तवन कथा • भगवान् धर्मनाथ • सम्पादकीय : मोदी सरकार द्वारा सत्ताबल से धर्मान्तरण का प्रयास : आचार्य श्री विद्यासागर जी वर्ष 5, • तत्त्वार्थसूत्र में न्यायशास्त्र के बीज : स्व. डॉ. दरबारीलाल कोठिया जैनेतर दर्शनों में अनेकान्त और स्याद्वाद : प्रो. रतनचन्द्र जैन • कुवैत में पर्युषणपर्व : एक अनुभव • लेख जैन संस्कृति वेदपूर्व है : स्व. श्री रामधारी सिंह दिनकर • जैनधर्म और हिन्दूधर्म हमसफर हैं, एक नहीं : कैलाश मड़वैया : पं. राकेश जैन साहित्याचार्य • जैन प्रतीक चिह्न : मनोज जैन पंचरल ग्रन्थसमीक्षा : एक महान् प्रयोजन की सिद्धि : स्वतंत्रता संग्राम में जैन : डॉ. कपूरचन्द्र जैन एवं डॉ. श्रीमती ज्योति जैन पं. रतनलाल बैनाड़ा • जिज्ञासा समाधान पत्र का प्रारूप : आचार्य श्री ज्ञानसागर जी के 116वें जन्मदिन पर डाकटिकट निकालने हेतु अनुरोध पत्र ● समाचार • जैन प्रतीक चिह्न का चित्र लेखक के विचारों से सम्पादक का सहमत होना आवश्यक नहीं है । जनभाषित से सम्बन्धित समस्त विवादों के लिए न्याय क्षेत्र भोपाल ही मान्य होगा । अङ्क 10 पृष्ठ आ. पृ. 2 आ. पृ.4 9 2 2 6 00 8 10 14 18 32 20 22 25 26-31 आ. पृ. 3 Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्पादकीय मोदी सरकार द्वारा सत्ताबल से धर्मान्तरण का प्रयास गुजरात की भाजपा - मोदीसरकार ने विधानसभा में सभी प्रतिपक्षी दलों के द्वारा तीव्र विरोध किये जाने पर भी दलीय बहुमत के बल पर 'गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता संशोधन अधिनियम 2006' पारित कराया है, जिसमें यह मान लिया गया है कि जैसे शिया और सुन्नी सम्प्रदाय इस्लाम के अंग हैं और कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म के, वैसे ही जैन और बौद्ध धर्म हिन्दूधर्म के अंग हैं। इस बिल का प्रयोजन धर्मान्तरण को रोकना बताया गया है, किन्तु इसके द्वारा स्वयं मोदीसरकार सत्ताबल से जैनों और बौद्धों का उनकी इच्छा के विरुद्ध धर्मान्तरण कर उन्हें कानून के द्वारा हिन्दू बनाने की कोशिश कर रही है। मैं भारतीय जनता पार्टी को एक राष्ट्रवादी पार्टी मानकर आज तक वोट देता आ रहा हूँ और जो दल उसे फासिस्ट पार्टी कहकर उसकी निन्दा करते थे, मैं उनकी निन्दा करता रहा हूँ, किन्तु अब मुझे उनका कथन सही सिद्ध होता दिखाई दे रहा है। एक लादेन सारी दुनिया को मुसलमान बनाना चाहता है, और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सारे जैनों और बौद्धों को हिन्दू बनाने की कोशिश कर रहे हैं । जैन और बौद्ध भारतवासी होने से भारतीय हैं और हिन्दुस्तानवासी होने से हिन्दू हैं, लेकिन धर्म की दृष्टि से हिन्दू नहीं हैं। जैनधर्म और बौद्धधर्म शैवसम्प्रदाय और वैष्णव सम्प्रदाय के समान हिन्दूधर्म के सम्प्रदाय नहीं हैं, अपितु स्वतंत्र धर्म हैं। इसका निर्णय अनेक प्रमाणों से होता है। पहला प्रमाण तो यह है कि जैसे शैवसम्प्रदाय में हिन्दूधर्म के भगवान् शिव को आराध्य माना जाता है और वैष्णव सम्प्रदाय में हिन्दूधर्म के भगवान् विष्णु को उपास्य माना जाता है, वैसे जैन और बौद्ध धर्मों में हिन्दूधर्म के किसी भगवान् या देवी - देवता को आराध्य या उपास्य नहीं माना जाता। जैनधर्म में भगवान् ऋषभदेव से लेकर भगवान् महावीर तक चौबीस तीर्थंकरों की उपासना की जाती है। इनमें से कोई भी तीर्थंकर हिन्दूधर्म में आराध्य नहीं माना गया है, किसी भी हिन्दूमन्दिर में किसी भी तीर्थंकर की प्रतिमा प्रतिष्ठित नहीं की जाती, तब आराधना, पूजा-अर्चना का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि जैनधर्म हिन्दूधर्म का सम्प्रदाय या शाखा नहीं है । जब जैनधर्म में हिन्दू देवी-देवताओं की आराधना नहीं की जाती और जैनों के आराध्य तीर्थंकरों को हिन्दूधर्म में अपना आराध्य देवता स्वीकार नहीं किया गया है, तब यह किस आधार पर कहा जा सकता है कि जैनधर्म हिन्दूधर्म का सम्प्रदाय, शाखा या अंश है? जैनधर्म में हिन्दूधर्म की कोई आनुवंशिकता ही नहीं है, कोई रक्तसम्बन्ध ही नहीं है, तब उसे हिन्दूधर्म का अंग कैसे कहा जा सकता है? यह तो आम के वृक्ष को अमरूद की शाखा कहने-जैसा अत्यन्त अतर्कसंगत, झूठा कार्य है। वृक्ष दूसरा प्रमाण यह है कि जैनधर्म में हिन्दूधर्म के वेद-पुराण आदि धर्मग्रन्थों को अपना धर्मग्रन्थ नहीं माना गया है। और जैनधर्म जिन षट्खण्डागम, कसायपाहुड आदि धर्मग्रन्थों को अपना धर्मग्रन्थ मानता है, उन्हें हिन्दूधर्म में अपना धर्मग्रन्थ स्वीकार नहीं किया गया है। हिन्दूशास्त्र ईश्वरकर्तृत्व, अवतारवाद, एकात्मवाद (एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म) और जगन्मिथ्यावाद (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या) का प्रतिपादन करते हैं, जबकि जैनशास्त्र इनके निषेधक हैं। इस तरह दोनों धर्मों में सिद्धान्तों, विश्वासों और मान्यताओं का भी अन्तः सम्बन्ध नहीं है । यह इस बात का दूसरा अकाट्य प्रमाण है जैनधर्म हिन्दूधर्म की शाखा नहीं है 1 किन्हीं भी भिन्न सम्प्रदायों के एकधर्म से सम्बन्धित होने के प्रमाण ये दो ही मुख्य तत्त्व होते हैं: 1. ईश्वर, भगवान् या देवी-देवताओं का एक (समान) होना और 2. धर्मग्रन्थों तथा सिद्धान्तों, विश्वासों और मान्यताओं का समान होना । शिया और सुन्नी एक ही अल्लाह (खुदा) तथा एक ही पैगम्बर मोहम्मद साहब के अनुयायी हैं तथा उनका धर्मग्रन्थ भी एक ही है- कुरआन । इसलिए ये दोनों सम्प्रदाय इस्लाम के हिस्से हैं। कैथोलिक और प्रोटेस्टैण्ट भी एक ही ईसामसीह के आराधक हैं और उनका धर्मग्रन्थ भी एक ही है- बाईबिल । अतः ये दोनों सम्प्रदाय भी ईसाई धर्म के भाग हैं । किन्तु जैन, बौद्ध और हिन्दू न तो एक ही भगवान् या देवी-देवता के आराधक हैं, न ही उनके धर्मग्रन्थ एवं सिद्धान्त, विश्वास और मान्यताएँ एक (समान) हैं। इसलिए जैन, बौद्ध और हिन्दू धर्मों में से कोई भी किसी का अंग या हिस्सा सिद्ध नहीं होता । 1 Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वेदबाह्य धर्म स्वयं हिन्दूपुराणों में जैनों और बौद्धों को वेदबाह्य कहा गया है। मत्स्यपुराण (300 ई.) में जैनधर्म को वेदबाह्य एवं उसे स्वीकार कर वेदबाह्य हो जानेवालों को नष्ट किये जाने योग्य अवस्था को प्राप्त हो जानेवाला बतलाया गया हैगत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान्वृहस्पतिः । जिनधर्मं समास्थाय वेदबाह्यं स वेदवित् ॥ 24/47 ॥ वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः । वेदबाह्यान् परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान् ॥ 24/48 ॥ जघान शक्रो वज्रेण सर्वान् धर्मबहिष्कृतान् || 24/49 || अनुवाद - (राजा रजि के पुत्रों ने इन्द्र का साम्राज्य छीन लिया, तब उसने वृहस्पति के पास जाकर प्रार्थना की, कि मेरा राज्य वापिस दिलाने के लिए कुछ उपाय कीजिए। वृहस्पति ने ग्रहशान्तिविधान तथा पौष्टिक कर्म करके इन्द्र को बलवान् एवं साहसी बना दिया (24 / 43-46 ) और) रजिपुत्रों के पास जाकर उन्हें मोहित कर वेदबाह्य जैनधर्म का अनुयायी बना दिया, जिससे वे वेत्रमयी से च्युत होकर शक्तिहीन हो गये। तब इन्द्र ने उन समस्त वैदिकधर्म से बहिष्कृतों को वज्रप्रहार से मार डाला। इस प्रकार स्वयं हिन्दूपुराणों में जैनधर्म को वेदबाह्य कहे जाने से सिद्ध है कि हिन्दूधर्म में भी उसे हिन्दूधर्म का अंग नहीं माना गया है। हिन्दू - पद्मपुराण में वैदिकधर्म के लक्षणों के अभाव को ही जैनधर्म का लक्षण बतलाया गया है। उसमें एक दिगम्बर जैनमुनि का रूप धारण करके आनेवाले पुरुष को राजा वेन के पूछने पर जैनधर्म के लक्षण बतलाते हुए वर्णित किया गया है। वह जैनधर्म के लक्षण इस प्रकार बतलाता है अर्हतो देवता यत्र निर्ग्रन्थो दृश्यते गुरुः । दया चैव परो धर्मस्तत्र मोक्षः प्रदृश्यते ॥ दर्शनेऽस्मिन्न सन्देह आचारान्प्रवदाम्यहम् । यजनं याजनं नास्ति वेदाध्ययनमेव च ॥ नास्ति सन्ध्या तपो दानं स्वधास्वाहाविवर्जितम् । हव्यकव्यादिकं नास्ति नैव यज्ञादिका क्रिया ॥ पितॄणां तर्पणं नास्ति नातिथिर्वैश्वदेवकम् । क्षपणस्य वरा पूजा अर्हतो ध्यानमुत्तमम् ॥ अयं धर्मसमाचारो जैनमार्गे प्रदृश्यते । एतत्ते सर्वमाख्यातं निजधर्मस्य लक्षणम् ॥ (पद्मपुराण/भूमिखण्ड /छद्मलिंगधारी से संवाद / श्लोक 17-21/पृ. 473) अनुवाद - हम अर्हन्त को देवता और निर्ग्रन्थ मुनि को गुरु मानते हैं, अहिंसा हमारा परमधर्म है और मोक्ष की प्राप्ति परम लक्ष्य । हमारे धर्म में यजनयाजन नहीं होता, न ही वेदों का अध्ययन। न हम सन्ध्या करते हैं, न (ब्राह्मणोंजैसा) तप और दान । हम देवताओं को स्वाहापूर्वक हवि प्रदान भी नहीं करते और स्वध्यापूर्वक पितरों का तर्पण नहीं करते। वैश्वदेव हमारे अतिथि नहीं होते। हमारे धर्म में क्षपणक (दिगम्बर जैनमुनि) की पूजा और अरहन्त का ध्यान ही श्रेष्ठ माना जाता है। ये ही हमारे धर्म के लक्षण हैं । इन लक्षणों से स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू पुराणों में जैनधर्म को हिन्दूधर्म के लक्षणों से रहित होने के कारण एक वेदबाह्य धर्म अर्थात् हिन्दूधर्म से बाहर का धर्म माना गया । अतः गुजरात की नरेन्द्रमोदी सरकार द्वारा जैनधर्म को हिन्दूधर्म का अंग मानना हिन्दूशास्त्रों के ही खिलाफ है। जैनधर्म प्राग्वैदिक धर्म राजा रजि के पुत्रों की उपर्युक्त पौराणिक कथा से एक महत्त्वपूर्ण तथ्य पर प्रकाश पड़ता । वह यह कि जैनधर्म प्राग्वैदिक धर्म है। राजा रजि, राजा पुरूरवा और अप्सरा उर्वशी से उत्पन्न 'आयु' के पुत्र थे । (मत्स्यपुराण 24/21-35)। पुरूरवा और उर्वशी की प्रेमकथा का वर्णन ऋग्वेद (10/85) और शतपथ ब्राह्मण (15/5/1 ) में मिलता है। (बलदेव उपाध्याय : वैदिक साहित्य और इतिहास / शारदा संस्थान, वाराणसी/पृ. 121-122)। वृहस्पति ने ऋग्वेदोल्लिखित राजा पुरूरवा के पौत्रों को जैनधर्म में दीक्षित किया था, इससे सिद्ध है कि जैनधर्म का अस्तित्व ऋग्वेदकाल के पहले से चला आ रहा था। Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इसका दूसरा प्रमाण श्रीमद्भागवतपुराण में उपलब्ध होता है। उसमें कहा गया है कि भगवान् विष्णु ने राजा नाभि का प्रिय करने के लिए महारानी मरुदेवी के गर्भ में ऋषभदेव के रूप में अवतार लिया था, जिसका उद्देश्य था वातरशन (वायुरूप वस्त्रधारी-नग्न, दिगम्बर) श्रमण ऋषियों के धर्म (दिगम्बर जैनधर्म) को प्रकट करना- "बर्हिषि तस्मिन्नेव विष्णुदत्त! भगवान् परमर्षिभिः प्रसादितो नाभेः प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मरुदेव्यां, धर्मान् दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानामृषीणामूर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तन्वावततार।" (भागवतपुराण/स्कन्ध 5/अध्याय 3/वाक्य 20/पृ. 207-208)। भगवान् ऋषभदेव चौदह मनुओं में से प्रथम स्वायम्भुव मनु (आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश-'मनु') की पाँचवीं पीढ़ी में (स्वायम्भुव मनु, प्रियव्रत, आग्नीध्र, नाभि और ऋषभ (भागवत पु./5/1-3) हुए थे। मनुस्मृति (1/79) के अनुसार एक मनु का काल (मन्वन्तर) मनुष्यों के 43, 20, 000 वर्षों का होता है। इसी को ब्रह्मा का 1/14 दिन मानते हैं, क्योंकि इस प्रकार के 14 कालों का योग ब्रह्मा का एक पूरा दिन होता है। इस समय हम सातवें मन्वन्तर में रह रहे हैं। (आप्टे संस्कृत-हिन्दी-कोष-'मनु')। इससे फलित होता है कि जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव आज से लगभग ढाई करोड़ वर्ष पहले हुए थे। हिन्दू-पुराणों के अनुसार जैनधर्म के प्राग्वैदिक होने का यह दूसरा प्रमाण है, क्योंकि इतिहासकारों की मान्यता है कि वैदिक मंत्रों की रचना ईसा पूर्व 2500 से आरंभ हुई थी। (दिनकर : संस्कृति के चार अध्याय/पृ. 25)। ऋग्वेद में भी भगवान् वृषभ (ऋषभ) तथा वातरशन मुनियों का उल्लेख हुआ है- 'ककर्दवे वृषभो युक्त आसीद्' (10/102/6), 'मुनयो वातरशनाः' (10/136/2-3)। इससे भी जैन तीर्थंकर ऋषभदेव एवं जैनधर्म की प्राग्वैदिकता सिद्ध होती है। भागवत पुराण में यह भी कहा गया है कि भगवान् ऋषभदेव के सौ पुत्र थे, जिनमें महायोगी भरत ज्येष्ठ एवं उत्तमगुणों से युक्त थे। उन्हीं के नाम से यह देश 'भारत' नाम से प्रसिद्ध हुआ- “अथ ह भगवानृषभदेवः ---- आत्मजानात्मसमानानां शतं जनयामास। येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीद्येनेदं वर्ष भारतमिति व्यपदिशन्ति।" (भाग.पुरा./5/4/वाक्य 8-9)। लिंगपुराण (47/19-25) में भी यही बात कह गई है। इससे जैनधर्म उतना ही प्राचीन सिद्ध होता है, जितना प्राचीन, भारतवर्ष का 'भारत' नाम है। और चूँकि भगवान् वृषभदेव और उनके ज्येष्ठ पुत्र महायोगी भरत प्राग्वैदिक महापरुष हैं. अतः भारतवर्ष का 'भारत' नाम भी प्राग्वैदिक है। महाभारत के उल्लेखों से भी जैनधर्म की प्राग्वैदिकता सिद्ध होती है। ब्रह्मर्षि उत्तङ्क अपने गुरु वेद को गुरुदक्षिणा देने के लिए गुरुपत्नी की इच्छानुसार राजा पौष्य की महारानी के कुण्डलयुगल माँगने जाते हैं। महारानी दे देती हैं, किन्तु सावधान करती हैं कि इन कुण्डलों पर नागराज तक्षक की आँखें गड़ी हुई हैं, अतः आप सावधानी से लेकर जाना। उत्तङ्क कुण्डल लेकर चल पड़ते हैं। रास्ते में वे देखते हैं कि एक क्षपणक (दिगम्बर जैन मुनि) उनके पीछे-पीछे आ रहा है। कुछ दूर जाकर उत्तंक एक सरोवर के किनारे कुण्डल रख देते हैं और स्नान के लिए जल में प्रविष्ट हो जाते हैं। तभी वह क्षपणक तेजी से आता है और दोनों कुण्डल लेकर भाग जाता है- "एतस्मिन्नन्तरे स क्षपणकस्त्वरमाण उपसृत्य ते कुण्डले गृहीत्वा प्राद्रवत्।" उत्तंक स्नान-तर्पण कर उस क्षपणक का पीछा करते हैं और उसे पकड़ लेते हैं। पकड़े जाने पर वह क्षपणक का रूप त्याग देता है और अपना वास्तविक (तक्षक नाग का) रूप धारण कर पृथ्वी के बहुत बड़े बिल मे घुस जाता है- “गृहीतमात्रः स तं रूपं विहाय तक्षकस्वरूपं कृत्वा सहसा धरण्यां विवृतं महाबिलं प्रविवेश।" (महाभारत/आदिपर्व/तृतीय अध्याय/पृ. 57)। उत्तङ्क जनमेजय के समकालीन थे। जनमेजय परीक्षित के पुत्र, अभिमन्यु के पौत्र तथा अर्जुन के प्रपौत्र थे। ये सभी द्वापरयुग में विद्यमान थे। हिन्दूमतानुसार सृष्टि काल चार युगों में विभाजित किया गया है : सत् या कृत युग (अवधि 17, 28,000 वर्ष), त्रेता (12,96,000 वर्ष), द्वापर (8,64,000 वर्ष) और कलियुग (4,32,000 वर्ष) । वर्तमान युग कलियुग है। (आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोष-'युगम्') । कलियुग का आरंभ ईसापूर्व 3102 वर्ष की 13 फरवरी को हुआ था। (आप्टे संस्कृत-हिन्दी-कोश-'कलि')। इससे स्पष्ट है कि वैदिकयुग कलियुग में आरंभ हुआ था, लगभग 2500 ई. पूर्व से (देखिए, दिनकर : संस्कृति के चार अध्याय/पृ. 25)। और क्षपणकों (दिगम्बर जैन मुनियों) का अस्तित्व द्वापरयुग में भी था। यह इस बात का हिन्दूमान्य ऐतिहासिक प्रमाण है कि जैनधर्म प्राग्वैदिक धर्म है। Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इन प्रमाणों के अतिरिक्त सिन्धुघाटी की खुदाई में जो पुरातत्त्व प्राप्त हुए हैं, उनमें जैन तीर्थंकरों की नग्न मूर्तियाँ । हैं। परातत्त्वविदों ने इस सामग्री का काल ईसा से तीन हजार वर्ष पर्व आकलित किया है। इससे भी इस बात की पुष्टि होती है कि जैनधर्म वैदिकयुग से पूर्ववर्ती है। (देखिये, 'Harappa And Jainism' by T.N. Ramachandran, Published by Kundakunda Bharati Prakashan, New Delhi, 1987 A.D.) यतः जैनधर्म प्राग्वैदिक धर्म है, अतः वैदिकधर्म या हिन्दूधर्म से उसका आविर्भाव संभव ही नहीं है। इसलिए ह हिन्दधर्म की शाखा या अंश हो ही नहीं सकता। गजरात की भाजपा-मोदी-सरकार ने जो उसे हिन्दधर्म का हिस्सा मानने की कोशिश की है, वह एक अत्यन्त झूठा कार्य करने की कोशिश है। उसे सत्य का आदर करते हुए इस कोशिश को निरस्त करना चाहिए। _आराध्य भगवान् या देवी-देवताओं, धर्म ग्रन्थों तथा सिद्धान्तों, विश्वासों एवं मान्यताओं की भिन्नता के कारण जैन, बौद्ध और हिन्दू धर्म परस्पर स्वतंत्र धर्म हैं, जैसे इसी भिन्नता के कारण सिक्खधर्म को मोदी सरकार ने स्वतंत्र धर्म ना है। विभिन्न धर्मावलम्बियों के एक स्थान में साथ-साथ रहने के कारण एक-दसरे की आदतों. रीतिरिवाजों, रहनसहन की पद्धतियों, भाषा, वेशभूषा और आचार-विचार का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ता है और इस कारण उनमें सामाजिक और सांस्कृतिक समानता दिखायी देने लगती है, किन्तु इस कारण उनके धर्म एक-दूसरे के हिस्से नहीं हो जाते। इन्हीं तथ्यों को दृष्टि में रखकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में फैसला दिया है कि जैनधर्म एक स्वतंत्र धर्म है, वह हिन्दूधर्म का अंग नहीं है। (देखिये, 'जैन गजट' 28 सितम्बर 2006 का सम्पादकीय)। इन तथ्यों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए हम गुजरात की मोदी सरकार से आग्रह करते हैं कि वह पारित कराये हए 'गजरात धार्मिक स्वतंत्रता संशोधन अधिनियम 2006' को. जो सर्वथा असत्य मान्यताओं पर आधारित है, असंवैधानिक है और माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध है, तुरन्त निरस्त करे। रतनचन्द्र जैन एकाग्रता से आती है निर्भयता स्वामी विवेकानन्द शिकागो के व्याख्यान के बाद अमेरिका में उदार मानवधर्म के वक्ता के रूप में प्रसिद्ध हो चले थे। वहाँ स्वामी जी वेदांतदर्शन पर प्रवचन दिया करते थे। इस सिलसिले में उनका प्रवास अमेरिका के उन अंदरूनी इलाकों में भी होता, जहाँ | धर्मांध और संकीर्ण विचारधारा वाले लोग होते थे। एक बार स्वामीजी को ऐसे ही कस्बे में व्याख्यान के लिए बुलाया गया था। एक खुले मैदान में लकड़ी के बक्सों को जमाकर मंच तैयार किया गया था। स्वामीजी ने उस पर खड़े होकर वेदांत, योग और ध्यान पर व्याख्यान देना शुरू किया। बाहर से गुजरने वाले लोग भी उनकी बातें सुनने लगे, जिनमें कुछ चरवाहे भी थे। थोड़ी देर में ही उनमें से कुछ ने बंदूकें निकालीं और स्वामी जी की और निशाना दागने लगे। कोई गोली उनके कान के पास से गुजरती, तो कोई पाँव के पास से। नीचे रखे बक्से तो छलनी हो गए थे। लेकिन इस सबके बावजूद स्वामीजी का व्याख्यान पहले की तरह धाराप्रवाह चलता रहा, न वे थमे न उनकी आवाज काँपी। व्याख्यान के बाद वे स्वामीजी से बोले - आपके जैसा व्यक्ति हमने पहले नहीं देखा। हमारे निशानों के बीच आपका भाषण ऐसे चलता रहा, जैसे कुछ हुआ ही न हो। जबकि हमारे निशाने की एक चूक आपकी जान आफत में डाल सकती थी। स्वामीजी ने उन्हें बताया कि वे जब व्याख्यान दे रहे थे, तब उन्हें बाहरी वातावरण का ज्ञान ही न था। उनका सारा चित्त वेदांत और ध्यान की गहराइयों में था। मन के इस प्रकार एकाग्र होने पर ऐसी शक्तियाँ विकसित होती हैं, जो परामानवीय लगती हैं। इससे उन चीजों को समझने .