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बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलख ऋषिजी महाराज रचित सदाचार का और व्यभचार का प्रत्यक्ष फल बताने वाला
चारत्र
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- सती भुवन सुन्दरी-चरित्र.
2 29 230 231 232 222 प्रसिद्ध कर्ता-स्वर्गस्थ लघुभग्निक स्मार्थ गुप्त परमार्थिक एक श्राविका दक्षिण हैद्राबाद
श्री वीर संवत्सर २४३७ विकमार्क १९६८-मूल्य-सद्बत-प्रत ५००, सर्व १०००. EDPURPURPREPWBOTPURPHOTOPPORDS TOURUS
आपका बिटिंग मेरा-दैद्राबाद दक्षिण
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॥ श्री जिनेश्वरायनमः॥ ॥ श्री भुवन सुन्दरी चरित्र ॥
१ कमल
॥ दुहा ॥ प्रणमु पद परमेश्वरके । रक्षा करण जगदीश ॥ यशः जिनका विख्यात | N जग । सकल सुरासुर इश ॥ १ ॥ अरिहंत सिद्ध आचार्य जी । उपाध्याय अणगार ॥ विघन हरण मंगल करण । लुली करूं नमस्कार ॥२॥ गुरु चरण पद्मा करु । मधुकर जिम र भ्रमर मुज मन ॥ निश दिवस लोभा रह्यो । ज्ञान रसे लुब्ध तन ॥ ३॥ वीतराग वाणी सुरी | सरश्वती मुज माय ॥ तनुज को सुबुद्ध दे । कार्य चिन्तित थाय ॥ ४ ॥ सहू चरण को सरण ले । धरी नन हुल्लास ॥ सील तणी रचनारच्यूं। भुवन सुन्दरी रास ॥५॥ संक ट समय कायन रही । करी केइ दाव उपाय ॥ सील रत्न शुद्ध राखीयो । महीमा जग
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दिन
नियम भंग के मार्ग में बिलकुल हा प्रवृतन न हुवा चाहिय, फिर दाखय मजहा कि-या अपना सत्य साल आदि नियम-तृत इस जन्म में आग्नेक कुंड का सोतल जल-पानीका सरावर-तलाव बनादताह. मरू जस पहाडा का एक शि ला रुप बनादताह, विक्राल सिंह का हिरण तुल्य बनादताह, सप का पुष्प का माल बनादताह, ओर हलाहल जहर को अमृत बनादेता है. ए सो साक्षी वरोक्त श्लक में राजा-मृतहरो दतह ओर इसहो बात का हबहू चित्र साल आदि तृत धारीयो का बता कर द्रढ बनाने, और अवृतो याँको वृत धारन करान यह “भुवन सुन्दरी सता" का छोटा सा चरित्र बहुत असर कारक जान कर सिकन्द्रा बाद निवासो गुलाब चंदजो गणेशमलजी समदरिया (गणश बोध आदि ग्रन्थक प्रासद्ध कर्ता) और गुप्त पार्थ की इच्छक स्वर्गस्थ लघु भाग्न के स्मणार्थ एक श्राविका बाइने इस ग्रन्थ की १००० प्रत छपवाकर सर्व व्रता यों को अमुल्य समर्पण कर कर्तार्थता समजत है, तपस्वीजो मुनाराज श्रोकेवल ऋषिजी महाराज और बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमालखऋषिजी महाराज ( इस ग्रन्थ आदिक चिता ) यहां विराजना हानसे और श्रीमंत ला ला जो श्री नतरामजी राम नरायगजा जवरी जसकी सहायता से आज तक यहां धर्मिक व व्यवहारिक सुधार हुवह, व २०,००० पस्तका अमल्य भेट दीगइ है ओर भी “परमात्म मार्ग दर्शक" जसा बडी पुस्तको लालाजी के तरफ से छपकर प्रसिद्ध होने का विचार हो रहाहै वगेरा कहमको कुछ जरुर नहीं है, फक्त सुचना इसलिये है कि यह अनुकरण अन्य धर्मात्माओं करके धर्म ज्ञान को वृद्धा करंग-तथास्तु चारकमान-दक्षिणहैद्राबाद
वृतीयोंकादास श्रीवीरसंवत २४३७-विक्रमार्क १९६८ आषाड रामलाल पन्नालाल कीमती शुक्लपूर्णिमां
रामपुरावाला.
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॥ श्री जिनेश्वरायनमः ॥
॥ श्री भुवन सुन्दरी चरित्र ॥
॥ दुहा ॥ प्रणमुपद परमेश्वरके । रक्षा करण जगदीश || यशः जिनका विख्यात जग । सकल सुरासुर इश ॥ १ ॥ अरिहंत सिद्ध आचार्य जी । उपाध्याय अणगार ॥ विघन हरण मंगल करण | लुली करूं नमस्कार ॥२॥ गुरु चरण पद्मा करु | मधुकर जिम | मुज मन ॥ निश दिवस लोभा रह्यो । ज्ञान रसे लुब्ध तन ॥ ३ ॥ वीतराग वाणी सुरी || सरश्वती भुज माय ॥ तनुज को सुबुद्ध दे । कार्य चिन्तित थाय ॥ ४ ॥ सहू चरण को सरण ले । धरी नन हुलास ॥ सील तणी रचनारच्यूं । भुवन सुन्दरी रास ॥५॥ संक ट समय कायम रही । करी केइ दाव उपाय ॥ सील रत्न शुद्ध राखीयो । महीमा जग
१ कमल
२ भ्रमर
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खण्ड ?
प्रगटाय ॥ ६ ॥ सरस रस पूरण कथा । श्रोता चित रख ठाम । सुणो प्रमाद छोडी करी । वक्ता कहे धर हाम ॥ ७॥ ॥ ढाल ॥ १५ मी ॥ इण सरवरीयारी पाल उभी दोय नागरी ॥ यह ॥ लक्ष जोयण के माय । जंबू द्विप जाणीयें ॥ हो सुजाण जंबू दिप जाणीयें ॥ तिणमां दक्षिण दिश । भरत बखाणी ॥ हों सु० भरत० ॥ आर्य देश ।
अनृप । विराट सुहामणो ॥ हो सु० विरा० ॥ चन्द्र पुर तिण मांय । सकल मन भावNणो ॥ हो सु० सक० ॥ १ ॥ गढ मढ पोल प्रकार । हाट हवेलीयां ॥ हो सु० हाट.॥ सिक्ट चौवट बजार । स्वर्ग छबे लियां ॥ हो सु० स्वर्ग• ॥ प्रद्युमन नामे भूप । रुप । इन्द्र के समो॥ हो सु. रुप. ॥ न्याय नीती को जाण । विचक्षण भारी खमो ॥ हो सु. विच. ॥ २ ॥ सुखथी पाले राज । खामी कुछ छे नहीं ॥ हो सु, खामी. ॥ धन जोबन को लाभ । उमंगे ते लही ॥ हो सु. उमं. ॥ प्रियवति तसनार । आकार रती जिसोश ॥ हो सु. आकार ॥ सील लज्जा नम्र गुण । बखाण करुं किसो ॥ हो सु.N वखाण. ॥ ३ ॥ लघु बंधव गुण खाण । प्रताप सेण जाणीयें ॥ हो सु. प्रताप.॥
