Book Title: Anekant 1940 05
Author(s): Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Veer Seva Mandir Trust
Catalog link: https://jainqq.org/explore/527162/1

JAIN EDUCATION INTERNATIONAL FOR PRIVATE AND PERSONAL USE ONLY
Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ NOR ORIEOKOTKOONIORICKEGORIOTIRGOTOSTEGOROFONTEGORIEONITOR@ro@roro@HOTI वैसाख वीर नि० सं० २४६६ वर्ष ३, किरण ७ अनेकान्त मई १९४० वार्षिक मूल्य ३ रु० FOOZANOROSPIOHTONIONIDATTROOTKHOROSITFORDER(GORIFOORIORNOHIRODHIROHOROHORONORO सायककात भाव को लोक विद्या अभाव जीव आत्मा परमालाआचदा अजीव मास बन्ध सारन्य hna काशक मामासक 11 balkan p): 2 -अनेको सुखकर्म अकर्म सुनय be प द साधर्म्य विवार्य हिंसा हिंसा वदन्त असत्य bab ERIET समान सत्य। चायाक अनेक साहत्य lallk विभावअप्रमाण इतिहास b ildebet A Hahaha ht 2 RAPE LANOONTROOF HONOROSPINOOPIONOMISEOHIDYASINOMICRTINOGELEELOPINONOHINOSANOOPIOICEIGENOK सम्पादक संचालकजुगलकिशोर मुख्तार तनसुखराय जैन अधिष्ठाता वीर-सेवामन्दिर सरमावा (सहारनपुर) कनॉट सर्कस पो० बो० नं०४८ न्यू देहली। AGAONOMISARDIGISION MEDIGITATOGHIGENOINSGENERONOGENORGRIOKOMARG मुद्रक और प्रकाशक-अयोध्याप्रसाद गोयलीय ONTEGO HODIOPORNO Page #2 --------------------------------------------------------------------------  Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पाहम स NELHILMINIMIM IMITRA - नीति-विरोध-ध्वंसी लोक-व्यवहार-वर्तकः सम्यक् । परमागमस्य बीजं भुवनैकगुरुर्जयत्यनेकान्तः ॥ ) सम्पादन-स्थान–वीरसेवामन्दिर (समन्तभद्राश्रम), सरसावा, जि० सहारनपुर वर्ष ३ प्रकाशन-स्थान-कनॉट सर्कस, पो० बो० नं० ४८, न्यदेहली वैशाख-पूर्णिमा, वीरनिर्वाण सं० २४६६, विक्रम सं० १९६७ श्रीकुन्दकुन्द-स्मरण वन्द्योविभभुवि न कैरिह कौण्डकुन्दः कुन्द-प्रभा-प्रणयि-कीर्ति विभूषिताशः। यश्चारुचारण-कराम्बुज-चञ्चरीकश्चक्रे श्रुतस्य भरते प्रयतः प्रतिष्ठाम् । -श्रवणबेलगोलशिलालेख नं०१७ जिनकी कुन्द-कुसुमकी प्रभाके समान शुभ एवं प्रिय कीर्तिसे दिशाएँ विभषित हैं-सब दिशात्रोंमें जिनका उज्ज्वल और मनोमोहक यश फैला हुआ है, जो प्रशस्त चारणोंके-चारणऋद्धिधारक महामुनियोंके -करकमलोंके भ्रमर थे और जिन्होंने भरतक्षेत्र में श्रुतकी-श्रागम-शास्त्रकी--प्रतिष्ठा की है, वे पवित्रात्मा स्वामी कुन्दकुन्द इस पृथ्वीपर किनसे वन्दनीय नहीं हैं ?--सभीके द्वारा वन्दना किये जानेके योग्य हैं। तस्यान्वये भूविदिते बभूव यः पद्मनन्दिप्रथमाभिधानः ।। श्रीकोण्डकुन्दादि-मुनीश्वराख्यस्सत्संयमादुद्गत-चारणद्धिः ॥ -श्रवणबेल्गोल शिलालेख नं. .. उन (श्रीचन्द्रगुप्त मुनिराज ) के प्रसिद्ध वंशमें वे श्री कुन्दकुन्दमुनीश्वर हुए हैं जिनका पहला-दीक्षा समयका--नाम 'पद्मनन्दी' था और जिन्हें सत्संयमके प्रसादसे चारण ऋद्धिकी--पृथ्वी पर पैर न रखते हुए स्वेच्छासे श्राकाशमें चलनेकी शक्तिकी-प्राप्ति हुई थी। रजोभिरस्पृष्टतमत्वमन्तर्बाह्यपि संव्यञ्जयितुं यतीशः । रजःपदं भूमितलं विहाय चचार मन्ये चतुरङ्गलं सः॥ -श्रवणवेल्गोन-शिलालेख नं. ... यतिराज (श्रीकुन्दकुन्द ) रजःस्थान पृथ्वी तलको छोड़कर जो चतुरंगुल ऊपर आकाशमें गमन करते थे उसके द्वारा, मैं समझता हूँ, वे इस बातको व्यक्त करते थे कि वे अंतरंगके साथ साथ बाह्यमें भी रजसे अत्यंत अस्पृष्ट हैं-अंतरंगमें रागादिकमल जिस प्रकार उनके पास नहीं फटकते उसी प्रकार बाह्य में पृथ्वीकी धूलि भी उन्हें छू नहीं पाती। Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उपासनाका अभिनय [ ले० - श्री० पं० चैनसुखदास, न्यायतीर्थ ] +200103++ भगवन् ! तेरी सेवाका व्रत बहुत कठिन है। आने वाली मिसार करतल ध्वनिमें क्या था ? जगत् प्रलोभनों से प्रेरित होकर उपासकके रूपमें उपासना के रंग-मन पर मैं अनेक बार श्रया । आपको देखते ही मेरे अङ्गोपाङ्ग मानों ताण्डव-नृत्यमें घूमने लगते थे, जैसे मेरे शरीरका प्रत्येक अणु सेवाव्रतका अनुभव कर रहा हो । दर्शक लोग मेरे इस अभिनयको देखकर बड़े प्रसन्न होते और उपासकके महान् पद द्वारा मेरा अभिवादन करते | मैं उनकी मधुर वाणीको सुन कर बड़ा प्रसन्न होता। मैं अनुभव करता कि सच मुच मैं उपासक हो गया हूँ। " जगत् की प्रसन्नतासे तेरा कोई तादात्म्य नहीं है" इस आध्यात्मिक रहस्य का ज्ञान मुझे न था । मैं नहीं जानता था कि तेरी सेवाका व्रत बहुत कठिन है । इस अभिनय में अनेक युग बीत गये, पर तुम्हारे बिठाने योग्य एक मनोहर उच्च और पवित्र आसनका निर्माण मैं न कर सका। मद, मत्सर, काम और स्वार्थ के राक्षस इस देवासन के निर्माण में बाधक थे । मैं तुम्हें निमन्त्रण देता, पर स्वागतकी योग्यता न थी । तुम्हारे गीत गाता था, किन्तु तुमसे बहुत दूर रह कर । शायद तुममें तन्मय होनेका वह ढोंग था । तुम्हारे पास रह कर भी मैं तुम्हें न पा सकता था। क्योंकि मेरा विवेक अंधकारसे आवृत था । पर आश्चर्य है कि दुनिया मुझे त्यागी, तपस्वी और उपासक कहती थी ! इस बिडम्बनामें धीरे धीरे जीवन समाप्त हुआ । मैंने बिचारा कि उपासक के लिये देवदूत आवेंगे, पर राक्षसोंने आकर कहा चलो ! मैं उन्हें देखकर भयभीत हो गया ! मैंने कहा- - 'मैं उपासक हूँ, तुम मुझे गलतीसे लेने आये हो। मैं तुम्हारे साथ न चलूंगा ।' यम- किंकर भयंकर मुँह बना कर बोले- 'चुप दंभी ! जीवन भर उपासनाका अभिनय खेल कर भी देवदूतों की आशा करता है ।' मैंने कहा - 'सारा जीवन उपासना में व्यतीत किया है।' मुझे घसीटते हुये उन्होंने कहा - 'अरे मूर्ख ! भावोपासककें लिये देवदूत आते हैं, द्रव्य-पूजकके लिये नहीं ।' मैं भक्तोंको वन्स मोर (once more) की ध्वनि को सुनकर उन्मत्त हो जाता, इस ध्वनिके उन्मादने मेरे और तेरे अन्तर को और भी अधिक बढ़ा दिया, पर मैं विमूढ इस सूक्ष्म रहस्यको न समझ सका। मैं तो मोहोन्मत्त हो अज्ञातकी ओर खिंचा जा रहा था। समझता था कि जीवन सफल हो रहा हैं; पर यह तो आत्म-वंचना थी । संसार प्रसन्न हो रहा था, किन्तु तुम्हारी उदासीनताका मुझे पता न था । जहाँ से पारितोषिककी आशा थी, वहाँ तो कृपाका लेश भी न था । बाहर से Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीपाल - चरित्र - साहित्यके सम्बन्धमें शेष ज्ञातव्य [ले० - श्री० अगरचन्द नाहटा, सम्पादक 'राजस्थानी ' ] এর h त्रा नेकान्त वर्ष २ की द्वितीय किरण में, “श्रीपाल "चरित्र साहित्य" शीर्षक हमारा लेख प्रकाशित हुआ है। इसमें श्रीपाल चरित्र सम्बन्धी ४६ श्वे० और १५ दि० कुल ६१ ग्रन्थों की सूची दी गई है । उसके पश्चात् उन ग्रन्थों सम्बन्धी विशेष ज्ञातव्य एवं कुछ नवीन साहित्यका पता चला है, उसीका संक्षिप्त परिचय इस लेख में दिया जा रहा है । जैन समाज में श्रीपाल चरित्रका लोकादर दिनोंदिन बढ़ रहा है । श्रभी कई मास पूर्व कलकत्ते में मैना सुन्दरी नाटक भी खेला गया था व ग्रामोफोन में 'मैनासुन्दरी' के नामसे कई रेकार्ड भी निकल चुके हैं। कन्नड भाषा के भी श्रीपाल चरित्रोंका पता चला है । * पूर्व लेखमें संख्या ४२/१६ सूचित की है पर रत्नशेखर रचित चरित्रकी ४ टीकाओंके नम्बर बढ़ाने से ६२ होते हैं, उनमें रैधू कविके चरित्रका उल्लेख दोबार हो गया है उसे देने पर संख्या ६१ होती हैं । पूर्व लेख में मुद्रण दोषवश नीचे लिखी महत्वपूर्ण अशुद्धियाँ रह गई हैं पाठक उन्हें सुधार लें। ताकि उस के द्वारा और कोई फिर भूल न कर बैठें - अशुद्ध पृ० १५५ पंक्ति १३ – २ बड़ी भंडार पृ० १६१ पंक्ति ११ – रत्नलाल पृ० १३२ पंक्ति १६ – मगदानन्द प० १६३ पंक्ति ६ – सं० १४३६ शुद्ध लोंबड़ी भंडार रत्नलाभ सागरानंद सं० २४३६ विशेष ज्ञातव्य पूर्व लेख में श्रीपालचरित्र सम्बन्धी सबसे प्राचीन ग्रंथ सं० १४२८ का बतलाया गया है पर मैनासुंदरी का नाम निर्देश बारहवीं शताब्दीके खरतर गच्छीय विद्वान् श्राचार्य जिनवल्लभसूरि (स्वर्गे सं० ११६७) के वृद्ध नवकार में भी मिलता है, अतः श्वेताम्बर समाजमें भी १२वीं शताब्दी के पूर्वका रचित कोई ग्रंथ अवश्य था यह सिद्ध है। पंडित कैलाशचन्द्रजी शास्त्रीके पास दि० भंडारोंकी जो प्राचीन सूचियाँ हैं उनमें भी पंडित नरसेन कृत प्राकृत श्रीपाल चरित्रका उल्लेख है, श्रुतः दि० विद्वानों को खोजकर प्रकट करना चाहिये कि वह कबका रचित है ? संभवतः वह प्राचीन होगा | दि० चरित्रों में से जिन ग्रन्थोंका केवल उल्लेख ही मिला था पर प्रतियों का पता पहले मुझे नहीं मिला था उनमें से जिन जिनका पता चला है वे इस प्रकार हैं: १ ब्र० नेमिदत (सं० ) भ० सकलकीत एवं दौलतरामजी की भाषावनिका की प्रतियाँ जयपुर के दि० भंडारोंमें उपलब्ध हैं । कलकत्ते बड़े दि० जैन मंदिर में सकलकीर्ति और परिमल कवि रचित चरित्रोंकी प्रतियाँ भी मैंने स्वयं देखी हैं उनके सम्बंध में जो विशेष बातें ज्ञात हुई वे ये * 'मासुंदरी' ती परे नवपय भांगण करंत | (हमारे प्र० अभयरत्नसार पृ० १५४) Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४२८ अनेकान्त [वैसाख, वीर निर्वाण सं०२४६६ हैं:-सकलकीर्ति रचित संस्कृत पद्यमय चरित्रकी २२ श्रीपाल चौपईकी प्रशस्तिसे भी उसका चरित्र नायक पत्रोंकी प्रति सं०१५६१ मार्गशीर्ष शुक्ला ६ शनिवारको हमारे श्रीपालसे भिन्न ही कोई श्रीपाल प्रतीत होता है। लिखित है । इसमें ७ परिच्छेद और कुल श्लोक संख्या यह रास “दान" के महात्म्यपर कथाकोष ग्रन्थके ८०४ है। . आधारसे रचा गया है, ऐसा ग्रन्थकी अन्त प्रशस्तिसे परमल्ल कविके हिन्दी पद्यमय चरित्रकी ६ प्रतियाँ स्पष्ट है । फिर भी मूलग्रन्थको पूरा पढ़े बिना या उसके उक्त मन्दिर में हैं । ग्रन्थ प्रशस्तिसे पता चलता है कि श्राधार भूत कथाकोषको देखे बिना निश्चित रूपसे कविके पूर्वज गोपगिरिके राजा मानके मान्य चांदन कुछ कहा नहीं जा सकता। चौधरी थे उनके पुत्र रामदासके पुत्र प्रासकरण बरहिया पूर्व लेखमें सकलकीर्ति और ब्रह्मजिनदासके के श्राप पुत्र थे और श्रागरेमें निवास करते थे । प्रस्तुत गुरु शिष्य-सम्बन्धके कारण चरित्रोंके