की दृष्टि मिलती है, जिनसे मन डर और दुर्बलता से छुटकारा पा जाता है। एकाग्रचित्त होकर किया गया कार्य कुछ इस तरह पूर्ण होता है, जैसे कोई अज्ञात रूप से उसमें मदद कर रहा हो। ध्यान और योग की पहली सीढ़ी एकाग्रता है। दैनिक भास्कर, भोपाल, 25 अक्टूबर 2006 से साभार -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 5 Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हिन्दू-संस्कृति का आविर्भाव आर्य और आर्येतर संस्कृतियों के मिश्रण से हुआ तथा जिसे हम वैदिक संस्कृति कहते हैं, वह वैदिक और प्राग्वैदिक संस्कृतियों के मिलन से उत्पन्न हुई थी, यह अनुमान कई प्रकार की युक्तियों पर आधारित है। भारतीय संस्कृति के विवेचन में हमारे सामने कुछ ऐसी शंकाएँ खड़ी होती हैं, जिनका समाधान न तो इस स्थापना से हो सकता है कि हिन्दू-संस्कृति सोलह आने आर्यों का निर्माण है, न इस स्थापना से कि वैदिक संस्कृति केवल प्राग्वैदिक संस्कृति का विकास मात्र है। डॉ. मंगलदेव शास्त्री ने ऐसी कई शंकाओं का उल्लेख अपनी पुस्तक 'भारतीय संस्कृति का विकास : वैदिक धारा' में किया है। जैन संस्कृति वेदपूर्व है पाणिनि का समय हम लोग ई० पू० 7 वीं सदी मानते हैं । पाश्चात्यों के मतानुसार उनका काल ई० पू0 5वीं सदी से इधर नहीं माना जा सकता। पाणिनि ने श्रमण-ब्राह्मण-संघर्ष का उल्लेख 'शाश्वतिक विरोध' के उदाहरण के रूप में किया है। अवश्य ही शाश्वत शब्द सौ-दो सौ वर्षों का अर्थ नहीं देता, वह इससे बहुत अधिक काल का संकेत करता है । अतएव, यह मानना युक्ति युक्त है कि श्रमण संस्था भारत में आर्यों के आगमन के पूर्व विद्यमान थी और ब्राह्मण इस संस्था को हेय समझते थे। श्रमणों और ब्राह्मणों के बीच सर्प-नकुल- सम्बन्ध का उल्लेख बुद्धोत्तर साहित्य में बहुत अधिक हुआ है, किन्तु, पाणिनि के उल्लेख से यह स्पष्ट भासित होता है कि श्रमणब्राह्मण-संघर्ष बौद्ध मत से कहीं प्राचीन है। पौराणिक हिन्दू-धर्म निगम और आगम, दोनों पर आधारित माना जाता है। निगम वैदिक विधान है। आगम प्राग्वैदिक काल से आती हुई वैदिकेतर धार्मिक परम्परा का वाचक है । पुराण और पौराणिक धर्म उतने नवीन नहीं हैं, जितना नवीन उन्हें पश्चिम के विद्वानों ने सिद्ध किया है।" यह कहना सम्भव है कि इतिहास-पुराणों का आरम्भ अथर्ववेद के काल में हुआ। अथर्ववेद में कहा गया है कि ऋग्वेद, सामवेद, पुराणों के साथ यजुर्वेद तथा छन्द ब्रह्मदेव से उत्पन्न हुए (11/7/24)। शतपथ-ब्राह्मण के (11/5/7/9) ब्रह्म - यज्ञ में इतिहास तथा पुराणों के पठन का फल बतलाया गया है और कहा गया है कि अश्वमेध में (13/4/3/13) पुराण तथा वेद का पठन किया जाय।” (वैदिक संस्कृति का विकास : लक्ष्मण शास्त्री जोशी) । 6 अक्टूबर 2006 जिनभाषित स्व. श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' पुराणों का उल्लेख धर्मसूत्रों में भी है तथा मनुस्मृति, विष्णुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति एवं ऋग्विधान में भी । रामायण और महाभारत तो पुराणों के नाम कई बार लेते हैं। इन सारे प्रमाणों से यह अनुमान अत्यधिक सुदृढ़ हो जाता है कि पुराणों की परम्परा वेदों की परम्परा से कम प्राचीन नहीं है. ----| डॉ. मंगलदेव शास्त्री ने यह भी अनुमान लगाया है कि भारतीय संस्कृति में जो कई परस्पर-विरोधी 'युग्म' हैं, उनका भी कारण यही है कि यह संस्कृति, आरम्भ से ही, सामासिक रही है। उदाहरणार्थ, भारतीय समाज में एक द्वन्द्व तो कर्म और संन्यास को लेकर है, दूसरा प्रवृत्ति और निवृत्ति के बीच तथा तीसरा स्वर्ग और नरक की कल्पनाओं को लेकर। यह विषय, सचमुच, विचारणीय है । अत्यन्त प्राचीन काल से भारत की मानसिकता दो धाराओं में विभक्त रही है। एक धारा कहती है कि जीवन सत्य है और हमारा कर्त्तव्य यह है कि हम बाधाओं पर विजय प्राप्त करके जीवन में जय लाभ करें एवं मानवबन्धुओं का उपकार करते हुए यज्ञादि से देवताओं को भी प्रसन्न करें, जिससे हम इस और उस, दोनों लोकों में सुख और आनन्द प्राप्त कर सकें। किन्तु, दूसरी धारा की शिक्षा यह है कि जीवन नाशवान् है । हम जो भी करें, किन्तु, हमें रोग और शोक से छुटकारा नहीं मिल सकता, न मृत्यु से हम भाग सकते हैं। हमारे आनन्द की स्थिति वह थी, जब हमने जन्म नहीं लिया था । जन्म के कारण ही हम वासनाओं की जंजीर में पड़े हैं। अतएव, हमारा श्रेष्ठ धर्म यह है कि उन सुखों को पीठ दे दें, जो हमें ललचा कर संसार में बाँधते हैं। इस धारा के अनुसार मनुष्य को घर-बार छोड़कर संन्यास ले लेना चाहिये और देह - दंडनपूर्वक वह मार्ग पकड़ना चाहिये, जिससे आवागमन छूट जाय । अनुमान यह है कि कर्म और संन्यास में से कर्म, तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति में से प्रवृत्ति के सिद्धान्त, प्रमुख रूप से, वैदिक हैं तथा संन्यास और निवृत्ति के सिद्धान्त, अधिकांश प्राग्वैदिक मान्यताओं से पुष्ट हुए होंगे। किन्तु, आश्चर्य की बात है कि भारतीय अध्यात्मशास्त्र और दर्शन पर जितना प्रभाव संन्यास और निवृत्ति का है, उतना प्रभाव कर्म और प्रवृत्ति के सिद्धान्तों का नहीं है । अथवा आश्चर्य की इसमें कोई बात नहीं है। ऋग्वेद के आधार पर यह मानना युक्तिसंगत है कि आर्य पराक्रमी मनुष्य थे । पराक्रमी मनुष्य संन्यास की अपेक्षा कर्म को अधिक महत्त्व देता है, दुःखों से भाग खड़ा होने के बदले वह Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ " . $ डटकर उनका सामना करता है। आर्यों का यह स्वभाव कई देशों में बिलकुल अक्षुण्ण रह गया । विशेषतः यूरोप में उनकी पराक्रमशीलता पर अधिक आँच नहीं आयी। किन्तु, कई देशों की स्थानीय संस्कृति और परिस्थितियों ने आर्यों के भीतर भी पस्ती डाल दी एवं उनके मन को निवृत्ति प्रेमी बना दिया । भारत की प्राग्वैदिक संस्कृति ने आर्यों की वैदिक संस्कृति के चारों ओर अपना जो विशाल जाल फैला दिया, उसे देखते हुए यह सूक्ति काफी समीचीन लगती है कि "भारतीय संस्कृति के वैदिक संस्कृति समुद्र में टापू के समान है।" वैदिक और आगमिक तत्त्वों के बीच संघर्ष, कदाचित् वेदों के समय भी चलते होंगे, क्योंकि आगम हिंसा के विरुद्ध थे और यज्ञ में हिंसा होती थी। इस दृष्टि से जैन और बौद्ध धर्मों का मूल आगमों में अधिक, वेदान्त में कम मानना चाहिये । हाँ, जब गीता रची गयी, तब उनका रूप भागवत आगम का रूप हो गया। सांस्कृतिक समन्वय के इतिहास में भगवान् कृष्ण का चरम महत्त्व यह है कि गीता के द्वारा उन्होंने भागवतों की भक्ति, वेदान्त के ज्ञान और सांख्य के दुरूह - सूक्ष्म दर्शन को एकाकार कर दिया। आर्यों का उत्साह और प्रवृत्तिमार्गी दृष्टिकोण, कदाचित् महाभारत के पूर्व तक अक्षुण्ण रहा था। महाभारत की हिंसा ने भारत के मन को चूर कर दिया। वहीं से, शायद, यह शंका उत्पन्न हुई कि यज्ञ सद्धर्म नहीं हैं, और जीवन का ध्येय सांसारिक विजय नहीं, प्रत्युत मोक्ष होना चाहिये। महाभारत की लड़ाई पहले हुई, उपनिषद्, कदाचित् बाद को बने हैं। संसार को सत्य मानकर जीवन के सुखों में वृद्धि करने की प्रेरणा कर्मठता से आती है, प्रवृत्तिमार्गी विचारों से आती है। इसके विपरीत, मनुष्य जब मोक्ष को अधिक महत्त्व देने लगता है, तब कर्म के प्रति उसकी श्रद्धा शिथिल होने लगती है। मोक्षा - साधना के साथ, भीतर-भीतर, यह भाव भी चलता है कि इन्द्रिय-तर्पण का दंड परलोक में नरकवास होगा। यह विलक्षण बात है कि वेदों में नरक और मोक्ष की कल्पना, प्रायः, नहीं के बराबर है। विश्रुत वैदिक विद्वान् डॉ. मंगलदेव शास्त्री ने लिखा है, "बहुत-से विद्वानों को भी यह जानकर आश्चर्य होगा कि वैदिक संहिताओं में 'मुक्ति' अथवा 'दुःख' शब्द का प्रयोग एक बार भी हमको नहीं मिला।" अन्यत्र उन्होंने यह भी लिखा है कि " नरक शब्द ऋग्वेद संहिता, शुक्ल यजुर्वेद - वाजसनेयिमाध्यन्दिन - संहिता तथा साम-संहिता में एक बार भी नहीं आया है। अथर्ववेद संहिता में 'नारक' शब्द केवल एक बार प्रयुक्त हुआ है।" अब यह विश्वास दिलाना कठिन है कि जिस निवृत्ति | का भारत के अध्यात्म-शास्त्र पर इतना अधिक प्रभाव है, वह आर्येतर तत्त्व थी। किन्तु, आर्यों के प्राचीन साहित्य में निवृत्तिविरोधी विचार इतने प्रबल हैं कि निवृत्तिवादी दृष्टिकोण को आर्येतर माने बिना काम चल नहीं सकता । इसी प्रकार, ऋषि और मुनि शब्दों का युग्म भी विचारणीय है । ऋषि शब्द का मौलिक अर्थ मन्त्रद्रष्टा है, किन्तु, मन्त्रों के द्रष्टा होने पर भी वैदिक ऋषि गृहस्थ होते थे और सामिष आहार से उन्हें परहेज नहीं था। पुराणों में ऋषि और मुनि शब्द, प्रायः, पर्यायवाची समझे गये हैं, फिर भी, विश्लेषण करने पर यह पता चल जाता है कि मुनि गृहस्थ नहीं होते थे। उनके साथ ज्ञान, तप, योग और वैराग्य की परम्पराओं का गहरा सम्बन्ध था। ऋषि और मुनि, दो भिन्न सम्प्रदायों के व्यक्ति समझे जाते थे । “मुनि शब्द का प्रयोग वैदिक संहिताओं में बहुत ही कम हुआ है। होने पर भी उसका ऋषि शब्द से कोई सम्बन्ध नहीं है।" (डॉ. मंगलदेव शास्त्री) । पुराणों में ऋषि और मुनि के, प्रायः पर्यायवाची होने का एक कारण तो यही मानना होगा कि पुराणों का आधार वैदिक और प्राग्वैदिक संस्कृतियों का समन्वित रूप है। अतएव, पुराणकार प्रत्येक धर्मप्राण साधु और पंडित को, प्रसंगानुसार, ऋषि या मुनि कहने में कोई अनौचित्य नहीं मानते थे । जब बौद्ध और जैन आन्दोलन खड़े हुए, बौद्धों और जैनों ने प्रधानता ऋषि शब्द को नहीं, मुनि शब्द को दी। इससे भी यही अनुमान दृढ़ होता है कि मुनि-परम्परा प्राग्वैदिक रही होगी। " ऋषि - सम्प्रदाय और मुनि-सम्प्रदाय के सम्बन्ध में, संक्षेप में, हम इतना ही कहना चाहते हैं कि दोनों की दृष्टियों में हमें महान् भेद प्रतीत होता है। जहाँ एक का झुकाव (आगे चलकर) हिंसामूलक मांसाहार और तन्मूलक असहिष्णुता की ओर रहा है, वहीं दूसरी का अहिंसा तथा तन्मूलक निरामिषता तथा विचार सहिष्णुता ( अथवा अनेकान्तवाद) की ओर रहा है । इनमें से एक, मूल में, वैदिक और दूसरी, मूल में, प्राग्वैदिक प्रतीत होती है।" (डॉ. मंगलदेव शास्त्री) । इस अनुमान की पुष्टि इस बात से भी होती है कि महंजोदरो की खुदाई में योग के प्रमाण मिले हैं और जैन मार्ग के आदि तीर्थंकर श्री ऋषभदेव थे, जिनके साथ योग और वैराग्य की परम्परा उसी प्रकार लिपटी हुई है, जैसे कालान्तर में, वह शिव के साथ समन्वित हो गयी। इस दृष्टि से कई जैन विद्वानों का यह मानना अयुक्ति-युक्त नहीं दीखता कि ऋषभदेव, वेदोल्लिखित होने पर भी, वेदपूर्व हैं । 'संस्कृति कं चरि अध्याय' ( लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद - 1 ) पृष्ठ 30-33 से साभार -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 7 Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनधर्म और हिन्दूधर्म हमसफर हैं, एक नहीं कैलाश मड़बैया म. प्र. के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह जी अपने लेखों । जैन संत/मुनि, अन्य धर्मों से हटकर पूर्ण अपरिग्रही और के माध्यम से प्रायः अपने विरोधियों को एक अच्छी बात | वीतरागी होता है। धन सम्पदा तो दूर, तन पर धागा तक नहीं समझाते हैं कि बिना अध्ययन के अभिव्यक्ति करना अनुचित | धारण करता। व्रत कर दूंखा-प्यासा रह सकता है, पर है। काश यह तथ्य वे अपने ही दल के वरिष्ठ नेता और अभक्ष्यसेवन नहीं कर सकता। राजनीति तो दूर की बात है, गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को समझा पाते, तो कम | संसार की किसी नीति में लिप्त नहीं रहता। त्याग, करुणा, से कम अल्पसंख्यकों के बारे में सारे विश्व में उनकी ऐसी | साधना तो सभी धर्मों में कमोवेश एक जैसी ही हैं। पर किरकिरी तो नहीं हो पाती। विशेषतौर से उनका ताजा धर्म | जैनधर्म का आदिकाल से पृथक अस्तित्व, पृथक इतिहास, परिवर्तन सम्बन्धी विधेयक तो यही पुष्ट करता है कि श्री | पृथक वैज्ञानिक उपासना पद्धति, पृथक भूगोल, पृथक मोदी को हिन्दूधर्म और जैनधर्म के मूल अभ्युदय की ही | समाजशास्त्र रहा है। हिन्दूधर्म वैदिक धर्म है, जबकि जैनधर्म जानकारी नहीं है। हालाँकि जैनियों के प्रति अपनी नियत | प्राग्वैदिक स्वतंत्र धर्म है। एक प्रवृत्तिमार्गी है तो दूसरा और इरादे तो उन्होंने गिरनार प्रकरण में बहुत पहले ही स्पष्ट | निवृत्तिमार्गी। वेदों में प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख कर दिये थे, जब अनाधिकृत कब्जा करनेवाले कतिपय | केशी नाम से अनेक जगह हुआ है। इसीलिये डॉ. सर्वपल्ली पण्डों को मोदी प्रशासन ने प्रश्रय देकर, ऐतिहासिक जैन | राधाकृष्णन जैसे दार्शनिक ने इसे एक स्वतंत्र धर्म और इस तीर्थंकर नेमिनाथ की निर्वाण भूमि पर अराजक तत्त्वों को | युग के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ को ही इसका प्रथम उपदेष्टा । अप्रत्यक्ष शह दी थी। यह अलग बात है कि अहिंसक | माना है। जैन धर्म का प्राचीन साहित्य, हिन्दूधर्म से भिन्न जैनियों का निष्क्रिय केन्द्रीय नेतृत्व पत्राचार ही करता रहा | प्राकृत में पाया जाता है। संस्कृत में तो बाद में प्रथम ग्रंथ और वे तत्त्व कोर्ट के स्टे तक की धज्जियाँ उड़ाते रहे। तत्त्वार्थ सूत्र आचार्य उमा स्वामी ने लिखा है। पं. जवाहर परिणाम यह कि सदियों से गिरनार वंदना करनेवाले जैनियों | लाल नेहरू को यद्यपि राजनेता के रूप में जाना जाता है, पर को वहाँ दर्शन तक करने पर मारा-पीटा जाने लगा। एक लेखक के रूप में 'डिस्कवरी ऑफ इण्डिया' उनकी अब यह उसी सहनशीलता पर दूसरा प्रहार है। सर्वमान्य साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कृति है, सामान्यतः जैनधर्म और हिन्दूधर्म में ऊपर से कोई अंतर नहीं | जिसमें उन्होंने भी जैन धर्म को एक स्वतंत्र धर्म और जैनियों दिखता, क्योंकि दोनों में अहिंसा और मानवीयता एक जैसी | को भारत का मूल निवासी माना है। संविधान ने, सुप्रीमकोर्ट ही है, पर सामान्य अध्येता भी यह समझता है कि वे साथ- | ने, और मण्डल कमीशन ने भी जैनधर्म को अहिन्दु धर्म ही साथ चलनेवाले हमराही भले कह दिये जायें, पर एक नहीं | माना है। जब अनेक राज्यों ने जैनियों को अल्पसंख्यक होने हैं। मूलभूत अंतर तो यही है कि हिन्दू धर्म में ईश्वर ही | की मान्यता दी थी, तब भी यह विवाद छिड़ा था और सृष्टि का कर्ता है। हिन्दू मानते हैं कि जब-जब धर्म की केन्द्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने सभी पक्षों को सुनकर जैनधर्म हानि होती है, भगवान धरती पर अवतार लेते हैं। दूसरी ओर | को स्वतंत्र धर्म माना था। तब नरेन्द्रमोदी बिना अध्ययनजैन धर्म में अवतार को कोई मान्यता नहीं है। प्रत्येक जीव, | मनन के यह विधेयक कैसे लागू कर सकते हैं कि जैनधर्म साधना और तपस्या से मुक्ति पाकर परम आत्मा हो सकता | और हिन्दू धर्म एक ही हैं ? मात्र इसलिये कि सत्ता का है, लेकिन फिर जन्म-मृत्यु से परे हो जाता है। तीर्थंकर | बहुमत उनके साथ है और अल्पसंख्यक जैन अहिंसक और अपने कर्मों से बनते हैं, अवतार से नहीं। जैन धर्म में सृष्टि | सहिष्णु हैं ? पर सत्ता के मद में कभी सत्य को झुठलाया का कर्ता ईश्वर को नहीं माना जाता। ईश्वर न तो कुछ | नहीं जा सकता। कुछ देर के लिये आँखों में धूल झोंकी जा बनाता है न किसी का कुछ बिगाड़ सकता है। सच्चा जैन, | सकती है। इतिहास में ऐसे कई सत्तासीन दब चुके हैं, मंदिर में मूर्ति पूजा इसलिये नहीं करता कि भगवान उसे | जिन्होंने अपनी मनमानी भले कुछ समय को कर ली हो, पर कुछ दे दें। बल्कि इसलिये करता है कि वह भी उनकी | सत्य को सदा के लिये झुठला नहीं पाये। शायद जैनियों को तरह जितेन्द्रिय बनकर मुक्तिपथ पर अग्रसर हो। एक सच्चा | ही अपनी अस्मिता का बोध हो जाये और उनके निष्क्रिय 8 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नेता चेत जायें, तो इस मनमानी पर लगाम लग सके। यों तो | को लोकतंत्र मानते हैं। मेरा उद्देश्य हिन्दू और जैनियों की माननीय सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति ही ऐसा नहीं होने देंगे। समरसता तोड़ना नहीं है, वह कोई तोड़ भी नहीं पाया पर सर्वप्रथम तो गुजरात के राज्यपाल ही ऐसे विधेयक को | अलग अलग धरातल पर खड़े पृथक पृथक उपास्यदेव और पारित होने से रोक सकेंगे। भगवान ऐसे राजनीतिज्ञों को | उपासना पद्धतिवाले दोनों धर्मों को एक तो नहीं ही कहा जा सद्बुद्धि दे, जो इक्कीसवीं सदी में भी अपना झूठ चलाने | सकता। 