प्रीती आपस में पूर । खीरे नीर मानीये ॥ ॥ हो सु. खीर. ॥ रुप तेज बल पुंज्य । बुद्धि चार सागर ॥ हो सु. बुद्धि, ॥ राज धुरंधर तह । जुग राज प्रजेश्वरु ॥ हो सु
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जुग. ॥ ४ ॥ भुवन सुन्दरी तस नार । शृंगार सील को सजी ॥ हो सु. शृंगार ॥ सती।
२ हिरण Nय शिरोमण तेह । रही पती ने भजी ॥ हो सु. रही. ॥ नग वेणी चन्द्र मुख । कूरंगे तोता
सम नयण छे ॥ हो सु. कूरंग ॥ शुक नाशीक अरुणोष्ट । सुधासम वयण छे ॥ हो सु.४ लाल Nसुधा ॥ ५ ॥ उर उन्नत हरी लैक । मरीलगती गामनी ॥ हो सु. मराला ॥ मानुपते ॥ ५ अमृत
६ सिंह प्रमाण । तनु दिप्त भामनी ॥ हो सु. तनु.॥जैन तणी रेश जाण । पहचाण छे काय ने GST
॥ हो सु. पहचाण. ॥ तत्व निक्षेपा नय । द्रव्य क्रिया न्यायने ॥ हो सु. द्रव्य ॥ ६ ॥ हंस N क्रिम जी रंग ज्यूं मीजी । धर्म मे रंग रही ॥ हो सु. धर्म. ॥ द्वादश वृत में द्रढ । देव डगा सके नहीं ॥ हो सु. देव. ॥ सामायिक पोषध वृत । शक्ती सारु साचवे ॥ हो । सु. शक्ती ॥ प्रतिलाभे अणगार । राचे धर्म राच वे ॥ हो सु. राचे. ॥ ७॥ एक दिन । उष्ण ऋतु माहे । हवाने कारणे ॥ हो सु. हवा, ॥ गइ आकाशी के मांय । बेठी आइ। वारणे ॥ हो सु. बेठी. ॥ दासी बृन्द चउपास । बातां बणावती ॥ हो सु. बाता. ॥ निशंक पणे सब चित । मिली गीत गावती ।। हो सु. मिली. ॥ ८॥ तिण समय प्रद्युमन
राय । चडया था मेहलपै ॥ हो सु. चडया. ॥ गायन सुणी ते वक्त । देख्यो तस खेलपे । Hu हो सु. देख्यो । भुवन सुन्दरी ने पेख । मदन व्याप्यो तन विषे॥ हो सु. म.॥ इन्द्रा
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दणी अपछरा एह । अतुल्य एह छबी दीशे ॥ हो अ. ॥ ९॥ दासी ने पूछीयो तामा खण्ड
उत्तर इशो दीयो ॥ हो. उ जुगरायकी पटनार । राय भेदज लीयो ॥ हो. रा.॥ निरखी। रमा निरंत । द्रष्ट पाछी नहीं फिरे ॥ हो. द्र. ॥ एहवी नारी नहीं सुणी कान । ते ए स्वर्ग थी गीरे ॥ हो. सु. स्वर्ग. ॥ १० ॥ थोडी देर ने मांय । सामायिक समय थयो । हो. सा. ॥ सता आदी परिवार । मेहल मांही गयो ॥ हो. नेह. ॥ महीप अद्रष्ट हुइ तेही राय मुरछा लही ॥ हो. राय. ॥क्षिण में हवो सावधान । दिले ते वसी रही॥ हो. दि ॥ ११ ॥ खान पान सन्मान । भाषण भागे नहीं गमें ॥ हो. भा. ॥ भुवन सुन्दरी N निरंत्र । नृप चित में रमें ॥ हो. नृप. ॥ पहिली ढास रसाल । अमोलख ऋषि कहे ॥
हो. अ.॥ धन्य २ जे जग माहे।सील में स्थिर रहे ॥हो. सी.॥१२॥७॥ दुहा। बेठा सयन । भवन विथे। मन में करे विचार। किण बिध ए प्रेमला मिले। करणो किस्यो उपचार ॥१॥ जगमें जन्म लेइ करी।जो नमिले यह नार ॥ तो जीवित निष्फल सही। धिक २ मुजअवतार २॥ धणी बेठा न धाडा पडे । करणो कांइ इलाज ॥ प्रताप सेण जो न हुवे । तो सीजे। मुज काज ॥ ३ ॥ करकट दुशमण भूप को । लेवण भेज्यूं राज । कोइ उपाय ऐसो रचूं फिर सीजे मुज काज ॥४॥इम बिकल्प ते चिन्तवे । करे सरीरका चेन ॥ कर ठपरकि ।
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१ बोले
सिर धुणे । लेवे ते मुखधी वेण ॥ ५ ॥ ● ॥ ढाल जी ॥ धनरारे लोभी वाणीया ॥ | यह ॥ तिण समय राणी प्रियवती । सज सिणगट जिहां आइ जी । पतीने देख्या वीचारमें। चुप उभी तिहां रहाइ जी ॥ १ ॥ काभी न माने सिखामण | आं ॥ कामी नर अन्ध होवे जी ॥ नी शरमी धारण करे। उंच्च नीच नहीं जोवे जी ॥ का ॥ २ ॥ कर जोडी पूछे तदा । कांइ छे श्वामी विचारो जी || नृप चमको जोइ सन्मुखे । इण विध करे उच्चारो जी ॥ कामी ॥ ३ ॥ अहो सुन्दर भले आवया । संतोषा कने बेठाइ जी || प्रचाइ कहे तेहने । भुवन सुन्दरी मुज चहाइ जी ॥ कामी ॥ ४ ॥ प्रियवती वचन सुणी । मनमां रीस भराणी जी || पति समजावण कारणे । बोले इण परे वाणी जी ॥ कामी ॥ ५ ॥ मधुर वयणे कहे श्वामी जी । एलो कामन कीजे जी ॥ यशः संप. त कुल बल बधे । तैसी चाल से रोजे जी ॥ कामी || ६ | उत्तम कुल का होय के । या बुद्धि किम आइ जी || लघु बन्धव तेनुज समो । बहू पुत्रीसी दरसाइ. जी ॥ कामी ॥ ७ ॥ ऐसा कर्म से आपको । राज पाट किम रहसी जी ॥ लोक सहू फिट कारसी । | सज्जन ओलंभो देसी जी ॥ कामी ॥ ८ ॥ ● ॥ सवैया ॥ कहे घरकी नार । सुणो हो भरतार । मत होवो जार । यार नारी के ॥ रुठे परिवार । धरे सज्जन खार । अरी न्हा
॥
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व्य
खे मार । होवे क्ष्वारी के ॥ जर जोबन जाय । तन मन सुरजाय । ढक उपर गाय । नके द्वारी के ॥ कहे अमोल संत । विष विषय अंत । कइ दुःख देवंत । मानो प्यारी के ॥ १ ॥ ॐ ॥ ढाल वोही || पर महीला प्रसंग थी । दरवे भावे दुःख पावे जी ॥ एह लोक बीति पडे । मर दुर्गत मांही जावे जी ॥ कामी ॥ ९ ॥ इन सीख सुणी भूपती ।। अधीकी रील भराणी जी ॥ उपदेश देवे मुज भणी । तूं दीसे घणी शाणी जी ॥ कामी ॥ १० ॥ खबर दार बोले मती । अक्कल थारी में जाणी जी ॥ जा तूं महाराथी परी ! दूजे स्थान गइ राणी जी ॥ कामी ॥ ११ ॥ चैन पडे नहीं क्षिण भरी । अंग में व्याप्यो कालो जी ॥ तडफनिकाली रातते । जब ऊगो दिने वामो जी ॥ कामी ॥ १२ | आइ सभा में हुकम दयो । शैन्य शिघ्र सज कीजे जी ॥ अरी करकट को क्षय करी || राज तस तावे लीजे जी ॥ कामी ॥ १३ ॥ नगारो सुण जुंगराय जी । जेष्ट भ्रात पासे आया जी || पूछ्वाथी कहे राय जी । तुज ने फिकर नहीं कायां जी ॥ कामी ॥ १४ ॥ धृग तुज क्षत्री पुत्र ने । भोग में गृध थइ रहीयो जी || दुशमण धूम मचा रह्या । तास खबर नहीं लहीयो जी ॥ कामी ॥ १५ ॥ प्रताप सेण सुणी वयण ए। अंग में चडयो रण शुरोजी ॥ कोण शत्रू छे बतावीये । अब्बी करूं चक चूरो जी ॥ कामी ॥ १३ ॥