एक होनेका चरित्र सं० १६५१ आषाढ शुक्ला ८ शु० अकबर के अनुमान किया गया था पर वह ठीक नहीं था, क्योंकि राज्यमें प्रारम्भ किया था। दोनोंके भिन्न भिन्न ग्रंथ उपलब्ध हैं । इसी प्रकार नेमि___ कलकत्तेके नित्यमणि विनय श्वे. जैन लायब्रेरीमें दत्त और मल्लिभषणके रचित चरित्र भी भिन्न भिन्न दि० विद्यानंदि रचित चरित्रकी प्रति अवलोकनमें आई। ही होंगे । पं० कैलाशचन्द्र जीकी प्राप्त सूचियोंमें भिन्न यह प्रति ३२ पत्रात्मक प्राचीन हैं । चरित्र श्लोकबद्ध है भिन्न लिखा मिलता है। नेमिदत्तका तो जयपुर और ११ पटलोंमें क्रमशः १६८, १३५, १४२, ८२, भंडार में उपलब्ध है ही। पंडितजीकी प्राप्त सूचियोंमें २३३, २१६, २४२, २३१, १४६, १६५, ११५, कुल शुभचन्द्र के नामके साथ साथ भट्टारक छोटा विशेषण १६०५ श्लोक हैं । ग्रन्थकर्ताने अपनी परम्परा इस प्रकार लगा है। अब अनुपलब्धदि चरित्रोंमें १ नरसेन २ बतलाई है:-कुंदकुंदान्वय गुणकीर्ति-रत्नकीर्ति प्रभाचंद्र मल्लिभषण ३ छोटा शुभचन्द्र ४ पं० जगन्नाथ कृत ही पद्मनंदि शि. देवेन्द्रकीर्ति शि० विद्यानंदि । ग्रन्थके रहे हैं, विद्वानोंको उन्हें खोजकर प्रकाश डालना प्रारम्भमें कुंदाकुंदाचार्यादिकी कई श्लोकोंमें प्रशंसा की चाहिये। है। पुष्पिका लेख इस प्रकार है:"ग्रंथ संख्या २००० । संवत् १५३० वर्षे बैशाख नवीन ज्ञातसाहित्य बदि ५ शुभ नक्षत्रे । श्री सिद्ध चक्र श्रीपाल चरित्र अब पूर्व सूचीमें निर्देशित चरित्रोंके अतिरिक्त समाप्त ।" कर्त्ताने पूर्व ग्रन्थानुसार रचनेका उल्लेख जितने साहित्यका पीछेसे पता चला है उसका परिचय किया है । पूर्व सूचीमें उल्लिखित दि० वादिचंद्र कृत दिया जाता है । श्रीपाल व्याख्यानकी प्रशस्ति देखने पर ज्ञात हुआ कि उस ग्रंथके चरित्रनायक हमारे श्रीपालसे भिन्न हैं । कथा श्वेताम्बर के अन्त में "इति श्री विदेह क्षेत्र श्रीपाल सोभागी चक्र- १. श्रीपालचरित्र (सं० गद्य):-लोकागच्छीय ऋषिकेशव वर्ती हवो तेहनी कथा" ऐसा स्पष्ट निर्देश है । रचित (रचनाकालः–१८७७ आश्विन शुक्ला ४ इसी प्रकार श्वे० विवंदनीक गच्छीय पद्मसुन्दरके बालचर ) इसकी प्रति विजयधर्मसूरि ज्ञानमन्दिर Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरगा ७] श्रीपाल - चरित्र - साहित्य के सम्बन्ध में शेष ज्ञातव्य आगरा के नं० १५३८ में ५६ पत्रोंकी हमारे अवलोकन में आई है । २. श्रीपाल रासः - गुणसुन्दर ( उपरोक्त ज्ञानमंदिर में ३ प्रतियें नं० ३५८५-८६ ८७ पत्र १४, १५, १०) ३. श्रीपाल : - गुजराती प्रकाशित संभावना (गद्य) में जैन आफिस से ४. श्रीपाल : - ( संक्षिप्त) धीरजलाल टो० लि० ज्योति कार्यालय से प्र० दिगम्बर १. श्रीपाल चरित्र – (सं०), पं० जगन्नाथ कृत० उ० पं० कैलाशचन्द्रजीको प्राप्त प्राचीन सूचियोंमें २. श्रीपाल चरित्र - भाषावचनिका, श्रमीचंद कृत. जय पुर दि० भंडार ३. श्रीपाल चरित्र - भाषावचनिका, विनोदीलाल जयपुर दि० भंडार सकलकीर्त्ति ४. श्रीपाल चरित्र — भाषावचनिका, मू० रचित पर जयपुर दि० भंडार कर्त्ता श्रज्ञात. ५. श्रीपालचरित्र - (हिन्दी पद्यमय ) सदासुख (?) कृत ० ( रचनाकाल सं० १८५७ श्राषाढ़ कृष्णा ६ रवि. संधि छंद २२६४) इसकी १०४ पत्रेकी एक ७. प्रति मैंने कलकत्तेके दि० बड़े मंदिरमें देखी है । कर्त्ता ने अपना नाम स्पष्ट नहीं सूचित कर कहीं “सुखकर्न' अन्तके छन्द में "अतिसुख" इस प्रकार दिया है अतः नाम सुखकरन या सदासुख होने की | अपने परिचयमें कविने इतना ही कहा है कि " वे पहले पाढिम नगर के निवासी थे फिर सकूराबादमें रहने लगे थे ।” कन्नड भाषा ६. श्रीपालचरित्र – मंगरसइय रचित सं० १५०८ देवरस (सं०१७०० लगभग) वर्द्धमान (सं० १६५० ) " "" ८. ६. १०. 99 39 ४२३ " 39 तृतीयगंगरस इन्द्रदेवकृत भी माना जाता हैं । तामिल साहित्य में भी सम्भव है श्रीपालचरित्र हो पर प्रो० चक्रवर्तीको रिप्लाइ कार्ड देने पर कोई सूचना नहीं मिली। इनमेंसे नं० १ कैलाशचन्द्रजी नं० २,३, ४ की मास्टर मोतीलालजी संघवी, जयपुर, नं० ६ से १० की पं० भुजबल जी शास्त्रीसे सूचना मिली है एतदर्थ मैं उनको धन्यावाद देता हूँ । अन्य विद्वान भी इसी प्रकार विशेष ज्ञातव्य प्रकट करें यहीं नम्र विज्ञप्ति है । 33 Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अहिंसाका अतिवाद [ ले० श्री दरबारीलाबजी सत्यभक्त ] त्रातिवाद एक ऐसा विप है जो स्वाद में अमृत खाओ, तब मैं महात्मा महावीरकी अहिंसाका पाठ पढा सरीखा भले ही लगे पर परिपाक में सर्वनाश ही नेवाली शैलीसे आश्चर्यचकित हो गया। यह एक मनोकरता है । इसलिए अहिंसाका भी अतिवाद घोर वैज्ञानिक सत्य है कि किसी चीज़को अगर तुम माँसकी हिंसा बढ़ाने वाला हो जाता है । इसका एक नमूना कल्पना करते हुए खा सकते हो तो एक दिन माँसके मुझे अभी अभी एक जैन पत्रमें पढ़नेको मिला। लेख प्रति तुम्हारी सहज घृणा नष्ट हो जायगी। के लेखक हैं प्रसिद्ध विद्वान श्री कालेलकर, शीर्षक है मुझे याद है कि जब मैं छोटा था तब संक्रान्तिके 'हृदय नो समभाव ।' अवसर पर गड़ियाघुल्ला ( शक्करके हाथी घोड़े ऊँट __ लेखकने पशुपक्षियोंकी दयाका चित्रण किया है आदि ) खाते समय कह बैठता था-मैं इसकी पंछ खाता आनन्दसे उछलने वाले घेटेकी हिंसाका करुण चित्रण हूँ, सिर खाता हूँ आदि । तब पिताजी नाराज होते थे किया है, इस बात पर आश्चर्य प्रगट किया है कि बकरे और अन्तमें उन्होंने शक्करके जानवर खरीदना बन्द कर के अंग खाते समय लोग यह क्यों नहीं विचारते हैं दिया था तबसे वे शक्कर के मन्दिर मकान आदि खरीद कि इसी सिरमें कैसा उल्लास श्रानन्द था । इसके बाद देते थे । उनने मुझे यह सिखा दिया था कि शक्कर में अहिंसाकी यह धारा बहते बहते वनस्पतियोंमें पहुँची भी अगर पशुकी कल्पना आ जाय तो उसके खानेमें है। यहाँ तक कि लकड़ियाँ वृक्षोंकी हड्डियाँ कहलाकर पाप लगता है । दयापात्र बनी हैं इमारतके लिये लकड़ी चीरी जाती है जब हम वृक्षकी छाल आदिको पशुके चमड़े, हड्डी, तो लेखकको हड्डी चीरनेका कष्ट होता है इस प्रकार माँस, नस, खून आदि की तुलनामें खड़ा करके अतिवृक्षके फलं खाना और जानवर खाना, दोनोंकी क्रूरता वादी भावुकतासे अहिंसाकी साधना करते हैं तब मंत्रएक ही श्रेणीमें खड़ी कर दी गई है। भ्रष्ट साधककी तरह हमारे जीवन में प्रतिक्रिया होती है । ___ इसमें सन्देह नहीं कि विश्वप्रेमी या परम अहिंसक जब हम टमाटर के रससे बकरेके रक्तमाँसकी तुलना वृक्षोंकी भी दया करेगा। जैनाचारमें जैन मुनियोंके करेंगे सूखी बनस्पतिको सूखा माँस और हड्डी समझेंगे, लिए सूक्ष्म-अहिंसाके पालन के लिये काफी विधान हैं फिर और इनके बिना जीवन-निर्वाह न होनेसे उन्हें खाते भी जैनधर्मकी अहिंसामें ऐसा अतिवाद या एकान्त भी जाँयगे, तो इसका परिणाम यह होगा कि एक दिन दृष्टि नहीं है अनेकान्त दृष्टिने जैनधर्मकी अहिंसाको टमाटरकी घृणाकी तरह बकरेके माँसकी घुणा भी शिथिल निरतिवाद या व्यवहार्य बना दिया है। हो जायगी । इस प्रकार यह अहिंसाका अतिवाद हिंसाके वर्षों पहिले जब मैंने जैनशास्त्रोंमें यह पढ़ा कि प्रचार में साधक बन जायगा। विवेकहीन अहिंसाका जिस चीजमें तुम्हें माँसकी कल्पना श्राजाय वह मत प्रवाह अशक्यताकी पर्वत श्रेणीसे टकराकर ठेठ हिंसाकी Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ • ] चरम सीमा तक पहुँचता है । इसीलिये चारित्रके मूल में भ. महावीरने सम्यग्यज्ञान के होने पर जोर दिया है । विवेकहीन चारित्रको चारित्र ही नहीं मिथ्याचारित्र तक कहा है। श्री कालेलकर साहिब के लेखमें अहिंसाका ऐसा ही अतिवादीरूप है जिसकी ऐसी प्रतिक्रिया होगी कि उससे रही सही हिंसा भी बह जायगी । भगवती अहिंसाका साधक वृक्षोंकी दया भी रक्खेगा और जहाँ जीवन निर्वाहका माँसाहार सिवाय दूसरा साधन न होगा वहाँ माँसाहारको भी क्षन्तव्य मान लेगा, इतना होने पर भी वह बनस्पति श्राहार और माँसाहारकी विभाजक रेखाको नष्ट न करेगा, न उसकी चौड़ाई कम करेगा । हृदय के समभावको निर्विवेक न बनायगा । जैन धर्म हिंसा हिंसाका बहुत ही गम्भीर विवेचन किया है । जहाँ उसने जड़ोपम प्राणियोंके सुख दुःखका खयाल रक्खा है वहाँ अहिंसाको व्यवहार्य बनाने के लिये हिंसाकी तत्रमताका भी खयाल रखा है इसलिये प्राणियों की गिनती पर ध्यान न देकर उनकी चैतन्यमात्रा पर ध्यान दिया है। इसलिये बनस्पति, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, पशु श्रादिकी हिंसा में संख्यगुणा असंख्य गुणा अनन्तगुणा अन्तर बतलाया है। अगर इस प्रकारका विवेक न रक्खा जाय तो अहिंसा व्यवहार्य होजाय । वर्ष अहिंसाका अतिवाद ४३१ प्रतिवादी समभाव रही सही अहिंसाको चौपट न कर जाय इसलिए बनस्पत्याहार और माँसाहार के बीच में जो खाई है उसको अधिक से अधिक बड़ी बनाने की ज़रूरत है । मांसभक्षी में दया . मानना उससे प्रेम करना आदि एक बात है पर मांसभक्षण और शाकाहारका भेद भुला देना दूसरी बात है। हम दैशिक परिस्थितिका विचार करके, उनकी संस्कृतिका विचार करके या सर्वसाधारण का व्यापक दोष समझ कर माँसाहारियों को तुम्य मानें, परन्तु शाकाहार माँसाहारके विषय में अपनी भावनाओंको अभिन्न न बनायें । इसका खयाल रखें कि बनस्पत्याहार में माँसाहारका संकल्प न याने पावे । इसके लिए इन बावोंका विचार ज़रूरी है । १ - जीवन - निर्वाह के लिए हिंसा तो अनिवार्य है परन्तु विश्वसुखवर्धनका विचार करते हुए अधिक चैतन्यवाले का विचार हमें पहिले करना चाहिए। बनस्पति, कीटपतंग, पशुपक्षी, मनुष्य इन चारोंकी हिंसा को बराबर न मानना चाहिये । २ -- बनस्पति आदि स्थावर तथा पशुपक्षी आदि त्रसके वधका प्रकार एकसा नहीं है। अनेक प्रकारका अंगच्छेद पशुओंको नुकसान पहुँचाता है, पर बनस्पतियोंको नुकसान नहीं पहुँचाता । वृक्षोंके फल अगर हम न तौड़ें तो वृक्ष उन्हें जैनधर्मकी इस अनेकान्त दृष्टिको भुला कर स्वयं फेंक देंगे । और उनके स्थान पर दूसरे फूलफूल जब हम भावुकता के अविवादसे बकरेकी हिंसा पत्र पैदा होंगे । पर बकरे में यह बात नहीं है कि अगर और झाड़ोंकी हिंसाको एक ही कोटि में लानेकी हम उसका सिर न काटेंगे तो वह स्वयं पुराना सिर