75, चित्रगुप्त नगर, कोटरा, भोपाल - 3 धर्मनाथ जम्बूद्वीप संबंधी भरतक्षेत्र में एक रत्नपुर नाम का नगर था, उसमें कुरुवंशी, काश्यपगोत्री महाराज भानु राज्य करते थे। उनकी महादेवी का नाम सुप्रभा था। माघ शुक्ला त्रयोदशी के दिन उस महारानी ने सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र को तीर्थंकरसुत के रूप में जन्म दिया। जब अनन्तनाथ भगवान् के बाद चार सागर प्रमाण काल बीत चुका और अन्तिम पल्य का आधा भाग धर्म रहित हो गया तब 'धर्मनाथ' भगवान् का जन्म हुआ था, उनकी आयु भी इसी अन्तराल में शामिल थी। शरीर की कान्ति सुवर्ण के समान थी तथा शरीर की ऊँचाई एक सौ अस्सी हाथ थी। जब उनके कुमारकाल के ढाई लाख वर्ष बीत गये तब उन्हें राज्य का अभ्युदय प्राप्त हुआ था। इस तरह सुखपूर्वक जब पाँच लाख वर्ष प्रमाण राज्यकाल बीत गया तब किसी एक दिन रात के समय उल्कापात देखने से उन्हें वैराग्य हो गया। उन्होंने सुधर्म नाम के अपने ज्येष्ठ पुत्र के लिये राज्य देकर शालवन के उद्यान में जाकर बेला का नियम लेकर माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन सायंकाल के समय एक हजार राजाओं के साथ दैगम्बरी दीक्षा धारण कर ली। पारणा के दिन वे भगवान् आहार के लिए पाटलिपुत्र नाम की नगरी में गये। वहाँ सुवर्ण के समान कान्ति वाले धन्यषेण राजा ने आहार दान देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये। तदनन्तर छद्मस्थ अवस्था के एक वर्ष बीत जाने पर उन्होंने उसी दीक्षा वन में सप्तच्छद वृक्ष के नीचे बेला का नियम लेकर योग धारण किया और पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन सायंकाल के समय घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया। भगवान् के समवशरण की रचना हुई जिसमें चौंसठ हजार मुनि, बासठ हजार चार सौ आर्यिकायें, दो लाख श्रावक, चार लाख श्राविकायें, असंख्यात देव-देवियाँ और संख्यात तिर्यंच थे। इस प्रकार भगवान् धर्मनाथ ने अनेक देशों में विहार कर धर्म का उपदेश दिया। अन्त में विहार बन्द कर वे पर्वतराज सम्मेदशिखर पर पहुँचे और एक माह का योग निरोध कर आठ सौ नौ मुनियों के साथ प्रतिमायोग से ध्यानारूढ़ हुए। तदनन्तर ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन रात्रि के अन्तिम भाग में अघातिया कर्मों का नाशकर वे भगवान् मोक्ष को प्राप्त हुए। मुनि श्री समतासागर कृत 'शलाकापुरुष' से साभार कृपया ध्यान दें 'जिनभाषित' के जिन सदस्यों को पत्रिका नियमितरूप से न मिल रही हो, वे अपना सदस्यता नं., सदस्यता अवधि एवं पूरा पता पिन कोड नम्बरसहित पोस्ट कार्ड पर लिखकर शीघ्र भेजने की कृपा करें। -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 9 Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्त्वार्थसूत्र में न्यायशास्त्र के बीज स्व० डॉ० दरबारीलाल जी कोठिया तत्त्वार्थसूत्र जैन परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण और | "प्रमाणनयाभ्यां ही विवेचिता जीवादय सम्यगधिगम्यन्ते। प्रतिष्ठित ग्रन्थ है। इसमें जैन तत्त्वाज्ञान का अत्यन्त संक्षेप | तद्व्यतिरेकेण जीवाद्यधिगमे प्रकारान्तरासम्भवात्।" न्या.दी.पृ.4 और प्रांजल संस्कृत-गद्यसूत्रों में बड़ी विशदता के साथ | 'न्याय' शब्द की व्युत्पत्ति भी इस प्रकार दी गयी है प्रतिपादन किया गया है। इसके रचियता आचार्य गृद्धपिच्छ | कि 'नि' पूर्वक 'इण गतौ' धातु से करण अर्थ में 'घञ्' हैं, जिन्हें उमास्वामी और उमास्वाति नामों से भी जाना जाता | प्रत्यय करने पर 'न्याय' शब्द सिद्ध होता है। 'नितरामियते ज्ञायतेऽर्थोऽनेनेति न्यायः,अर्थपरिच्छेदकोपायो न्याय इत्यर्थः। इसमें दश अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में रत्नत्रय के स च प्रमाणनयात्मक एव। अर्थात् निश्चय से जिसके द्वारा रूप में मोक्ष-मार्ग का उल्लेख करते हए सम्यग्दर्शन उसके पदार्थ जाने जाते हैं वह न्याय है और वह प्रमाण एवं नय रूप विषयभूत जीवादि सात तत्त्वों, उन्हें जानने के उपायों और | ही हैं, क्योंकि उनके द्वारा पदार्थों का ज्ञान किया जाता है। सम्यग्ज्ञान का निरूपण किया गया है। दूसरे, तीसरे और | नाऔ अतएव जैन दर्शन में प्रमाण और नय न्याय हैं। चौथे अध्यायों में जीवतत्त्व का लक्षण, उसके विभिन्न भेदों, | तत्त्वार्थसूत्र में प्रमाण, प्रमाणाभास और नय उससे सम्बन्धित शरीरों, जन्मों, योनियों, आवासों (रत्नप्रभा न्याय के उक्त स्वरूप के अनुसार तत्त्वार्थसूत्र में प्रमाण आदि नरकभूमियों, जम्बूद्वीप-लवणसमुद्र आदि मध्य लोक | और नय दोनों का प्रतिपादन उपलब्ध है। तत्त्वार्थसूत्रकार ने के स्थानों और देव निकायों) तथा उससे सम्बद्ध आवश्यक स्पष्ट कहा है कि प्रमाण और नयों के द्वारा पदार्थों का यथार्थ जानकारियों का, प्रतिपादन निबद्ध है। पाँचवे अध्याय में | ज्ञान होता है। यथा - 'प्रमाणनयैरधिगमः' (त. सू. 1-6)। . अजीवतत्त्व और उसके पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल | इससे स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्र में जहाँ धर्म और दर्शन इन पाँच भेदों का, छठे और सातवें अध्यायों में आस्रव तत्त्व | का प्रतिपादन किया गया है वहाँ उसमें प्रमाण और नय रूप (पापास्रव और पुण्यास्रव) का, आठवें में बन्धतत्त्व का, | न्याय का भी प्रतिपादन है। नवमे में संवर और निर्जरा तत्त्वों का तथा दशवें में मोक्ष तत्त्व षटखण्डागम आदि आगमग्रन्थों में ज्ञानमार्गणा के का विवेचन है। इस तरह जैन धर्म के प्रसिद्ध सात तत्त्वों का | अन्तर्गत ज्ञानमीमांसा के रूप में आठ ज्ञानों का वर्णन किया इसमें सांगोपांग कथन किया गया है। और इस प्रकार हमें | गया है। उनमें पाँच ज्ञानों को सम्यग्ज्ञान और तीन ज्ञानों को इसमें धर्म और दर्शन का पर्याप्त या यों कहिये कि प्रायः पूरा | मिथ्याज्ञान निरूपित किया गया है। परन्तु वहाँ उन ज्ञानों का निरूपण उपलब्ध होता है। प्रमाण और प्रमाणाभास के रूप में कोई विभाजन दृष्टिगोचर ___ अब प्रश्न है कि इस धर्म और दर्शन के ग्रन्थ में क्या | नहीं होता। पर तत्त्वार्थसूत्र में आगम वर्णित पाँच सम्यग्ज्ञानों उनके विवेचन या सिद्धि के लिये न्याय का भी अवलम्बन | को प्रमाण और तीन मिथ्याज्ञानों को प्रमाणभास १ (अप्रमाणलिया गया है ? इस प्रश्न का उत्तर, जब हम तत्त्वार्थसूत्र का | विपर्यय) बतलाकर दार्शनिक एवं न्यायिक दृष्टिकोण प्रस्तुत गहराई और सूक्ष्मता से अध्ययन करते हैं, तो उसी से मिल | किया गया है। मति आदि पाँच ज्ञानों को प्रमाण तथा विपरीत जाता है। मति, विपरीत श्रृत और विपरीत अवधि (विभंगज्ञान) इन न्याय का स्वरूप : प्रमाण और नय तीन ज्ञानों को विपर्यय-अप्रमाण-प्रमाणाभास के रूप में निरूपण संस्कृत भाषा के ग्रन्थों में तत्वार्थसूत्र में ही सर्व प्रथम उपलब्ध न्यायदीपिकाकार अभिनव धर्मभूषणयति ने न्याय का होता है। स्वरूप देते हुए लिखा है कि प्रमाण और नय दोनों न्याय हैं, क्योंकि उनके द्वारा पदार्थों का ज्ञान किया जाता है। उनके तत्त्वार्थसूत्र में न्याय के दूसरे अंग नय का भी प्रतिपादन , अतिरिक्त उनके ज्ञान का अन्य कोई उपाय नहीं है। जैसा कि है और उसके सात भेदों का निर्देश किया गया है। वे हैं उनके निम्न प्रतिपादन से स्पष्ट है - नैगम, संग्रह व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत । टीकाकारों ने इनका विस्तृत विवेचन किया है। 10 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ · + प्रमाण के प्रत्यक्ष-परोक्ष भेद प्रत्यक्ष और परोक्ष के भेद से प्रमाण के दो भेदों को बतलाकर उनका तत्त्वार्थसूत्र में विशदता के साथ प्रतिपादन किया गया है । मति और श्रुत इन दो ज्ञानों को परोक्ष तथा अवधि, मन:पर्यय और केवल इन तीन ज्ञानों को प्रत्यक्ष कहा गया है। 6 तत्तवार्थसूत्रकार ने परोक्षता और प्रत्यक्षता भी कारण बताते हुए लिखा है कि चूँकि आदि के दोनों (मति और श्रुत) ज्ञान इन्द्रियों और मन की सहायता से उत्पन्न होते अतः परापेक्ष होने से वे परोक्ष कहे गये हैं और अन्य तीन ज्ञान ( अवधि, मन:पर्यय और केवल ) इन्द्रियों और मन की सहायता से न होने तथा मात्र आत्मा की सहायता से होने के कारण प्रत्यक्ष बतलाये गये यह प्रमाणद्वय का भेद आगमिक 8 न होकर तार्किक है, जिसका अनुसरण उत्तरवर्ती अकलंक 9 , विद्यानन्द 10 आदि सभी जैन तार्किकों ने किया है। भारतीय न्यायशास्त्र में 11 किये गये प्रमाण के दो ( वैशेषिक और बौद्ध स्वीकृत), तीन (सांख्य मान्य) चार (नैयायिकसम्मत), पांच (प्राभाकर अंगीकृत) और छह (भाट्ट मीमांसक स्वीकृत) भेदों का समावेश उनके उक्त प्रमाणद्वय (प्रत्यक्ष और परोक्ष) में ही हो जाता है । तत्वार्थसूत्रकार12 जब मति, स्मृति, संज्ञा (प्रत्यभिज्ञान), चिन्ता (तर्क) और अभिनिबोध ( अनुमान) के भी प्रमाणान्तर न होने का संकेत करते हुए उन्हें मतिज्ञान कहते हैं और उनका इन्द्रिय-मनपूर्वक होने के कारण परोक्ष में अन्तर्भाव करते हैं, तो उनकी यहाँ निश्चय ही तार्किक दृष्टि लक्षित होती है। उनकी इस दृष्टि से प्रकाश लेकर पूज्यपाद 13 ने न्यायदर्शन आदि में पृथक् प्रमाण के रूप में स्वीकृत उपमान, आगम आदि प्रमाणों को परसापेक्ष होने से परोक्ष में अन्तर्भाव कर लिया है और तत्वार्थ सूत्रकार के प्रमाणद्वय का समर्थन किया है। अकलंक14 ने भी उनके प्रमाणद्वय की ही सम्पुष्टि की है। साथ ही उनने नये आलोक में प्रत्यक्ष-परोक्ष की परिभाषाओं और उनके तार्किक भेदों का भी प्रतिपादन किया है। उत्तरकाल में तो आचार्य गृद्धपिच्छ का आधार लेकर अकलंक ने जो प्रमाण-निरूपण किया, उसी पर विद्यानन्द 15, माणिक्यनन्दि 16 आदि तार्किक चले हैं । के तीन (पक्ष, हेतु और उदारहण) अवयवों से अनुमान सिद्धि तत्त्वार्थसूत्र में कुछ सिद्धान्तों की सिद्धि अनुमान (युक्ति) से की गयी है। उन्होंने अनुमानप्रयोग के तीन अवयवों पक्ष, हेतु और उदाहरण से मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानों को विपर्यय ( अप्रमाण- प्रमाणाभास) सिद्ध करते हुए प्रतिपादन किया है 1. पक्ष मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च । 2. हेतु - सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेः । 3. उदाहरण - उन्मत्तवत् । - (त.सू. 1-31, 32 ) अर्थात् मति, श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान विपर्यय (मिथ्या - अप्रमाण- प्रमाणाभास) भी हैं, क्योंकि उनके द्वारा सत् (समीचीन) और असत् (असमीचीन) का भेद न कर स्वेच्छा से उपलब्धि होती है, जैसे उन्मत्त ( पागल पुरुष ) का ज्ञान । उन्मत्त व्यक्ति विवेक न रख कर माता को स्त्री और स्त्री को माता कह देता है । उसी प्रकार मति, श्रुत और अवधि (विभंग) ज्ञान भी सत्-असत् का भेद न कर कभी काचकामलादि के वश वस्तु का विपरीत (अन्यथा) ज्ञान करा देते हैं । अतः ज्ञान मिथ्याज्ञान भी कहे जाते हैं । तत्त्वार्थसूत्रकार के इस प्रतिपादन से स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्र में न्यायशास्त्र भी समाहित है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उनके समय में तीन अनुमानावयव वस्तुसिद्धि में प्रचलित थे, उपनय और निगमन को अनुमानावयव स्वीकार नहीं किया जाता था या उनका जैन संस्कृति में विकास नहीं भी 'देवागम' (अप्तमीमांसा) में उक्त तीन अवयवों से ही हुआ था । तत्त्वार्थसूत्रकार के उत्तरवर्ती आचार्य समन्तभद्र ने अनेक स्थलों पर वस्तु-सिद्धि की है। न्यायावतारकार सिद्धसेन ने भी अनुमान के उक्त तीन ही अवयवों का प्रतिपादन किया है । तत्त्वार्थसूत्रकार का तीन अवयवों से वस्तु-सिद्धि का दूसरा उदाहरण और यहाँ प्रस्तुत है । तत्त्वार्थसूत्र के दशवें अध्याय में तीन सूत्रों द्वारा मुक्तजीव के ऊर्ध्वगमन को सयुक्तिक सिद्ध करते हुए तत्त्वार्थसूत्रकार ने लिखा है 1. पक्ष - तदनन्तरं (मुक्तः) ऊर्ध्वं गच्छत्यालोकान्तात् । 2. हेतु - पूर्वप्रयोगात्, असंगत्वात्, बन्धच्छेदात्, तथा गतिपरिणामाच्च । 3. उदाहरण आविद्धकुलालचक्रवत्, व्यपगतलेपालावुवत्, एरण्डबीजवत्, अग्निशिखावच्च । (त.सू. 10-5, 6, 7) - -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 11 Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ I अर्थात् द्रव्यकर्मों और भावकर्मों से छूट जाने के बाद | मुक्त जीव लोक के अन्त पर्यन्त ऊपर को जाता है, क्योंकि उसका ऊपर जाने का पहले का अभ्यास है, कोई संग (परिग्रह) नहीं है, कर्म बन्धन नष्ट हो गया है और उसका ऊपर जाने का स्वभाव है। जैसे कुमार का चाक, लेपरहित तूमरी, एरंड का बीज और अग्नि की ज्वाला। मुक्त जीव के ऊर्ध्वगमन को सिद्ध करने के लिए सूत्रकार ने चार हेतु दिये और उनके समर्थन के लिए चार उदाहरण भी प्रस्तुत किये हैं। 17 इस तरह से अनुमान से सिद्धि या विवेचन करना न्यायशास्त्र का अभिधेय है। यद्यपि साध्याविनाभावी एक हेतु ही विवक्षित अर्थ की सिद्धि के लिए पर्याप्त है, उसे सिद्ध करने के लिए अनेक हेतुओं का प्रयोग और उनके समर्थन के लिए अनेक उदाहरणों का प्रतिपादन अनावश्यक किन्तु उस युग में न्यायशास्त्र का इतना विकास नहीं हुआ था। वह तो उत्तर काल में हुआ है। इसी से अकलंक, विद्यानन्द, माणिक्यनन्दि आदि न्यायशास्त्र के आचार्यों ने साध्य (विवक्षित अर्थ) की सिद्धि के लिए पक्ष और हेतु इन दो को ही अनुमान का अंग माना है 18 उदाहरण को भी उन्होंने नहीं माना- उसे अनावश्यक बतलाया है। तात्पर्य यह कि तत्त्वार्थसूत्रकार के काल में परोक्ष अर्थों की सिद्धि के लिए न्याय (युक्ति-अनुमान) को आगम के साथ निर्णय-साधन माना जाने लगा था। यही कारण है कि उनके कुछ ही काल बाद हुए स्वामी समन्तभद्र 19 ने युक्ति और शास्त्र दोनों को अर्थ के यथार्थ प्ररूपण के लिए आवश्यक बतलाया है। उन्होंने यहाँ तक कहा है कि वीर जिन इसिलिए आप्त हैं, क्योंकि उनका उपदेश युक्ति और शास्त्र के अविरुद्ध है । तत्त्वार्थसूत्र के उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि उसमें न्यायशास्त्र के बीज समाहित हैं, जिनका उत्तरकाल में अधिक विकास हुआ है। तत्त्वार्थसूत्र के पाँचवें अध्याय के पन्द्रह और सोलहवें सूत्रों द्वारा जीवों का लोकाकाश के असंख्यातवें भाग से कर सम्पूर्ण लोकाकाश में अवगाह प्रतिपादित किया गया है। यह प्रतिपादन भी अनुमान के उक्त तीन अवयवों द्वारा हुआ है । पन्द्रहवाँ सूत्र पक्ष के रूप में और सोलहवाँ सूत्र हेतु तथा उदाहरण के रूप में प्रयुक्त हैं। 20 जीवों का अवगाह लोकाकाश के असंख्यातवें भाग लेकर सम्पूर्ण लोकाकाश में है, क्योंकि उनमें प्रदेशों का संहार (संकोच) और विसर्प (विस्तार) होता है, जैसे प्रदीप । दीपक को जैसा आश्रय 12 अक्टूबर 2006 जिनभाषित मिलता है उसी प्रकार उसका प्रकाश हो जाता है। इसी तरह जीवों को भी जैसा आश्रय प्राप्त होता है, वैसे ही वे उसमें समव्याप्त हो जाते हैं । सत् में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य की सिद्धि भी अनुमान से द्रव्य का लक्षण तत्त्वार्थसूत्र में आगमानुसार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य की युक्तता को बतलाया है। यहाँ प्रश्न उठा21 कि उत्पाद, व्यय अनित्यता ( आने-जाने) रूप हैं और ध्रौव्य (स्थिरता) नित्यतारूप है। ये दोनों (अनित्यता और नित्यता) एक ही सत् में कैसे रह सकते हैं? इसका उत्तर सूत्रकार ने हेतु का प्रयोग करके दिया है। उन्होंने कहा22 कि मुख्य (विवक्षित) और गौण (अविवक्षित) की अपेक्षा से उन दोनों की एक ही सत् में सिद्धि होती है। द्रव्यांश की विवक्षा करने पर उसमें नित्यता और पर्यायांश की अपेक्षा से कथन करने पर अनित्यता की सिद्धि होती है । इस प्रकार युक्तिपूर्वक सत् को उत्पाद-व्यय- ध्रौव्य रूप त्रयात्मक या अनेकान्तात्मक सिद्ध किया गया है 23 इस तरह तत्त्वार्थसूत्र हमें धर्म, दर्शन और न्याय तीनों का सूत्ररूप में दिग्दर्शन करानेवाला जैन वाङ्मय का अद्वितीय सूत्रग्रन्थ है । सम्भवतः इसी से उसकी महिमा एवं गरिमा का गान करते हुए उत्तरवर्ती आचार्यों ने कहा है24 कि इस तत्त्वार्थसूत्र का जो एक भी बार पाठ करता या सुनता है उसे एक उपवास करने - जितना फल प्राप्त होता है । तत्त्वार्थसूत्र की इस महिमा को देखकर आज भी समाज में उसका पठन-पाठन अधिक प्रचलित है और पर्युषण (दशलक्षण ) पर्व में तो उस पर व्याख्यान भी दिये जाते एवं सुने जाते हैं । निष्कर्ष इस अनुसन्धानपूर्ण विमर्श के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन विद्वानों का मत युक्त प्रतीत नहीं होता, जो आचार्य गृद्धपिच्द्ध-उमास्वामी को 5वीं शताब्दी का मानकर उनके तत्त्वार्थसूत्र के कतिपय विचारों-निरूपणों को लेकर आचार्य कुन्दकुन्द को उनका उत्तरवर्ती अर्थात् छठी-सातवीं शताब्दी का विद्वान् बतलाते हैं । अतः तत्त्वार्थसूत्र में जहाँ उक्त प्रकार से न्याय का विमर्श उपलब्ध है वहां कुन्दकुन्द के किसी भी ग्रन्थ में धर्म और दर्शन के सिवाय न्याय का विमर्श नहीं है। इसी दृष्टि से हमने तत्त्वार्थसूत्र में न्यायशास्त्र के बीज खोजे हैं, जो हमें उक्त प्रकार से प्राप्त हुए हैं। पर कुन्दकुन्द ★ " Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ के ग्रन्थों में वे हमें प्राप्त नहीं हुए। अतः कुन्दकुन्द न्यायशास्त्र | 10. प्रमाणपरीक्षा पृ. 28, वीर सेवा मन्दिर ट्रस्ट संस्करण, के विकास के बहुत पूर्ववर्ती हैं। तथा तत्त्वार्थसूत्रकार उस 19771 समय हुए जब न्यायशास्त्र का विकास आरम्भ हो चुका था | 11. जैनतर्कशास्त्र में अनुमान-विचार, पृ. 69, वीरसेवा मन्दिर और अपने सिद्धान्तों की सम्पुष्टि के लिये उसे भी आवश्यक ट्रस्ट, 19691 माना जाने लगा था। इसी से उन्होंने अपने सिद्धान्तों को न्यायशास्त्र के द्वारा अनेक जगह पुष्ट किया है, जैसा कि हम 12. त.सू., 1-13, 141 ऊपर देख चुके हैं, खासकर तीन अनुमानावयवों से वस्तु 13. स.सि., 1-11। सिद्धि के उदाहरण। 14. लघीयस्यय 1-3 15. प्र.प., पृ. 28 सन्दर्भ 16. परीक्षा मुख 3-1, 2 1. प्रमाणनयात्मकन्यायस्वरूपप्रतिबोधकशास्त्राधिकारसम्पत्तये प्रकरणमिदमारभ्यते। न्याय दी. 5 वीर सेवा 17. अनुपदिष्टहेतुकमिदमूर्ध्वगमनं कथ्मध्यवसातुं शक्यमन्दिर संस्करण, सन् 19451 मिजिति? अत्रोच्यते आह...। हे त्वर्थः पुष्पलोऽपि दृष्टान्तसमर्थनमन्तरेणाभिप्रेतार्थसाधनाय नालमिति, 2. न्या. दी. टिप्प., पृ. 5, संस्करण पूर्वोक्त। उच्यते। सर्वार्थसिद्धि 10-6,7 की उत्थानिकाएँ। 