खण्ड १
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९ दोपहरे २ राना
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राय कहे होइ सज तुमे । करकट को जाइ मारो जी || आण मनावो आपणी । पाछा | वेग पधारो जी ॥ कामी ॥ १७ ॥ बचन चडाइ सिरपरे । निज मेंहल मांही आवे जी | बीजी ढाल बन्धू कपट की। ऋषि अमोलख गावे जी ॥ कामी ॥ १८ ॥ * ॥ दुहा। ॥ प्रीतम पधार्या देखकर | सती उठ आदर दीघ || रण मांहे जावा तणी । सती - |गल बात की ॥ १ ॥ एक मांस में आवस्यूं । थे रह जो सुख मांय ॥ सील रत्न तन करंड में । राख जो यत्न सवाय || २ || सती कहे भले पधारीये । करी शत्रू को नाश || वेगा दरशन देइने । पूरण कीजे आस ॥ ३ ॥ शैन्या संग सुर चालीया । सती नेणे नीर भराय ॥ प्रद्युमन खुशी हूवा । हिवे मुज कार्य थाय ॥ ४ ॥ ७ ॥ ढाल ३ जी ॥ चार पेहर को दिन होवेरे लाल || यह || दूजे दिन प्रद्युमन रायजीरे । प्रताप सेण का दासी दास हो ॥ श्रोताजन ॥ निकलाइ दीया मेहलधीरे । पूरवा भगी दुष्ट आस हो ॥ श्रोता | जन ॥ १ ॥ जोय जो सती को सत्य पणोरे || आं ॥ पर वश पणें ते बापडारे । जाइ बेठा निज गह हो ॥ श्री ॥ पुरी मंडले तब गर्डे पतीरे । विभूक्षित करी निज देह हो ॥ श्रो ॥ जो ॥ २ ॥ निशंकपणे गुप्त मार्गेरे । भुवन सुन्दरीरा मेहल मांय हो श्रोत ॥ आवे चोर तणी परेरे । सती बेठी सामायिक ठाय हो ॥ श्री ॥ जोय ॥ ३ ॥ अचाणक आइ
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उभा रझारे । सती चमकी तिण वार हो ॥ श्रो॥ यह कुण आया मुज मेहलमेरे ॥ भु.सु । उफिकर पडयो अपार हा ॥ श्रो ॥ ॥ जोय ॥ ४॥ थर २ अंग धूजण लग्योरे । माणस खण्ड
नहीं कोइ पास हो ॥ श्रो॥ महारो जोर यहां किशो चलेरे । रखे करे सील वीणास हो ॥ श्री ॥ जोय ॥ ५ ॥ नृप कहे न घबराबीयेरे । हं छू पृथवी को इशहो सुन्दर॥प्रिये । मुज पर कृपा करीरे । पूरण कीजे जगीश हो ॥ सुन्दर ॥ जोय ॥ ६ ॥ मुजपर प्रीती धर्या थकारे । पाम सो सुख सवाय हो ॥ सु ॥ प्रतापो गयो संग्राम मेंरे । जीव तो पाछो न आय हो । सु ॥ जोय ॥ ७॥ कटुक बचन सती सांभलीरे । बोली धीरप धार | हो ॥ राजेश्वर ॥ जेठ पिता की ठोड छोडे । बोली जो बचन विचार हो ॥ राजेश्वर ॥ जोय ॥ ८॥ पर प्रेमल नहीं पेखीये जी । जो इच्छो सर्व सुख हो ॥रा ॥ हाथ में कुछ आली नहीरे । उलटो पामसो दुःख हो ॥रा ॥ ९ ॥ रावण पद्मोतर राजीयारे । कीचक कौरव जाण हो ॥राजे ॥ सती को छल कियां थकांरे । दोइ भवे हुवा हैरान हो ॥ जोय ॥ १० ॥ भूधर कहे में समज्यूं नहीरे । मुजने एक थारी चहाय हो ॥ सुन्दर ॥ दुःख देणहार मुज को नहींरे । विचरुं जिम सुख थाय हो ॥ सु ॥ जोय ॥ १२ ॥ खुशी N/ थी जो मुज चाव सोरे । तो पासो सुख अपार हो ॥ सु ॥ तूं स्त्री की जात छरे ।
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बलत्कारी को आचार हो । सु । जोय ॥ १२ ॥ सती कहे तुम छो राजवीहो । ए नहीं | उत्तम काम हो ॥ रा ॥ महारो सील सहाइ छेजी । श्री जिन पूरसी हाम हो ॥ रा ॥ जो ॥ १३ ॥ राय कहे में नीच छूरे । किम होत्रे जिन तुज सहाय हो ॥ सु ॥ इम कही ने पकडण चल्योरे । सती नवकार मन ध्याय हो ॥ श्रोता ॥ जो ॥ १४ ॥ सासण सुरी आइ तदारे । नृप ने मुरछा दीघ हो ॥ श्रो ॥ आँख मीच धरणी ढल्योरे । हूयो मृत्युक की विध हो ॥ श्री ॥ जो ॥ १५ ॥ सती के मन चिन्ता हुइरे । अरर हुयो यो अकाज हो ॥ श्रो ॥ मुज मेहल में राज मूयोरे । लोक मील्या जासी लाज हो ॥ श्री ॥ जो ॥ | १९६ ॥ डाकण सीकोतरी बाजस्यूंरे । पती पण करसी अपमान हो ॥ श्री ॥ अहो वीतराग सरणो आपरोरे । पुनः कन्यो नवकारको ध्यान हो ॥ श्रो ॥ जो ॥ १७ ॥ सासण देवी प्रगट हुइरे । सती ने कन्यो नमस्कार हो ॥ श्री ॥ गुटिका दीवी तस हाथ मेंरे । कहें एमा गुण अपार हो ॥ श्री ॥ जो ॥ १८ ॥ इण ने घसी ने लगाव तांरे । सर्व रोग नाश थाय हो । सती जी ॥ तिलक कियां रूप प्रावृतरे । विष सर्व जात विरलाय हो । सती ॥ जोय ॥ १९ ॥ एता गुण बताय केरे । देवी गइ अकाश हो ॥ श्री ॥ तीजी ढाल अमोलख कहीजी । सतीकी पूरी आस हो ॥ श्री ॥ जो ॥ २० ॥ ॥ दुहा || सती सामायिक पारके । भूप
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पासज आय॥ नेत्र गुटिका जल छांटतां । झट सावध नृप थाय ॥१॥ सती उठ दूरी गइ।
खण्ड नृप जोवे भर नयन ॥ लोभी कामी सुख लाल से । करे दुःख केइ सहन ॥२॥ कर जोडी, ५ नरवर भणे। करो मुज अंगीकार ॥ चरन दास हो रेवस्तूं। कह सो करूं प्रकार ॥ ३ १ राजा सती कहे सुण राजवी । जो में करस्यूं पुकार ॥ सज्जन पुरजन मिल करी । कर से ।
तुज फिटकार ॥ ४ ॥ मून रही ने नरपती । आयो आपणे गेह ॥ बेठो चिन्ता माय ने।