कोशिश करेंगे, बकरेकी हिंसाकी घृणा वृक्ष... फेंक कर वसन्तमें नया सिर लगा लेगा । हिंसा में लागू करना चाहेंगे तो इसका परिणाम यह होगा कि वृक्ष हिंसाकी अघृणा या उपेक्षा बकरेकी हिंसामें आा उतरेगी । इस प्रकारका वृद्रकी शाखा काटने पर उसी जगह दूसरी शाखा उगती है, बहुतसी जगह तो शाखा प्रशाखा न काटने पर उनका विकास ही रुक जाता है । एकबार मैं एक Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३२ अनेकान्त [वैसाख, वीरनिर्वाण सं०२४६६ गुलाबका झाड़ लाया उसे पानी तो अच्छा दिया उसमें तैयार करलेंगे पर बेचारे गाँव वालोंकी तो वृक्षोंकी नये नये पत्ते भी श्राये पर कटिंग न किया, धीरे धीरे हड्डियाँ जलाये बिना गुजर ही नहीं। इस प्रकार अतिउसके पत्ते काले पड़ गये और झाड़ उखड़ गया । एक · वादी अहिंसा भाव अगर बेचारे गरीब लोगोंके मनमें जानकारसे पछने पर मालम हुआ कि उसका कटिंग घुस जाय और उसके अनुसार आत्महत्या करनेको करना जरूरी था। तबसे मैं बराबर कटिंग करता हूँ। अगर वे अपनेको तैयार न पायें, अहिंसाको अव्यवहाय कटिंगके बाद ही उसमें बाढ़ होती है फूल पाते हैं। समझ बैठे, तो शताब्दियोंमें जो थोड़ा बहुत विकास हो बकरेकी टांग काटना ऐसा जरूरी नहीं है, न टांग पाया है यह ध्वस्त हो जाय । घर घरमें शाक और काटनेसे उसमें बाढ़ आती है । इसलिये अब मैं वृक्षोंके मांस सब एकाकार हो जाय । फलों पत्रों आदिको गायके दूधकी तरह ही मानता हूँ। हृदयके समभावको खूब बढ़ाइये, पर समभावके शाखाओंके कटिंगको एक तरहका अपरेशन मानता हूँ। नाम पर हमारे भाव ऐसे अतिवादी न हो जाँय कि और खास कर गुलाबके कटिंगको तो इसी तरह करता कौड़ियाँ गिननेमें हम मुहरे लुटा दें और दोई दीनसे है जैसे छोटे बच्चेके बाल बनवा रहा होऊँ। बकरेकी जाँय । अगर कभी भावुकताके उफानसे ऐसे भाव हो भी टांग तोड़ने सरीखी कल्पना मुझे नहीं होती। जाँय तो उन्हें आत्मनेपद ही रक्खें। दुनिया के सामने ___ जंगलवालोंसे मालूम हुआ कि सागौन श्रादिके रखकर उन्हें परस्मैपद बनाना और फिर भी अात्मनेपद झाड़ काटने पर तीन चार साल में फिर वैसी ही शाखाएँ की दुहाई देना चिल्ला चिल्लाकर अपने वर्तमान मौनकी तैयार हो जाती हैं अन्यथा पुराने अंग ही जरठ होते घोषणा करना है। रहते हैं। पशु पक्षियोंके अंग कट जाने पर वे इस प्रकार अन्तमें यही कहना है कि जैनधर्मका अहिंसावाद दूने उत्साहसे नहीं बढ़ते। बहुत सूक्ष्म होकर भी वह निरतिवाद है, व्यवहार्य है, मेरा मतलब यह नहीं है कि बनस्पतियों तक हमारा उसमें योग्यायोग्य विवेक है वह प्राणियोंके चैतन्यकी दयाभाव न पहुँचे, मतलब इतना ही है कि हम पशु- तरतमताके अनुसार हिंसा अहिंसाका विचार करता है वधसे उसकी समानता बताने न लग जाँय । अगर हम और मांसाहार शाकाहारकी विभाजक रेखाको काफी यह सोचने लगें कि घरके माड़ोंका काटना तो ठीक, स्पष्ट रखता है। शाकाहारमें मांसाहारकी कल्पना भी पर जो बेचारे जंगलमें ऊगे हैं उनका क्या अपराध ? नहीं होने देता। यह अहिंसाका विवेकपर्ण सच्चा रूप है। उनके लिये हमने क्या किया है ? इस प्रकार हम जंगल जिन पत्रोंने श्री कालेलकर साहिबके भावकता पर्ण से लकड़ी लेना बन्द करदें तो शहरोंके महलोंकी बात विचार प्रगट किये हैं उनका कर्तव्य है कि वे उनका तो दूरवे तो शायद लोहा और कांक्रोटके बल पर बन दूसरा पहल, जो कि विवेक तथा व्यावहारिकता पर भी जाय जिनमें वृक्षोंकी हड्डियाँ दिखाई न दें, पर गांवों अवलम्बित है अवश्य प्रगट करें। अन्यथा इस प्रकार की झोपड़ियाँ मुश्किल हो जायगी। बेचारे ग्रामीण अहिंसाका अधूरा और अतिवादी विवेचन घोर हिंसाका लोहा चना सिमिट कहाँसे लायेंगे। शहर वाले तो उत्तेजक होगा। बिजलीका बटन दबाकर प्रासुक और शुद्ध भोजन -सत्य सन्देशसे Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रभाचन्द्रका तत्वार्थसूत्र [सम्पादकीय (गत किरणसे आगे) छठा अध्याय त्रिकरणैः कर्म योगः ॥ १ ॥ 'तीन करोंसे ( मन-वचन-काय से) की जाने वाली क्रियाको योग कहते हैं ।' प्रशस्ता प्रशस्तौ ||२|| पुण्यपापयोः [ हेतू ] ॥३॥ 'योग प्रशस्त अप्रशस्त दो हैं ।' 'प्रशस्त योग grunt अप्रशस्त योग पापका (आव) हेतु है।' उमास्वातिके 'शुभः पुण्यस्याऽशुभः पापस्य' सूत्रका श्रथवा श्वे० मान्यता के अनुसार 'शुभः पुण्यस्य', 'अशुभः पापस्य' सूत्रोंका जो आशय है वही इन सूत्रोंका 1 गुरुनिन्हवादयो ज्ञानदर्शनावरणयोः * ॥४॥ 'गुरुन्दिव (गुरुका छिपाना ) भादि ज्ञानावरणदर्शनावरणके हेतु हैं ।' यहाँ 'आदि' शब्द से मात्सर्य, अन्तराय, श्रासादन उपघात आदि उन हेतुत्रोंका ग्रहण करना चाहिये जो श्रागम में वर्णित हैं, और जिनका उमास्वातिने 'तत्प्रदोषमिन्दव' नामके सूत्र में उल्लेख किया है । दुःखात्यनुकंपाद्या असाता सातयोः ||५|| . 'दुःख आदि असाताके, व्रत्यनुकम्पा आदि साताके हेतु हैं ।' * वरणादयः । + वृ । ↓ थाः साता । यहाँ 'आदि' शब्दसे असातावेदनीयके श्रास्रवहेतुमें शोक, ताप, श्राक्रन्दन, वध, परिदेवनका और साता वेदनीयके हेतुत्रों में दान, सरागसंयम, क्षमा, शौचादिका संग्रह किया गया है । उमास्वातिके दो सूत्र नं०११, १२ का जो आशय है वही इसका समझना चाहिये । यहाँ सूचना रूपसे बहुत ही संक्षिप्त कथन किया गया है। केवल्यादिविवादो (द्यवर्णवादो १) दर्शन मोहस्य | ६ केवल्ली आदिका विवाद (भववाद ?) - उन्हें झूठे दोष लगाना - दर्शनमोहका हेतु है।' यहाँ 'आदि' शब्द के द्वारा श्रुत, संघ, धर्म और देवके अवर्णवादका भी संग्रह किया गया है । यह सूत्र उसी श्राशयको लिये हुए जान पड़ता है जो उमास्वातिके 'केवलिश्रुत संघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य सूत्रका है । कषायजनिततीव्र परिणामश्चारित्रमोहस्य ||७|| 'कषाय से उत्पन्न हुआ तीव्र परिणाम चारित्रमोहका हेतु है।' यह सूत्र और उमास्वातिका 'कषायोदयात्तीत्र ' नामका सूत्र प्रायः एक ही हैं - मात्र 'उदयात और 'कै । श्च । * यहाँ मूल पुस्तकमें नं०७ दिया है जो गलत है; क्योंकि इससे पहिले 'चतुर्विशतिकामदेवा:' नामका एक सूत्र पुनः गलतीसे नं० ६ पर लिखा गया था, जिसे विकास देनेका संकेत किया हुआ है; परन्तु उसे निकालने पर धागेके नम्बरों को बदलना चाहिये था जिन्हें नहीं बदला । इसलिये इस श्रध्यायके अगले सब नम्बर ग्रन्थप्रतिमें एक एककी वृद्धिको लिए हुए हैं । Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४३४ अनेकान्त [वैसाख, वीर निर्वाण सं० २४६६ 'जनित' शब्दोंका अन्तर है। दर्शनविशुद्धधादिषोडशभावनास्तीर्थकरत्वस्य ॥११॥ बह्वारंभपरिग्रहाद्या नारकाद्यायुष्कहेतवः ॥ ८॥ 'दर्शन विशुद्ध आदि सोलह भावनाएं तीर्थकर 'बहु भारंभ-परिग्रह आदि नारक आदि आयु के नामके प्रास्रवकी हेतु हैं।' .. यहाँ 'आदि' शब्दसे श्रागमप्रसिद्धविनयसम्पइस सूत्रमें दो जगह 'श्राद्य' शब्दका प्रयोग करके नता आदि उन १५ भावनात्रोंका संग्रह किया गया नारक आदि चारों ही गतियोंके श्रास्रव हेतुओंका एकत्र है जिनका उमास्वातिने अपने २४ वे सूत्रमें नामोसंग्रह किया गया है, परन्तु दूसरी गतियोंका एक एक ल्लेखपूर्वक संग्रह किया है। भी कारण सूचना एवं दूसरे कारणोंको ग्रहण करनेकी आत्मविकत्थानाद्या नीचैर्गोत्रस्य ॥ १२ ॥ प्रेरणारूपसे साथमें नहीं दिया है, इससे यह सूत्र श्राव. प्रारमरनापा (अपनी प्रशंसा) आदि नीचगोत्रके श्यकतासे कहीं अधिक संक्षिप्त और अजीबसा ही जान हेतु हैं। पड़ता है । यह विषय मास्वातिने १५ से २१ तक यहाँ 'श्रादि' शन्दसे परनिन्दा, सद्गुणोंका उच्छा... सात सूत्रोंमें वर्णित किया है। दन और असद्गुणोंका उद्भावन, ऐसे तीन हेतुत्रोंका योगवक्रताधों भशुभानाम्नः ॥६॥ संग्रह किया गया जान पड़ता है,जो उमास्वातिके 'परात्म 'योगकी-मन-वचन-कायकी- वक्रता प्रादि अशु- निन्दीपर्शसे" श्रादि सूत्रमे स्पष्टतया उल्लेखितं मिलते हैं। भ नामके पानवहेतु हैं।' तद्वयत्ययो महतः ॥ १३ ॥ यहां 'श्राद्याः' पद बहुवचनान्त होनेसे उसके द्वारा ___'नीचगोत्रके हेतुभोंसे विपरीत-मात्मनिन्दादिक उंच गोत्रके हेतु है।' उमास्वातिके २२र्वे सूत्रमें निर्दिष्ट एकमात्र 'विसंवादन . (अन्यथा प्रवर्तन)' का ही ग्रहण नहीं किया जा सकता _यह सूत्र उमास्वातिके 'तद्विपर्ययों नीचैर्वृत्यनुस्से को चोत्तरस्य' सूत्रके आशयके साथ मिलता जुलता है । बल्कि दूसरे कारणोंका भी ग्रहण होना चाहिये । उन । कारणोंमें सर्वार्थसिद्धिकारने मिथ्यादर्शन, पैशून्य, दानादिविघ्नकरणमंतरायस्य ॥१४॥ ___ 'दानादिमें विग्न करना अन्तराय कर्मके मानवका अस्थिरचित्तता, कूटमानतुलाकरणको भी बतलाया हैं। और लिखा है कि सूत्रमें प्रयुक्त हुए 'च' शब्दसे यहां 'श्रादि' शब्दसे लाभ, भोग, उपभोग, और अगका ग्रहण करना चाहिए। वीर्यका ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि अन्तराय तद्वैपरीत्यं शुभस्य ॥ १० ॥ कर्मके दानान्तराय आदि पाँच ही भेद हैं । इस सूत्रमें 'अशुभ नामके पानवहेतुओंसे विपरीत-योगकी उमास्वाति के सूत्रसे सिर्फ 'दानादि' शब्दः अधिक हैं । सरलता और अनुकूल प्रवर्तनादि-शुभ नामके आस्रव इति श्रीबृहत्प्रभाचन्द्रविरचिते तत्वार्थ सूत्रे उमास्वातिका 'तद्विपरीतं शुभस्य' सूत्र और यह " 'इस प्रकार श्रीवृहत्प्रभाचन्द्र विरचित तत्वार्थसूत्र दोनों एक ही हैं । सूत्रमें छठा अध्याय समाप्त हुभा।' धाशुभ विकथ । षष्ठिमो। षष्टोभ्यायः ॥ ६॥ Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष , किरण प्रभाचन्द्रका तत्वार्थ सूत्र ४३१ सातवाँ अध्याय वाले अगले पाँच सूत्र नहीं दिये । मैत्र्यादयश्चतस्रः॥४॥ हिंसादिपंचविरतिव्रतं ॥१॥ 'मैत्री आदि चार भावनाएँ और हैं।' 'हिंसादिपंचकसे विरक्त (निवृत्त) होना व्रत है।' यहाँ 'श्रादि' शब्दसे आगमनिर्दिष्ट प्रमोद, कारुण्य हिंसा, असत्य, चौर्य, अब्रह्म और परिग्रह ये पंच और माध्यस्थ्य नामकी तीन भावनात्रोंका संग्रह किया पाप कहलाते हैं । इनसे निवृत्त होना ही 'व्रत' है, और गया है। मैत्री सहित ये ही चार प्रसिद्ध भावनाएँ हैं । इसीलिये व्रतके अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य उमास्वातिने 'मैत्रीप्रमोद' नामक सूत्र में इन चारोंका और अपरिग्रह ऐसे पाँच भेद हैं । यह सूत्र और उमा- नाम सहित संग्रह किया है । स्वातिका 'हिंसानृतस्ते याब्रह्म परिग्रहेभ्यो विरतिद्वतं' श्रमणानामष्टाविंशतिर्मूलगुणा: ॥