3. मतिश्रुतावधिमनः पर्ययकेवलानि ज्ञानम्, तत्प्रमाणे। त.सू. 18. एतद्वयमेवानुमानांग नोदाहरणम्। परीक्षामुख 3-37। 1-9, 101 न्याय विनि. का. 381, अकलंक ग्र. पत्रपरी. पृ.9। 4. मतिश्रुतावधयो विपर्यश्च । वही, 1-31। 19. युक्तिशास्त्राविरोधिवाक् । देवागम (आप्तमी.), का.। 5. नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूद्वैवंभूता नयाः । वही, | 20. असंख्येयभागादिषुजीवानाम्(अवगाहः),प्रदेशसंहारविसर्पाभ्याम्, 1-31 प्रदीपवत्, त.सू., 5-15, 16। 6. तत्प्रमाणे, आद्ये परोक्षम्, प्रत्यक्षमन्यत्। वही, 1-10, | 21. नन इदमेव विरुद्धं तदेव नित्यं तदेवानित्यमिति। यदि 11,12। नित्यं व्ययोदयाभावाद् नित्यताव्याघातः। अथानित्यमेव 7. तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् प्रत्यक्षमन्यत्। त.सू. 1-14, स्थित्यभावान्नित्यताव्याघात इति? नैतद्विरुद्धम्। कुतः? 121 स.सि. 5-32 की उत्थानिका। 8. मति, श्रुत आदि पाँच सम्यग्ज्ञानों का भेद आगमिक है। | 22. अर्पितानर्पितसिद्धेः 5-32 । स्वाभावज्ञान और विभाव ज्ञान के भेद से ज्ञानोपयोग के | 23. त.सू. 5--32 । दो भेदों का आ. कन्दकन्द का निरूपण (नियमसार. [.. 24. दशाध्याये परिच्छिन्ने तत्वार्थं पठिते सति । गाथा 10) भी आगमिक है। कुन्दकुन्द ने प्रवचनसार फलं स्यादुपवासस्य भाषितं मुनिपुंगवैः ।। (गाथा 21, 22, 39, 40) में प्रत्यक्ष और परोक्ष शब्दों का प्रयोग किया है। पर वहाँ इन शब्दों का प्रयोग पदार्थ अज्ञात व्याख्याकार कृत। के विशेषण रूप में है । हाँ, इसी ग्रन्थ में आगे (गाथा 58 श्री 1008 आदिनाथ जिनेन्द्रबिम्बप्रतिष्ठा महोत्सव, में) अवश्य परोक्ष और प्रत्यक्ष के लक्षण बतलाते हुए मदनगंज-किशनगढ़ (राज.) स्मारिका, उन्हें ज्ञान का विशेषण बताया है। पर प्रमाण के भेद सन 1979 से साभार रूप में उनका प्रतिपादन नहीं है। 9. लघीयस्त्रय 1-31 -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 13 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनेतर दर्शनों में अनेकान्त और स्याद्वाद प्रो. रतनचन्द्र जैन सम्पादक : जिनभाषित हिन्दी के सुविख्यात कवि एवं इतिहासकार स्व. श्री रामधारीसिंह 'दिनकर' ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'संस्कृति के चार अध्याय' में लिखा है कि अहिंसा' और 'अनेकान्तवाद' की विचारधारा एवं प्रवृत्ति प्राग्वैदिक है, जो वेदपूर्व जैन तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव से जुड़ी हुई है। (देखिए, इसी अंक में 'जैन संस्कृति वेदपूर्व है' इस शीर्षक से प्रस्तुत उनके विचार)। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि विभिन्न धर्मावलम्बी जब एक स्थान में साथ-साथ रहते हैं, तब उनके धार्मिक, दार्शनिक, साहित्यिक और सामाजिक आचार-विचारों का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ता है और उनमें अपने धर्मानुकूल अनेक तत्त्वों का आदान-प्रदान होता है। इसी कारण जैनधर्म की अहिंसा के साथ जैनदर्शन के अनेकान्त और स्याद्वाद का भी प्रभाव भारत के जैनेतर दर्शनों पर पड़ा है। इसके कुछ प्रमाण इस लेख में प्रस्तुत किये जा रहे हैं। अनेकान्त जैनदर्शन का एक आधारभूत एवं विशिष्ट । इन उक्तियों में ब्रह्म में सत् और असत् उभय धर्मों सिद्धान्त है। जैन विचारधारा में प्रत्येक वस्तु अनेकान्तात्मक | का विधान भी किया गया है और निषेध भी। इसका उद्देश्य मानी गयी है। एक ही वस्तु में अपेक्षाभेद से सत्व-असत्त्व, ‘सदसत्' कहकर कहीं तो ब्रह्म के व्यक्ताव्यक्त स्वरूप नित्यत्व-अनित्यत्व, भेदत्व-अभेदत्व, एकत्व-अनेकत्व का बोध कराना है, कहीं अव्यक्त स्वरूप में सगुण-निर्गुण आदि वस्तुस्वरूपनिष्पादक परस्परविरुद्ध धर्मयुगलों का होना स्वरूप का निर्देश करना है और कहीं सदसत् से विलक्षण अनेकान्त कहलाता है। निरूपित कर केवल निर्गुण स्वरूप का ज्ञान कराना है। इसी ___अनेकान्त एकान्त का विरुद्धार्थी है। एकान्त का अर्थ के आधार पर उपनिषदों तथा भगवद्गीता में अनेक स्थानों के है 'सर्वथात्व' अर्थात् वस्तु में किसी एक ही धर्म का होना। पर ब्रह्म को सद्प, असद्प, सदसद्रूप तथा सदसद्अनेकान्त उसका निषेधक है जैसा कि जैनाचार्य भट्ट | विलक्षण बतलाया गया है। अकलंकदेव के निम्नलिखित वचनों से स्पष्ट है - "सदसन्नि- | ऋग्वेद (1/164/46) का ही कथन है - "एकं सद्विप्रा त्यानित्यादिसर्वथैकान्तप्रतिक्षेपलक्षणोऽनेकान्तः।" (देवागम/ | बहुधा वदन्ति' = सत् एक ही है, विद्वान् उसका अनेक रूपों अष्टशती/कारिका 103) में वर्णन करते हैं। यह कथन 'सत्' को एक और अनेक अर्थात् वस्तु सत् ही है या असत् ही है, नित्य ही है | उभयरूप सिद्ध करता है। या अनित्य ही है, इस प्रकार के सर्वथा एकान्त का निषेध | उपनिषदों में ब्रह्म का स्वरूप अनेकान्तरूप में वर्णित करना अनेकान्त का लक्षण है। अतः वस्तु में किसी एक ही | हुआ है। उदाहरणार्थ - धर्म का न होना, उसके प्रतिपक्षी धर्म का भी होना, अनेकान्त | 1 "अणोरणीयान्महतो महीयान्।" (कठोपनिषद् 1/2/20)। कहलाता है। = "वह ब्रह्म सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् से महान् है।" जैनदर्शन के प्रभाव से यह अनेकान्त जैनेतर दर्शनों में भी स्वीकृत किया गया है। वैदिक साहित्य के सबसे प्राचीन | 2. "तदेजति तन्नजति तद् दूरे तदन्तिके।" (ईशोपनिषद/ ग्रन्थ ऋग्वेद में सृष्टि के मूल कारण ब्रह्म को सत्-असत् से । 5)। = "वह चलता है, नहीं भी चलता है। वह दूर भी है, पास भी है।" भिन्न बतलाया गया है - "नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्" (ऋग्वेद 10/129/1 )। किन्तु तैत्तिरीय ब्राह्मण (2/1/9/1) | 3. “क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तम्।" (श्वेताश्वतरोपनिषद् में उसका सत-असत् उभयरूप में निरूपण है - "नामरूप- 1/8)। = "वह क्षर भी है, अक्षर भी। व्यक्त भी है, रहितत्त्वेनासच्छब्दवाच्यं सदेवावस्थितं परमात्मतत्त्वम्"। अव्यक्त भी।" ऋग्वेद में ही अन्यत्र कहा गया है कि देवताओं के प्रथम युग इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि उपनिषदों के प्रणेता में असत् (अव्यक्त ब्रह्म) से सत् (व्यक्त संसार) की उत्पत्ति | ऋषि भी आत्मा को परस्परविरुद्ध धर्मयुग्मों से समन्वित हुई। "देवानां युगे प्रथमेऽसतः सदजायत" (10/72/3)। । मानते थे। 14 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मीमांसा, सांख्य-योग, वैशेषिक, वेदान्त आदि दर्शनों में भी जैनदर्शन की भाँति अनेकान्त सिद्धान्त की उपलब्धि होती है। इसके कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं - उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यत्व - जैनदर्शन में प्रत्येक वस्तु को उत्पाद - व्यय - ध्रौव्यात्मक माना गया है- "उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्।'' (तत्त्वार्थसूत्र 5/30) । वस्तु में नई अवस्था की उत्पत्ति " उत्पाद", पूर्वावस्था का विनाश "व्यय" और दोनों अवस्थाओं में मूल तत्त्व का विद्यमान रहना "ध्रौव्य" कहलाता है । जैसे स्वर्णपिण्ड को गलाकर कुण्डल बनाया जाय, तो उसकी पिण्डावस्था का व्यय और कुण्डलावस्था का उत्पाद होता है और दोनों अवस्थाओं में स्वर्ण ध्रुव रहता है । प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिल भट्ट ने भी पदार्थों के उत्पाद - व्यय - ध्रौव्यात्मक स्वभाव को मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया है और इसे सिद्ध करने में उन्होंने जैनाचार्य समन्तभद्र की युक्ति का ही अवलम्बन किया है । वे कहते हैं • " स्वर्ण के वर्धमानक (पात्रविशेष) को तोड़कर यदि रुचक (आभूषणविशेष) बनाया जाय, तो वर्धमानक के अभिलाषी को शोक होगा, रुचक के अभिलाषी को हर्ष, किन्तु जिसे स्वर्णमात्र की इच्छा होगी वह मध्यस्थ रहेगा । इसलिए वस्तु त्रयात्मक है, क्योंकि उत्पाद, स्थिति और भंग के अभाव में शोक, हर्ष और माध्यस्थ्य, ये तीन प्रकार की बुद्धियाँ नहीं हो सकतीं। ''3 - नित्यानित्यत्व - जैनदर्शन में वस्तु के उत्पन्न और विनष्ट होनेवाले रूप को पर्याय तथा स्थायी रहने वाले तत्त्व को द्रव्य कहते हैं । इस तरह द्रव्य की दृष्टि से में वस्तु नित्यत्व है और पर्याय की दृष्टि से अनित्यत्व। इस सिद्धान्त का महर्षि पतञ्जलि ने भी व्याकरण महाभाष्य (पस्पशाह्निक) में बड़ी सुन्दरता से प्रतिपादन किया है। वे कहते हैं " द्रव्यं नित्यमाकृतिरनित्या । सुवर्णं कयाचिदाकृत्या युक्तं पिण्डो भवति, पिण्डाकृतिमुपमृद्य रूचकाः क्रियन्ते, रुचकाकृतिमुपमृद्य कटकाः क्रियन्ते कटकाकृतिमुपमृद्य स्वस्तिकाः क्रियन्ते, पुनरावृत्त - सुवर्ण पिण्डः पुनरपरयाकृत्या युक्तः खदिराङ्गारसदृशे कुण्डले भवतः । आकृतिरन्या चान्या भवति, द्रव्यं पुनस्तदेव । आकृत्युपमर्देन द्रव्यमेवावशिष्यते । " अर्थात् द्रव्य नित्य है, आकृति अनित्य । सुवर्ण किसी आकार से युक्त होकर पिण्डरूप धारण करता है। पिण्डाकृति को नष्ट कर उसके रुचक (आभूषणविशेष) बनाये जाते हैं । | रुचकाकृति का विनाश कर उसे स्वस्तिकों का रूप दिया जाता है । स्वस्तिकों को गलाकर पुनः स्वर्णपिण्ड बना दिया जाता है और वह पिण्ड पुनः अन्य आकृति से युक्त होकर खदिरांगार - सदृश दो कुण्डलों के रूप में परिवर्तित हो जाता है । इस प्रकार आकृति भिन्न-भिन्न होती जाती है, द्रव्य वही का वही रहता है। आकृति के नष्ट होने पर भी द्रव्य अवशिष्ट रहता है। सांख्यदर्शन यद्यपि पुरुष को कूटस्थ नित्य मानता है, तथापि प्रकृति को परिणामिनित्य अर्थात् नित्यानित्यात्मक स्वीकार करता है, अन्यथा घटपटादि विभिन्न कार्यों के रूप में प्रकृति की उत्पत्ति और विनाश तथा मूलरूप में स्थिरता सिद्ध नहीं हो सकती । बौद्धों के एक आरोप का खण्डन करते हुए पातंजल योगभाष्य में व्यास स्वयं कहते हैं - “ अयमदोषः । कस्मात् ? एकान्तानभ्युपगमात्। तदेतद् त्रैलोक्यं व्यक्तेरपैति । कस्मात् ? नित्यत्वप्रतिषेधात् । अपेतमप्यस्ति विनाशप्रतिषेधात् ।" (विभूतिपाद / सूत्र 13 ) । अनुवाद हम प्रकृति को एकान्त नित्य अथवा एकान्त अनित्य नहीं मानते, अपितु कथंचित् नित्यानित्य मानते हैं। यह संसार (तदन्तर्गत पदार्थ) बाह्य रूप की अपेक्षा नष्ट होता है, क्योंकि सर्वथा नित्यत्व का प्रतिषेध है, नष्ट होकर भी विद्यमान रहता है, क्योंकि सर्वथा अनित्यत्व का निषेध है । - भेदाभेद - जैनदर्शन की भाँति पातंजल योगभाष्य के कर्त्ता महर्षि व्यास भी धर्म और धर्मी में कथंचित् भेदाभेद स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि धर्मी के धर्म, लक्षण तथा अवस्था नाम के जो तीन परिणाम माने गये हैं, वे धर्म और धर्मी में भेद की अपेक्षा से ही माने गये हैं। अभेद-दृष्टि से तो एक ही परिणाम है। जैसे एक ही रेखा शत के स्थान में शत, दश के स्थान में दश और एक के स्थान में एक रूप से निर्दिष्ट होती है और जैसे एक ही स्त्री भिन्न भिन्न पुरुषों की अपेक्षा माता, पुत्री और भगिनी कही जाती है वैसे ही एक ही धर्मी का धर्म, लक्षण और अवस्था के भेद से भिन्न भिन्न रूप में निर्दिष्ट होता है, वह भी अवस्थान्तर से, न कि द्रव्यान्तर से 14 एकानेकत्व - वस्तु के भेदाभेद से उसका एकानेकत्व भी सिद्ध होता है । अभेदरूप से वस्तु में एकत्व है, भेदरूप से अनेकत्व । जैसे जाति की दृष्टि से 'गो' पदार्थ एक है, व्यक्ति की दृष्टि से अनेक । धर्मी की अपेक्षा वस्तु एक होती है और धर्म की अपेक्षा अनेक । कुमारिल भट्ट को यह अक्टूबर 2006 जिनभाषित 15 Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्वीकार्य है। वे मीमांसाश्लोकवार्तिक में कहते हैं “केनचिद्ध्यात्मनैकत्वं नानात्वं चास्य केनचित् " अर्थात् किसी अपेक्षा से वस्तु एक है, किसी अपेक्षा से अनेक । सामान्य- विशेषत्व - जैनदर्शन पदार्थ को सामान्यविशेषात्मक मानता है । पातंजल योगभाष्यकार भी 'सामान्यविशेषात्मनोऽर्थस्य' (समाधिपाद / सूत्र 7 ) इन शब्दों में इसे स्वीकार करते हैं। मीमांसक कुमारिल भट्ट वस्तु की सामान्यविशेषात्मकता का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं‘‘विशेषरहित सामान्य और सामान्यरहित विशेष शशविषाण के समान असत् है।''5 अर्थात् एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं है। सत्त्वासत्त्व - जैनदर्शन को वस्तु में जैसा सत्त्वासत्त्व स्वीकार्य है, वैसा ही वैशेषिकदर्शन के प्रणेता महर्षि कणाद तथा उनके अनुयायियों को भी स्वीकार्य है । 'सच्चासत्' (विद्यमान पदार्थ भी अविद्यमान होता है) इस वैशेषिकसूत्र की व्याख्या करते हुए आचार्य शंकर मिश्र लिखते हैं - 'यत्र सदेव घटादि असदिति व्यवह्रियते तत्र तादात्म्याभावः प्रतीयते । भवति हि असन्नश्वो गवात्मना, असन् गौरश्वात्मना --- । (वैशेषिक सूत्रोपस्कार 9/1/4)। अर्थात् जहाँ सत् घट भी असत् कहा जाता हैं वहाँ तादात्म्याभाव प्रतीत होता हैं, क्योंकि अश्व गोरूप से असत् है, गो अश्वरूप से असत् है । मीमांसक कुमारिल भट्ट भी वस्तु को स्वरूप से परिवर्तनशीलता संभव है। सत् और पररूप से असत् प्रतिपादित करते हैं सभी धर्म सप्रतिपक्ष नहीं - स्वरूप पररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके । वस्तुनि ज्ञायते कैश्चिद्रूपं किञ्चन कदाचन ॥ उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि जैनेतर दर्शनों में भी अनेकान्त स्वीकार किया गया है 1 वस्तुस्वरूप के निष्पादक परस्परविरुद्ध धर्मों के एकत्र अवस्थान में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि वे वस्तु में भिन्न भिन्न अपेक्षा से रहते हैं, एक ही अपेक्षा से नहीं। इसे जैनेतर आचार्यों ने भी स्वीकार किया है। पार्थसारथिमिश्र - कृत शास्त्रदीपिका की व्याख्या में सुदर्शनाचार्य कहते हैं - "भेदाभेदयोर्विरोधाभावे हेत्वन्तरमाह- अपेक्षाभेदादिति, निरूपकभेदादिति यावत् । यद्येकेनैव रूपेण भेदाभेदौ स्यातां तदा विरोधः स्यादपि । नैवमस्ति, किन्तु केनचिद्रूपेण भेदः केनचिद्रूपेणाभेद इति न विरोधः । यथा यज्ञदत्तस्य देवदत्तापेक्षया ह्रस्वत्वेऽपि विष्णुदत्तापेक्षया दीर्घत्वमपीति परस्पर 16 अक्टूबर 2006 जिनभाषित विरुद्धयोरपि ह्रस्वत्वदीर्धत्वयोरेकत्र यज्ञदत्ते न विरोधस्तथात्रापि द्रष्टव्यम् ॥” इन शब्दों का तात्पर्य यह है कि वस्तु में भेद और अभेद दोनों के एक साथ रहने में अपेक्षाभेद के कारण विरोध का अभाव है । यदि एक ही अपेक्षा से भेद और अभेद दोनों होते, तो विरोध होता । किन्तु ऐसा नहीं है। भेद किसी अपेक्षा से है और अभेद किसी अपेक्षा से । इसलिए विरोध नहीं है, जैसे यज्ञदत्त देवदत्त की अपेक्षा ह्रस्व होते हुए भी विष्णुदत्त की अपेक्षा दीर्घ है। इसलिए ह्रस्वत्व और दीर्घत्व के परस्परविरुद्ध होते हुए भी एक ही यज्ञदत्त में उनके एक साथ रहने में कोई विरोध नहीं है । ऐसा ही भेद और अभेद के विषय में भी समझना चाहिए। विरुद्धधर्मों से ही वस्तुस्वरूप को निष्पत्ति विरुद्धधर्मयुगलों से वस्तुस्वरूप में कोई विरोध उत्पन्न नहीं होता, इसके विपरीत वस्तुस्वरूप निष्पन्न होता है । उदाहरणार्थ, यदि वस्तु में स्वरूप का सत्त्व (सद्भाव) न हो और पररूप का असत्त्व (अभाव) न हो, तो वस्तुओं का पृथक् पृथक् स्वरूप निश्चित नहीं हो सकता। स्वर्ण रजत से इसलिए भिन्न है कि उसमें स्वर्णत्व की सत्ता है और रजतत्व की सत्ता का अभाव है। इसी प्रकार वस्तु में द्रव्यदृष्टि से नित्यत्व और पर्याय (अवस्था) की दृष्टि से अनित्यत्व होने पर ही वस्तु की शाश्वतता तथा उसकी अवस्थाओं में अनेकान्त का तात्पर्य यह नहीं है कि वस्तु का प्रत्येक धर्म विरुद्धधर्म से युक्त है। जिन धर्मों का वस्तु में अत्यन्ताभाव होता है, वे उसमें कभी नहीं रह सकते। जैसे अचेतनत्व का आत्मा में अत्यन्ताभाव है, अतः चेतनत्व के प्रतिपक्षी के रूप में उसका अस्तित्व आत्मा में कदापि संभव नहीं है। ऐसा होने पर वस्तु की मर्यादा नष्ट हो जायेगी। जैनाचार्य वीरसेन का कथन है- “वस्तु में जिन धर्मों का अत्यन्ताभाव नहीं होता उन्हीं का अस्तित्व हम उसमें मानते हैं।' अनेकान्त और स्यादवाद वस्तु के अनेकान्तस्वरूप के कथन की पद्धति स्याद्वाद कहलाती है-" अनेकान्तात्मकार्थकथनं स्याद्वादः । " (लघीयस्त्रय/ स्वोपज्ञभाष्य 3/62 ) । जैसा कि कहा गया है, वस्तु में प्रत्येक धर्म अपेक्षाविशेष से ही होता हैं, सर्वथा नहीं। यह तथ्य वस्तुस्वरूप का कथन Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ करते समय द्योतित होना चाहिए, अन्यथा श्रोता यह समझ | सन्दर्भ लेगा कि जो धर्म पदार्थ में बतलाया जा रहा है वह उसमें | 1. "यदेव तत्तदेवातद् यदेवैकं तदेवानेकं यदेव सत्तदेवासद सर्वथा है, अपेक्षाविशेष से नहीं। इससे उसे यह प्रतीति न हो | यदेव नित्यं तदेवानित्यमित्येकवस्त-वस्तुत्वनिष्पादकसकेगी कि निरूप्यमाण धर्म का प्रतिपक्षी धर्म भी पदार्थ में परस्पर विरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनमनेकान्तः।"समयसार है। अर्थात् उसे वस्तु के अनेकान्तात्मक होने का बोध न हो स्याद्वादाधिकार। सकेगा। वह वस्तु को एकमात्र उसी धर्म से युक्त मान लेगा, 2. घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम्। जिसका उसमें उस समय निरूपण किया जा रहा है। अतः शोकप्रमादमाध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम्॥ भगवान् महावीर ने वस्तु के विषय में कोई भी परामर्श करते आत्तमीमांसा, 591 समय उसके साथ 'स्यात्' शब्द लगाने का निर्देश दिया है। 'स्यात्' एक निपात हैं। उससे यह घोतित होता है कि वस्त | 3. वर्धमानकभङ्गे च रुचकः क्रियते यदा। में निरूप्यमाण धर्म उसमें अपेक्षाविशेष से ही है. सर्वथा तदा पूर्वार्थिनः शोकः प्रीतिश्चाप्युत्तरार्थिनः ॥ नहीं। अन्य अपेक्षा से उसमें प्रतिपक्षी धर्म भी है। इस प्रकार हेमार्थिनस्तु माध्यस्थ्यं तस्माद् वस्तु त्रयात्मकम्। 