मन में वसरही तेह ॥ ५॥ ७ ॥ ढाल ४थी ॥ जात्रीडा जात्रा निन्याणु कारीयेरे ॥ यह ॥ देखो सतीयां तणी द्रढ ताइरे । कायम किम वे सील मांही ॥ देखो ॥ ७॥ क्षिती पति मन मांही वीमासेरे । इहां रह्या काम नहीं थासेरे । वन में लेगयां या वश आसे । देखो ॥ १ ॥ दूती ने तब बुलावर । भुवन सुन्दरी की बात चेतावेरे । कर झट। जाइ एक उपाव ॥ देखो ॥ २ ॥ रथ मांही तास बेठाइरे । ले चाल तूं जंगल मांही गरे ॥ पाछल थी हूँ रहस्यूं आइ ॥ देखो ॥३॥ दूती भुवन सुन्दरी पास आवेरे । मधुर वचने इम बोलावेरे । प्रताप सेण जी तुमने बुलावे ॥ देखो ॥ ४ ॥ बन्धव कपट बात। तिण जाणीरे । बाहिर डेरा दीपाछे आणीरे । सती जाणी बात साचाणी ॥ देखो॥५॥ आइ बेठी रथ चलायोरे । पीछे थी धरणी धव आयोरे । मिल्या आइ जंगल ने मायो
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H॥ देखो ॥ ६ ॥ दूती सारथी पाछा पठायारे । रथ उभो कर्यो झाडी मायारे । सती १ रना भूपेत जोइ धस्काया ॥ देखो ॥ ७ ॥ राज खड्ग हाथ मांही लीधोरे । चेरो रोस भगा।
कीधोरे | सती से बोले कूवीधा ॥ देखो ॥ ८॥ हिवे वांछा कर तूं महारीरे । नही तो इज्जत लेस्ट्रं हं थारीरे । सती नीचे उतरी तिण वारी । देखो ॥ ९ ॥ दोडी इत उत्तम अंग छीपावरे । राज तिण पाछे धावरे । तस्कर मध्ध भंग पडावे ॥ देखो ॥ १० ॥ चोर ।
२ चोर INपल्ली को भील राजारे । आयो सीकार खेलण काजारे । सती राजा देखी अति ला--
जा ॥ देखो ॥ ११॥ तस्कर पत तिण कने आयारे । पूछे यह क्या झगडा मचायारे । सती देखीने तेहवी मोहवाया ।। देखो ॥ १२ ॥ राजा कहे यह महारी नारीरे। मुज छोड। करे व्यभचार ॥ यहां लाया हूं न्हाखुगा मारी ॥ देखो ॥ १३ ॥ भुवन सुन्दरी कहे सुणो। भाइ जी । यारा भाइरी हूंछ लुगाइ जी । इजत लेवे छे कर जबराइ ॥ देखो ॥ १४ ॥ राजा क्रोध में रातो हावरे । आँख्या फाडी ने सामें जोवरे । सती कहे इम कर्या काइ
होवे ॥ देखो ॥ १५ ॥ जो खोटी निजरे जोसोरे । तो निश्चय आँख्या खोसोरे । भव २ IN INमांहे घणां रोसो ॥ देखो ॥ १६ ॥ पल्ली पत तव रीसायोरे । राजाने मार भगायोरे ।।
सती वश आइ जाणी हर्षायो । देखो ॥ १७ ॥ सती लार लेइ घर आयोरे । कू भवा
REAT
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भु. सु.Jसतीने जणायोरे । सुणी सती मन फीकर भरायो ॥ देखो ॥ १८॥ इत्ते भीलडी तिहां आइरे । देखी सतीने ते रीसाइरे । पती साथ लडाइ लगाइ ॥ देखो ॥ १९ ॥ एहने
खण्ड निकाल तूं घरवारे । नहीं तो हूं पडु अगेड मझारेरे । मंडयो क्लेश अनेक प्रकारे ॥ देखो ॥ १९ ॥ चोर सती ने कहे जावो वाइरे । सुण सती अति हर्षाडरे । सहजे फंद टल्यो ।
सील सहाइ ॥ देखो ॥ २० ॥ इम विचार करी ने चालीरे । हुइ चौथी ढाल रसालीरे। INकहे अमोल ऋषि उजमालो ॥ देखो ॥ २१ ॥ ७ ॥ दुहा ॥ रन वन अटवी विहामणी।
रात तम भय कार ॥ स्वपद जीव गतो गत करे । सती एकली निराधार ॥ १॥ लागे । २वनकेपर काँटा काँकरा । शीतल बाजे वाय । खाड पाहाड उल्लंगती । नवकार स्मरती जाय ॥ २N
॥ पीछे को डरमन विषे । रखे कोइ पकड लेजाय ॥ पुण्य जोग अटवी लंधी । तब ५ मूर्य उग्यो दिने राय ॥३॥ निज पीयर की सीम में । आइ निकली तेह ॥ पूछत आइN IN पिता नगर । निज मेहल धरनेह ॥ ४॥ पोलीये कह्यो जाइ रायने । बाइ एकली आइ
बार ॥ तक्षिण राय सुण आवीयो । हिवे देखो कर्म प्रकार ॥ ५॥ * ॥ ढाल ५ मी ॥
बंधव बोल मानो हो ॥ यह ॥ तिण अवमर चन्द्र पुर पती । आयो निज पुर मांही है। IN ॥ पत्र लिख्यो अवनी पुरे । लाइ कपटाइ हो ॥ १॥ भविक जन सील सहाइ होम
३आवागम
४ उलघगा
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१ पथर
आं ॥ चन्द्र पुर थी प्रताप सेण को। बांचीजो जुहारा हो । तुम पुली कूलंछनी । कहाडी घर के बारो हो । भवि ॥ २ ॥ कासीद पत्र ले चालीयो । अवनी पुरे आयो हो | सत्य सेण उभा आवारणे । तस पत्र बताया हो ॥ भवि ॥ ३ ॥ पत्र बांचीने भूपति अति क्रोध भरायो हो । करुर निजर सती सन्मुखे । जोवे तब रायो हो ॥ भवि ॥ ४ | ॥ रे अभाग्यणी दुष्टणी | कुल कलंक लगायो हो ॥ धिक्क २ तुज चतुराइने | विभचार उपायो हो ॥ भवि ॥ ५ ॥ पापणं पेटे पडयो होतो । तो नीव में देता हो ॥ जन्म तांइ मुंइ होती तो । दुःख कर रह तो हो ॥ भवि ॥ ६ ॥ कालो मुख कलंक से कर | यहां | क्यों आइ हो ॥ तुज देख्या मुज आंतडी । अभीसी दजाइ हो || भवि ॥ ७ ॥ इम कटुक बचन सूणी सती । पडी तिहां मुरछाइ हो || जलविना जलचलपरे । तडफ रही काइ हो ॥ भवि ॥ ८ ॥ सती बंधव मधुकर जी । बेहन आगम सुणीयों हो । दोडी आया मिलण भणी | देखी अश्चर्य थुणीयों हो ॥ भवि ॥ ९ ॥ नृप से पूछे कर जोड के । बाइ क्यों मुर छाइ हो । भूप कहे इण दुष्टणी । फेरी कुलपे स्याइ हो ॥ भवि ॥ १० ॥ लेजाइने अटवी विषे । दीजे सीस उडाइ हो । सती कर जोडी कहे । सुणो तातजी भाइ हो । भवि ।। ११ । पति प्रदेश संचर्या । करी जेठ अन्याइ हो ॥ वन में मेली
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तस्कर गृही। तिहां थी वच आइ हो ॥ भवि ॥ १२ ॥ में कू कर्म कर्या नहीं । कहूं।
खण्ड सोगन खाइ हो ॥ पती आत्रे जिहां लगे । राखो दया लाइ हो ॥ भवि ॥ १३ ॥ हिवे ।।