५॥ सूत्र दोनों एक ही टाइप और श्राशयके हैं। उमास्वाति _ 'श्रमणोंके अट्ठाइस मूलगुण हैं।' ने प्रसिद्ध पाँचों पापों के नाम दिये हैं, यहाँ हिंसाके साथ इस आशयका कोई सूत्र उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्र शेषका 'पादि' शब्दके द्वारा संग्रह किया गया है। में नहीं है । इसमें जैन साधुओंके मूल गुणोंकी जो २८ महाऽणु* भेदेन तद्विविधं ।। २ ॥ संख्या दी है उसमें मूलाचारादि प्राचीन दिगम्बर ग्रंथों 'वह व्रत (व्रतसमूह ) महाव्रत और अणुव्रतके के कथनानुसार अहिंसादि पंच महाव्रत, ईर्यादि पंच भेदसे दो प्रकारका है।' समितियां, पाँचो इन्द्रियोंका निरोध, सामायिकादि छह ___यह सूत्र उमास्वाति के दूसरे सूत्र ‘देशसर्वतोऽणु आवश्यक क्रियाएँ, अस्नान, भूशयन, केशलोंच, अचेमहती' के समकक्ष है और उसी अाशयको लिये हुए लत्व ( ननत्व ), एकभुक्ति, ऊर्ध्वभुक्ति ( खड़े होकर है । इसके और पूर्व सूत्र के अनुसार महाव्रतों तथा अ- भोजन करना और अदन्तघर्षण नामके गुणोंका समाणुव्रतोंकी संख्या पाँच पाँच होती है । वेश है। तहााय भावनाः पंचविंशतिः ॥ ३ ॥ श्रावकाणामष्टौ ॥६॥ 'उन (व्रतों) की दृढ़ताके लिये पच्चीस भावनाएं हैं। 'श्रावकोंके मूलगुण पाठ हैं।' यह सूत्र उभास्वाति के 'तत्स्थैर्यार्थ भावनाः पंच अाठ मूल गुणोंके नामोंमें यद्यपि प्राचार्यों में कुछ पंच' सूत्र (नं ० ३) के समकक्ष है और उसीके श्राशय मत भेद पाया जाता है, जिसके लिये लेखकका लिखा को लिये हुए है। वहाँ प्रत्येक व्रतको पाँच पाँच भाव- हुश्रा 'जैनाचार्योका शासन-भेद' नामका ग्रंथ देखना नाएँ बतलाई हैं, तब यहाँ उन सबकी एकत्र संख्या चाहिये । परन्तु यहाँ च कि व्रती श्रावकोंका अधिकार है पच्चीस दे दी है । दिगम्बर पाठानुसार उमास्वाति के इसलिये आठ मूलगुणों में स्वामी समन्तभद्र-प्रतिपादित अगले पाँच सूत्रों में उनके नाम भी दिये हैं, परन्तु यहाँ पाँच गुणवतों और मद्य-माँस-मधुके त्यागको लेना संख्या के निर्देशसे उनका संकेतमात्र किया गया है। चाहिये । इस आशयका भी कोई सूत्र: उमास्वातिके श्वेताम्बर सूत्रपाठमें भी ऐसा ही किया गया है-नामों- तत्त्वार्थसूत्र में नहीं है । . * ऽनु * श्रवणा | मूलगुणा। Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त वीर निर्वाण सं० २४६६ शीलसप्तकं च ॥७॥ व्रत-शीलादिकके भी पाँच पाँच ही अतीचारोंका अपना 'सात शील भी श्रावकोंके गुण हैं।' क्रम रक्खा है, इसलिये सम्यग्दर्शनके शेष अतीचारोंका सप्त शील के नामोंमें भी प्राचार्यों में परस्पर कुछ प्रशंसा-संस्तवमें अन्तर्भाव कर लेना चाहिये । यहाँ मत भेद है * | उमास्वातिने अपने 'दिग्देशानर्थदण्ड' 'शंकाद्याः' पद पर पाठका अंक दिया है, इससे भी नामक सूत्रमें उनके नाम दिग्विरति, देशविरति, अन- आठ अतीचारोंका ही ग्रहण जान पड़ता है। र्थदण्डविरति, सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोगपरिभोग बंधाक्ष्योव्रतानां ॥९॥ परिमाण, अतिथिसंविभाग दिये हैं जब कि कुन्दकुन्दा- 'बंध आदिक व्रतोंके अतीचार हैं।' चार्यने चारित्र प्राभृत में देशव्रतका ग्रहण न करके सप्तम यहाँ 'व्रतानां' पदके द्वारा अहिंसादिक सब व्रतोंस्थान पर 'सल्लेखना' का विधान किया है । इसी तरह का और 'पादि' शब्दके द्वारा उनके पृथक् पृथक् और भी थोड़ा थोड़ा मतभेद है । यहाँ संभवतः कुन्द- अतीचारोंका संग्रह किया गया है। परन्तु उनकी कुन्द प्रतिपादित गुणवत-शिक्षाव्रतात्मक सप्त शीलोंका संख्याका किसी रूप में भी उल्लेख नहीं किया है। यह ही उल्लेख जान पड़ता है; क्योंकि आगे संन्यास सूत्र बहुत ही संक्षिप्त-सूचनामात्र है। इसमें उमास्वा( सल्लेखना ) का कोई अलग विधान न करके १० वें तिके २५ से ३२ अथवा ३६ नम्बर तक सूत्रोंके विषय सूत्रमें उसके अतीचारोंका उल्लेख किया गया है। का समावेश किया जा सकता है । शंकाद्याः + सम्यग्दृष्टेरतीचाराः ॥ ८॥ मित्रस्मृत्याद्याः संन्यासस्य ॥ १० ॥ . 'शंका आदि सम्यग्दर्शनके प्रतीचार हैं।' 'मित्रस्मृति प्रादि संन्यास ( सल्लेखना ) के अतो यहाँ अतीचारोंकी संख्याका निर्देश न होनेसे श्रादि' चार हैं।' शब्दद्वारा जहाँ उमास्वाति-सूत्र-निर्दिष्ट काँक्षा, विचि- यहाँ भी अतीचारोंकी संख्याका कोई निर्देश नहीं कित्सा, अन्यदृष्टिप्रशंसा, अन्यदृष्टि संस्तव इन चार किया। 'आदि' शब्दसे सुखानुबन्ध, निदाम नामके अतीचारोंका ग्रहण किया जा सकता है वहाँ सम्यग्द- अतीचारोंका और क्रम-व्यतिक्रम करके यदि ग्रहण र्शनके निःशंकित अंगको छोड़कर शेष सात अंगोंके किया जाय तो जीविताकाँक्षा तथा मरणाकाँक्षाका भी प्रतिपक्षभूत काँक्षा, विचिकित्सा, मूढदृष्टि, अनुपगहन, ग्रहण किया जा सकता है, जिन सबका उमास्वातिके अस्थितीकरण, अवात्सल्य और अप्रभावना नामके 'जीवितमरणाशंसा' इत्यादि सूत्रमें उल्लेख है। दोषों-अतीचारों-का भी ग्रहण किया जा सकता है। स्वपरहिताय स्वस्यातिसर्जनं दानं ॥ ११ ॥ सर्वार्थसिद्धि में अष्ट अंगोंके प्रतिपक्षभूत अाठ अतीचार 'अपने और परके हितके लिये अपनी वस्तुका होने चाहिये, ऐसी शंका भी उठाई गई है और फिर त्याग करना दान है। उसका समाधान यह कहकर कर दिया है कि ग्रन्थकारने यह सूत्र उमास्वातिके 'अनुग्रहार्थ स्वस्यातिसर्गो * देखो, जैनाचार्योंका शासनभेद, गणव्रत और * श्वेताम्बरीय सूत्रपाठके अनुसार ये सूत्र नं०२० शिक्षाबत प्रकरण पृ० ४१ से ६४ । से प्रारंभ होते हैं और था। fचा स। Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण . ] प्रभाचन्द्रका तत्वार्थ सूत्र दानं' इस सूत्रके समकक्ष है । दोनोंका श्राशय एक ही उत्तरा अष्ट चत्वारिंशच्छतं ॥ ४ ॥ है । इस सूत्रका 'स्वपरहिताय' पद उमास्वातिके 'अनु- 'उत्तर प्रकृतियाँ एकसौ अड़तालीस हैं।' ग्रहार्थ' पदसे अधिक स्पष्ट जान पड़ता है। ____ ज्ञानावरणकी ५, दर्शनावरणकी ६, वेदनीयकी २, ___ इति प्रभा चन्द्रविरचिने तत्त्वार्थसूत्रे सप्तमो- मोहनीयकी २८, आयुकी ४, नामकी ६१, गोत्रकी २ ध्यायः ॥ ७॥ और अन्तरायकी ५ प्रकृतियाँ मिलकर उत्तर प्रकृति'इस प्रकार प्रभाचन्द्रविरचित तत्त्वार्थसूत्रमें योंकी संख्या १४८ होती है। उमास्वातिने मूल प्रकृतिसातवाँ अध्याय समाप्त हुना।' योंके नामाऽनन्तर उत्तर प्रकृतियोंकी संख्याका निर्देशक जो सूत्र 'पंचनवद्वयष्टाविंशति' इत्यादि दिया है उसमें आठवाँ अध्याय नाम कर्मकी उत्तर प्रकृतियोंकी संख्या ४२ बतलाते हुए उत्तर प्रकृतियोंकी कुल संख्या ६७ दी है। नामकर्मकी मिध्यादर्शनादयो बंधहेतवः ॥ १ ॥ उत्तरोत्तर प्रकृतियोंको भी शामिल करके उत्तर 'मिथ्यादर्शन आदि बन्धके कारण हैं।' प्रकृतियोंकी कुल संख्या १४८ हो जाती है । उन्हीं .. यहाँ 'श्रादि' शब्दसे आगम-कथित उन अविरत, सब उत्तर प्रकृतियोंका यहाँ निर्देश है । प्रमाद, कषाय और योग नाम के बन्धहेतुअोंका संग्रह ज्ञानावरणादित्रयस्यांतरायस्य च त्रिंशत्सागकिया गया है, जिनका उमास्वातिने भी अपने इसी रोपमकोटीकोट्यः पराध्या (परा?) स्थितिः ॥५॥ अध्यायके पहले सूत्र में नामनिर्देशपूर्वक संग्रह किया है। 'ज्ञानावरणादि तीन कर्मों की और अन्तरायकी - चतुर्धा बन्धाः ॥२॥ उत्कृष्ट स्थिति तीस कोडा कोडी सागरकी है।' 'बन्ध चार प्रकारका होता है।' यह सूत्र उमास्वाति के 'आदिस्तिसृणामन्तरायस्य' यहाँ चारकी संख्याका निर्देश करने से अागम- इत्यादि सूत्रके समकक्ष है और उसी आशयको लिये निर्दिष्ट प्रकृति-स्थिति-अनुभाग-प्रदेशबन्ध नामके चारों हुए है। बन्धोंका संग्रह किया गया है | और इसलिये यह स्त्र महिनीयस्य सप्ततिः ॥६॥ और उमास्वातिका 'प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशास्तद्विधयः' 'मोहनीय कर्मको उस्कृष्ट स्थिति सतरकोडाकोटी सूत्र दोनों एक ही श्राशयको लिये हुए हैं । सागर की है।' ... मूलप्रकृतयोऽष्टौ ॥३॥ . उमास्वातिके सूत्र में 'सप्ततिः' पद पहले और 'मृल प्रकृतियाँ पाठ हैं।' 'मोहनीयस्य' पद बादमें है। आगम-कथित कर्मोकी मूल आठ प्रकृतियाँ ज्ञाना त्रयस्त्रिंशदेश्वायुषः ॥७॥ चरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, श्रायु, नाम 'मायुकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति तेतीस ही सागर की है। और गोत्र हैं, और इसलिये इस सूत्रका वही श्राशय है यह सूत्र उमास्वातिके 'अयविंशसागरोपमाण्याजो उमास्वाति के 'मायो ज्ञानदर्शनाबरण' इत्यादि युषः' सूत्रके समान है । इसमें प्रयुक्त हुश्रा 'एव' शब्द सत्रका है। + उत्तराष्ट। । । Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४३८ अनेकान्त वीर निर्वाण सं० २४६६ U S कोटी कोटिकी निवृत्यर्थ जान पड़ता है । 'तपसे निर्जरा भी होती है।' - नामगोत्रयोविंशतिः ॥८॥ यह सूत्र और उमास्वातिका दूसरा सूत्र दोनों प्रायः 'नाम और गोत्र कर्मकी उस्कृष्ट स्थिति बीस कोडा एक ही है-वहाँ 'च' शब्दका प्रयोग है तब यहाँ उस कोडी सागरकी है। के स्थान पर 'अपि' शब्दका प्रयोग है। अर्थमें कोई .. यह सूत्र उमास्वातिके 'विंशतिनामागोत्रयोः' सूत्र भेद नहीं । तपसे संबर और निर्जरा दोनों ही होते हैं, यह के बिल्कुल समकक्ष है । परन्तु यह सूत्र नम्बर ७ पर 'च' और 'अपि' शब्दोंके प्रयोगका अभिप्राय है । होना चाहिये; क्योंकि ८ ३ नम्बर पर होने के कारण इस उत्तमसंहननस्यांतर्मुहूर्तावस्थापि ध्यान ॥३॥ में वर्णित स्थिति पूर्व सूत्रके सम्बन्धानुसार २० सागरकी 'उत्तम संहननवालेके ध्यान अन्तमुहूर्त पर्यंत हो जाती है-२० कोडाकोडी सागरकी नहीं रहती- अवस्थित रहने वाला होता है।' और यह सिद्धान्त शास्त्र के विरुद्ध है। ध्यान अन्तरंग तपका एक भेद है, वह ज्यादासे इति श्रीवृहत्प्रभाचंद्रविरचिते तत्त्वार्थसूत्रे अष्ट- ज्यादा अन्तर्मुहूर्त-एक मुहूर्त-पर्यन्त ही स्थिर रहने मोध्याय ॥८॥ वाला होता है,और वह भी उत्तम संहनन वाले के । हीन 'इस प्रकार श्री बृहत्प्रभाचंद्र विरचित तत्त्वार्थ सूत्र संहननवालेका ध्यान किसी भी विषय पर एक साथ इतनी में पाठवां अध्याय समाप्त हुआ। देर तक नहीं ठहर सकता। उमास्वातिका 'उत्तमसंहनन स्यैकाग्रचिन्तानिरोधोध्यानमान्तर्मुहूर्तात्' यह २७वाँ छ नववाँ अध्याय सूत्र भी इसी श्राशयका है । विशेषता इतनी ही है कि गुप्त्यादिना संवरः ॥१॥ उमास्वातिने 'एकाग्रचिन्तानिरोधः' पदके द्वारा ध्यानका . 'गुप्ति श्रादिके द्वारा संवर (कर्मास्रवका निरोधी स्वरूप भी साथमें बतला दिया है। होता है।' तच्चतुर्विधं ॥४॥ । यहाँ 'श्रादि' शब्दसे समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परि वह ध्यान चार प्रकारका है।' पहजय और चारित्र नामके पागम कथित संवर-भेदोंका यहाँ चारकी संख्याका निर्देश करनेसे अागमप्रसिद्ध उनके उपभेदों-सहित संग्रह किया गया है, और इस बात, रौद्र, धर्म्य और शुक्ल ऐसे चारों भेदोंका संग्रह लिये इस सूत्रका विषय बहुत बड़ा है । उमास्वातिका । किया गया है । उमास्वातिका इसके स्थान पर 'पातं. 'सगुप्ति-समिति-धर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचरित्रैः' नामका सूत्र रौद्रधर्म्यसुक्तानि' सूत्र है, जो ध्यान नामोंके स्पष्ट इसी श्राशयका स्पष्टतया व्यंजक है। उनके तत्त्वार्थ और उल्लेखको लिये हुए है। सूत्रमें गुप्ति आदिके उपभेदोका भी अलग अलंग सूत्रों . आद्य संसारकारणे ॥५॥ में निर्देश किया गया है, जब कि यहाँ वैसा कुछ भी . परे मोक्षस्य ।।६।। नहीं है। तपसा निर्जराऽपि ॥२॥ - * श्वेताम्बरीय सूत्रपाठमें 'ध्यानम्' तकके अंशको ____ २७ वाँ सूत्र और 'आमुहूर्तात' को २८ वाँ सूत्र बत. * ति। लाया है। Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७ ] 'पहले दो (भार्त, रौद्र ) ध्यान संसार के कारण प्रभाचन्द्रका तत्त्वार्थसूत्र कुल समकक्ष है । दोनों एक ही श्राशयको लिये.. हुए हैं । हैं ।' 'दूसरे दो (धर्म्य, शुक्ल) मोचके कारण हैं ।' उमास्वाति ने इन दोनों सूत्रोंके स्थान पर 'परे मोच'हेतू' नामका एक ही सूत्र रक्खा है और उसके द्वारा दूसरे दो ध्यानोको मोक्षका हेतु बतलाया है, जिसकी सामर्थ्य से पहले दो ध्यान स्वतः ही संसारके हेतु हो जाते हैं । यहाँ स्पष्टतया संसार और मोक्षके हेतुओं का अलग अलग निर्देश कर दिया है । पुलाकाद्याः † पंचनिर्ग्रन्थाः ॥ ७ ॥ 'पुलाक आदि पाँच निर्मन्थ हैं।' यहाँ पाँचकी संख्याके निर्देश पूर्वक 'आदि' शब्दसे श्रागमप्रसिद्ध बकुश, कुशील निर्ग्रन्थ और स्नातक नामके चार निर्ग्रन्थों का किया गया है । उमा स्वातिने 'पुलाक-मकुश-कुशील- निर्व्रन्थ- स्नातका निर्मन्था:' इस सूत्र में पाँचोंका स्पष्ट नामोल्लेख किया है। इति वृहत्प्रभा चन्द्रविरचिते तत्त्वार्थसूत्रे नवमोध्याय ॥ ९ ॥ 'इस प्रकार वृहत्प्रभा चन्द्रविरचित तस्थार्थ सूत्रमें है, क्योंकि वहां धर्मास्तिकायका प्रभाव है।' नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।' दसवां अध्याय मोहये घातित्रयापनोदात्केवलं ॥ १ ॥ 'मोहनीय कर्मका चय होने पर तीन घातिया कर्मों ज्ञानावरण दर्शनावरण, अन्तराय - के विनाशसे केवल ज्ञान होता है।' यह सूत्र उमास्वातिके 'मोहल्यात् ज्ञानदर्शनावरणान्तरायचयाञ्च केवलम्' इस प्रथम सूत्रके बिल +द्या 224 अशेषकर्मक्षये मोक्षः ॥ २ ॥ 'सब कर्मोंका चय होने पर मोच होता है।' इस सूत्र के स्थान पर उमास्वातिका दूसरा सूत्र 'बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोदोमोचः जिसमें 'बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां यह कारमा निर्देशात्मक पद अधिक है । और उसके द्वारा यह सूचित किया गया है कि शेष कर्मोंका विनाश बन्धके हेतु के प्रभाव और संचित कर्मोंकी निर्जरासे होता है । तत ऊर्ध्व गच्छत्या लोकांतात ॥ ३ ॥ 'तत्पश्चात ( मोचके अन्तर) मुक्त जीव लोकके अन्त तक गमन करता है ।' ... यह सूत्र उमास्वातिके पांचवें सूत्र 'तदनन्तर मुर्ध्वं गच्छत्याढोकान्तात् के बिल्कुल समकक्ष है तथा एकार्थक है और उससे तीन अक्षर कम हैं । ततो न गमनं धर्मास्तिकायाभावात् ॥ ४ ॥ 'लोकके अन्तिम भागके परे अलोक में गमन नहीं यह सूत्र उमास्वातिके‘धर्मास्तिकायाभावात' सूत्रके समकक्ष है - मात्र 'ततो न गमनम्' पदोंकी विशेषताको लिये हुए है, जो अर्थको स्पष्ट करते हैं । क्षेत्रादिसिद्धभेदाः साध्याः ॥ ५ ॥ * श्वे० सूत्र पाठ में यह सूत्र दो सूत्रों में विभक्त है। इसका पहला पद दूसरा सूत्र और शेष दो पद 'विप्रमोक्षो' के स्थान पर 'क्षयो' पदकी तबदीलीके साथ तीसरा सूत्र है । कन्या । *कायत्वात् । Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४० अनेकान्त [वैसाख, वीरनिर्वाण सं०२४६६ ____चत्र प्रादिके द्वारा सिद्धभेद साध्य हैं-विकल्प- इति श्री वृहत्प्रभाचंद्राचार्यविरचिते तत्त्व नीय-हैं। . ___ सारे सूत्रे दशमोध्यायः ॥१०॥ यहाँ 'आदि' शब्दसे उन अगमोदित काल, गति,, ... इति जिनकल्पिसूत्र समाप्तं ॥ लिंग, तीर्थ, प्रत्येकबोधित, बुद्धबोधित, ज्ञान, अवगाह- . . 'इस प्रकार वृहस्प्रभाचन्द्राचार्य विरचित तत्वार्थना, अन्तर, संख्या और, अल्पबहुत्व भेदोंका संग्रह सार सूत्रमें दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।' किया गया है. जिनके द्वारा सिद्धोंमें नयविवक्षासे विक- 'इस प्रकार जिनकल्पी सूत्र समाप्त हुआ।' ल्प किया जाता है उन्हें भेदरूप माना जाता है- वीरसेवा-मन्दिर, सरसावा, ता० २१-४-१६४० और जिनका उल्लेख उमास्वातिने अपने क्षेत्रकालगति... . बहुत्वतःसाध्याः' सूत्रमें किया है । और सर्वार्थसिद्धिकारादिने जिनका विशेष विवेचन किया है। विविरचिते । जिनकल्पी सूत्र ........ - परमाणु ! ... रच०–श्री॰चैनसुखदास न्यायतीर्थ] ' - अजब हैं तेरे सब व्यापार ! तु अनित्य औ' नित्य कथश्चित् । स्पर्श द्वय-रस-गन्ध-रूप-मय. कभी न मिलता तुझसे सञ्चित् विश्वोदय औ' लयका प्रालय : बन जाता जब स्कन्ध बन्ध-मय पा अनन्त परिवर्तन, फिर भी हो जाता सविकार। रहता है अविकार । आदि-मध्य-अवसान न होता शाङ्कर-छिद्र सहित क्तलाते फिर भी तू षटकोण कहाता छिद्र रहित सब दर्शन गाते । ४. साँख्य पतञ्जलिकी तन्मात्रा तुझे बताते विधि-विधानमें । ........ तु त्वन्मय संसार । . आदि-अन्तका द्वार । 1. यह अनन्त रचना सब तेरी. सर्व: तन्त्र-सिद्धान्त बनाते x विश्व-प्रकृति है तेरी घेरी तुझे तत्ववेत्ता बतलाते । जल-थल-सूरज-चन्द्र आदिमें विविध क्रिया-गतिका आश्रय तू तेरा ही विस्तार। अववि का है सार । Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश [ले-श्री पं० नाथूरामजी 'प्रेमी'] उपोद्घात ..... ही मालूम होती है । जैनधर्मके दिग़म्बर सम्प्रदायकी इस समय इस बातकी चर्चा बड़े जोरों पर है कि यह अनुयायिनी है। अन्य जातियोंके समान न इसमें परवार जातिका एक इतिहास तैयार किया कोई श्वेताम्बर सम्प्रदायका अनुयायी है और न जैनेजाय । अपनी प्राचीनता और गत-गौरवकी कहानी तर सम्प्रदायोंका । हाँ, इसमें कुछ लोग तारन पंथके जाननेकी किसे इच्छा नहीं होती है परन्तु वास्तव में अनुयायी अवश्य हैं जो 'समैया' कहलाते हैं । दिगम्बर जिसे इतिहास कहते हैं उसका लिखना इतना सहज सम्प्रदायकी और सब बातोंको मानते हुए भी मूर्ति पूजा नहीं है जितना कि लोग समझते हैं । जातियोंका इति नहीं करते, केवल शास्त्रोको पूजते हैं और वे शास्त्र हास लिखना तो और भी कठिन है। क्योंकि इसके गिनतीमें चौदह हैं, जिन्हें विक्रमकी सोलहवीं शताब्दीमें लिए जो उपयोगी सामग्री है अभी तक उसे प्रकाशमें तारनस्वामी नामक एक संत ने रचा था। लानेकी ओर ध्यान ही नहीं दिया गया है। फिर भी ___ परवारोंके अठसखे, छहसखे, चौसखे और दोसखे जो कुछ सामग्री मिल सकी है उसके श्राधर पर मैं इस ये चार भेद किसी समय हुए थे, जिनमें से इस सम लेखमें कुछ प्रकाश डालनेका प्रयत्न करूँगा। केवल अठसखे और चौसखे रह गये हैं। सुना जाता है कि दोसखे परवारों के भी कुछ घरोंका अस्तित्व है, परवार जातिका परिचय और उसके भेद परन्तु हमें उनका ठीक पता नहीं है। लेख शुरू करने के पहले यह ज़रूरी है कि परवार जातियोंकी उत्पत्ति कैसे होती है ? जातिका थोड़ा सा परिचय दे दिया जाय । इस बारेमें हमें इतना ही कहना है कि वैश्योंकी जो सैकड़ों परवार जातिकी उत्पत्ति पर गहराईसे विचार करजातियाँ है, परवार जाति भी उन्हींमें से एक है । बुंदे नेके लिए यह ज़रूरी है कि पहले यह जान लिया जाय कि भारतवर्षकी उसके समान अन्य जातियोंकी उत्पत्ति लखण्ड, मध्यप्रदेशके उत्तरीय ज़िले, मालवेकी ग्वालियर और भोपाल आदि रियासतोंके कुछ हिस्से, प्रधा कैसे होती रही है। इसके लिए पहले हम भगवजिन नतासे इन्हींमें यह जाति श्राबाद है । दि. जैन डायरे सेनाचार्यका मत उद्धृत करते हैं। भगवजिनसेनके क्टरी (सन् १६१४ ) के अनुसार परवारोंकी जनसंख्या कथनानुसार पहले मनुष्य जाति एक ही थी, पीछे जीलगभग ४२ हज़ार है । साहूकारी, जमींदारी, दूकान विकाओंके भेदके कारण वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य दारी और बज़ाज़ी इस जातिको मुख्य जीविकाएँ हैं। और शूद्र इन चार भेदोंमें बँट गई । रंग रूप और शरीर-संगठनसे यह शुक्ल वर्ण आर्य जाति आदिपुराण पर्व २८ श्लोक ४५ । Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [वैसाख, वीर निर्वाण सं० २४६६ ४४२ महाभारतके शान्तिपर्वमें भी यही बात कही गई रखें और अपने दलको औदीच्य कहें ® । कुछ जातिहै । परन्तु इस समय भारतवर्ष में सब मिला कर याँ सामाजिक कारणोंसे बन गई हैं जैसे प्रत्येक जाति २७३८ जातियाँ हैं । अब प्रश्न यह होता है कि मूलके के दस्सा, बीसा, पाँचा श्रादिभेद और परवारों के उक्त चार वर्षों में से ये हज़ारों जातियाँ कैसे बन गई ?, चौसखे, दोसखे आदि शाखायें । कुछ जातियाँ विचार इस विषयमें इतिहासकारोंने बहुत कुछ छानबीन की है। भेदसे या धर्मसे बन गई हैं जैसे वैष्णव और जैन; खंडेहम यहाँ जाति बननेके कारण बहुत ही संक्षेपमें बत- लवाल, श्रीमाल, पोरवाड़, गोलापूरव श्रादि । लाएँगे। पेशोंके कारण बनी हुई भी बीसों जातियाँ हैं, जैसे सुनार, लुहार, धीवर, बढ़ई, कुम्हार, चमार आदि । - कुछ जातियाँ तो भौगोलिक कारणोंसे-देश प्राँत- इन पेशेवाली जातियों में भी फिर प्राँत, स्थान, भाषा नगरोंके कारण बनी हैं । जैसे ब्राह्मणोंकी औदीच्य, श्रादिके कारण सैकड़ों उपभेद हो गये हैं । कान्यकुब्ज, सारस्वत, गौड़ आदि जातियाँ और वैश्यों ___ सुप्रसिद्ध इतिहासकार स्वर्गीय काशीप्रसाद की श्रीमाली, खण्डेलवाल, पालीवाल या पल्लीवाल, जायसवालने. अपने 'हिन्दू-राजतन्त्र' नामक यन्थम श्रोसवाल, मेवाड़ा, लाड आदि जातियाँ । उदीची बतलाया है कि कई जातियाँ प्राचीन कालके गणतंत्रों अर्थात् उत्तर दिशाके औदीच्य, कान्यकुब्ज देशके या पंचायती राज्योंकी अवशेष हैं, जैसे पंजाब के अरोड़े कान्यकुब्ज या कनबजिया, सरस्वती तटके सारस्वत (अरट्ट) और खत्री (क्सपोई) और गोरखपुर श्रा जमगढ़ और गौड़ देश या बंगालके गौड़ । इसी तरह श्रीमाल जिले के मल्ल आदि । अभी अभी डाक्टर सत्यकेतु विद्यानगर जिनका मूल स्थान था वे श्रीमाली कहलाये, जो नागवाजानिरनिवास मिट कि ब्राह्मण भी हैं, वैश्य भी हैं और सुनार भी हैं। इसी कि अग्रवाल लोग 'आग्रेय' गणके उत्तराधिकारी हैं । तरह खंडेलाके रहनेवाले खंडेलवाल, पालीके रहनेवाले ये गणतंत्र एक तरह के पंचायती राज्य थे और अपना पालीवाल या पल्लीवाल, अोसियाके श्रोसवाल, मेवाड़ के शासन आप ही करते थे। कौटिल्यने अपने अर्थ-शास्त्र मेवाड़ा, लाट (गुजरात) के लाड अादि । यहाँ यह में इन्हें 'वार्ताशस्त्रोप नीवी' बतलाया है । 'वार्ता' का बात ध्यान में रखने योग्य है कि जब किसी राजनीतिक अर्थ कृषि, पशुपालन और वाणिज्य है । ये तीनों कर्म या धार्मिक कारणसे कोई समूह अपने प्राँत या स्थानका वैश्योंके हैं । इसके साथ शस्त्र धारण भी वे करते थे । परिवर्तन करके दूसरे स्थानमें जाकर बसता था, तबसे ये अनहिलवादाके सोलंकी राजा मूलराज (ई. नाम प्राप्त होते थे और नवीन स्थानमें स्थिर-स्थावर हा ११११६) ने यज्ञके लिये जिन ब्राह्मण परिवारों को जाने पर धीरे धीरे उनकी एक स्वतंत्र जाति बन जाती उत्तर भारतसे बलाकर अपने यहाँ बसाया था, उन्हें ही थी। उदीची या उत्तरके ब्राह्मणोंका दल जब गुजरात औदीच्य कहते हैं। में आकर बसा तब यह स्वाभाविक था कि वह अपने x इनका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है, जैसे अपने ही दल के लोगोंके साथ सामाजिक सम्बन्ध परन्तु वह केवल पेशेकी पहचान के रूपमें, वर्तमान ॐ शांतिपर्व भ० १८८ श्लोक १०। जातिरूपमें नहीं । जैसे यूरोपके लुहार बढ़ई श्रादि । Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण • } परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश जब इनकी स्वाधीनता छिन गई और एकतंत्र राज्यों में शब्द पल्लीवाल, अोसवाल, जैसवाल जैसा ही है और इनको समाप्त कर दिया, तब ये शस्त्र छोड़कर केवल उसमें नगर या स्थानका संकेत सम्मिलित है । महतरों वैश्य कर्म ही करने लगे और अब उनमें से कितने ही या महाब्राह्मणोंसे जो परवारोंकी उत्पत्तिका अनुमान पुराने नामोंको लिए हुए जातिके रूपमें अपना अस्ति- किया हैं वह तो निराधार और हास्यास्पद है ही, इस त्व बनाये हुए हैं । संभव है कि अन्य वैश्य जातियों के लिये उस पर कुछ लिखनेकी जरूरत ही नहीं मालम विषयमें भी खोज करनेपर उनका मूज भी अरोड़ा, मी गोरा होती। ... . खत्री, मल्ल श्रादि जातियों के समान प्राचीन गणतंत्रॉमें ___अगर हम 'परवार' शब्दके अन्तका 'वार' 'वाट' मिल जाय इस विषय में यह भी संभव है कि कई के अर्थ में लें तो यह सिद्ध करना ज़रूरी है कि इस समय बार स्थान परिवर्तनके कारण नये स्थानों परसे नये परवार जातिका जहाँ श्रावास है वहाँ वह किसी समय नाम प्रचलित हो गये हों और पुराने गणतंत्र वाले नाम कहीं अन्यत्रसे आकर बसी है। उसे वर्तमान आवास भूल गये हों। स्थानमें आये हुए कई शताब्दियाँ बीत गई हैं इसलिए परवारोंके विषयमें प्रचलित मान्यताओंका उनके रहन-सहन, रीति-रिवाजोंमें पहले कुछ खोज निका. लना, अशक्य सा है, फिर भी कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे खंडन और अपने मतका स्थापन । बाहरसे आनेका अनुमान- ज़रूर हो सकता है 1. सबसे परवार जाति के विषय में अधिक खोज करनेसे पहले पहली बात पंचायती संगठन है । बुंदेलखंड और मध्ययह जरूरी है कि इसके सम्बन्धमें प्रचलित मान्यताओं प्रदेशमें शायद ही कोई ऐसी मूल जाति हो जिसमें इस का विचार किया जाय । तरहका पंचायती अनुशासन हो यह अनुशासन उन्हीं ___'परवार' शब्दको बहुतसे लोग 'परिवार' का अप जातियोंमें होना स्वाभाविक है जो कहीं अन्यत्रसे श्राकर भ्रष्ट रूप बतलाते हैं जिसका अर्थ कुटुम्ब होता है । कोई वसती हैं और जिन्हें दसरों के बीच अपना स्थान बनाकर यह भी कल्पना करते हैं कि शायद परवार 'परमार' रहना पड़ता है या जो गणतंत्रोंकी अवशेषहैं। इनके व्याह राजपूतों मेंसे हैं, जिन्हें आजकल पंवार भी कहते हैं। शादी अादिके रीति-रिवाज भी अन्य पड़ोसी जातियोंसे परन्तु ये सब कल्पनायें हैं । मूल शब्दसे अपभ्रष्ट होने के निराले हैं । ब्राह्मणोंको इस जातिने अपने सामाजिक और भी कुछ नियम है और उनके अनुसार 'परमार' से धार्मिक कार्योसे बिल्कुल बहिष्कृत कर दिया है । यहाँ 'परवार' नहीं बन सकता। अपभ्रंश में 'म' का कुछ तक कि उनके हाथका भोजन भी ये नहीं करते। यदि अंश शेष रहना चाहिए जैसा कि 'पँधार' में वह अनु ये जहाँ हैं वहींके रहने वाले होते, तो ब्राह्मणोंका प्रभाव स्वार बनकर रह गया है। हमारी समझमें परवार इनपर भी होता जो प्रत्येक प्रांतकी प्रत्येक जातिमें परम्परा *इस विषयकी विशेष जानकारीके लिए देखो स्व- गत रहा हैं । इनकी स्त्री पुरुषोंकी पोशाकमें भी विशेषता गीय म०म० के० पी० जायसवाल कृत 'हिन्दू राज्य- थी, जो अब लुप्त हो रही है। हमारी समझमें घाघरा, लंत्र। . . 'चाल' शब्द संस्कृत के 'वाट' या 'पाट' प्रत्ययसे बना है। पिरवार, पल्लीवाल वगैरह शब्दोंका 'वार' या देखो भागे इसी विषयकी एक टिप्पणी । Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४ भनेकान्त [वैसाख, वीरनिर्वाण सं०२४६६ - चुनरी और तनीदार चोली परवार स्त्रियोंकी ही विशे- तीसरा लेख प्रानपुरा (चंदेरी) की एक प्रतिमाका पता थी, जो पड़ोसी जातियोंमें नहीं थी और यदि थी तो है-- बीके अनुकरण-पर। "संवत् १३४५ आषाढ़ सुदि २ बुधौ (धे) श्री मूल परवार जाति बाहरसे आकर बसी है, इसके अन्य संघे भट्टारक श्रीरत्नकीर्तिदेवाः पौरपाटान्वये साधुदा हृद प्रमाण इसी लेखमें अन्यत्र मिलेंगे। भार्यावानी सुतश्च सौ प्रणमति नित्यं ।” .. परवार जातिका प्राचीन नाम इसमें भी मूर्ति प्रतिष्ठित करनेवाले पौरपाट अन्वयके हैं । . अब देखना चाहिए कि प्राचीन लेखोंमें इस जाति स्पष्ट मालूम होता है कि इन लेखोंमें 'पौरपाट' का नाम किस रूपमें मिलता है। मेरे सन्मुख परवारों या 'पौरपट्ट' शब्द परवारोंके लिए ही आया है क्योंकि द्वारा प्रतिष्ठित प्रतिमानों और मन्दिरोंके जो थोड़ेसे लेख इन प्रांतोंमें जैनियोंमें परवार लोग ही ज्यादा हैं । फिर है, उनमें से सबसे पहला लेख अतिशय क्षेत्र 'पचराई भी अगर इस पर शंका की जाय कि पौरपट्टया पौरके शांतिनाथके मन्दिरका है जो वि० सं० ११२२ का पाट वंश परवार ही है, इसका क्या प्रमाण ? तो इसके है। उसका यह अंश देखिए लिए चन्देरीकी श्री ऋषभदेवजीकी मूर्तिका यह लेख पौरपरट्टान्वये शुद्धे साधुनाम्ना महेश्वरः । देखिए-- " महेश्वररेव विख्यातस्तत्सुतः ध(म) संज्ञकः ॥ संवत् ११०३४ वर्षे माघ सुदी ६ बुधौ (धे ) - अर्थात् पौरपट्ट वंशमें महेश्वरके समान साहु महे. मूलसंघे भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेव-शिष्य-देवेन्द्रकीर्ति श्वर थे जिनका पुत्र ध (म) नाम का था। पौरपाट अष्टशाखा अाम्नाय सं० थणऊ भार्या पु तत्पुत्र दूसरा लेख चंदेरीके मन्दिरकी पार्श्वनाथकी प्रतिमा सं० कालि भार्या आमिणि तत्पुत्र सं० जैसिंघ भार्या पर इस तरह है:-- महासिरि तत्पुत्र सं०..........." "संवत् १२५२ फाल्गुन सुदि १२ सोमे पौरपाटा- इसी तरह का लेख देवगढ़ में है जिसका एक न्वये साधु यशहृद' रुद्रपाल साधु नाल भार्यायनि...... अश ही यहाँ दिया जाता है - पुत्र सोलू भीमू प्रणमंति नित्यम् ।” "संवत् १४६३ शाके १३५८ वर्षे वैशाख बदि ५ गुरौ दिने मूलनक्षत्रे श्री मूलसंघे बलात्कारगणे साहु सोलु भीमूने सं० १२५२ में यह प्रतिमा प्रतिष्ठित की थी और वे पौरपाट अन्वय या वंशके थे। सरस्वतीगच्छे कुंदकुंदाचार्यान्वये भट्टारक श्री प्रभाचन्द्र देवाः तच्छिध्य वादिवादीन्द्रभट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवा ॐ यह लेख पचराई तीर्थकी रिपोर्ट में छपा है । इस च्छिष्य श्री देवेन्द्रकीर्तिदेवाः पौरपाटान्यवे अष्टका कटिंग बाबू ठाकुरदासनी बी. ए. टीकमगढ़ने कृपा ...... करके मेरे पास भेज दिया है। उसके नीचे छपा है, यह संवत शायद १४९३ हो । प्रतिलिपि करने 'पुरातत्वविभाग ग्वालियरसे प्राप्य'। इस निबन्धके वाले ने गलत पढ़ लिया है, ऐसा जान पड़ता है। · अन्य प्रतिमा-लेख भी उक्त बाबू सा० की कृपासे ही यह लेख हमें बाबू नाथूरामजी सिं० की प्राप्त हुए हैं। लेखोंकी कापी सावधानीसे नहीं की गई कृपासे प्राप्त हुआ है । इसकी नकल बहुत ही अशुद्ध है। पढ़ने में भी भ्रम की हुई है Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७ ] परवार जाति के इतिहास पर कुछ प्रकाश शाखे श्राहारदानदानेश्वर सिंघई लक्ष्मणतस्य भार्या नहीं रह जाता कि पौरपट्ट या पौरपाट† परवारोंका हो अय सिरिकुक्षिसमुत्पन्न श्रर्जुन... ।" पर्यायवाची हैं। उक्त लेखों में 'पौरपाट' के साथ 'ष्टशाखा लिखा गया है और चूंकि आठसखा परंवार ही होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि 'पौरपाट' शब्द 'परवार' - जाति के ही लिये प्रयुक्त किया गया है। लगभग इसी समयका एक और लेख प्रानपुरा ( चंदेरी) घोंडशकारण यंत्र पर ख़ुदा हुआ देखियेसं० १६८२ मार्गसिर यदि वो भ० ललितकीर्तिपट्टे भ० श्री धर्मकीर्ति गुरुपदेशात् परवार धनामूर सा० हठीले भार्या दमा (या ) पुत्र दयाल भार्या केशरि भोजे गरीब भालदास भार्या सुमा....." er एक और लेखांश देखिये जो पपौंस जीके भौंह के मन्दिरके दक्षिण पार्श्वके मन्दिरकी एक प्रतिमा पर खुदा है | ""संवत् १७१८ वर्षे फाल्गुने मासे कृष्णपक्षे ....