'स्यात' के प्रयोग से तत्त्व की अनेकान्तात्मकता का बोध नोत्पादस्थितिभङ्गानामभावे स्यान्मतित्रयम्॥ होता है। ‘स्यात्' शब्द लगाकर वस्तुस्वरूप का कथन करने मीमांसाश्लोकवार्तिक। की इस पद्धति को स्याद्वाद कहते हैं। 4. "तत्र धर्मिणो धर्मैः परिणामो, धर्माणां लक्षणैः परिणामो, 'स्यात्' शब्द सापेक्षता का द्योतक लक्षणानामप्यवस्थाभिः परिणाम इति ।---- एतेन 'स्यात्' शब्द अनिश्चितता या संशय का वाचक नहीं भूतेन्द्रियेषु धर्मधर्मिभेदात् त्रिविधः परिणामो वेदितव्यः । • है, अपितु वर्ण्यमान धर्म की सापेक्षता का द्योतक है। जैसे परमार्थतस्त्वेक एव परिणामः।-----न धर्मी त्र्यध्वा, 'स्यात् आत्मा नित्य है' इस कथन में 'स्यात्' शब्द से यह धर्मास्तु त्र्यध्वानः । ते लक्षिता अलक्षिताश्च तान्तामवस्थां द्योतित होता है कि आत्मा कथंचित् (किसी अपेक्षा से) प्राप्तुवन्तोऽन्यत्वेन प्रतिनिर्दिश्यन्ते, अवस्थान्तरतो न अर्थात् द्रव्य की अपेक्षा नित्य है। इस प्रकार 'स्यात्' शब्द न द्रव्यान्तरतः। यथैका रेखा शतस्थाने शतं, दशस्थाने केवल वर्ण्यमान धर्म की सत्ता को निश्चितरूपेण स्वीकार दशैकं चैकस्थाने। यथा चैकत्वेऽपि स्त्री माता चोच्यते करता है, अपितु वह जिस अपेक्षा से वस्तु में है, उसका भी दुहिता च स्वसा चेति।" पातंजल योगभाष्य/विभूतिपाद संकेत कर वर्ण्यमान धर्म के अस्तित्व को और निश्चयात्मक सूत्र 131 बना देता है। इस प्रकार 'स्यात् आत्मा नित्य है' इससे द्रव्य |5. निर्विशेषं न सामान्यं भवेच्छशविषाणवत। की अपेक्षा आत्मा नित्य ही है, यह अर्थ व्यक्त होता है। । सामान्यरहितत्वाच्च विशेषास्तद्वदेव हि॥ यद्यपि वस्तु के अनेकान्तस्वरूप के कथन के लिए मीमांसाश्लोकवार्तिक। 'स्यात्' शब्द का प्रयोग जैनेतर दर्शनों में नहीं किया गया, 6. मीमांसाश्लोकवार्तिक। आकृतिवाद, 101 तथापि 'केनचिद्रूपेण भेदः केनचिद्रूपेणाभेदः'= किसी दृष्टि | 7. "येषां धर्माणां नात्यन्ताभावो यस्मिन्नात्मनि तत्र कदाचित् से भेद है, किसी दृष्टि से अभेद (शास्त्रदीपिका-टीका : सुदर्शनाचार्य), इस रूप में 'स्यात्' शब्द के पर्यायवाची क्वचिदक्रमेण तेषामस्तित्वं प्रतिजानीमहे।" षट्खण्डा-- 'केनचिद्रूपेण' आदि पदों का प्रयोग कर वस्तु की गम/धवला टीका/पुस्तक 1/1/1/11। अनेकान्तात्मकता का कथन किया गया है। परमार्थदृष्टि | 8. "सर्वथात्वनिषेधकोऽनेकान्तद्योतक: कथाञ्चिदर्थः और व्यवहारदृष्टि शब्दों का उल्लेख करते हुए भी तत्त्व स्याच्छब्दो निपातः।" समयसार/स्याद्वादाधिकार। का निरूपण किया गया है। यह स्याद्वाद ही है। इस प्रकार प्रकारान्तर से जैनेतर दर्शनों में भी स्याद्वाद है। वस्तुतः जहाँ A/2, मानसरोवर, शाहपुरा अनेकान्त है वहाँ स्याद्वाद होगा ही क्योंकि वे वाग् और भोपाल (म.प्र.) अर्थ के समान अविभाज्य हैं। अक्टूबर 2006 जिनभाषित 17 Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कुवैत में पर्युषण पर्व : एक अनुभव पं. राकेश जैन साहित्याचार्य श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान साँगानेर की । भगवान् की तस्वीर और अपने आराध्य मुनिराजों की तस्वीर ओर से इस वर्ष मुझे पयुषण पर्व में धर्मप्रभावना करने हेतु | आदि रखकर लोग वहाँ दैनिक दीपक, अगरबत्ती लगाकर कुवैत जाने का अवसर प्राप्त हुआ। पिछले दो वर्षों से कनाडा | पूजा-पाठ करते हैं। वहाँ पर सूरिमन्त्र से मन्त्रित प्रतिमा नहीं जाने के बाद किसी अरब देश में धर्म प्रभावना करने का यह है। फलतः मैंने पलासने में वेष्टित कर शास्त्र जी को विराजमान मेरे लिए पहला मौका था। करने का सुझाव सभी भाइयों को दिया। गृह चैत्यालयों में “अरिहन्त सोशियल ग्रुप' के प्रमुख पदाधिकारी | प्रतिष्ठित प्रतिमा नहीं रखने का कारण पूछा तो उन्होंने दो तीन प्रेसिडेन्ट श्री विमल कुमार जैन का पत्र संस्थान में आया, | कारण बताये कि प्रवास पर दो-तीन महीने के लिए भारत जिस पर विचार कर संस्थान ने मुझे भेजने का निर्णय लिया।| आते हैं तो अभिषेक नहीं हो पाते हैं। दूसरा, अभिषेक के दिनांक 18/08/06 को जयपुर से मुंबई को तथा प्रातः 6:00 | लिए वहाँ कुये या बोरिंग का शुद्ध जल नहीं मिल पाता। बजे मुंबई से कुवैत के लिए रवाना हो गया। एयर पोर्ट पर ही | तीसरा, एयर पोर्ट से प्रतिमा लाने में दिक्कत होती है। नित्य संक्षिप्त में स्वागत की रश्म अदा कर श्री जैन प्रवास हेतु मुझे | देवदर्शन का नियम उनका कैसे पले इस विषय में विद्वानों अपने घर पर ले गये। परन्तु मर्सडीज में बैठकर जब में एयर | से सुझाव अपेक्षित हैं। पोर्ट से घर की ओर जा रहा था तो मन में यह संशय था कि 4. कार्यक्रम स्थल - पर्युषण के अठारह दिनों के अरब देश में मुझे शुद्ध शाकाहारी भोजन, शुद्ध जल आदि | कार्यक्रमों का आयोजन अलग-अलग घरों में हुआ। ये अठारह मिल पायेगा या नहीं। परन्तु यह कहते हुये मुझे प्रसन्नता हो | घर ऐसे चुने गये जिनके आसपास कोई कुवैती, पाकिस्तानी रही है कि वहाँ अपेक्षाकृत ज्यादा शुद्ध एवं पवित्र ही भोजन | या अन्य कोई कट्टरपंथी रहता न हो। आसपास कोई मस्जिद था, वैसे वहाँ का राष्ट्रीय भोज तो मांस ही है, फिर भी | न हो। अन्य धर्मावलम्बियों का इस तरह से एक जगह शाकाहारी लोग भी अपना जीवन आनन्द से व्यतीत कर रहे | एकत्रित होना कानूनन अपराध है। अतः प्रायः सावधानी हेतु 'Happy Birth Day' का एक कार्डशीट बोर्ड बनाकर तैयार 1. 18 दिन का पर्युषण पर्व - कुवैत में अरिहन्त | रखा जाता था। सोशियल ग्रुप एक ऐसा जैन संगठन है जिसमें दिगम्बर और 5. पर्युषण के दैनिक कार्यक्रम - वहाँ प्रातः सामूहिक श्वेताम्बर दोनों ही सम्प्रदायों के लोग परस्पर मतभेदों को | पूजा एवं सामान्य रूप से तत्त्वचर्चा होती थी, जिसमें माताभूलकर भगवान जिनेन्द्र के अनुयायी होकर संगठित रहते | बहिनों की संख्या अधिक होती थी। वहाँ के लोग धर्म की हैं। इस कारण से वहाँ की कमेटी ने श्वेताम्बर के आठ दिन, | बात सुनने के लिए सदैव लालायित एवं तत्पर रहते हैं। और एवं दिगम्बर के 10 दिन, कुल 18 दिन का पर्युषण पर्व | जो-जो भी बताया जाता था उसको ध्यान से सुनते थे, प्रश्न मनाने का दृढ निश्चय किया। करते थे और जीवन में उतारने का प्रयास भी करते थे। ____ 2. जिनचैत्य एवं चैत्यालय का अभाव - कुवैत एक | मध्याह्न में बच्चों को धार्मिक संस्कार हेतु एक धार्मिक कक्षा पूर्णतः मुस्लिम देश है। इस्लाम धर्म, वहाँ का राष्ट्रीय धर्म है। भी चलायी, जिसमें बालकों को प्रारम्भिक, नैतिक एवं धार्मिक अतः इस धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार का | शिक्षा प्रदान की गयी। रात्रि में सामूहिक रूप से दोनों सम्प्रदायों धर्मायतन होना कानूनी अपराध है। किसी उदारहृदयी शेख | के अनुकूल भक्तामर स्तोत्र का उच्चारण एवं अर्थ समझाया के काल का एक गिरिजाघर बना हुआ है। जो अभी तक | जाता था पश्चात् एक घंटे का सामान्य जीवनोपयोगी धार्मिक चला आ रहा है। वैसे वहाँ कोई हिन्दुओं एवं जैनियों का | प्रवचन होते थे, जिसमें प्रतिदिन श्रोतागण आते थे। तत्पश्चात् मन्दिर नहीं है। जिनस्तवन, आध्यात्मिक-भजन एवं आरती का कार्यक्रम । 3. प्रायः सभी घरों में चैत्यालय - वहाँ के जैनी भाई | होता था। आरती में एक आरती दिगम्बरसम्प्रदाय की दूसरी धर्म की आराधना बाहर तो नहीं कर सकते, परन्तु सभी जैन | आरती श्वेताम्बरसम्प्रदाय की होती थी। श्रावकों के घरों में गृह-चैत्यालयों का निर्माण किया हुआ है। 6. संवत्सरी प्रतिक्रमण - भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी को 18 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्वेताम्बरों का एक सामूहिक रूप से संवत्सरी प्रतिक्रमण | पर एवं कम्पनियों में काम करने वाले जैन युवा साथियों की होता है। यह कार्यक्रम वहाँ पहले भी होता था, इस वर्ष भी संख्या लगभग चार हजार है, जो प्रायः राजस्थान के उदयपुर, बड़े उत्साह के साथ किया गया। इसमें वे प्रतिक्रमण की | बाँसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों के हैं। उदयपुर जिले के 200 टेपरिकार्ड चालू कर देते हैं, फिर निर्देशानुसार व्यवस्थित ले पारसोला ग्राम के तो प्रत्येक घर से सभी प्रतिक्रमण करते हैं। तीन या चार व्यक्ति कुवैत में ही काम करते हैं। 7. श्रमण संस्कृति पाठशाला की स्थापना -- बड़े हर्ष वहाँ रहने वाले प्रत्येक जैनीभाई भारत आकर मन्दिर की बात है कि 10 दिन पाठशाला से प्रभावित होकर दो युवा | जायें या न जायें, निश्चित नहीं, पर वहाँ कमरे पर तो सुबह साथियों ने इस पावन परम्परा को प्रति शुक्रवार (अवकाश | भगवान के सामने दीपक-अगरबत्ती जलाकर दर्शन कर का दिन) जारी रखने का संकल्प लिया है। श्री सोहनलाल | यथासम्भव स्तोत्र, माला करके ही काम पर जाते हैं व रात्रि में जी कलावत (पारसोल वाले) एवं श्री वैभव शाह (पूना) ने | भी एक आरती तो प्रायः करते ही हैं। इन लोगों का रहना प्रारम्भिक कुछ धार्मिक ज्ञान होने के कारण इस जिम्मेदारी समूह में ही होता है। ये 10-15-20 लोग एक साथ दो तीन के वहन का संकल्प किया है। कमरों में ही रहते हैं। एक खाना बनाने वाला व्यक्ति रख 8. कुवैत का भौगोलिक वातावरण - यह एक 30 | लेते हैं, जो शुद्ध भोजन बना लेता है और कमरों की सफाई लाख की जनसंख्या वाला छोटा सा देश है। जिसमें लगभग | कर लेता है। ये लोग सुबह 7 या 8:00 बजे काम पर निकल 5 लाख के आसपास तो भारतीय ही हैं, जो वहाँ अर्थोपार्जन | जाते हैं। दोपहर 2 बजे आते हैं, भोजन कर थोड़ा विश्राम की दृष्टि से गये हुये हैं। यह पूरा प्रदेश रेगिस्तान प्रदेश है, | करके पुनः 4 बजे काम पर चले जाते हैं तथा रात्रि में 9 या यहाँ मुख्यरूप से दो ऋतुओं का प्रभाव अधिक है, ग्रीष्म | 10 बजे वापस आकर भोजन करके थोड़ा भ्रमण करके ऋतु व शीत ऋतु। बरसात में वहाँ पर एक-दो महीने के शयन करते हैं। 1 या 2 वर्ष में भारत आ जाते हैं। वहाँ लोगों लिए कभी-कभी बारिश हो जाती है। ए. सी. के बिना वहाँ को मेहनत के अनुकूल पारिश्रमिक भी अच्छा मिल जाता लोग रह नहीं सकते। वहाँ लोगों की कारें, आफिस एवं घर | है। अतः वे घर से दूर रहकर भी वहाँ अर्थोपार्जन करना सभी वातानुकलित ही होते हैं। मक्खी या मच्छर तो हँढने | ठीक समझते हैं। पर भी नहीं मिलते। वहाँ बीमारियाँ भी नहीं होतीं। पूरे देश 11. कुवैत में अन्य देश वालों को नागरिकता नहीं - में सुन्दर-सुन्दर इमारतें हैं। बड़ी साफ व सुन्दर सड़कें एवं | कुवैत में व्यक्ति कितने ही वर्षों से वहाँ रह रहा हो, परन्तु पार्क हैं। कहीं भी नाम के लिये भी गंदगी नहीं है। अत्यन्त | | उसको वहाँ की नागरिकता नहीं मिलती है, जिसके कारण साफ सुथरा देश है। वह वहाँ जमीन दुकान घर आदि नहीं खरीद सकता है। वहाँ 9. देश का आर्थिक स्रोत - कुवैत में न तो किसी | फ्लैट, दूकान आदि केवल किराये पर उपलब्ध हैं। अनाज की खेती होती है न ही कपड़े आदि बनाने की पिछले वर्षों में कुवैत में कभी भी कोई जैन विद्वान् फैक्ट्रियाँ हैं। वहाँ सिर्फ पेट्रोल एवं डीजल के कुएँ हैं, | प्रवचन हेतु नहीं गया था। इस वर्ष वहाँ एक नवीन उत्साह जिनकी खफत पूरी दुनिया में होती है। वहाँ किसी प्रकार का | एवं जोश के साथ पर्युषण पर्व मनाया गया। एक नई चेतना आयकर या बिक्रीकर सरकार नहीं लगाती है तथा पानी | जागृत हुई। सभी भाइयों ने निर्णय किया है कि अगले वर्ष बिजली एवं शिक्षा की व्यवस्था भी सामान्य चार्ज पर उपलब्ध भी इसी प्रकार भारत से जैन विद्वान् बुलाकर और अधिक कराती है। अच्छे कार्यक्रमों के द्वारा पर्व मनाया जायेगा। 10. जैनों की संस्था - अरिहन्त सोशियल ग्रुप 60 संस्कृत व्याख्याता परिवारों का एक छोटा सा ग्रुप है, जिसमें डाक्टर्स, इन्जीनियर्स, श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट्स आदि हैं । इसके अतिरिक्त वहाँ दूकानों वीरोदय नगर, सांगानेर, जयपुर (राज.) दुष्ट पुरुष शिष्ट पर, विजयी मनुष्य विषय-विरक्त पर, चोर जागनेवाले पर, दुराचारी धर्मात्मा पर और कायर वीर पर स्वभाव से ही क्रोध किया करते हैं। वीरदेशना -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 19 Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्रन्थ समीक्षा एक महान प्रयोजन की सिद्धि : स्वतंत्रता संग्राम में जैन देवेन्द्र कुमार जैन सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ग्रन्थ का नाम : स्वतंत्रता संग्राम में जैन लिखी गईं, तो स्वाध्यायी जैन समाज में उनके सेनानियों पर (प्रथम खण्ड) संस्करण : द्वितीय वर्ष 2006 साहित्य न हो, यह संभव नहीं। इसलिए डॉ. कपूरचंद तथा लेखक : डॉ. कपूरचंद जैन एवं डॉ. श्रीमती ज्योति जैन । डॉ. ज्योति जी साधुवाद के अधिकारी हैं और प्रकाशक प्रकाशक : सर्वोदय फाउण्डेशन, खतौली (उ. प्र.) सर्वोदय फाउण्डेशन प्रशंसा के पात्र हैं। प्रथम खण्ड तो मूल्य : रु.300 आगाज है एक महान प्रयोजन की सिद्धि का। यह मंजिल जब जज्बा देशप्रेम का हो और उददेश्य देश को | नहीं, पड़ाव है, ताकि उन स्वातंत्र्य शहीदों और दिवंगतों का आजादी दिलाना तो आजादी के दीवानों में ऊँच-नीच, छोटे- | स्मरण अगले खण्ड में किया जा सके, जो किसी कारणवश बड़े, गरीब-अमीर, मालिक-मजदूर जैसे भेदभाव नहीं होते।। अनदेखे, अनचीन्हे रह गये। मुझे विश्वास है कि प्रथम तभी एक शक्तिपुंज बनता है, जिसकी किरणें यत्र तत्र सर्वत्र खण्ड के वाचन से बहुतों को यह लगेगा कि उनके निकट बिखर जाती हैं, दीप से दीप जलते हैं और विप्लव कहें या संबंधी या उनके क्षेत्र के अमुक स्वतंत्रतासंग्रामी का उल्लेख विद्रोह, शांतिपूर्ण असहयोग कहें या सविनय अवज्ञा-आंदोलन, न होने से ग्रंथ अधूरा है। तब स्वाभाविक रूप से उनके द्वारा ऐसे समाजशिरोमणियों के नाम विवरण और स्वतंत्रता संग्राम संज्ञा कुछ भी दें, पर असर वही होता है कि विदेशी शासक के पैरों तले की जमीन खिसकने ही लगती है। में उनके योगदान का ब्यौरा लेखक / प्रकाशक को उपलब्ध . कराया जायेगा। जैन अपने अहिंसक आचरण और शांत जीवनशैली के लिये जाने जाते हैं, परन्तु यह कायरों की कौम नहीं, वीरों मुझे अपने गुरुदेव स्व. प्रो. भगवानदास माहौर की ये की विरासत है। जब-जब धर्म पर विधर्मियों ने घेरा डाला. पंक्तियाँ बरबस स्मरण हो आती हैं - जैन वीरों ने धर्म रक्षार्थ बुद्धि और विवेक के साथ शांत संघर्ष मेरे शोणित की लाली से, कुछ तो लाल धरा होगी, किया और अवसर आने पर प्राणों की आहुति देने में नहीं मेरे वर्तन से परिवर्तित, कुछ तो परंपरा होगी। हिचकिचाये। इसी तरह राष्ट्र पर, देश पर आये संकट का क्रांतिकारी स्व. माहौर झांसी में चंद्रशेखर आजाद सामना भी बड़ी निर्भीकता, सूझबूझ, साहस और संगठन (छद्मनाम शिवदत्त ब्रह्मचारी) के सहचर रहे और उग्रवाद सूत्र बना कर किया। के मार्ग से देश को स्वतंत्रता दिलाने में सफलता पाई। यह 'स्वतंत्रता संग्राम में जैन' नामक ग्रंथ उन्हीं स्वातंत्र्य | देश केवल अहिंसक आंदोलनों से स्वाधीन नहीं हआ। राजनीति वीरों का पण्य स्मरण है। नई पीढी को अपने पर्वजों पर गर्व में साम-दाम, दण्ड और भेद भी नीति होती है. अंग्रेजी हो और दिवंगतों को स्वर्ग में यह संतोष कि उन्होंने उत्तराधिकार | साम्राज्य, जिसमें सूर्य कभी अस्त नहीं होता था उस की चूलें में देशप्रेम, जनसेवा और सत्यनिष्ठा योग्य हाथों में सौंपी है, | सत्याग्रह से हिली तो क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासकों की इस उद्देश्य से लिखा गया यह संग्रह संग्रहणीय है। नींद उड़ाई। अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दरअसल होता यह है कि राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय आजाद हिन्द सेना संगठित कर ब्रिटिश शासन को युद्धक्षेत्र ख्यातिप्राप्त महापुरुषों को जब समय भुलाने लगता है, तो में भी ललकारा था। इसलिए कवि दुष्यंत के शब्दों में - जातीय समाज उन्हें गर्व से स्मरण करते हैं। यह समाजों का 'जो जहाँ पर है वतन के काम पर है' को चरितार्थ किया। अधिकार है और कर्तव्य भी। इसलिये जब इतर पत्रकारिता ने कलम से आजादी की लड़ाई लड़ी। कवि, लेखक साहित्यकार नाट्यकर्मियों ने अपने-अपने मोर्चे सम्हाले जातियों/समाजों के स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों पर पुस्तकें 20 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ और अध्यात्म पुरूष? वे सीधे और प्रत्यक्ष स्वतंत्रता संग्राम सृजन कभी चुकता नहीं, के सेनानी नहीं बने, परन्तु उन्होंने अपने प्रेरणास्पद संबोधनों स्वतंत्रता का संघर्ष, कभी रुकता नहीं, और उपदेशों से साहस और संगठन शक्ति के लिये प्राणवाय शहीदों का स्मरण हमारी प्रेरणा है, प्रदान की। देशप्रेमी का सिर, कभी झुकता नहीं। जैन समाज के स्वतंत्रता सेनानियों की खोज का कार्य स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत का भाग्य गढ़ा, सदियों कठिन था। प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करना और भी कठिन, | से पराधीन देश को आजादी दिलाई, राजतंत्र, सामंतवाद से क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को केन्द्र सरकार तथा | मुक्ति दिलाकर लोकतंत्र दिया, जनता को, जनता के लिये, राज्य सरकारों से पेंशन, यात्रा में कन्सेशन तथा आरक्षण | जनता द्वारा चलाई जाने वाली राज्य व्यवस्था दी। स्वतंत्रताआदि की सुविधायें जब से मिलने लगीं, फर्जी सेनानियों की | संग्राम सेनानियों ने जहाँ सादगी और त्याग की मिसाल कायम फसल बहुतायत में उगी, फूली-फली। यदाकदा उनके । की, वहीं उसकी अनुवर्ती पीढ़ी सत्ता-सुख में मदान्ध होकर कलंकित करने वाले काण्ड भी प्रकाश में आते रहे हैं, परन्तु | उन्हें ही विस्मृत कर रही है। रघुवीर सहाय जी की यह अपमिश्रण का विकार समाज में कहाँ नहीं है ? इससे | पंक्तियाँ हैं - हतोत्साहित हुये बिना अनवरत यायावरी करके लेखकों ने राष्ट्रगीत में भला कौन वह जो सच्चे मोती खोज निकाले, वे उस ग्रंथमाला में सुशोभित भारत-भाग्य विधाता है हैं। भारत एक विशाल देश है। जैन संख्या में अल्प होते हुये फटा सुथन्ना पहिने जिसका भी देश में सम्मानित कौम के रूप में जाने जाते हैं। अतः गुन हरचरना गाता है। आगामी दो खण्डों में वे स्वतंत्रता- संग्रामी स्थान पा सकेंगे. मखमल, टमटम, बल्लम, तुरही जो लेखक / प्रकाशक को ज्ञात नहीं हो सके हैं। इस यज्ञ में पगड़ी-छत्र-चँवर के साथ आहुति देने का हम सभी का कर्तव्य है कि जिन परिचित तोप छुड़ा कर ढोल बजाकर सज्जन का उल्लेख नहीं हुआ है, उनके नाम, विवरण लेखक/ जय-जय कौन कराता है। प्रकाशक को उपलब्ध करावें। 