आधार आपको । पडी चरण में आइ हो ॥ नृप टली दूरी करी । वोले रीस भराइ हो । Taln भवि ॥ १४ ॥ लज्जा हीणी पापणी । थने शरम न आवे हो ॥ झुठो बोली दूजा परे । । कूडो आल चडावे हो ॥ भवि ॥ १५ ॥ मधुकर कहे झुटी किम कहो । तव पत्र बताइ हो ॥ अक्षर यह तस हाथ का । चन्द्र पुर के जमाइ हो ॥ भवि ॥ १६ ॥ गुप्त रस्ते ।। मधूकर तदा । सती ने ले जावे हो ॥ स्मशाणमें उभी करी । इण परे बोलावे हो ॥ भवि N॥ १७ ॥ बाइ म्हारो दोषण नहीं। ऐसा कर्म हे थारो हो ॥ संभाल अब इष्ट देवने । कही कहाडी तरवारो हो ॥ भवि ॥ १८ ॥ सती नैनाश्रुत हुइ कहे । सुण म्हारी भाइ। हो । मरने से हूं ना डरूं । डर कलंक को आइ हो ॥ भवि ॥ १९ ॥ पती यह बात जो । जाणसे ! तो दुःख घणो पासे हो ॥ महारा कर्म छ जहवा । ते आयां जाणा से हो ॥ भवि ॥ २० ॥ इम कही श्री नवकार को । सती ध्यान लगायो हो ॥ बेहन ने मारण : भाइजी । जब खडग उठायो हो ॥ भवि ॥ २१ ॥ तिण समय आकाश में । हुइ एहवी । N वाणी हो ॥ मारा मती सती भणी । छ महा गुण खाणी हो ॥ भवि ॥ २२ ॥ कुसुम
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वृष्टी सुर तिहां करी । सती सुख पाइ हो ॥ पंचमी ढाल संकट हरण । ऋषि अमोलख । गाइ हो ॥ भवि ॥ २३ ॥ * ॥ दुहा ॥ मधुकर अश्चर्य हुइ । पडयो सतीके पांय IN/
आँश्रूच रण पखाल तो । इण विध बोले वाय ॥१॥में पापी अजाण में। करण पिता की । पण ॥ तुज अपराध कियो घणो । ते खमजो मुज वेन ॥ २ ॥ सती कहे भाइ कोई को । इण में दोषण नांय ॥ मुज कमें मुज जीव प। विप्त पडी यह आय ॥ ३ ॥ धर्म पसाय दूरी हुइ । अव कहो कीजे काय ॥ मधुकर कहे अबी ग्राम में । बाइ जी जाणों नाय ॥ ४ ॥ कलंक गयां परिवार से । मिलस्यां धरी आणंद ॥ इम कही वन विचरण लगा । हिवे पाछे को सम्बन्ध ॥ ५॥ ढाल ६ ठी ॥ कपूर होवे अति उज्जलारे ॥N यह ॥ अवनीपत जोवो बाटडीरे । मधुकर आयो नाय ॥ चौकस करी भेट भेजनेरे।
१॥ पालमटर १ अन्धा पत्तो न लग्यो किण ठाय । चतुरनर । जोवो कर्म चरित्र ॥ ७ ॥ स्माशणे आइ जोवता
र । पुप्प पड्या तिण ठाम ॥ समज्या ते होती महासती जी। दोनों गया किण गाम N॥ चतुर ॥ २ ॥ जमाइ जी इसो जाणसी तो । किसा करती हवाल ॥ फिकर करता।
घरे गयाजी । निकल्यो न कांइ सवाल ।। चतुर ॥३॥ निश दिन चिंता में रहे जी । घर हाणी जन हांस ॥ हिवे प्रद्युमन राय को जी । चरित करुं प्रकाश ॥ चतुर ॥ ४ ॥
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खोटो खत लिख्यां पछे जी । अशुभ प्रगटया पाप जोग ॥ नेल गया अन्धा थयाजी
JAखण्ड उपज्यो नहीं कछू रोग ॥ चतुर ॥ ५॥ पश्चाताप करे मन विषे जी। किण थी को नहीं । जाय ॥ किया कर्म उदय हुवा जी । लागे न कछू उपाय ॥ चतुर ॥ ६ ॥ प्रतापसेणN अरी जय करी जी । जीत नगारा बजाय ॥ चन्द्र पुर हर्षी आवीया जी। लाग्या भाइ के पाय ॥ चतुर ॥ ७ ॥ अद्रेष्ट भाइ ने देख ने जी। पूछे वे कर जोड ॥ कांड कारण थी भाइ जी । हुइ नत्र की खोड ॥ चतुर ॥ ८ ॥ कहे गरमी में खाइ घणी जी ।।
तिण थी आइ सुज आँख ॥ उपचार तो कीधा घणा जी । ते सह - हुवा घृत। गोबर राख ॥ चतुर ॥ ९॥ फिकर करी मेहला आधीया जी । लाग्या दीठा कमाड ॥
दास ने पूछ्या कहे राय जी। दीना राणी जी ने कहाड ॥ चतुर ॥१०॥ अश्चर्य धर चि। Nन्ते चित में जी। फिस्यो अव गुण तिण मांय ॥ लाखीणो मुज बंधवो जी । किम कियो । एह उपाय ॥ चतुर ॥ ११ ॥ फिर आया भाइ कने जी। पूछे कारण जेय ॥ किम निका । ली तिण भणीजी। बीतक देवो केय ॥ चतुर ॥ १२ ॥ साच कह्यो जावे नहीं जी। जे। कियो पोते अन्याय ॥ पाप छीपावा पंचरची जी । बोले इणपर वाय ॥ चतुर॥ १३॥ वा पता हूं ती धूतारणीरे । तुज ने लियो थो भरमाय ॥ थारा देखत धरमिण वणीरे । पाछे क
DALA
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१ पहाड
रती अन्याय ॥ चतुर ॥ १४ ॥ एक दिनमें छत्तेप चडी जी । जोयो तुज मेहल मांय ॥ कू कर्म करती देखनेजी । आइ रीस सवाय || चतुर ॥ १५ ॥ तिण पण मुजने देखीयो जी । जार गयो तब नाश | में गुप्त गयो तुज मेहलमें जी । भुवन सुन्दरी के पास ॥ चतुर ॥ १६ ॥ निर्लज्ज मुजने फसाव बाजी । कीधा बहूला उपाय ॥ कुल कलंकित जाणनजी । मुज अंग लागी लाय ॥ चतुर ॥ १७ ॥ में मन माहे जाणीयोंरे । जोप्रगट सी यह बात । तो कुल आपणो लाजसीरे । इम चिंती रथ मंगात ॥ चतुर ॥ १८ ॥ पिछले रस्ते लेयनेजी । मेली अटवी मांय ॥ अवनी पुरे कागद दियोजी । तुज सुसराने बात जणाय ॥ चतुर ॥ १९ ॥ प्रताप सेण अश्चर्य हुयोजी । अहो २ स्त्रीकी जात ॥ अफूके फूल सारखी जी ॥ विष भर्यो जेहनो गात ॥ चतुर ॥ २० ॥ लज्जा पामी चुपका रह्या जी ॥ चलावे सुखे राज || छुट्टी ढाल अमोलख कही जी । जोवो कपटीके काज ॥ चतुर ॥ २९ ॥ ७ ॥ दुहा || हिवे मधुकर भुवन सुन्दरी । करे वन फलका आहार || अवनी सयन गीरी घन रहन । वन दुःख केइ प्रकार ॥ १ ॥ एक दिन जल मिलीयो नहीं । लागी प्यास अपार | गीरी गहन जोता फिरे । वारी को आगार ॥ २ ॥ भुवन सुन्दरी थाकी घणी । कंठ रह्यो सोसाय ॥ बेठा तरु तल दोइ जणा । मधु चिन्त मम
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२ पाणी
३ रथ न
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भु.सु.