श्रीमूलसंघे बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे कुंदकुन्दाचार्यन्वये भट्टारक श्री ६ धर्मकीर्तिदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री ६ पद्मकीर्तिदेवास्तपट्टे भट्टारक श्री ६ सकलकीर्तिरुपदेशेनेयं प्रतिष्ठीकृता तद्गुरूराद्योपाध्याय नेमिचन्द्रः पौरपट्टे अष्टशाखाश्रये धनामूले कासिल्ल गोत्रे साहु धार भार्या लालमती' * ' एक और लेख थूबोन जीकी एक प्रतिमा पर इस प्रकार है— "सं० ( १६ ) ४५ माघ सुदी ५ श्री मूलसंघे कुंदकुन्दाचार्यान्वये भ० यशकीर्ति पट्टे भ० श्री ललितकीर्ति पट्टे भ० श्री धर्मकीर्ति उपदेशात पौरपट्टे छितिरामूर गोहिल गोत्र साधु दीनू भार्या .. .........93 इस तरह के और भी अनेक लेख हैं जिनमें मूर और गोत्र भी दिये हैं। इससे इस विषय में कोई सन्देह * साहु अधारके ही वंशका सं०१७०६ का एक लेख ललितपुर के क्षेत्रपाल के दक्षिण तरफ़ पार्श्वनाथ की खङ्गासनस्थ मूर्तिपर खुदा । उसमें भट्टारकोंकी परस्परा भी यहो दी है पर मूर और गोत्र नहीं है। सिर्फ 'पौरपट्टे भ्रष्टशाखान्वये' लिखा है । यह यन्त्र भी उन्ही भट्टारक धर्मकीर्तिके उपदेश स्थापित हुआ है जिन्होंने थूबोनकी पूर्वोक्त प्रतिमा को प्रतिष्ठितं कराया था । पर उसमें तो 'पौरपट्ट' खुदा है और इसमें 'परवार' । इससे भी यह स्पष्ट होता है पौरपट्ट और परवार एक ही हैं और यह लेख लिखनेवालेकी इच्छा पर था कि वह चाहे पौरपट्ट या पौरपाट लिखे और चाहे परवार । अर्थात् परवार शब्द ही संस्कृत लेखों में 'पौरपट्ट' बन जाता था । परवार और पोरवाड़ अब हमें यह देखना चाहिये कि इस 'पौरपाट या 'पौरवाट' के सम्बन्ध में अन्यत्र भी कुछ जानकारी मिलती है या नहीं । यह सोचते ही हमारा ध्यान सबसे पहले नाम साम्य के कारण वैश्योंकी एक और प्रसिद्ध जाति पोरवाड़की ओर जाता है, जिसकी आबादी दक्षिण मारवाड़, सिरोही राज्य और गुजरात में काफी तादाद में है । कुछ लेखों और ग्रंथोंमें इसे भी परवार जाति के समान पौरवाट या पौरपाट कहा गया 'वाट' या 'वाटक' और 'पाट' या 'पाटक' शब्द भौगोलिक नामों के साथ विभागके अर्थमें प्रयुक्त होते. '' '' हो जात देखो स्व० रा० ब० हीरालाल कृत इन्सक्रिप्शन्स क सी०पी एण्ड बरार, पृ० २४ और ८७ Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४६ अनेकान्त श्रीमाली उसपालाश्च पौरवादाश्च नागराः । दिक्पालाः गुर्जराः मोदाः ये वायुवटवासिनः ।। वायुपुराण इसमें वायुवट अर्थात् वायड ( पाटण के समीप ) में रहने वाली वैश्य जातियोंके नाम बतलाए हैं-श्रीमाली, उसपाल (सवाल), पौरवाड़ ( पोरवाड़), नागर दिक्पाल (. डीसावाल या दीसावाल ), गुर्जर और मोढ़ | यह बात विद्वानोंने मान ली है कि गुजरातकी 'पौरवाट ' जाति पोरवाढ़ ही है, वहांके पोरवाड़ भी. अपनेको 'पोरपाट' या 'पौरवाट ' मानते हैं । ऐसी दशा में यदि यह अनुमान किया जाय कि पोरवाड़ और परवार मूलमें एक ही थे तो वह अत्युक्त न होगा । और यह सिद्ध हो जाने पर कि 'पोरवाड़' और 'परवार' एक ही हैं, 'पोरवाड़ों' का इतिहास एक तरह से परवारों का ही इतिहास जाता है और पोरवाड़ों की उत्पत्ति जहाँसे हुई है वहांते ही परवारों की उत्पत्ति सिद्ध हो जाती है। अब हम यह देखेंगे कि विद्वानोंका पोरवाड़ों की उत्पत्तिके विषय में क्या कहना है । परवारों और पोरवाड़ोंका मूल स्थान पोरवाड़ोंका पुराना नाम 'पौरपाट' 'पौरवाट' और प्राग्वाट मिलता है । इस सम्बन्धमें सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ महामहोपाध्याय पं० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा अपने 'राजपूतानेका इतिहास' की पहिली जिल्द में लिखते 10 [वैसाख, वीर निर्वाण सं० २४६६ " करनबेल (जबलपुर के निकट) के एक शिला - लेखमें प्रसंगवशात् मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा हंसपाल, वैरिसिंह और विजयसिंहका वर्णन आया है जिसमें 'उनको 'प्राग्वाट' का राजा कहा है। अतएव 'प्रावाद' मेवाड़का ही दूसरा नाम होना चाहिए । संस्कृत-शिलालेखों तथा पुस्तकों में 'पोवाड़' महाजनोंके लिए 'प्राग्वाट' नामक प्रयोग मिलता है और वे लोग अपना निकास मेवाड़के 'पुर' नामक कस्बेसे बतलाते हैं जिससे सम्भव है कि प्राग्वाट देशके नाम पर वे अपनेको प्राथवाट वंशी कहते रहे हो ।” हम विभिन्न प्रतिमा-लेखोंसे ऊपर सिद्ध कर चुके हैं कि 'परवार' शब्द में जो 'वार' प्रत्यय है वह 'वाट' या 'पाट' शब्दसे बना है जिसका प्रचलित अर्थ होता है। 'रहनेवाले' । इस तरह 'पौरबाट ' शब्दका अर्थ 'पौरके रहनेवाले' होता है। मेरे ख्यालसे इसी पुर नामसे 'पौर' बन गया है और परवार और पोरवाड़ लोग मूलमें इसी 'पुर' के रहनेवाले थे । 'पौरपाट' का अर्थ 'पुरकी तरफ भी लिया जा सकता है । 'पुर' गाँव जिसका कि ऊपर जिक्र है, अब भी मेवाड़ में भीलवाड़े के पास एक क़स्बा है जो किसी समय बड़ा नगर था । * यह उद्धरण श्री मणिलाल बकरभाई व्यास लिखित श्रीमालीभन! 'ज्ञातिभेद' नामक पुस्तक परसे लिया गया है। कभी कभी शब्दों के दुहरे रूप भी बना लिये जाते हैं जैसे 'नीति' शब्दसे 'नैतिकता' । 'नीति' से 'नैतिक' बना और फिर उसमें भी 'ता' जोड़कर 'नैतिकता' बनाया गया यद्यपि 'नीति' और 'नैतिकता' के अर्थ एक ही हैं। इसी तरह मालूम होता है 'पुर' से भी 'पौर' बनाकर उसमें 'वाट' या 'पाट' लगा लिया गया जबकि 'पुर' के आगे 'घाट' या 'पाट' लगा देनेसे भी काम चल सकता था । पर यदि 'पुर' का पौर न कर सीधा ही उसमें 'वाट' या 'पाट' प्रत्यय जोड़ दें तो 'पुरवाट ' 'पुरवाड़ ' Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण •] परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश या 'पुरवार' शब्द बनता है जो 'परवार' शब्दके अधिक साँभरके अासपास था । पर बघेरवाल आज कल निकट है । संभव है 'परवार' लोग अपने 'पोरवाड़' बरारमें ही अधिक हैं । पल्लीवालोंका मूलस्थान 'पाली' कहलानेवाले भाइयोंसे पहले ही मेवाड़ छोड़ चुके हों मारवाड़में है जो अब य० पी० के अनेक जिलोंमें फैले पर बादमें बहुत दिनों तक सम्बन्ध बना रहा हो और हुए हैं। इसी तरह श्रीमाल, अोसवाल, मेड़वाल, तब जिस तरह लेखोंमें पोरवाड़ 'पौरपाट' लिखे जाते , 'चित्तौड़ा आदि जातियाँ हैं जिनके मूलस्थान राजस्थान रहे हों उसी तरह इन्हें भी 'पौरपाट' लिखा जाता रहा में निश्चित हैं+। ऐसी दशामें परवारोंका भी मूल: हो। पर बोलचाल में 'पुरवार' या 'परवार' ही बने स्थान मेवाड़में होना संभव है । आज भी अपने देशको रहे हों। . छोड़कर दुनियाँभर में व्यापार निमित्त जानेकी जितनी इसके सिवाय एक संभावना और भी है। वह यह पं. आशाधरजी बघेरवाल थे। वे मांडलगढ़में कि गुजराती और राजस्थानी भाषाओंमें शन्दके शुरू में पैदा हुए और शहाबुद्दीन गौरीके आक्रमणोंसे त्रस्त और बीचका 'उ' कार 'श्री' कारमें बदल जाता है। होकर बहुत लोगोंके साथ मालवेमें मा बसे थे। देखो अक्सर लोग 'बहुत' का उच्चारण 'बहोत' 'लुहार' का मेरी विद्वन्द्ररनमानाका पृ. १२.१३ । पूर्वकालमें इसी 'लोहार' 'सुपारी' का 'सोपारी' 'मुहर' का 'मोहर' 'गुड़' तरहके कारणोंसे जातियाँ बन जाती थीं। को 'गोड' 'पुर' का 'पोर' करते हैं और लिखते भी हैं । इस तरह सहज में ही उस तरफके लोग 'पुरवार' या ____ + इनमें 'नेमा' और 'गोलाबारे' जातिको भी 'पुरवाट' को 'पोरवार' 'पोरवाट' या 'पोरवाई' उच्चारण शामिल किया जासकता है। मालवा और सी० पी० करने लगे हों और एक ही जानि इस तरह दो में 'नेमा' वैष्णव और जैन दोनों हैं। बरारमें ये 'नेवा' हों। कुछ भी हो पर यह बात निश्चित् है कि 'पौरपाट' कहलाते हैं और श्वेताम्बर जैन डायरेक्टरीके अनुसार शब्द जब बना तब वह 'पोरवाई' का ही संस्कृत रूप ५६०८ में गुजरातमें इनकी संख्या ११०२ थी। सिर्फ माना गया। बागबमें इनके कई हजार घर हैं। सूरत जिलेमें और ___ 'वैश्यवंशविभषण' नामक पुस्तक में जो बहुत उसके आसपास एक 'गोनाराणे' नामकी जाति भावाद पहले एंग्लो अोरियण्टल प्रेस लखपऊसे छपी थी परवारों है जिसके बारेमें मेरा अनुमान है कि यही बुन्देलखण्डमें का नाम 'पुरवार' छपा है । इससे मालूम होता है कि आकर गोलालारे' कहलाने लगी है। ये लोग अपनेको परवारों के लिए 'पुरवार' शब्द भी व्यवहृत होता था । क्षत्रिय बताते हैं और वैश्य हैं । स्व० मुनि बुद्धिसागर सम्पादित 'जैन-धातु-प्रतिमा-लेख-संग्रह' नामक पुस्तक परवार जातिका मूल राजस्थान में है, यह बात के पहले भागके ५० नं० के एक लेखमें एक प्रतिमाके सुननेमें कुछ लोगोंको भले ही विचित्र मालम हो, पर स्थापकको 'गोलावास्तव्य' लिखा है जिससे मालूम जातियोंके इतिहासका प्रत्येक विद्यार्थी जानता है कि होता है कि 'गोला' नामका कोई नगर था जिसमेंसे वैश्योंकी करीब करीब सभी जातियाँ राजस्थानसे ही गोलापुरव, गोलाबारे और गोलसिघाड़े ये तीनों ही निकली हैं । उदाहरणार्थ बघेरवालोंका मूलस्थान 'बधेरा' समय समय पर निकले होंगे। Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४८. अनेकान्त [ वैसाख, वीरनिर्वाण सं० २४६६ जी ने और 'जैन-सम्प्रदाय - शिक्षा' के लेखक यति श्रीपाल जीने पोरवाड़ों का मूल स्थान 'पारेवा' या 'पारा' पोरवाड़ोंकी उत्पत्तिके संबंधकी कथाएँ और नगर बतलाया है मगर वह कहाँ पर है इसका कुछ गलत धारणाएँ पता नहीं दिया। संभव यही है कि 'पुर' सबका ही बिगड़कर 'पारा' या 'पारेवा' बन गया हो। मेवाड़ से बाहर फैलाव प्रवृत्ति राजस्थानी और मारवाड़ी लोगों में है उतनी और किसी में नहीं । प्राग्वाट और पौरवाड़ोंकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें अनेक कल्पित कथायें 'श्रीमालीपुराण' और 'विमल - प्रबन्ध' आदि ग्रन्थों में मिलती हैं। परन्तु वे सब शब्दों अर्थ परसे ही गढ़ी गई जान पड़ती हैं। जब लोग किसी जाति के मूल इतिहासको भूल जाते हैं, तब कुछ न कुछ कहने के लिए संभव असंभव कथायें रच डालते हैं । उन्हें क्या पता कि मेवाड़का एक नाम 'प्राग्वाट' भी था और वहाँ कोई 'पुर' नामक नगर था । उदाहरण के लिये एक कथा देखिये जब लक्ष्मीजीको श्रीमाल नगरकी समृद्धिकी चिंता हुई, तब विष्णु भगवानने उनके मनकी बात जानकर ६० हज़ार वणिकोंको श्रीमाल नगर में दाखिल किया। तब उनमें से जो पूर्व दिशामें बसे, वे प्राग्वाट कहलाये । 