'मन' के. एच. 50, अयोध्यानगर बायपास मार्ग, भोपाल (म.प्र.) सह मृत्युव्रजति सह मृत्युनिषीदति। गत्वा सुदूरमध्वानं सह मृत्युर्निवर्तते ।। हम चलते हैं, तो मृत्यु भी हमारे साथ चलने लगती है। हम बैठ जाते हैं, तो मृत्यु भी हमारे साथ बैठ जाती है। हम कोसों दूर की यात्रा पर जाते हैं, तो मृत्यु भी हमारे साथ उतनी दूर तक जाती है और जब हम वापस लौटते हैं, तो मृत्यु भी हमारे साथ वापस लौट आती है। मृत्यु हमारे साथ सदा मौजूद रहती है। -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 21 Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा - समाधान पं. रतनलाल बैनाड़ा प्रश्नकर्ता - आनन्द सिंघई, जबलपुर गिहत्थाणं दिक्खाभिमुहाणं वा जंकरिदे तं मणुण्ण वेज्जावच्चं जिज्ञासा - कुभोगभूमि में कौन सा संस्थान होता है ? | णाम। समाधान - श्री आचारसार अध्याय-11 में इस सम्बन्ध अर्थ - आचार्यों के द्वारा सम्मत और दीक्षाभिमुख में इस प्रकार कहा है गृहस्थ की वैयावृत्य मनोज्ञ कहलाती है। हंडं त (पं)नारकैकाक्षाद्यसंजयन्तेषु सामरे। 4. श्री चामुण्डरायदेव रचित चारित्रसार - अभिरूपो भोगभूजे भवेदाद्यं सर्वाण्यन्येषु देहिषु॥ 93॥ मनोज्ञः आचार्याणां सम्मतो वा दीक्षाभिमुखो वा मनोज्ञः, अयं वा विद्वान् वाग्मी महाकुलीन इति यो लोकस्य सम्मत: स मनोज्ञस्तस्य भावार्थ - कुभोगभूमियों के मनुष्य, नारक, एकेन्द्रिय, ग्रहणं प्रवचनस्य लोके गौरवोत्पादनहेतुत्वादसंयत सम्यग्दृष्टिा दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रियों में | संस्कारोपेतरूपत्वान्मनोज्ञः। एक हुंडक संस्थान होता है। देव और भोगभूमि जीवों में | अर्थ - जो सुंदर हों, उन्हें मनोज्ञ कहते हैं अथवा जो समचतुरस्र संस्थान है। शेष जीवों में छहों संस्थान होते हैं।। विद्वान् हों, वक्ता हों, महा कुलीन हों, इस प्रकार लोक में जो 93 ॥ (हिन्दी टीका-पू. आर्यिका सुपार्श्वमति माताजी) मान्य हों उन्हें मनोज्ञ कहते हैं। मनोज्ञ ग्रहण करने का यह भी उपर्युक्त प्रमाण के अनुसार कुभोगभूमियाँ-मनुष्यों अभिप्राय है कि संसार में जो अपने मत का गौरव उत्पन्न के हुंडक संस्थान मानना चाहिए। इसके अतिरिक्त कोई करने का कारण हो, ऐसा असंयतसम्यग्दृष्टि भी मनोज्ञ और प्रमाण पाठकों को प्राप्त हो, तो अवश्य सूचित करें। कहलाता है अथवा जो संवेगादिक संस्कार सहित हैं उन्हें भी जिज्ञासा- क्या मनोज्ञ साधुके अन्तर्गत मुनि ही आते | मनोज्ञ कहते हैं। हैं और वे ही वैयावृत्ति के योग्य हैं या गृहस्थ भी आते हैं ? 5. श्री वीरनन्दी सिद्धान्तचक्रवर्ती कृत आचारसार -- समाधान - तत्वार्थसूत्र अध्याय-9 के आचार्यो (अधिकार 6/89-90)पाध्यायतपस्विशैक्ष्यग्लानगणकुलसंघसाधुमनोज्ञानाम्॥ चिरप्रव्रजितः साधुर्यतिः शेषो हि संयमी। 24॥ में दिये गये अंतिम भेद मनोज्ञ की परिभाषा विभिन्न दीक्षोन्मुखो मनोज्ञाख्योऽसंयतो वा सुदर्शनः ॥89॥ ग्रन्थों में निम्न प्रकार पाई जाती है विद्याजात्यादिविख्यातो मिथ्यादृग्वास्य संग्रहः। 1. सर्वार्थसिद्धि - मनोज्ञो लोकसम्मतः। जिन प्रवचनस्यायं लोके गौरवकारकः ॥१०॥ अर्थ - लोकसम्मत साध को मनोज्ञ कहते हैं। अर्थ-दीक्षाभिमुख श्रावक को मनोज्ञ कहते हैं अथवा 2. तत्त्वार्थराजवार्तिक-अभिरूपो मनोज्ञइत्यभिधी- | लोक में जो विद्वान् हैं, वाग्मी हैं, महाकुलीन आदि जाति से यते॥12॥ प्रसिद्ध हैं, जिनका संघ में रहना प्रवचन-गौरव का कारण है, अथवा विद्वान् वाग्मी महाकुलीन इति लोकस्य सम्मतः । उनको मनोज्ञ कहते हैं। अथवा जो संस्कार सहित ससंस्कृत स मनोज्ञः, तस्य ग्रहणं प्रवचनस्य लोके गौरवोत्पादन असंयत सम्यग्दृष्टि हैं, वे भी मनोज्ञ हैं। इस ग्रन्थ में विद्या, हेतुत्वात्॥13॥ जाति आदि से विख्यात जिनधर्म की प्रभावना करनेवाले भद्र अथवा, असंयतसम्यग्दृष्टिमनोज्ञ इति गृह्यते संस्कारो परिणामी मिथ्यादृष्टि को भी मनोज्ञ में ग्रहण किया है। (टीका पेतरूपत्वात् ॥14॥ प. आर्यिका सुपार्श्वमति जी)। अर्थ - अभिरूप (सुंदर) मनोहर को मनोज्ञ कहते उपर्युक्त प्रमाणों के अनुसार लोकप्रसिद्ध सुन्दर साधु हैं ॥ 12 ॥ अथवा जो विद्वान् मुनि वाक्पटुता, महाकुलीनता | | को तो मनोज्ञ कहते ही हैं, दीक्षाभिमुख अथवा लोकप्रसिद्ध आदि गुणों के कारण लोक में प्रसिद्ध हैं, वे मनोज्ञ हैं। ऐसे | असंयत सम्यग्दृष्टि अथवा जिनधर्म-प्रभावक भद्र परिणामी लोगों का संघ में रहना, लोक में प्रवचन-गौरव का कारण मिथ्यादष्टि को भी मनोज्ञ कहा है, इनकी आपत्तियों को दर होता है ।। 13 ।। अथवा संस्कारों में सुसंस्कृत असंयत सम्यग्दृष्टि करना वैयावृत्ति है। को भी मनोज्ञ कहते हैं (क्योंकि उससे प्रवचन की प्रभावना प्रश्नकर्ता - श्री शांतिलाल जी बैनाड़ा, आगरा। होती है)॥14॥ जिज्ञासा - कुछ साधर्मी भाई वेदी में चाँदी के मेरु 3. श्री धवला पु.-13, पृष्ठ-63 - आइरियेहिं सम्मदाणं | आदि विराजमान कर देते हैं, क्या इनका वेदी में विराजमान 22 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ करना उचित है? क्या ये चाँदी के मेरु पूजनीय हैं? समाधान - अष्टाह्निका पर्व के दिनों में, बहुत से जिनालयों में पंचमेरु के प्रतीक रूप से, चाँदी के पाँच मेरु आदि विराजमान करने की परम्परा है। ये अष्टाह्निका पर्व के बाद हटा दिये जाते हैं। अष्टाह्निका पर्व में सभी श्रावक प्रतिदिन पंचमेरु एवं नन्दीश्वर द्वीप की पूजा करते हैं। अतः पंचमेरु के प्रतीक एवं स्मरण के लिए चाँदी के पाँच मेरु विराजमान किये जाते हैं। ये पंचमेरु प्रतिष्ठित नहीं होते हैं, इनको सूरिमंत्र देने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है । अतः इनको वेदी में भगवान् के साथ विराजमान करना उचित नहीं है । इनको बेदी से अलग नीचे विराजमान किया जाना चाहिए। ये तो प्रतीक मात्र हैं। ये पूजनीय भी नहीं हैं। बुन्देलखण्ड के बहुत से जिनालयों में सैकड़ों वर्षों से अष्टधातु के बड़े-बड़े मेरुओं को वेदी में विराजमान करने की परम्परा है। इनमें छोटे-छोटे जिनबिम्ब भी विराजमान रहते हैं, और इनका अभिषेक आदि भी होता है। ऐसे भी सभी मेरु प्रतिष्ठित होने के कारण वेदी में विराजमान करने के योग्य भी हैं और पूजनीय भी है। इनकी वंदना - पूजा अवश्य करनी चाहिए। जिज्ञासा - क्या दिगम्बर मुनि या आर्यिका, फ्लश की लैट्रिन में शौच के लिए जा सकते हैं ? क्या ऐसा करने पर अहिंसाव्रत का पालन हो जाता है? समाधान- वर्तमान में कुछ साधु या आर्यिकाओं के द्वारा प्रतिष्ठापना समिति के पालन को बिल्कुल अनावश्यक समझ लिया गया है। ये साधु या आर्यिकाएँ अपने ठहरने के स्थान पर ही बनी हुई सुविधा युक्त फ्लश की या बिना फ्लश की लैट्रिनों में लघुशंका या शौच के लिए निःसंकोच जाने लगे हैं, जबकि आगमदृष्टि इसका बिल्कुल भी समर्थन नहीं करती। कुछ आगम प्रमाण इस प्रकार हैं - 1. श्री मूलाचार में इस प्रकार कहा है वणदाहकिसिमसिकदे थंडिल्लेणुप्परोध वित्थिण्णे । अवगदजंतु विवित्ते उच्चारादी विसज्जेज्जो ॥ 321॥ अर्थ- दावानल से, हल से या अग्नि आदि से दग्ध हुए, बंजरस्थान, विरोधरहित, विस्तीर्ण, जन्तुरहित और निर्जन स्थान में आदि का विसर्जन करें ॥ 321 ॥ मलमूत्र आचारवृत्ति - दावानल को वनदाह कहते हैं। हल से अनेक बार भूमि का विदारण होना कृषि है । श्मशान प्रदेश, अंगारों के प्रदेश और अग्नि आदि से जले प्रदेश को मषि कहते हैं । कृत शब्द का प्रत्येक के साथ सम्बन्ध करना चाहिए। अर्थात् जहाँ दावानल (अग्नि) लग चुकी है ऐसा प्रदेश, जहाँ हल चल चुका है ऐसा प्रदेश, तथा श्मशान भूमि, - अंगारों से अग्नि आदि से जला हुआ प्रदेश, स्थण्डिलीकृत - ऊसर प्रदेश, जिसे बंजर भी कहते हैं अर्थात् जहाँ पर घास नहीं उगती है ऐसी कड़ी भूमि का प्रदेश, जहाँ पर लोगों का विरोध नहीं है ऐसा प्रदेश, विशाल खुला हुआ बड़ा स्थान, जहाँ पर दो इन्द्रिय आदि (चींवटी आदि) जन्तु नहीं है, ऐसा निर्जतुंक स्थान और विविक्त अर्थात् विष्ठा तथा कूड़ा कचरा आदि रहित स्थान या जनरहित स्थान, इन उपर्युक्त प्रकार के स्थानों में मुनि, मल मूत्रादि का त्याग करें अर्थात् उचित भूमि प्रदेश में शौचादि के लिए जावें ऐसा सम्बन्ध कर लेना चाहिए। 2. श्री मूलाचारप्रदीप में इस प्रकार कहा है एकान्ते निर्जने दूरे संवृते दृष्ट्यगोचरे । विलादिरहितेऽचित्तऽविरोधे जन्तुवर्जिते ॥ 588 ॥ प्रदेशे क्रियते यत्स्वोच्चार प्रस्त्रवणादिकम् । दृष्टिपूर्वं प्रतिष्ठिापनिका सा समितिर्मता ॥ 589 ॥ अर्थ मुनि लोग जो मल मूत्र करते हैं, वह ऐसे स्थान में करते हैं, जो एकान्त हो, निर्जन हो, दूर हो, ढँका हो अर्थात् आड़ में हो, दृष्टि के अगोचर हो, जिसमें बिल आदि न हों, जो अचित्त हो, विरोधरहित हो अर्थात् जहाँ किसी की रोक टोक न हो और जिसमें जीव जन्तु न हों, ऐसे स्थान में देख - शोध कर वे मुनिराज मल-मूत्रादिक करते हैं, इसको प्रतिष्ठापना समिति कहते हैं । 588-589 ॥ 3. श्री आचारसार में इस प्रकार कहा है दूरगूढविशालाविरुद्धशुद्धमहीतले । उत्सर्गसमितिर्विण्मूत्रादीनां स्याद्विसर्जनम् ॥ 26 ॥ अर्थ- दूर (ग्राम के बाहर का स्थान), गूढ़ (छिपा हुआ स्थान), विशाल (बिल तथा छेद रहित चौड़ा स्थान ), अविरोधी (लौकिकजनों के विरोध से रहित स्थान ), ऐसे जीवादि से रहित शुद्ध स्थान में मल-मूत्र आदि करना प्रतिष्ठापना ( उत्सर्ग) समिति है। उपर्युक्त प्रमाणों के अनुसार, अपने ठहरने के स्थान पर ही निकट में जो लैट्रिन आदि बना दी जाती है, उसका साधु या आर्यिका के द्वारा प्रयोग करना, किसी भी प्रकार आगमसम्मत नहीं है। ऐसा करने से अहिंसा महाव्रत, प्रतिष्ठापना समिति आदि मूलगुणों का नाश होता है। जिसका फल श्री मूलाचारप्रदीप में इस प्रकार कहा है - - ww आसां ये शिथिला: प्रपालनविधौ निद्यं प्रमादं सदा । कुर्वत्यत्र दयादयो व्रतगुणास्तेषां प्रणश्यन्ति भोः ॥ तन्नाशाच्च महाधमात्महतकं तत्पाकतो दुर्गतौ । घोरं स्यादसुखं ह्ममुत्र परमं चांतातिगासंसृतिः ॥ -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 23 Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अर्थ - जो मुनि इन पाँचों समितियों के पालन करने में शिथिलता करते हैं, तथा निंदनीय प्रमाद करते हैं, उनके दया आदि व्रत और गुण सब नष्ट हो जाते हैं। व्रतों के नष्ट होने से आत्मा का घात करनेवाला महापाप उत्पन्न होता है, उस महापाप के उदय से परलोक में दुर्गतियाँ प्राप्त होती हैं, उन दुर्गतियों में महा घोर दुख उत्पन्न होते हैं और अनन्त संसार में परिभ्रमण करना पड़ता 1 अतः उपर्युक्त प्रमाणों को ध्यान में रखते हुए सभी श्रावकों का यह परम कर्तव्य हो जाता है कि वे आये हुए मुनिराज को, ठहरने के स्थान से दूर एवं उपर्युक्त आगमानुसार जीव-जन्तु रहित स्थानों पर ही शौचादि निवृत्ति की व्यवस्था एवं निवेदन करें तथा मुनि या आर्यिका के ठहरने के स्थान के निकट उनके लिए लैट्रिन आदि कदापि निर्माण न करावें । मुनिराज के चातुर्मास की व्यवस्था करनेवाली समिति के सभी सदस्यगण यदि मुनिचर्या की थोड़ी जानकारी कर लेवें, तो साधुशिथिलाचार पर तुरंत रोक लग सकती है तथा साधु भी, उपर्युक्त श्री मूलाचार के प्रमाणानुसार, महान् पापों से बच सकता है। साधु को उन शहरों या स्थानों पर जाना उचित नहीं है, जहाँ उसके मूलगुणों का ही नाश हो जाये । जिज्ञासा- कृपया श्रीदत्त मुनि का जीवनचरित्र बताएँ । समाधान - राजा जितशत्रु के श्रीदत्त नामक पुत्र का विवाह राजकुमारी अंशमति से हुआ था । अंशमति ने एक तोता पाल रखा था। चौपड़ आदि खेलते हुए जब राजा विजयी होता था, तब तो वह तोता एक रेखा खींचता था और जब रानी विजयी होती थी, तब वह तोता चालाकी से दो रेखायें खींच देता था। उसकी यह शरारत राजपुत्र ने दो-चार बार तो सहन कर ली, परन्तु एक दिन उसे गुस्सा आ गया और उसने तोते की गर्दन मरोड़ दी। तोता मरकर व्यंतर देव हुआ। एक बार राजपुत्र श्रीदत्त, आकाश में बादलों को छिन्नभिन्न होते हुए देखकर विरक्त हो गये और जिनदीक्षा धारण कर ली। अनेक प्रकार के कठोर तपश्चरण एवं विहार करते हुए एक बार वे ध्यान में स्थित थे । अत्यंत ठंड का मौसम था। उसी समय उस पूर्वभव के तोते से व्यंतर बने हुए देव ने उनको देखा । पूर्व वैर के कारण उसने उनके ऊपर पानी बरसाया, ओले गिराये और खूब ठंडी हवा चलाई। उन श्रीदत्त मुनिराज ने उस महान् उपसर्ग को समता परिणाम से सहन किया और समाधिमरणपूर्वक ध्यान में निश्चल होते हुए केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पधारे। 1/205, आगरा श्रेष्ठ-साधना मुक्तगिरि का चातुर्मास पूरा हुआ। संघ-सहित आचार्य महाराज ने रामटेक की ओर विहार किया। रास्ते में एक दिन अम्बाड़ा गाँव पहुँचते-पहुँचते अँधेरा घिर गया। सारा संघ गाँव के समीप एक खेत में ठहर गया। खेत में ज्वार के डंढलों से बना एक स्थान था। रात्रि विश्राम यहीं करेंगे, ऐसा सोचकर सभी ने प्रतिक्रमण किया और सामायिक में बैठ गए। दिसम्बर के दिन थे। ठंड बढ़ने लगी। रात नौ बजे जब श्रावकों को मालूम पड़ा कि आचार्य महाराज खेत में ठहरे हैं तो बेचारे सभी वहाँ खेजते खोजते पहुँचे। जो बनी सो सेवा की, इंतजाम किया। स्थान एकदम खुला था, नीचे बिछे डंठल नुकीले कठोर थे। इस सबके बावजूद भी आचार्य महाराज अपने आसन पर अडिग रहे। किसी भी तरह से प्रतिकार के लिए उत्सुकता प्रकट नहीं की। लगभग आधी रात गुजर गई। फिर दिन भर के थके शरीर को विश्राम देने के लिए वे एक करवट से लेट गए। उनके लेटने के बाद ही सारा संघ विश्राम करेगा, ऐसा नियम हम सभी संघस्थ साधुओं ने स्वतः बना लिया था, सो उनके उपरान्त हम सभी लेट गए । 24 अक्टूबर 2006 जिनभाषित ठंड बढ़ती देखकर कुछ श्रावकों ने समीप में रखे सूखे ज्वार के डंठल सभी के ऊपर डाल दिए। सब चुपचाप देखते रहे, किसी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। लोग यह सोचकर निश्चिन्त हो गए कि अब ठंड कम लगेगी, पर ठंड तो उतनी ही रही, डंठल का बोझ और चुभन अवश्य बढ़ गई। उपसर्ग व परीषह के बीच शान्त-भाव से आत्म-ध्यान में लीन रहना ही सच्ची साधुता है, सो सभी साधुजन चुपचाप सब सहते रहे। सुबह हुई। लोग आए। डंठल अलग किए। हमारे मन में आया कि श्रावकों को उनकी इस अज्ञानता से अवगत कराना चाहिए, पर आचार्य महाराज की स्नेहिल व निर्विकार मुस्कराहट देखकर हमने कुछ नहीं कहा। मार्ग में आगे कुछ दूर विहार करने के बाद आचार्य महाराज बोले कि "देखो, कल सारी रात कर्म-निर्जरा करने का कैसा शुभ अवसर मिला, ऐसे अवसर का लाभ उठाना चाहिए।" हम सभी यह सुनकर दंग रह गए। मन ही मन अत्यन्त श्रद्धा और विनय से भरकर उनके चरणों में झुक गए। आज कर्म - निर्जरा के लिए तत्पर ऐसे रत्नत्रयधारी साधक का चरण सान्निध्य पाना दुर्लभ ही है। मुनिश्री क्षमासागरकृत 'आत्मान्वेषी' से साभार प्रोफेसर्स कालोनी 282002 (उ. प्र. ) . २५ Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्र का प्रारूप श्रावकों से निवेदन है कि यह पत्र उल्लिखित मंत्री महोदय को अवश्य प्रेषित करें सेवा में, श्रीमान् थिरू दयानिधि मारन माननीय मंत्री, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, भारत सरकार इलेक्ट्रोनिक्स निकेतन 6, सी. जी. ओ. काम्पलेक्स, लोदी रोड नई दिल्ली- 110 008 डॉ. शकील अहमद माननीय राज्य मंत्री, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, भारत सरकार डाक भवन, संसद मार्ग नई दिल्ली - 110 001 विषय : गत शताब्दी के महान् संत, कवि एवं संस्कृत विद्वान् महाकवि जैनाचार्य ज्ञानसागर जी (पं. भूरामल जी शास्त्री) के 116 वें जन्मदिन तथा संयमित जीवन के 50 वें वर्ष के प्रसंग पर दिनांक 2 जून 2007 को संगीत, स्मारक, डाक टिकट आदि निकालने के सम्बन्ध में । संदर्भ : फाइल सं. 16-29/2004 फिलेटेलि मान्यवर महोदय, आप दोनों की अध्यक्षता एवं सह अध्यक्षता में दिनांक 17 मई, 2005 को इलेक्ट्रोनिक्स निकेतन के सभागार में अयोजित फिलेटेलिक सलाहकार समिति की बैठक में गत शताब्दी के महान् संत, कवि एवं संस्कृत विद्वान् महाकवि जैनाचार्य ज्ञानसागर जी (पं. भूरामल जी शास्त्री) पर डाक टिकट निकालने पर चर्चा हुयी थी, जो बैठक की कार्यवाही संख्या 7 (6) में अंकित की गई थी। महाकवि जैनाचार्य ज्ञानसागर जी (पं. भूरामल जी शास्त्री) ने न केवल संस्कृत भाषा को अपने महाकाव्यों से समृद्ध किया है, वरन् हिन्दी को भी अपनी लेखनी से कई ग्रंथ दिये हैं। इस सम्बन्ध में सभी जानकारी डाक विभाग में स्थित फाइल सं. 1629/2004, फिलेटेलि में उपलब्ध है। 2. आगामी वर्ष दिनांक 2 जून 2007 को इन महापुरुष की 116 वीं जन्म जयन्ती है एवं संयमित जीवन का 50वाँ वर्ष । अतएव इन महापुरुष का डाक टिकट जारी करके इन्हें सम्मानित करने का यह उपयुक्त अवसर है। इस सम्बन्ध में श्री नरेश कुमार जैन, सदस्य-फिलेटेलिक सलाहकार समिति एवं अध्यक्ष- बिहार फिलिटेलिक सोसाइटी, सूरज भवन, स्टेशन रोड, पटना - 800001 ने आपकी सेवा में इन महापुरुष से सम्बन्धित विवरणिका में प्रकाशनार्थ संक्षिप्त जीवन परिचय ( हिन्दी एवं अंग्रेजी में) साथ ही डाक टिकट एवं प्रथम दिवस आवरण हेतु रंगीन चित्रांकन आपके अवलोकनार्थ प्रेषित किया है। मैं अनुरोध करता हूँ कि इस लम्बित विषय पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुये इन महापुरुष की 116 वीं जयन्ती एवं सयंमित जीवन के 50 वें वर्ष के अवसर पर दिनांक 2 जून 2007 को रंगीन डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण परिचय विवरणिका तथा विशिष्ट मुहर आदि जारी करने का आदेश देकर सम्पूर्ण जैन समाज एवं विद्वत् वर्ग को अनुगृहीत करने की कृपा करेंगे। आपका यह कर्तृत्व सदियों तक याद किया जायेगा। हार्दिक अभिवादन एवं शुभकामना सहित प्रतिलिपि सूचनार्थ एवं उचित कार्यवाही हेतु प्रेषित : 1. श्रीमती कावेरी बनर्जी, डी.