माय ॥ ३ ॥ इहां बेठां कोइ लायने । पावे न आंपाने नीर ॥ भनी तिहां सुवाडने । चाल्यो घर मन धीर ॥ ४ ॥ शतिल छांय पवन करी । सती निंद्रा वश थाय ॥ भाइ बेहन को विरह पडे । ते सुण जो चित लाय ॥ ५ ॥ ७ ॥ ढाल ७ मी ॥ जल्लाकी देशी ॥ श्रोता, तिण अवसर तिण काले क्षिती पुर श्वामीहो ॥ सुणो चित रख ठाम ॥ तिण अवसर तिण काले क्षितीपुर श्वामी हो । राजिन्द्र ॥ श्रोता, विर सेण नामे सूरो राजा गुण धार्म हो ॥ सुणो ० वीरसेण ० राजिन्द्र ॥ १ ॥ श्रोता, चतुरंगी शैन्या सज तिण वार कराइ हो सुणो० चतुरंगी ० राजिन्द ॥ श्रोता, वन क्रिडा करवाने वन माहीं आइ हो । सुणो० वन० राजिन्द्र ॥ २ ॥ श्रोता, मही पती अश्व झपट थी सती कने आवें हो || सुणो० मही० राजिन्द्र ॥ श्रोता सती निंद्रा वश तेहनी खबर न पावे हो ॥ सुणो० सती • राजिन्द्र ॥ ३ ॥ श्रोता, रुप देखी ने नर पती अती मोहवात्रे हो || मुणो० रुप० राजिन्द्र ॥ राजा, मधुर वचन थी सतीने तब जगावे हो ॥ सुणो० मधु० राजिन्द्र ॥ ४ ॥ श्रोता, भाइर करती सती बेठी थाइ हो || सुणो० भाइ • राजिन्द्र ॥ श्रोता, संतोष बचन थी राजाजी ताम बोलाइ हो || सुणो० संतोप० राजिन्द्र ॥ ५ ॥ सुन्दर, आपने चाहीये | ते कृपा करी फरमावो हो ॥ सुणो० आप० नारीश ॥ सुन्दर, चलो मुज मन्दर जिम सुख
खण्ड
१ बेहन
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। सह पावो हो । सुणो० चालो० नारीश ॥ ६ ॥ राजा, सती कहे मुज बन्धू लेवाने गया पाणी हो ॥ सुणो० सती० राजिन्द्र ॥ राजा, ते आयां थी चल स्यूं साथ थाणी हो ॥ सुणो० ते आया० राजिन्द्र ॥ ७ ॥ सुन्दर, राय कहे बेठी रथमें मुज संग । N चालो हो ॥ सुणो० राय नारीश ॥ सुन्दर, कई मीठास थी। एमुज बचन ने पालो हो । 13॥ सुणो० कहूं• नारीश ॥ ८॥ श्रोता, ते अबला घबराइ रथचड चाली हो ॥ सुणो०
ते अ० राजिन्द्र ॥ राजा, मेली मेहल में खुशी थयो नरपाली हो ॥ सुणो० मेली० राजि|| १ राजा न्द्र ॥ ९ ॥ राजा भोजन पाणी सतीने पास पठायो हो ॥ सुणो० भोज. राजिन्द्र ॥ श्रोता वृत भंग वन्धु वीजोग डरे नहीं भायो हो ॥ सुणौ० वृत. राजिन्द्र ॥ १०॥ श्रोता निशा पंडया शृंगार सजी राय आया हो ॥ सुणो० निशा राजिन्द्र ॥ राजा, अति नर । माइ थी मनका भाव दर्शाया हो ॥ सुणो० अति० राजिन्द्र ॥ सुन्दर, पट्ट राणी कर हुकम प्रमाणे चालस्यूं हो ॥ सुणो० पट्ट० नारीश ॥ सुन्दर, मनसा पूरो तो हूं तुम बचन । Nने पालस्यूं हो ॥ सुणो० मन० नारीस ॥ १२ ॥ राजा, सती भाखे सुण भूपत म्हारी ।
वाणी हो । सुणो० सती. राजिन्द्र ॥ राजा, सती यांरो छल अनंत दुःखांरी खाणी हो । - सुणो० सती• राजिन्द्र ॥ १३ ॥ राजा, रावण पद्मोतर कचिक मणीरथ जाणो हो ।
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भु.सु.
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सुणो० रा० राजिन्द्र || राजा, इत्यादी पर नारीथी डूव्या महाराणो हो । सुणो० राजि - न्द्र ॥ १४ ॥ राजा, इन्द्रादिक नहीं वाळूं मनकर राया हो ॥ सुणो० इन्द्रा० राजिन्द्र ॥ राजा, तूं क्यों अशुची रुप देख मोहवाया हो । सुणो० तूंक्यों० राजिन्द्र ॥ १५ ॥ श्रोता, नृप चिन्ते यह मुज वशमे पडी आइ हो । सुणो० नृप० नारीस ॥ श्रोता, ए अबलकी जात भाग किहां जाइ हो । सुणो० अ० नारीश ॥ १६ ॥ श्रोता, इम चिन्ती निज ठामे फिरी आयो पाछो हो । सुणो० इम० राजिन्द्र ॥ श्रोता, फिर२ जोवा जावे लागे रुप आछो हो । सुणो० फिर० राजिन्द्र ॥ १७ ॥ श्रोता, निर्लज्ज बोलणो सती सुणी घबराई हो || सुमो० निर्ल० राजिन्द्र ॥ राजा, तुज पग किम नहीं टूटा फिरर आइ हो ॥ सुणो० तुज० राजिन्द्र ॥ १८ ॥ श्रोता, इम बचन सुणी उतरतां पग लचकायो हो । ॥ सुणो० इम राजिंद्र ॥ श्रोता, डर लाइने भूप निजठाम सिधायो ॥ सुणो० डर० राजिन्द्र ॥ १९ ॥ श्रोता, पीडा बहूली थावे घणो पस्तावे हो ॥ सुणो० पीडा० राजिन्द्र ॥ श्रोता, अनीती किया थी ऐसी आपदा पावे हो || सुणो० अनी राजिंद० ॥ २० ॥ श्रोता ढाल सातमी सती प्रभाव की दाखी हो ॥ सुणो ढाल० राजिंद ॥ श्रोता अमोलख ऋषि कहे | सत्य को साहिब साखी हो || मुणो० अमो० राजिंद ॥ २१ ॥ ७ ॥ दुहा ॥ सती चिन्ते
खण्ड १
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जंगल
चित के विषे । रहणे में नहीं सार ॥ सुरी गुटिका प्रभाव से । कीनो पुरुषा कार ॥ १ ॥ सिरपर फेटो बान्धीयो । मुखे भभूती लगाय ॥ भगबां वस्त्र पेहरीया । तिलक छाप । शुभ ठाय ॥ २ ॥ समरना करके विषे। गले रुद्राक्षकी माल ॥ कीधी जोग विधी सह ।। दीपे अति विशाल ॥ ३ ॥ गुप्त मार्गे नीकली । गइ कन्तार के मांय ॥ नृप चौकस कीनी घणी । खबर कछु नहीं पाय ॥ ४ ॥ सती वे फीकर भूमंडले । फिरे स्वइच्छा गर ॥ हिवे मधूकर की वरता । सुणीयों सहू नर नार ॥ ५॥ ढाल ८मी ॥ राज ग्रहीतो नगरी जी ॥ यह ॥ मधुकर जल ले आवीयो । बेन को पतो नहीं पात्रीयो । घबरावीयो। बाइ २ करतो फीरे जी ॥ १॥ किहां गइ बेहन महा सती । थारो आधार हूं तो अति , । हे महामती । तुज विन मुज काळजो चिरे जी ॥२॥ जिहां कांइ आवाज थावे ।। तिहां दोड के ते जावे । वाइ नहीं पावे | मुरछा खाइ धरणी पडे जी ॥ ३ ॥ पवनथी ।
साव चेत थावे । इत उत ते वन में जावे । फीकर लावे । इम केइ दुःख तस नडे जी । N॥ ४ ॥ कब तुज दरसण पावसी । जब मुज ने सुख थावसी । चेन आवसी । धन घडी ते लेखस्यूं जी ॥ ५॥ कोण दुष्ट तुज ले गयो । न जाणू किम हरण थयो । इम दुह वयो । विजोग तणा दुःख रेखस्यूं जी ॥ ६ ॥ इतरे प्रदेशी वाणीया । आया भाग्य का ।
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ताणीया पहा या । गनुन्य दीले कोइ पुग्य तो जी ॥ ७ ॥ सेठ तिण पासे आवा या। शिष्ट बचना बतलवीया । संतोषावीया । धैर्य देइ इम पुछतो जी ॥ ८॥ तुम कुण।