डी.जी. (फिलेटेलि), भारतीय डाक विभाग, भारत सरकार, डाक भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली- 110 001 श्री बीरज कुमार, निदेशक, फिलेटेलि, भारतीय डाक विभाग, डाक भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली- 110 001 आपका शुभेच्छु अक्टूबर 2006 जिनभाषित 25 Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ समाचार भोपाल में जैन छात्रों के व्यक्तित्व विकास हेतु । सम्मिलित हों इस हेतु सभी को आमंत्रण पत्र भेजा गया है। सम्मेलन यदि आमंत्रण प्राप्त नहीं हुआ है तो कृपया भोपाल नगर में मध्यप्रदेश एवं समीपस्थ प्रदेशों के | www.Vidyasagar.net/www.jainheritageछोटे-छोटे नगरों एवं ग्रामों के 300 से अधिक छात्र मेडीकल, centres.com पर अथवा संयोजक डॉ. सन्मति ठोले से इंजीनियरिंग, मेनेजमेन्ट, फार्मेसी एवं अन्य विविध विषयों मोबाईल नं. 09822597310/09421315881 पर संपर्क में अध्ययन कर रहे हैं। विभिन्न अवसरों पर प्रयास करने | बनाकर पूर्ण मालुमात ले सकते हैं। पर ऐसा कोई फोरम नहीं बन सका है, जहाँ हम उनसे मिल सम्मेलन हेतु अखिल भारतीय दिगंबर जैन डॉक्टर्स सकें, उनसे चर्चा कर सकें और कभी आवश्यकता पड़ने फोरम संरक्षक/राष्ट्रीय समन्वयक से संपर्क बनाकर अपना पर उन्हें सहयोग एवं मार्गदर्शन दे सकें। इस आवश्यकता नाम पंजीकरण करावें ऐसा आवाहन संयोजन समिति द्वारा को ध्यान में रखते हुए एवं छात्रों के व्यक्तित्व को विकसित | किया गया है। करने के उद्देश्य से विद्यासागर संस्थान द्वारा इन छात्रों को डॉ. सन्मति ठोले, संयोजक 17 सितम्बर 2006 को विद्यासागर संस्थान में दोपहर भोज | पर आमंत्रित किया गया। छात्रों के व्यक्तित्व विकास हेतु स्व. बाबा सा. श्री रतनलाल जी पाटनी की प्रथम मध्यप्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव डॉ. ए. के. पयासी, पुण्यतिथि पर नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एन.सी. देश में न केवल जैन समाज अपितु अन्यान्य समाजों ई आरटी) नई दिल्ली के डॉ विपिन कमार जैन एवं | में भी अपनी दानशीलता की उदात्त मिशाल स्थापित कर डॉ. विजय अग्रवाल, संचालक भारत सरकार द्वारा अत्यधिक उन्हें प्रेरणा देने वाला पाटनी परिवार (आर. के. मार्बल) प्रभावशाली एवं प्रेरणादायक व्याख्यान दिए गए। त्याग, तपस्या और धर्मसाधना के क्षेत्र में भी अग्रणी है। इस डॉ. चन्दा मोदी, भोपाल (म. प्र.) वर्ष 2006 के पर्वाधिराज पर्युषण पर्व में अमरकंटक क्षेत्र पर ससंघ विराजमान परम पूज्य संत शिरोमणि आचार्य 108 श्री श्री सम्मेदशिखरजी में डॉक्टर्स सम्मेलन विद्यासागर जी महाराज के चरणसान्निध्य में इस परिवार की ऑल इंडिया दिगंबर जैन डॉक्टर्स फोरम एवं मुनिश्री | बहुओं-श्रीमती शांता जी पाटनी (धर्मपत्नी श्री सुरेशकुमार 108 प्रमाणसागरजी वर्षायोग समिति के द्वारा संयोजित “द्वितीय | जी पाटनी) ने 10 (दस) दिन के उपवास एवं श्रीमती अखिल भारतीय दिगंबर जैन डॉक्टर्स सम्मेलन' परम पावन सुशीला जी पाटनी (धर्मपत्नी श्री अशोककुमार जी पाटनी) तीर्थराज श्री सम्मेदशिखरजी में 10, 11 नवम्बर 2006 को | ने 5 (पांच) दिन के उपवास कर त्याग की महिमा को सम्पन्न होने जा रहा है। बढ़ाया है। उद्यापन के उपलक्ष्य में क्षेत्र पर रजत उपकरण सम्मेलन में “चिकित्सा, चिकित्सक एवं जैनधर्म" | भेंट कर एक महती धनराशि की भी घोषणा की गई तथा इस विषय पर चर्चा, संवाद, प्रवचन आदि आयोजित किये | किशनगढ़ के आदिनाथ जिनालय में पूजा के 4 रजत सेट जा रहे हैं। डॉक्टर्स से अनुरोध है कि वे इस विषयपर अपने | भेंट स्वरूप प्रदान किये। लेख, विचार प्रस्तुत करने हेतु संयोजन समिति से संपर्क कर यह संयोग था कि उस दिन 10 सितम्बर स्वर्गीय सकते हैं। बाबा सा. श्री रतनलाल जी पाटनी की प्रथम पुण्यतिथि भी सम्मेलन को मंगल आशीर्वाद संतशिरोमणी आचार्य | पड़ गई थी। अतः सकल दिगम्बर जैन समाज को श्री 108 विद्यासागरजी एवं देशभर के सभी आचार्यों का | वात्सल्यभोज पर आमंत्रित किया गया किन्तु इससे भी बढ़कर प्राप्त है। सम्मेलन मुनिश्री 108 प्रमाणसागरजी के मंगल | दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य बाबा सा. की स्मृति को चिरस्थायी सान्निध्य में श्री दिगंबर जैन तेरहपंथी कोठी, कुंदकुंदमार्ग, | बनाने हेतु आयोजित किये गये। सम्मेदशिखरजी में संपन्न होने जा रहा है। प्रथमतः एक विशाल नेत्र शल्य चिकित्सा शिविर का सम्मेलन में देशभर के सभी दिगंबर जैन डॉक्टर्स | आयोजन आर. के. कम्युनिटी सेन्टर पर आयोजित था, जिसमें 26 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लगभग 2000 से ज्यादा रोगियों का उपचार किया गया। 444 | उपाध्यायश्री के पावन सान्निध्य में रवीन्द्र भवन के विशाल रोगियों को लेन्स प्रत्यारोपण, 500 से अधिक रोगियों को | हॉल में किया गया। स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. नरोत्तम जी मिश्रा, चश्में एवं शेष को आवश्यकतानुसार जाँच के उपरान्त दवा | विट्ठलभाई पटेल, विधायिका सुधा मलैया, श्री शैलेन्द्र जैन आदि निःशुल्क प्रदान की गई। रोगियों एवं उनके साथ | (भाजपा नेता) तथा भूपेन्द्र सिंह ठाकुर की कार्यक्रम में आनेवाले लोगों को निःशुल्क भोजन, आवास व वाहन आदि | गरमामयी उपस्थिति रही। 12 चयनित प्रतियोगियों में शिखा की व्यवस्था की गई। ऑपरेशन हेतु रोगियों को अजमेर के | जैन, सागर ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। विख्यात नेत्र चिकित्सक डॉ. रमेश क्षेत्रपाल और उनके पुत्र मुकेश कुमार, शास्त्री श्री अरुण क्षेत्रपाल के चिकित्सालय रोगियों को ले जाया गया और वापस लाया गया। यह शिविर प्रारम्भ में मात्र 4 श्रमण ज्ञान भारती मथुरा द्वारा पर्युषण पर्व में दिन के लिए आयोजित था किन्तु रोगियों की संख्या के ___ अद्वितीय धर्मप्रभावना मद्वेनजर इसे 10 से 18 सितम्बर 2006 तक 9 दिन जारी रखा - इस वर्ष “श्रमण ज्ञान भारती' संस्थान सिद्ध क्षेत्र गया। इस सारी व्यवस्था को जिस सन्दर ढंग से हमारी नगर | चौरासी मथुरा (उ.प्र.) द्वारा दशलक्षण पर्व में प्रवचन के की विख्यात सेवा संस्थान-भारत विकास परिषद के सदस्यों | माध्यम से भारत देश के 38 स्थानों पर विद्वानों ने धर्म की अहर्निशि सेवा प्रदान की वह अत्यन्त श्लाघनीय रही। | प्रभावना की जिसका विवरण निम्नप्रकार है। 10 सितम्बर को भविष्य के लिए नेत्र ज्योति दिवस घोषित 1. ब्र. अरूण जी, करौल बाग दिल्ली, 2. पं. जिनेन्द्र किया गया और प्रतिवर्ष इस तारीख को निःशल्क नेत्र शास्त्री, अधीक्षक, गुड़गांव (हरियाणा),3. पं.सनील शास्त्री. चिकित्सा शिविर का आयोजन पाटनी परिवार करेगा। प्राध्यापक, कृष्णा नगर दिल्ली, 4. पं. अभिषेक शास्त्री. . द्वितीय - राज्य सरकार ने श्री भामाशाह योजना के प्राध्यापक/सौरभ जैन, जलगांव (महा.), 5. पं. अमोल अन्तर्गत राजकीय महाविद्यालय किशनगढ़ को राज्य का | बरवंटे/प्रशान्त जैन, बारामती(महा.), 6. पं. सौरभ जैन, प्रथम मॉडल महाविद्यालय घोषित किया गया और इसका | रोहणी सेक्टर 16 दिल्ली, 7. पं. केतन जैन, रोहणी, सेक्टर 8 नामकरण रतनलाल कंवरलाल पाटनी राजकीय महाविद्यालय | | दिल्ली, 8. पं. विकास जैन, ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.), 9. पं. किये जाने की घोषणा राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री माननीय श्री | मनीष जैन, बहादुरगढ़ (उ.प्र.), 10. पं.रीतेश जैन, सोनीपत घनश्याम जी तिवाडी ने की। पाटनी परिवार इस महाविद्यालय | (हरियाणा), 11. पं. अभिषेक जैन, गोटेगांव (म.प्र.). का जीर्णोद्धार एवं विभागों के अनुसार नवीन भवन एवं | 12. पं. अंकित जैन, ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.), 13. पं. नितिन कमरों का आधुनिक सुख-सुविधा पूर्ण निर्माण सम्पन्न जैन, कमलानगर आगरा (उ.प्र.), 14. पं. आशीष करायेगा। इस हेतु पाटनी परिवार ढाई करोड़ से अधिक की जैन/सिद्धशरण जैन, मसूरी (उत्तरांचल), 15. पं. दिनेश राशि मुहैय्या करायेगा। खेल-कूद के मैदान एवं अन्य जैन, किशनगढ़ (राज.), 16. पं. वर्धमान जैन/दीपेश जैन, समयोचित सूविधायें भी उपलब्ध कराई जावेंगी। बुरहानपुर (म.प्र.), 17. पं. सौरभ जैन, पिपरई (म.प्र.). कसम कटारिया | 18. पं. अमोल महेशकर/आकाश जैन, फरीदाबाद (उ.प्र.), अध्यक्षा, दिगम्बर जैन महासमिति | 19. पं. अंशुल जैन, महावीर नगर कोटा (राज), किशनगढ़ | 20. पं. अमित जैन/आलोक जैन, हाथरस (उ.प्र.), 21. पं अनुज जैन/अंकित जैन, मेरठ (उ.प्र.), 22. पं. जिला स्तरीय शाकाहार निबन्ध लेखन तथा भाषण | मनोज जैन/मनीष जैन, धूलियागंज आगरा (उ.प्र.), 23. पं. प्रतियोगिता शैलेन्द्र जैन/चेतन जैन, धौलपुर (राज.), 24. पं. सौरभ शाकाहार प्रवर्तक राष्ट्र संत परम पूज्य उपाध्याय श्री | जैन/अमित जैन. बोदला सेक्टर 7 आगरा (उ.प्र.).25. पं. ज्ञानसागर जी महाराज की पावन प्रेरणा व आशीर्वाद से | संचय जैन/अनपम जैन कोशीकलां ( दीपेश सागर जिला स्तरीय 'शाकाहार निबन्ध लेखन व भाषण | बगेरिया/गौरव जैन, जमुना कालोनी आगरा (उ.प्र.), 27. पं. प्रतियोगिता' के विशिष्ट प्रतियोगियों को पुरस्कार वितरण | विवेक जैन/वर्धमान जैन. शालीमार एन्क्लेव आगरा (उ.प्र.). समारोह का शुभारम्भ 10 सितम्बर, 2006 को पूज्य | 28. पं. विलास जैन, देववंद सहारनपुर (उ.प्र.), 29. पं. -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 27 Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अग्रज जैन/राकेश जैन, झालावाड (राज.), 30. पं. सुरेश | ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में प्राप्त 25000 रु. की राशि में जैन, पहाड़ी (राज.), 31. पं. वृषभ जैन चंदू जी, गढ़ा | इतनी ही राशि अपनी ओर से मिलाकर अपनी पूज्य माँ (राज.), 32. पं. मयंक जैन/सुदीप जैन, जैतपुरकलां आगरा | श्रीमती चमेलीबाई की पुण्यस्मृति में इस निधि की स्थापना (उ.प्र.), 33. पं. सौरभ जैन, भीलवाड़ा (राज.), 34. पं. | की थी। बैठक में उन्होंने यह सूचना भी दी कि इसी 8 राहुल जैन/आदीश जैन, चिरगांव (उ.प्र.), 35. पं. ब्रजेश | अक्टूबर को त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर भी अपना जैन/पुष्पेन्द्र जैन, एत्मादपुर आगरा (उ.प्र.), 36. पं. राहुल | सर्वोच्च सम्मान गणिनी ज्ञानमती पुरस्कार' (एक लाख रुपये) जैन/जिग्नेश जैन अवागढ (उ.प्र.),37.पं.यशवन्त जैन/राजेश | उन्हें प्रदान कर रहा है। यह राशि जैन, लालसोंठ (राज.), 38. पं. सौरभ जैन, मोती कटरा | | अर्पित करना चाहते हैं। सभी उपस्थित महानुभावों के मन में आगरा (उ.प्र.) उनकी इस निःस्पृहता से उत्साह की लहर दौड़ गई और विधि-विधान, अनुष्ठान हेतु संस्थान से सम्पर्क करें। | उनकी प्रशस्त भावना को साकार करने का सबका मानस मोबाइल - 9412626524 फोन - 0565 2420323 | बन गया। श्रुत सेवा निधि, जो एक लघु बीज के समान थी, निरंजन बैनाडा || | अब एक छायादार वृक्ष बनने की ओर उन्मुख है। वामन से (अधिष्ठाता) विराट् बनने की इस यात्रा के पीछे प्राचार्य जी की प्रेरणा एवं त्याग भावना से सभी अभिभूत थे। श्री जिनेन्द्र अर्चना सम्पन्न अनूपचन्द्र जैन (एडवोकेट) अलवर - पर्युषण पर्व की पावन बेला पर अनिल मंत्री राखी परिवार अलवर द्वारा अहिंसा स्थली पर श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन किया गया। श्री सम्मेदशिखर जी में श्रावक संस्कार शिविर सम्पन्न मुजफ्फर नगर - नमिनाथ भगवान के गर्भ कल्याणक ____ तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर की पावन भूमि पर संत 9 सितम्बर से 18 सितम्बर तक गणिनी आर्यिका रत्न ज्ञानमती शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक माताजी द्वारा लिखित श्री इन्द्रध्वज महामंडल विधान का शिष्य, श्री प्रमाण सागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में आयोजन प्रेमपुरी मुजफ्फरनगर में किया गया। श्रावक संस्कार शिविर सानन्द सम्पन्न हुआ। पर्युषण पर्व के कानकी - पश्चिमी बंगाल कानकी नगर में 23 सित. | पावन अवसर पर आयोजित इस दस दिवसीय शिविर का से नव दिवसीय अलग अलग विधानों द्वारा श्री जिनेन्द्र उद्घाटन झारखंड सरकार के पर्यटन सचिव के कर कमलों महाअर्चना का आयोजन किया गया। से हुआ तथा शिविर का ध्वजारोहण शिविर पुण्यार्जक श्री उपर्युक्त तीनों विधान प्रतिष्ठाचार्य युवा विद्वान् पं. विमल कुमार प्रेमलता पाटनी, “इम्पेक्स ग्रुप” कोलकाता कमल कुमार कमलांकुर भोपाल द्वारा आगमोक्त रीति से के कर कमलों द्वारा हुआ। मधुवन के इतिहास में प्रथम बार सम्पन्न कराये गये। आयोजित इस शिविर में आठ सौ से अधिक शिविरार्थियों ने डा. पवन विद्रोही भाग लिया तथा इसके अतिरिक्त हजारों ऐसे भी लोग थे, अध्यक्ष, श्री दि. जैन मंदिर, नेहरूनगर, भोपाल (म. प्र.) जिन्होंने बिना पंजीयन के शिविर का लाभ उठाया। इस शिविर में एक विशेष बात यह रही कि इन हजारों लोगों के 'श्रुत सेवा निधि' का लोकार्पण एवं विस्तार । धर्मध्यान हेतु किसी पेशेवर संगीतकार को नहीं बुलाया फीरोजाबाद, 3 अक्टूबर. । प्रा. नरेन्द्रप्रकाश जैन (पूर्व गया। कोलकाता के श्रद्धालु श्रावक मुन्ना पहाड़िया एवं संघस्थ अध्यक्ष-शास्त्री परिषद्) ने आज नगर के वरिष्ठ अधिवक्ता | ब्र. रोहित भैया ने अपने मधुर स्वरों से सभी को भाव विभोर श्री अनूपचन्द्र जैन के आवास पर आहूत उत्साही एवं युवा | कर दिया। मुनिश्री ने यह शिक्षण सभी शिविरार्थियों हेतु एक उद्योगपतियों की एक बैठक में स्वयं के द्वारा स्थापित 'श्रुत | कैप्सूल कोर्स के रूप में तैयार किया था। धर्म और जीवन . सेवा निधि' को समाज को सौंपने तथा लोकहित में उसे | व्यवहार से जुड़े मुनिश्री के मौलिक प्रवचनों की चर्चा पूरे बढ़ाने की अपनी भावना एक मार्मिक अपील के रूप में | प म मधुवन में छायी रही। व्यक्त की। ज्ञातव्य है कि उन्होंने गत वर्ष इन्दौर में कुन्दकुन्द छीतरमल पाटनी 28 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रेलों के 'खान-पान' पर छापेमारी के आदेश . | विदेश में ऐतिहासिक धर्म प्रभावना रेल के रसोईयान में शाही पनीर, आलू-मटर आदि | श्री दिगम्बर जैन ऐसोसियन लंदन द्वारा 4 अगस्त से सब्जियों को लजीज बनाने के लिए चिकन, मटन और अंडे | 9 अगस्त 2006 तक श्री महावीर स्वामी जिन बिम्ब की ग्रेवी मिलाई जा रही है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित था, जो अपूर्व रेलवे में खान-पान की जाँच के लिए हाईकोर्ट द्वारा | धर्म प्रभावना के साथ सानंद सम्पन्न हुआ। गठित एक विशेष कमेटी की रिपोर्ट में खाने की गुणवत्ता को श्री दिगम्बर जैन विसा मेवाड़ा ऐसोसियेसन लंदन बेहद घटिया बताया गया है। इस रिपोर्ट को बेहद गंभीर | (यू.के.) के अन्तर्गत श्री पार्श्वनाथ चैत्यालय हेण्डन लंदन मानते हुए हाई कोर्ट ने उक्त कमेटी को देश भर की रेल | की श्रीमती पुष्पा जैन, कलरैया के आग्रह पूर्ण आमंत्रण पर कैंटीनों और रसोईयानों पर छापे मारने का निर्देश दिया है। भारतवर्ष से कोलकाता के प्रतिष्ठाचार्य पं. कमलकुमार जैन इसकी विस्तृत रिपोर्ट चार हफ्ते में दाखिल करने को कहा | पर्युषण पर्व एवं दशलक्षण महापर्व पर जैनधर्म की मंगल गया है। यह आदेश कार्यवाहक चीफ जस्टिस विजेंद्र जैन | प्रभावना हेतु पधारे थे। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने दिया। इस संबंध में वकील | सभी कार्यक्रमों में भी आपकी पूर्ण सहभागिता रही। श्री वरुण गोस्वामी की ओर से एक जनहित याचिका दाखिल श्रीमती पुष्या जैन कलरैया की गई थी, जिसमें रेलवे में खाने की गुणवत्ता पर सवाल 25, शनि गार्डन रोड, हेण्डन लंदन, (यू. के.) उठाए गए थे। ___ 'नई दुनिया' इन्दौर तृतीय पाठशाला शिक्षक प्रशिक्षण एवं संगोष्ठी 21 जुलाई 2006 से साभार शाहपुर में सानंद संपन्न आचार्य श्री विद्यासागर जी के शिष्य मुनि श्री निर्णय वर्षों की मेहनत बेकार न जाए सागर जी एवं श्री आगम सागर जी महाराज के तत्त्वावधान स्टासबर्ग विश्वविद्यालय के प्रो. लई पाश्चर ने कत्ते | में संगोष्ठी समारोह का आयोजन हुआ। सत्र की शुरुआत 15 के काटने के इलाज की खोज की। वे विश्वविद्यालय के ही | अगस्त से हुई। प्रथम दो दिन 15 एवं 16 अगस्त के प्रथम एक अधिकारी की बेटी को पसंद करते थे और उससे | सत्र में मुनि श्री निर्णय सागर जी ने तथा द्वितीय सत्र में मुनि विवाह करना चाहते थे। लड़की और उसके माता-पिता की | श्री आगम सागर जी ने प्रशिक्षण दिया। ओर से विवाह को मंजूरी मिल गई। निश्चित समय पर मित्र | मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज ने 72 पाठशालाओं व संबंधी चर्च पहुँच गए, लेकिन पाश्चर नहीं पहुँचे। कुछ | के 350 प्रशिक्षार्थियों को प्रशिक्षण देते हुए कहा “आप जब लोग खुसर-फुसर करने लगे कि शायद पाश्चर विवाह नहीं | भी पाठशाला में प्रवेश करेंगे तब आपको पूर्ण अनुशासित करेगा। इतने में एक मित्र पाश्चर की प्रयोगशाला में गया, तो | ढंग से आना पड़ेगा क्योंकि पूरी समाज की दृष्टि आपको देखा कि वे प्रयोग करने में अत्यंत व्यस्त थे। मित्र बोला, | देख रही होगी, उनकी दृष्टि आपके पढ़ाने के ढंग को देख 'यार हद हो गई, आज तो तुम्हारा विवाह है, चर्च में तुम्हारा | रही होगी। आपका अनुशासन ही उनको अनुशासित कर इन्तजार हो रहा है। बन्द करो यह प्रयोग, यह तो बाद में भी | जीवन को महका सकता है।" हो जाएगा।' पं. राजेन्द्र कुमार पाश्चर ने उसकी ओर देखे बिना ही कहा, 'जरा शाहपुर-गनेशगंज, सागर (म.प्र.) रुको। कई दिनों से मैं जो प्रयोग कर रहा था उसके परिणाम डॉ. सुरेन्द्रकुमार जैन निकल रहे हैं। ऐसा न हो कि मेरी वर्षों की मेहनत बेकार हो पं. बंशीधर जी व्याकरणाचार्य व्यक्तित्व एवं कृतित्व जाए।' पाश्चर अपना प्रयोग पूरा करने के बाद ही चर्च के राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न अ. भा. दि. जैन विद्वत्परिषद के तत्वाधान एवं परम लिए रवाना हुए। उनकी शादी भी खूब धूमधाम से सम्पन्न हुई। लेकिन महान कार्य यं ही परे नहीं होते उन्हें करने के | पूज्य सराकोद्धारक, उपाध्याय श्री ज्ञानसागर जी महाराज, लिए जरूरत पड़ने पर अपनी सर्वाधिक प्रिय व्यक्तिगत आर्यिका रत्न श्री दृढमति माता जी (ससंघ) एवं क्षु. श्री इच्छाओं को भी किनारे करना होता है। सहजसागर जी महाराज के सान्निध्य में पं. वंशीधर जी क्ष. श्री समर्पणसागर | व्याकरणाचार्य व्यक्तित्व एवं कृतित्व राष्ट्रीय संगोष्ठी श्री -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 29 Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, गोपालगंज, सागर म. प्र. में | जैन छतरपुर, मंत्री - डॉ. सुरेन्द्रकुमार जैन, बुरहानपुर, संयुक्त सम्पन्न हुई। इस अवसर पर परम पूज्य उपाध्याय श्री ज्ञानसागर मंत्री - डॉ. नेमिचन्द्र जैन, खुरई, उपमंत्री - डॉ. ज्योति जैन, जी महाराज ने पं. बंशीधर जी व्याकारणाचार्य के कृतित्व | खतौली, कोषाध्यक्ष - ब्र. पं. अमरचन्द जैन, कुण्डलपुर, की सराहना करते हुये कहा कि - विद्वान् ही विद्वान् के श्रम | प्रकाशन मंत्री - डॉ. सनतकुमार जैन जयपुर, कार्यकारिणी को जान सकते हैं। समाज पर इन विद्वानों का असीम उपकार सदस्य - 1. डॉ. रमेशचन्द जैन, बिजनौर, 2. डॉ. फूलचन्द है जिसे भुलाना नहीं चाहिए। संगोष्ठी का सफल संचालन | जैन प्रेमी, वाराणसी, 3. डॉ. सुरेशचन्द्र जैन, नई दिल्ली, 4. डॉ. सुरेन्द्रकुमार जैन (मंत्री - विद्वत्परिषद्) ने किया। । डॉ. जयकुमार जैन, मुजफ्फरनगर, 5. डॉ. कमलेशकुमार डॉ. सुरेन्द्रकुमार जैन, | जैन, वाराणसी, 6. डॉ. भागचन्द जैन भागेन्दु दमोह, 7. डॉ. मंत्री, अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद | विजयकुमार जैन, लखनऊ, 8. डॉ. हुकुमचन्द- पार्श्वनाथ एल-65, न्यू इंदिरानगर, बुरहानपुर (म. प्र.) संगवे, सोलापुर, 9. डॉ. विमलकुमार जैन, सागर, 10. पं. इन्द्रसेन जैन, सहारनपुर, 11. डॉ. नरेन्द्रकुमार जैन, गाजियाबाद, अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत्परिषद् नवीन 12. पं. सिद्धार्थकुमार जैन, सतना, 13. पं. जयन्तकुमार जैन, कार्यकारिणी का चुनाव सम्पन्न सीकर, 14. पं. ज्योतिबाबू जैन, उदयपुर, विशेष आमंत्रित डॉ. शीतलचन्द जैन - अध्यक्ष एवं डॉ. सुरेन्द्रकुमार | सदस्य - डॉ. हरिश्चन्द्र जैन मुरैना जैन - मंत्री निर्वाचित डॉ.सुरेन्द्रकुमार जैन सागर, म. प्र. स्थित श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मंदिर, मंत्री - अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद् गोपालगंज में अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत्परिषद एल-65, न्यू इंदिरानगर, बुरहानपुर (म. प्र.) साधारण सभा का अधिवेशन दि. 15, 16, 17 सितम्बर, 06 को प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी (वाराणसी) की अध्यक्षता में कल्पद्रुम महामंडल विधान अभूतपूर्व धर्म प्रभावना के • सम्पन्न हुआ। दि. 16 सितम्बर को रात्रि में 8.30 बजे से साथ आनंद संपन्न साधारण सभा की बैठक में नये अध्यक्ष के रूप में डॉ. दमोह, श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान एवं शीतलचन्द जैन, प्राचार्य को सर्वसम्मति से अध्यक्ष एवं | विश्व शांति महायज्ञ का नगर गजरथ फेरी के साथ सानंद कार्यकारिणी के शेष 20 सदस्यों का चुनाव किया गया। ऐतिहासिक आयोजन आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज विद्वत्परिषद् के संविधान के अनुरूप नवनिर्वाचित अध्यक्ष | के परम शिष्य मुनि श्री 108 अजित सागर जी महाराज एवं डॉ. शीतलचन्द जैन ने मंत्री पद हेतु डॉ. सुरेन्द्रकुमार जैन, | ऐलक श्री निर्भय सागर जी महाराज के परम सान्निध्य एवं (बुरहानपुर) को नामांकित किया। मंत्री पद हेतु यह उनका | युवा प्रतिष्ठाचार्य ब्र. प्रदीप भैया जी सुयश अशोकनगर के दूसरी बार चयन था। अध्यक्ष एवं मंत्री ने परस्पर विचारविमर्श | कुशल निर्देशन में अभूतपूर्व धर्म प्रभावना के साथ संपन्न पूर्वक आगामी तीन वर्षों के लिए नवीन कार्यकारिणी की | हुआ। घोषणा परिषद् के, दि. 17 सितम्बर को, खुले अधिवेशन में सुनील वेजीटेरियन प. पू. सराकोद्धारक, उपाध्याय श्री ज्ञानसागर जी महाराज प्रवक्ता शाकाहार उपासना परिसंघ, दमोह एवं क्षु. श्री सहजसागर जी महाराज के सानिध्य में की। संपूर्ण कार्यकारिणी इस प्रकार है - डॉ. शेखरचन्द जैन के अभिनंदन का निश्चय संरक्षक - 1. भट्टारक श्री चारूकीर्ति स्वामी जी, 'जैन जगत के प्रसिद्ध विद्वान. प्रखर वक्ता, समाजसेवी, श्रवणबेलगोला, 2. भट्टारक श्री चारूकीर्ति स्वामी जी, विविध संस्थाओं के पदाधिकारी एवं 'तीर्थंकर वाणी' मासिक मूडबिद्री, 3. भट्टारक श्री भुवनकीर्ति स्वामी जी, करकागिरि, | पत्र के प्रधान संपादक डॉ. शेखरचन्द्र जैन की विविध क्षेत्रों 4. संहितासूरि पं. नाथूलाल जी शास्त्री, इन्दौर, 5. प्रो. उदयचन्द | में की गई सेवायें एवं उनके बहुमुखी व्यक्तित्व की अनुमोदना जैन, सर्वदर्शनाचार्य, वाराणसी, ब्र. पं. रतनलाल जैन, इन्दौर, | हेतु उनका अभिनंदन राष्ट्रीय स्तर पर जैनों के चारों संप्रदायों 7. पं. पद्मचन्द जैन, दिल्ली, 8. डॉ. नन्दलाल जैन, रीवा 9.| की ओर से करने का निश्चय किया गया है। इस अवसर पर पं. गुलाबचन्द जैन, प्रतिष्ठाचार्य, टीकमगढ, अध्यक्ष - डॉ. | उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक अभिनंदन ग्रंथ 'स्मृतियों शीतलचन्द जैन, प्राचार्य जयपुर, उपाध्यक्ष - डॉ. लालचन्द | के वातायन से' प्रकाशित करने का संकल्प किया गया है। 30 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्रंथ में जैन दर्शन संबंधी मौलिक शोध परक लेखों का | महाराज ने अपनी सरल प्रवचन शैली से श्रद्धालुओं को मंत्र प्रकाशन किया जायेगा। मुग्ध कर दिया। मेनपुरी (उ.प्र.) से पधारे जैन धर्म के वह कार्यक्रम एवं ग्रंथ प्रकाशन 'डॉ. शेखरचन्द्र जैन | मूर्धन्य विद्वान पं. श्री सुशील कुमार जी ने रात्री कालीन अभिनंदन समिति' द्वारा सम्पन्न होगा। साधुवृंद, विद्वानों, प्रवचन श्रृखंला में धर्म के सार गर्भित तत्वों की जीवन सहयोगियों एवं धर्म तथा समाज के नेताओं से उनका व्यवहार से जुड़ी हुयी विवेचना कर श्रद्धालुओं को प्रभावित आशीर्वाद, शुभकामनायें प्रेषित करने की सादर प्रार्थना की | किया। बरेली से पधारे योगाचार्य डॉ. नवीन जैन ने अपनी गई है। कार्यक्रम संभवतः फरवरी - 2007 में आयोजित विशिष्ट योग-ध्यान पद्धति से शिविरार्थियों को योग की नयी होगा। क्रियाओं से प्रशिक्षण दिया। दशलक्षण पर्व के अंतर्गत गांधीबाग स्थित महाजन राँची में अखिल भारतीय विद्वत संगोष्ठी संपन्न | वाड़ी में मुनि श्री समता सागर जी महाराज के सानिध्य में । संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के | एक दस दिवसीय आध्यात्मिक श्रावक संस्कार शिविर का परम प्रभावक शिष्यत्व चिंतक पूज्य मुनि श्री 108 | आयोजन किया गया। जिसमें 250 शिविरार्थियों ने अनुशासन आर्जवसागर जी महाराज एवं ऐलक 105 श्री अर्पण सागर | में रहकर धार्मिक संस्कार ग्रहण किये इस अवसर पर जी महाराज के सान्निध्य में दिनांक 15 सितंबर 2006 से 17 | शिविरार्थियों एवं बाहर से पधारे अतिथियों के लिये आवास सितंबर 2006 तक षट् काल परिवर्तन एवं काल परिवर्तन | एवं आहार की समुचित व्यवस्था समिति द्वारा की गयी। में निमित्त ज्योतिष्क विमान विषय पर अखिल भारतीय | बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य श्री शांतिसागर जी विद्वत संगोष्ठी का आयोजन भी दिगंबर जैन पंचायत, राँची महाराज की जीवन शैली पर एक भव्य प्रदर्शनी एवं शाकाहार के तत्वाधान में स्थानीय श्री दि. जैन भवन में किया गया। प्रदर्शनी का आयोजन मुनि श्री के निर्देशन में चिटणीस पार्क इस संगोष्ठी में बडी संख्या में जैन एवं जैनेतर श्रोता | पर किया गया। उपस्थित रहते थे। प्रत्येक सत्र के अंत में पूज्य मुनि श्री आर्जवसागर जी महाराज ने समीक्षात्मक उदबोधन दिया तथा श्रोताओं की शंकाओं का निराकरण किया। कर्म में संकोच कैसा ? प्रदीप बाकलीवाल पवनार आश्रम में विनोबा की दिनचर्या एक आदर्श मंत्री - श्री दिगम्बर जैन पंचायत, राँची | संत की दिनचर्या थी। जन सेवा को ही वे राष्ट्र सेवा मानते थे। इसलिए रोज ही वे एक तरह से सेवा के लिए 21 दिवसीय आध्यात्मिक समारोह सम्पन्न समय निकालते थे। सूरज उगने से पहले ही वे रोज सुबह श्री वर्षायोग धर्मप्रभावना समिति, श्री दिगम्बर जैन कंधे पर फावड़ा रखकर सुरगाँव जाते थे और वहाँ सफाई परवार मंदिर ट्रस्ट एवं सकल जैन समाज, नागपुर द्वारा करते थे। एक बार कमलनयन बजाज ने उनसे पूँछा कि आयोजित 21 दिवसीय आध्यात्मिक समारोह के अंतर्गत आप फावड़ा रोज इतनी दूर अपने साथ क्यों ले जाते हैं? भक्ति सत्संग प्रवचन माला का समापन महानगर नागपुर के उस गाँव में ही किसी के यहाँ फावड़ा रोज क्यों नहीं छोड़ हृदय स्थल सप्रसिद्ध स्टेडियम भक्तिधाम चिटणीस पार्क में आते ? विनोबा जी बोले - जिस काम के लिए मैं जाता हूँ सोल्लास संपन्न हुआ। विशाल जनसमुदाय के बीच आचार्य उसका औजार भी मेरे साथ ही होना चाहिए। फौज का श्री विद्यासागर जी महाराज के धर्मप्रभावक शिष्य मुनि श्री सिपाही हमेशा अपनी बंदूक साथ लेकर चलता है। इसी समता सागरजी महाराज एवं ऐलक श्री निश्चय सागरजी तरह एक सफाई कर्मी को भी औजार सदा अपने साथ महाराज की धारा प्रवाह ओजस्वी वाणी का श्रद्धालुओं ने रखना चाहिए। इसीलिए मैं अपना फावड़ा अपने साथ भरपूर लाभ लिया। ज्ञान की इस गंगा में जैन समुदाय के रखता हूँ। कर्म में संकोच कैसा ? कमलनयन बजाज ने अलावा अन्य समाजों के धर्मावलंबी श्रद्धालओं ने प्रवचन आश्चर्यचकित होकर विनोबा जी का उत्तर सुना और माला में प्रतिदिन उपस्थित रहकर बढ़ चढ़कर धर्म लाभ | उन्हें देखते ही रह गये। लिया। प्रियम् जैन, सनावद ओजस्वी वक्ता, कवि हृदय, मुनिश्री समता सागर जी -अक्टूबर 2006 जिनभाषित 31 Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन प्रतीक चिह्न मनोज जैन पंचरत्न प्रतीक चिह्न : एक व्याख्या उपयोग निर्देश ___वर्ष 1975 में 1008 भगवान महावीर स्वामी जी के प्रतीक चिह्न किसी भी विचारधारा, दर्शन या दल के 2500 वें निर्वाण वर्ष के अवसर पर समस्त जैन समुदायों ने | ध्वज के समान है, जिसको देखने मात्र से पता लग जाता है जैनधर्म के प्रतीक चिन्ह का एक प्रारूप बना कर उस पर | कि यह किससे सम्बन्धित है, परन्तु इसके लिये किसी भी सहमति प्रगट की थी। आजकल लगभग सभी जैन पत्र- प्रतीक चिह्न का विशिष्ट (यूनिक) होना एवं सभी स्थानों पर पत्रिकाओं, वैवाहिक कार्ड,क्षमावाणी कार्ड, भगवान् महावीर | समानुपाती होना बहुत ही आवश्यक है। यह भी आवश्यक स्वामी निर्वाण दिवस, दीपावली एवं जैन समाज से जुड़े | है कि प्रतीक का प्रारूप बनाते समय जो मूल भावनायें इसमें किसी भी कार्यक्रम की पत्रिकाओं में इस प्रतीक चिह्न का | समाहित की गयी हैं, उन सभी मूल भावनाओं को यह प्रयोग किया जाता है। हमारे कार्यक्रमों के आमंत्रणपत्र, इत्यादि | प्रकाशित चिह्न अच्छी तरह से प्रगट करता हो। शायद आपने में प्रतीकचिह्नों का प्रयोग हमारी अपनी परम्परा में श्रद्धा एवं | कभी ध्यान से देखा हो, इन सभी पत्र-पत्रिकाओं में इस विश्वास का द्योतक है। प्रतीक चिह्न का कुछ अलग-अलग ही रूप दर्शाया जाता है। जैन प्रतीक चिह्न : मूल भावनाएँ एक ही चिह्न का अलग-अलग रूप भ्रम की स्थिति उत्पन्न जैन प्रतीक चिह्न कई मूल भावनाओं को अपने में | करता है एवं इसमें समाहित मूल भावनाओं को भली प्रकार समाहित करता है। इस प्रतीक चिह्न का रूप जैन शास्त्रों में | प्रदर्शित नहीं कर पाता है। प्रस्तुत आलेख में, इन सभी वर्णित तीन लोक के आकार जैसा है। इसका निचला भाग | बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित किया गया है। अधोलोक, बीच का भाग मध्यलोक एवं ऊपर का भाग फोंट ग्राफिक उपलब्धता उर्ध्वलोक का प्रतीक है। इसके सबसे ऊपरी भाग में चन्द्राकार विभिन्न साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाओं में इसका अलगसिद्धशिला है। अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठी भगवान् इस सिद्ध | अलग रूप छपने का मुख्य कारण इसको एकरूप छापने के शिला पर अनन्त काल से अनन्त काल तक के लिये | लिये आवश्यक फोंट एवं ग्राफिक्स का अभाव है, प्रिन्टर विराजमान हैं. चिह्न के निचले भाग में प्रदर्शित हाथ अभय | एवं कम्पोजर अपने पास उपलब्ध संसाधन के अनुसार का प्रतीक है और लोक के सभी जीवों के प्रति अहिंसा का | इसका डिजाइन बना देते हैं। इस प्रतीकचिह्न को एक रूप में भाव रखने का प्रतीक है। हाथ के बीच में 24 आरों वाला | छापने के लिये अब इसके फोंट का विकास कर लिया गया चक्र चौबीस तीर्थंकरों द्वारा प्रणीत जिन धर्म को दर्शित करता है। फोंट के उपयोग से इसको इसका सही स्वरूप में छापा है, जिसका मूल भाव अहिंसा है। ऊपरी भाग में प्रदर्शित | जा सकेगा। जरूरत है, इसका उपयोग करते समय हम स्वस्तिक की चार भुजायें चार गतियों -- नरक, तिर्यञ्च, | सुनिश्चित करें कि प्रिंटर एवं कम्पोजर सही फोंट का उपयोग मनुष्य एवं देव गति की द्योतक हैं। प्रत्येक संसारी प्राणी | करें। इस फोंट की उपलब्धता के लिये इसकी सीडी प्रिंटर जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होना चाहता है। स्वस्तिक के | तथा कम्पोजर को भेजी जा रही है एवं इसे इन्टरनेट वेबसाइट ऊपर प्रदर्शित तीन बिंदु सम्यक् रत्नत्रय-सम्यकदर्शन, | से निःशुल्क डाउन लोड भी किया जा सकता है। सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चारित्र को दर्शाते हैं और संदेश देते हैं | सही स्वरूप कि सम्यक् रत्नत्रय के बिना प्राणी मुक्ति को प्राप्त नहीं कर प्रस्तुत ग्राफिक्स के माध्यम से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं सकता है। सम्यक्ररत्नत्रय की उपलब्धता जैनागम के अनुसार में छपे इसके विविध रूप उनकी त्रुटियाँ एवं सही स्वरूप मोक्षप्राप्ति के लिये परम आवश्यक है। सबसे नीचे लिखे | को दर्शाया गया है। (देखिए आवरण पृष्ठ 3)। गये सूत्र ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्' का अर्थ है जीव एक बी-20, गली नं. 11 दसरे का उपकार करते हैं। संक्षेप में जैन प्रतीक चिह्न संसारी लक्ष्मी नगर, दिल्ली- 110092 प्राणी की वर्तमान दशा एवं इससे मुक्त होकर सिद्ध शिला फोन - 011 - 22017981 तक पहुँचने का मार्ग दर्शाता है। Email : [email protected] 32 अक्टूबर 2006 जिनभाषित Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन प्रतीक चिन्ह सिद्धशिलाभली प्रकार दर्शायी जानी चाहिए, दो चन्द्राकार रेखाएँ अनावश्यक हैं. परस्परोपाहोजीवानाम् स्वस्तिक चिन्ह जैन प्रचलन के परस्परोपणहो रवानामा प्रतीक चिन्ह समानुपातिक होना चाहिए. अनुसार होना चाहिए. 卐 स्वस्तिक में चार बिंदु अनावश्यक हैं. प्रतीक चिन्ह में परम्परानुसार रंगो का प्रयोग किया जाना चाहिए. परस्परोपग्रहो जीवानाम् हाथ के मध्य में चौबीस आरों वाला चक्र एवं मध्य में अहिंसा हाथ के मध्य में चौबीस आरों वाले चक्र प्रतीक चिन्ह के निचले भाग में परस्परोग्रहो जीवानाम् लिखा जाना चाहिए. लिरखा जाना चाहिए Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राज न. UPHINIZUU6/16/50 0 मुनि श्री योगसागर जी श्री पुष्पदन्त स्तवन श्री शीतलनाथस्तवन (द्रुतविलम्बित छन्द) (वसन्ततिलका छन्द) श्री पुष्पदंत परमेश्वर को प्रणाम। है दूसरा सुविधनाथ अपूर्व नाम // ज्ञानेश्वरा विधि विनाशक ज्ञान देते। निर्लेप कर्मलेप से परिशुद्ध होते॥ पतितपावन शीतलनाथ जी, दरित पाप निवारक नाथ जी। शिव सुखामृत अर्णव आप हैं, विनयभाव लिए गुण गा रहे। 2 चमर चौसठ सुन्दर डोलते, कनक छत्रत्रयी अति शोभते। पवन मन्द सुगंधमयी चले, प्रकृति के फल पुष्प सभी खिले॥ जो ग्रीष्म में शिखर पर्वत पै विराजे। अभ्रावकाश सरिता तट पै विराजे॥ वर्षा घनी तरुतले ऋतु को बिताये। जो काय-क्लेश सहते समता जगाये॥ 3 जो राग रंग से मन है विरक्त। त्रैगुप्ति सुंदर विशाल गुफा विरक्त॥ ना ही प्रवेश जिसमें अघकर्म का ही। जो शान्ति शाश्वत निजात्म रसानुभूति॥ मनुज देह अपावन हो भले, परम पंकज मोक्ष अहो खिले। जय नमो जयवन्त सदा हुये, पद महा अजरामर पा गये॥ धवलकीर्ति ध्वजा फहरा गये, अभय का वरदान हमें दिये। सुखद शीतल छाँव तले गये, परम पावन जीवन पा गये। अध्यात्म मानस सरोवर है पवित्र। शुद्धोपयोग जल से परिपूर्ण पात्र / वैराग्य पंकज खिले मुनि हंस आये। सम्यक्त्व मोति चुगते शिव सौख्य पाये॥ कुसुम से मन मोहक काय से, न ममता लव मात्र शरीर से। अचल मेरु समान मुमुक्षु है, तप किया वह दुर्दरवान है। 5 जंगत वैभव नश्वर ही रहा, तव दिगम्बर गात्र सुना रहा। दृग खुले डरके निज को लखा, वह अनन्त सुवैभव को दिखा। श्री वीतराग प्रभु के दरबार जायें। सम्यक्त्व रत्न अति दुर्लभ वस्तु पायें। सौभाग्यवान् इसको अतिशीघ्र पायें। मिथ्यात्व के उदय से इसको न पायें। यह चिदम्बर चेतन मूर्ति है, समयसार प्रशान्त समुद्र है। तव स्वरूप निहार कृतार्थ है, विकृतियाँ मद मोह विलीन है। प्रस्तुति - रतनचन्द्र जैन स्वामी, प्रकाशक एवं मुद्रक : रतनलाल बैनाड़ा द्वारा एकलव्य ऑफसेट सहकारी मुद्रणालय संस्था मर्यादित, 210, जोन-1, एम.पी. नगर, _Jain Education Internatभोपाल (म.प्र.) से मुद्रित एवं 1/205 प्रोफेसर कॉलोनी,आयरा०282002(उ.प्र.) से प्रकाशित / संपादक : रतनचन्द्र जैन। www.jainelibrary.ord,