खण्ड N|भमो किम वन विषे । दिल उदास थाणो दिसे । किसी जगीस । फरमावो कृपा करी ।
जी ॥ ९ ॥ मधुकर वीती बारता। सेठ आग उच्चारता । सेठ धारता । इण ने हूं राखं पूल परीरे ॥ १० ॥ चिन्ती कहे फीकर मत करो । महारी केण हृदय धरो। म संग चलो । सुत तणी परे राखस्यूं जी ॥ ११ ॥ कुँवर तिण साथे थयो । उपर थी सोग विसरी गयो । मिल्यो सुख चयो । पूर्व पुण्य की साखस्यूं जी ॥ १२ ॥ देशो देश फिरी रया । इम केता दिन वही गया । चन्द्र पुर गया ।वैपार करण तिहां रह्मा जी ॥ १३॥ एक दिन पाप उदय करी । कुँवर ने काटयो जीव जैहरी । चडी ते लेहरी । क्षिण भर मे मुर्छित थयो जी ॥ १४ ॥ सेठ देख फीकर करे । रोवे पीटे घणो दुःख धरे । मुख उच्चरे । अरे पुत्र तुज सी भयो जी ॥ १५ ॥ उपाव कर्या अति घणा । जोर न चाल्या कोइ तणा । क्षप्या घणा । सब जाण्योयोतो मुयो जी ॥ १६ ॥ सह जन अति दुःखीया । भइ । ले जावण बिध बणाइ स्मशाणो आइ । सहू सज्जन संग परवरी जी ॥ १७ ॥ डाल आठ पुरी थाइ । अमोलख ऋषि ए गाइ । पुण्य थी भाई । आइ मिले स्वजन IN
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चरी जो ॥ १८॥ ७ ॥ दुहा ॥ तिण समय भुवन सुन्दरी । जोगी रुप के माय ॥ फि। रती ते मही मंडले । आ निकली तिण ठाय ॥ १ ॥ लोक समोह तिहां देखीयो । शो कि अक्रांद करंत ॥ पूछे तस जोगी तदा । कुण ए पुरुष मरंत ॥ २ ॥ एक के परदेशी
राज सुत । मिलियो जंगल मांय ॥ सेठ पुल कर राखीयो। फिरत आया इण ठाय ॥ ३ ॥ अशुभ कर्म के जोग थी। उरगें डस्यो इण तांय ॥ तेहथी प्राणागत थयो । देस्या हिवे जलाय ॥ ४॥ सती तब चित चिन्तवे । जो निकले मुज भ्रात ॥ तो अपणे फिकरवा तणो शरम सार्थक थात ॥ ५॥ ॥ ढाल ९ मी ॥ कुँवर जी अर जी सुणीये ।
मोय ॥ यह ॥ जोगी कहे अहो भाइ जी हम को। बतावो तेह कुँवार ॥ जो हमारी । इच्छा हुइ तो। करेंगे हम उपकार ॥भाइ जी देखो सत्य प्रभाव ॥ आं॥१॥ करामात बतावें तुम को। हम जोगी अवधूत ॥ हमारे हाथ उपकार बने तो । जगा देंवे ।
तुम पूत ॥ भाइ ॥ २ ॥ लोक हर्षी कुँवर कने लाया। देखीयासग्गा भाइ ॥ IN | ढोंग करी गुटि का मुख मेली । सील प्रभाव जे पाइ ॥ भाइ ॥ ३ ॥
सावध हुया सब अश्चर्य पाया । देखे द्रष्ट पसार ॥ कांइ कारणे दहां मुज लाया । बोले एम कुँवार ॥ भाइ ॥ ४॥ वृतात कही जोगी पग लगा |
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भु. सु.
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अर्ज करे सब एम ॥ आप कृपा कर नगरे पधारो । जिम पावां सह खम ॥ भा ॥ ५ ॥ जोगी अवसर जो संग चलीया । सर्व करे गुण ग्राम ॥ केइ लोक तेहने पग लागे । आया सेठके धाम ॥ भाइ ॥ ६ ॥ सुख मांहे रह एकांत स्थाने । यशःफेल्यो जग मांय ॥ कुष्टा दिक केइ मोटा रोगने । तुत देवे गमाय ॥ भाइ || ७ || देश प्रदेशे फेली पर संस्या | आवे जातरी लोक ॥ क्षितीपुर पती पण सुणी बातए पग को कडावू रोग । भाइ | ॥ ८ ॥ शैन्या लेइ तिहां ते आयो । उतय रावला मांय ॥ प्रताप सेण हर्ष धर पूछे किण कारण आया राय ॥ भाइ ॥ ९ ॥ थाणा गाम में जोगी करामाती । कर्यो घणाने आराम । महारो पगमें साजो करवा | आयो छू इण ठाम ॥ भाइ ॥ १० ॥ इम सुणी ने खबर मंगाइ । जाणी साची बात | प्रद्युमन राय अति हर्ष यो । नेत्र मुज शुद्ध थात ॥ भाइ ॥ ११ ॥ बोलावण भणी सचीव भेज्यों । आयो सेठ घर चाल | आदर पाइ कने जा बैठा । दाख्या सर्व हवाल | भाइ ॥ १२ ॥ सचीव सेठ जोगी कने आया || लुली कीयो नमस्कार ॥ नृप आपने याद करे हैं । दाख्या सब समाचार ॥ भाइ ॥ १३ ॥ जोगी कहे मुज कुछ नहीं चहिये । करते पर उपकार || दिल हुवातो कल आवेंगे || नृप कचेरी मझार ॥ भाङ्ग ॥ १४ ॥ प्रधान नमी महीपपे आया । दाखी सबली बात
खण्ड
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NI॥ नवमी ढाल अमोलख दाखी । आगे अश्चर्य थात ॥ भाइ ॥ १५ ॥ ॥ दुहा ॥
जे दिन भूवन सुन्दरी । हर्ष अती दिल धार ॥ नप कचेरी जाव वा । कयों जोगी शंNगार ॥१॥ सेठ सर्व परिवार ले । हुवा जोगी के संग ॥ मध्य बजारे चालीया। मिलीयो । मनुष्य को दंग ॥ २ ॥ केइ लोक गुण उचरे । केइ करे नमस्कार ॥बहू आडंबरे परवर्या ।।
आया कचेरी मझार ॥ ३ ॥ राजादी उभा हुइ । दियो घणो सन्मान ॥ सुवर्ण सिंहासNण जोगी को । बेठाया राजान ॥ ४ ॥ सब परसंसे जोगीने । देखी तस करामात ॥ पर।
उपकारी निर्लोभी । तेही जग पूजात ॥५॥ ७ ॥ ढाल १०मी ॥ सखी पनीया भरन कैसे जाना ॥ यह ॥ दोनो नृप सामने आया । कर जोडी सीस नमाया जी ॥ कहे धन्य। तुम पर उपकारी । सुणो सील तणी महीमारी |१॥ हम उपर कृपा कीजे । नेत्र
चरण दान दीजे जी ॥ झट पूरो ए इच्छा हमारी ॥ सुणो ॥ २ ॥ जोगी विचारी। N/बोले । खट पट हीया की खोले जी ॥ कहो वीती हकीगत थांरी ॥ सुणो ॥३॥साच ।
बोल्यां थी सुख पासो । तक्षिण सब रोग गमासो जी । नहीं तो फिर दुःख अपारी ॥ सुणो ॥ ४॥ भूप अहम सट्टम बतावे । जोगी घ्राण ने हाथ लगावे जी । कहे झुटी । हकीगत यारी ॥ सुणो ॥ ५॥ हम आगे लपराइ न चाले । झुट बोले ते मुज मन ।।
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लाले जी ॥ कांइ कहूं तुम पृथवी राजरी ॥ सुणो ॥ ६ ॥ अवनीपत अति शरमाया । भु. सु. प्रताप सेणने पास बुलायाजी । अब छोडनी सहू लज्जारी ॥ सुणो ॥ ७॥ भाइ तुज
कृपा मुजपे थासी । तो जोगी जी रोग गमासी जी। कहो कैसी इच्छा थांरी ॥सुणो में साची बात इहां दाखू । पण थारो डर मन राखूजी । मने देवो थे अभय बाचारी ॥ सुणो ॥ ९ ॥ प्रताप सेण रजू भावे । बचन भाइ कर ठावे जी । मत मुज डर राखो। लगारी ॥ सुणो ॥ १० ॥ इम सुण प्रद्युमन हर्षाया। महाराज भणी दरसायाजी । भुवन सुन्दरी मुज बन्धु प्यारी ॥ सुणो ॥ ११ ॥ तिणरो छल में कीधो । तिण सराप मुजने के दीधो जी । तिण थी गइ म्हारी आँख्यारी ॥ सुणो ॥ १२ ॥ प्रताप जी क्रोधे भराया | || तरिक्षण खड्ग उठायाजी ॥ अरे दुष्ट करूं थने ठारी ॥ सुणो ॥ १३ ॥ पतिवृतापे कलंक चडायो । इम मने प्रदेश पठायो जी। किहां गइ मुज प्राणाधारी ॥ सुणो ॥ १४ ॥ |॥ जोगी कहे सुणो राणा । थे चालो नी बचन प्रमाणा जी । ज्यों रेवे कीर्ती करारी ॥ पुणो ॥ १५ ॥ प्रताप जी सुस्त रहाया ॥ बचन देइ पस्ताया जी। सती गुटिका ली। कर मझारी ॥ सुणो ॥ १६ ॥ नेत्र उपर फीराइ । तब देखण लाग्या राइ जी ॥ लोक। सर्व थया अचंभारी ॥ सुणो ॥ १७ ॥ वीरसेण कहे सुणो श्वामी । ते सुन्दरी वन में
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पामी जी हवी लायो मुज महलांरी ॥ सुणो ॥ १८ ॥ दुष्ट इच्छा तिण ने दरसाइ तिण सराप मुज ने दियाजी । तिण थी पगकी हुइ खुडारी ॥ सुणो ॥ १९ ॥ जोगी कहे बात ए साची । अब रोग ने देवुं यम डाचीजी । फेरी गुटिका तब चरणारी ॥ पुणो ॥ २० ॥ सबी जणा सुख पाया । ढाल दशमीके मांयां जी । ऋषि अमोल सील सुखकारी ॥ सुणो ॥ २१ ॥ ७ ॥ दुहा || प्रतापसेण मधुकर मिली | करे जोगी से | अरदास || तुम ज्ञानी पूरा गुणी । हम संदेह करो प्रकास ॥ १ ॥ जोगी कहे तुम मन बले । भुवन सुन्दरी नार || तेहने इहां प्रगट करूं । तो मुज नाम उचार ॥ २ ॥ दोइ जणा खुशी हुवा । लेगया महल के मांय । कर जोडी जुगराज कह । झट दो मुज बताय ॥ ३ ॥ सती अवसर देखी तदा । तिलक ते सिरथी निकाल । नमन किया प्रा- | गेशने । मूल रुपने निहाल || ४ || हर्षाश्चर्य दोनो भया । कहे धन्य तुज अवतार । ते सुख जाणे आत्मा । के सर्व नाण काधार ॥ ५ ॥ ७ ॥ ढाल ११ मी ॥ रघुपति जीरा जी || यह ॥ सुख समाचार पूछीया जी । भाइ बेन मिल्या दोय || अवसर मधुकर | देखनेरे । बायर आया सोय ।। सबी दिल हर्ष्या जी। देखी सील तणो प्रताप । सती गुण परेख्या जी । टली गया सब संताप । सवी दिल || आं ॥ १ ॥ लोक जोवे बाट जोगी
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भु. सु.
खण्ड
नाजी । किम नहीं आया बार ॥ मधूकर बीती बातडी । करी सभा माहे उचार ॥ सवी । ॥ २ ॥ सब कहे यह अश्चर्य बडोजी । साक्षात देख्या प्रभाव ॥ जैन सरीखो धर्म नहीं। |तील सरीखो नहीं उपाय ॥ सघी ॥ ३ ॥ सब जणा निज स्थानक गया जी । मुलकमें । पसरी बात ॥ अवनी पत सुण इच्छा हुइरे । पुती मिलण ने आत ॥ सबी ॥ ४ ॥ राय भवन मे आवीया । जमाइ न दीयो सन्मान ॥ पत्र बतायो राय को जी। तब
आगो समाधान ॥ सवी ॥ ५॥ मधुकर जा बेहन ने कह्यो जी । आया पिता जी एथ। N॥ बोलणो नहीं तिण थी हीवे जी । सती तब उत्तर देत ॥ सबी ॥ ६ ॥ दोष नहीं । पिता जी तणों जी । कर्म करे जिसो थाय ॥ रुसणो कदा करणो नहीं । भाइ दीजे आदर सवाय ॥ सवी ॥ ७ ॥ अवनीप आया मेह में जी । लज्जायत अति थाय ॥ सती उठ। वरणे नमी । कर्म दोष दरसाय ॥ सबी ॥ ८॥ आंधत होइ हृदय चंपी जी । पर-N|
संस्था करी सवाय ॥ वात विगत संतोषीया ॥ जीम्या सह अधिक उमाय ॥ सबी ॥ ९/ N/॥ किनाक दिन के आंतरे जी । धर्म घोष ऋषि राय ॥ धणा मुनीवर परिवारस्यूं जी IN
उतर्या बाग में आय ॥ सबी ॥ १० ॥ राजा आदी सबी जणा जी । मुनी दर्शन के काज ॥ गया अंतेवर संग लेइ जी । वंदी वेठ्या नम्याज ॥ सबी ॥ ११ ॥ मुनीवर ।
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दीवी देशाना जी। धर्म सदा श्रेय कार ॥ उपसर्ग एह थी मोटा टले। होबे काया को उद्धार ॥ सबी ॥ १२ ॥ संयम मार्ग आदर तो । दुःख कधी नहीं पाय ॥ दोनो लोके सुखीया होवे जी । अजरामर पद पाय ॥ सवी ॥ १३ ॥ भव्य वैराग्य मन आण ने जी । किया घणा पञ्चखाण ॥ ऋषिश्वरने वंदना करी जी। आया निज ठिकाण ॥ सबी ॥ १४ ॥ पुण्य प्रभाव थी आरज्यां जी । पधाया करत विहार ॥ भुवन सुन्दरी आणन्दने जी । मांगे आज्ञा ते वार ॥ सबी ॥ १५ ॥ प्रताप सेण कहे मीठास थी । तुज अजु वय छे बाल ॥ पडती वये संयम लीजो । अब्बी भोगवो भोग विशाल ॥ सब ॥ १६॥ सती कहे वनमें जो मरती तो । कोण भोगवतो भोग ॥ धर्म पसाये हूं बची । तेही आदर स्यूं जोग ॥ सबी ॥ १७॥ उत्तर प्रत्युत्तर हुया घणाजी ।। दिक्षा मौछब कराय ॥ वह ठाटे बहू जनमिली जी । आया वाग के मांय ॥सबी ॥१८॥ लोच करी दिक्षा ग्रही जी। अति आणंद मन लाप ॥ परिवार श्रावक वृत ग्रही। धरी उदासी घर जाय ॥ सबी ॥ १९ ॥ सती ज्ञान उद्यम करी जी । तपस्या मांडी करुर । संथारो कर स्वर्गे गइ । आगे पावसी शिव सुख पूर ॥ सबी ॥२०॥ इम जाणी सील आal राधीये जी। नर नारी धर प्रेम ॥ एका दश ढाल अमोल कहे। तो पामसा अविल क्षेम ।
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॥ सबी ॥ २१ ॥ * ॥
क खण्ड ॥ कळश ॥ हरीगीत ॥ पुज्य कहान जी ऋषिकी स्मप्रदा । खूबा ऋषि जी अने सरी
चेना ऋषि जी गुरु प्रशादे। सील महीम्गं यह करी ॥ रत्न ऋषि जी महाराज पास रही । अमोलख ऋषि उच्चरी ॥ उन्नीस सो छप्पन शाले । अहमद नगरे । दक्षिणेश्वरी ॥ १॥ दूबली अष्टमी गुरु दिन । सील महीमा की खरी । गावे गवावे सुणे सुगावे । ते लेसी ही श्री ॥ त्रणे तत्व को शुद्ध धारो । तो लेवो शिव पुर वरी । जय २ रहो । १ देव, श्री जैन धर्म की । आनन्द मंगल शुभ भरी ॥ २ ॥ - परम पुज्य श्री कहान जी ऋषि जी महाराज की स्मप्रदाय के बाल ब्रह्मचारी मुनी श्री अमोलख ऋषि जी कृत सील महीमापरः
॥ भुवन सुन्दरी सतीका चरित्र समाप्त ॥
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________________ LEKKEKEKEKEKEKEKIN ЕКСКУКУКУКУКУКУКЕК Суукккккк KVERSEN - सती भुवन सरी-चरित्र समाप्तम्. KEKEKEKSK AKVAKS KVKYKYKYK. KIEK KARTOSHKA КЕККЕ ЕКСКУПККЕ