'प्राग' का अर्थं पूर्व होता है और वाटका दिशा, स्थान आदि । बस शब्दार्थ में से ही कथा बन गई । गरज यह कि इस तरहकी कथाओं पर विश्वास नहीं करना चाहिए । प्रायः सभी जातियों के सम्बन्ध में इस तरह की अद्भुत अद्भुत कथायें प्रचलित हैं । 'महाजन - वंश मुक्तावली' के लेखक यति रामलाल t चोलुक्य या सोलकी राज्यवंश के विषय में भी ऐसी ही एक कथा शब्द परसे गढ़ी गई है। 'लुक' शब्दसे. चौलुक्य बन सकता है और 'चुलुकका अर्थ होता है, चुल्लू! ब्रह्माकी ने या किसी देवताने चुलू भर पानी डालकर जिला दिया बस उसीसे चौलुक्य वंश उत्पन्न हो गया । जातियों के एक स्थान से दूसरे स्थानको जाने के अनेक कारण होते हैं । उनमें मुख्य है आर्थिक कारण । अक्सर प्राचीन समृद्ध नगर राजनीतिक उथलपुथलोसे, श्राक्रमणकारियोंके उपद्रवोंसे और प्रकृति-प्रकोप से उजड़ जाते हैं। जहाँ जीविका के साधन नहीं रहते तब जातियाँ वहाँ से उठ कर दूसरे समृद्विशाली नगरों या प्रान्तों में चली जाती है। वर्तमान स्थानकी अपेक्षा दूसरे स्थानोंमें लाभकी अधिक श्राशासे भी गमन होता है । अक्सर प्रतापी राजा नये नगर बसाते हैं और उनमें पुरुषार्थियों को बुलाकर बसाते हैं। ऐसे ही किसी कारण से पोड़वाड़ या परवार जातिने मेवाड़से बाहर क़दम रक्खा होगा । जहाँ जहाँ जाकर ये बसे वहाँ वहाँ इन्होंने अपना परिचय प्राग्वाट या पोरवाड़ विशेषण के साथ दिया और तभी से ये इस नाम से प्रसिद्ध हुए । पद्मावती - पुरवार परवारोंकी एक शाखा ऐसा जान पड़ता हैं कि प्राग्वाटों या पोवाड़ोंका एक दल पद्मावती नगरी में भी आकर बसा था । पीछे जब यह महानगरी ऊजड़ हो गई, और इस कारण उसे वहाँसे अन्यत्र जाना पड़ा तब उस दलका नाम पद्मावती पोरवाड़' या ‘पद्मावती पुरखार' हुना । पद्मावती किसी समय बड़ी ही समृद्धिशाली नगरी थी । खजुराहाके एक शिलालेखमें जो ईस्वी सन् + देखो इण्डियन एक्टिक्वेरी पहवाखंड पृ०१४३ Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश वर्ष ३, किरण ७ ] १००१ का है इसकी समृद्धि की अत्यन्त प्रशंसा की गई है। उसे ऊँचे गगनचुंबी भवनोंसे सुशोभित अनुपम नपर बतलाया है, जिसके राज़ मार्गोंमें बड़े बड़े घोड़े दौड़ते हैं, और जिसकी दीवारें चमकती हुई, स्वच्छ, शुभ्र और आकाश से बातें करती हैं । ग्वालियर राज्यका 'पदम पवाँया' नामक स्थान प्राचीन पद्मावती के स्थान पर बसा हुआ है । यह बहुत समय तक नाग - राजानोंकी राजधानी रही है । 'पद्मावती पोरवाड़' परवारोंकी ही एक शाखा है, इस बातका प्रमाण पं० बखतरामजी कृत 'बुद्धिविलास' नामक ग्रंथ के 'श्रावकोत्पत्ति प्रकरण' में भी मिलता है सात खाँप परवार कहावैं, तिनके तुमकौं नाम सुनावें । सक्खा फुनि हैं चौसक्खा, सह सक्खा फुनि हैं दो सक्खा । सोरठिया अरु गाँगज जानौ, पदमावतिया सप्तम जानौ । अर्थात् परवार सात खाँपके हैं - १ ठसखा, २ चौसखा ३ छहसखा, ४ दो सखा, ५ सोरठिया, ६ गांगज ७ और पदमावतिया । इनमें से पहले चार तो परवारों के प्रसिद्ध भेद हैं ही जिनमें से अब केवल ठसखा और चौसखा रह गये हैं और पदमावतिया से झांसी-आगरा लाइन पर देवरा स्टेशनसे कुछ दूर पर ग्वालियर राज्य में । * इसे मेरे मित्र तात्या नेमिनाथ पांगलने बहुत बरस पहिले बारसी टा उनके जैन मन्दिरसे लेकर भेजा था । उस समय मैंने एक नोट भी जैनहितैषी (भाग ६ अंक ११-१२ ) में प्रकाशित किया था। इस समय यह ग्रन्थ मेरे सन्मुख नहीं है। इसलिए यह नहीं कह सकता कि ग्रन्थ किस समयका बना हुआ है । -४४६ मतलब पद्मावती पौरवाड़ से है जो इस समय एक जुदी जाति है + । परवारोंसे दूर पड़ जानेके कारण ही कालान्तर में इसका परवार संम्वन्ध टूट गया होगा । पद्मावती पोरवाड़ों में जिस तरह 'पाँडे' हुआ करते है उसी तरह परवारों में भी हैं । पहिले शायद इनसे वही काम लिया जाता था, जो अन्य जैनेतर जातियों में ब्राह्मणोंसे लिया जाता है। परवारोंके मूल- गोत्रों में भी 'बामल्ल' गोत्रका एक मूर 'पद्मावती' नामका है। । जान पड़ता है इस मूर के लोग ही दूर चले जाने पर एक स्वतंत्र जातिके रूप में परिणत होगए होंगे। जो थोड़े लोग परवारोंके साथ रह गये, वे पद्मावती मूर वाले कहलाते हैं। जैसा कि ऊपर कहा है यह नाम पद्मावती नगरीके नामसे ही पड़ा होगा । • जातियोंके इतिहास में ऐसी बहुत-सी जातियाँ है जो पहले एक बड़ी जातिके अन्तर्भूत गोत्र रूपमें थीं और फिर पीछे एक अलग जाति बन गई । .. + दि० जैन डिरेक्टरीके अनुसार पद्मावती पोर - वाड़ोंकी जन संख्या ११५३१ थी। इनका एक जत्था सौ दो सौ वर्ष पहले शायद बघेरवालोंके ही साथ बरारमें जा बसा था जो भाषा वेष आदिमें बिलकुल दक्षिणी हो गया । इससे उत्तरभारत वालोंका इनके साथ विवाह सम्बन्ध टूट गया था; जो अब जारी किया गया है । * हमारे गांवमें एक पड़े परिवार है, अमरावती में भी एक पांड़े हैं । अन्यत्र भी इनके घर होंगे । + एक सूची में कासा गोत्रका मूर भी पद्मावती लिखा है । कोइल्ल गोत्रके एक मूरका नाम 'पद्मावती डिम' भी है । Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५. भनेकान्त [वैसाख, वीरनिर्वाण सं०२४६६ - सोरठिया परवार संका। पर इससे यह पता लगता है कि महा-कौशल में . 'सोरठिया पोरवाड' नामकी जाति · गुजरातमें है । जबलपुर, नरसिंगपुर, सिवनी आदिकी तरफ परवार दो सोरठमें बसनेके कारण इसका यह नाम पड़ा है। इस स्थानोंसे जाकर श्राबाद हुए हैं । जो सीधे बुन्देलखंडसे जातिमें जैन और बेष्णव दोनों धर्मोके अनुयायी हैं । आये वे बुन्देलखंडी और जो गढ़ा (जबलपुरके पास) इन्हें परवारोंकी एक खाँप बतलाया है और इस तरफ से आये वे गढ़ावाले । गढ़ा पहले समृद्धिशाली नगर ये पोरवाड़ ही माने जाते हैं, इससे भी परवार और था । उसके उजड़ जाने पर इन्हें नीचेकी तरफ आना पोरवाड़ पर्यायवाची मालूम होते हैं । पड़ा होगा। ___ 'बुन्देलखंडी' और 'गढ़ावाले' यह भेद परवारोंकी जाँगड़ा परवार पड़ौसिन गहोई जातिमें भी है । वैश्य होनेके कारण यह अब शेष रहे 'गाँगज' सो मेरा ख्याल है कि जाति भी साथ साथ ही नई जगहोंमें आबाद हुई होगी। लिखने वाले की भलसे यह नाम अशुद्ध लिखा गया है। गहोइयोंमें इन दोनों दलोंमें बेटी व्यवहार तक बन्द हो संभवतः यह 'जाँगड़' होगा जो 'जाँगड़ा पोरवाड़ों' के गया था जो बड़े आन्दोलनके बाद अब जारी हुआ लिए प्रयुक्त हुअा है। ___ जाँगड़ा पोरवाड़ बैष्णव और जैन दोनों हैं। परवारों और पोरवाड़ोंके बाकी उपभेद चम्बल नदीकी छाया में रामपुरा, मन्दसोर मालवा परवारोंकी सात खाँपे ऊपर बतलाई जा चुकी हैं। तथा होल्कर राज्य में वैष्णव जाँगड़ा और बडवाहा उनमें से दोसखे छहसखे समाप्त होकर दो खाँपे अठ नीमाडके आसपास तथा कुछ बरारमें जैन जाँगडा सखा और चौसरवा रह गई हैं । चौसखे भी अब अठरहते हैं जो सिर्फ दिगम्बर सम्प्रदायके ही अन्यायी हैं। सखोंमें मिल रहे हैं । तारनपंथी समैया उपजातिका ____ जोधपुर राज्यका उत्तरी भाग जिसमें नागौर आदि जिक्र ऊपर किया जा चुका है ! इसका सम्बन्ध भी परगने हैं 'जांगल देश' कहलाता था। शायद इसी अब परवारोंसे होने लगा है और अब सिर्फ एक पन्थके कारणसे ये जाँगड़ा कहलाये होंगे और मेवाइसे निकल रूपमें ही इसका अस्तित्व रह गया है। कर पहले उधर बसे होंगे। * श्री मणिलाल बकोर भाई ग्यासके पास संवत् ___ इनका रहन-सहन और आचार-विचार परवार १७०० के आस पास का लिखा हुआ एक पाना है जातिसे बहुत कुछ मिलता-जुलता है। दूसरोंके हाथसं जिसमें राजौर जातिके । बड़ी सखा, २ लहुड़ी सखा, खाने-पीनेका इन्हें भी बड़ा परहेज है । रंगरूपमें भी ये ३ चउसखा, ४ द्विसखा और ५ राजसखा ये पाँच परवारों के समान है। अन्तर्भेद बतलाये हैं। 'जैन-सम्प्रदाय-शिक्षा' के अनु. सार इस जाति का उत्पत्ति-स्थान 'राजपुर' बतलाया बुन्देलखण्डी और गढ़ावाल है। क्या पूर्वकालमें परवार जातिसे इस जातिका भी परवारोंका सबसे पिछला भेद बुन्देलखंडी और कुछ सम्बन्ध था ? कहीं 'पुर' का ही दूसरा नाम 'राजगढ़ावाल है जो पृथक् जातिके रूपमें परिणत न हो पुर' न हो ? Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश वर्ष ३, किरण ७ ] हाँ परबारोंमें दस्से भी हैं जो 'बिनैकया' कहलाते हैं । उनमें भी नये और पुराने ये दो भेद हैं। पुराने विनेकया वैसे ही हैं जैसे श्रीमाली, हूमड़ आदि जातिमें दस्सा हैं, अर्थात् उनमें विधवा-विवाह नहीं होता और पहले कभी हुआ था, इसका भी कोई प्रमाण नहीं मिलता । नये विनेकयोंसे भी इनका कोई सम्बन्ध नहीं है । पुराने विकया कहाँ २ अपनेको 'जैसवार' भी कहलाने लगे हैं, पर वास्तवमें जैसवारोंसे उनका कोई सम्बन्ध नहीं है । एक दल ऐसा भी है जो अपनेको चौखा परवार कहता है । जान पड़ता है कि पंचायती दंड विधानकी सख्ती और प्रायश्चित्त देकर शुद्ध करनेकी बंदी ही विनैकयों की उत्पत्तिके लिये जिम्मे वार है | पुराने विनैकयोंके विषय में तो हमारा ख्याल है कि किसी समय किसी हुकुम-उदूली आदि के अपरामें ही ये अलग किये गये होंगे और फिर अलसंख्यक होनेके कारण लाचारीसे इन्हें अपने मूर गोत्रोंको अलग रख देना पड़ा होगा । पोरवाड़ों के तीन भेद हैं शुद्ध पोवाड़, सोरठिया पोरवाड़, और कंडुल या कपोल † । फिर इन सबमें गुजरात और राजपूतानेकी अन्य 1 दिगम्बर जैन डिरेक्टरी ( सन् १३१४ ) के अनुसार विनैकेया परवारोंकी संख्या ३६८५ और चौसखोंकी १२७७ थी । + ततो राजप्रसादात्समीपपुरनिवासतो वणिजः प्राग्वाटनामनो वभूवुः । तेषां भेदत्रयम् । पादौ शुद्ध प्रावाटाः । द्वितीयाः सुराष्ट्रं गता । केचित्सौराष्ट्र प्राग्वाडाः । तदवशिष्टाः कंडल महास्थान निवासिताऽपि कंडुल प्राग्वाटा वभवुः । - ' श्रीमाली भोनो शातिभेद' के १०७ में पेजका ज्योंका त्यों उद्धरण । ४२१ जातियों के समान बीसा और दस्सा ये दो मुख्य भेद और हैं। प्राचीन लेखोंमें 'बृहत्शाखा' और 'लघुशाखा' नामसे इनका उल्लेख मिलता है । परन्तु दस्खा कहला कर भी इनमें विधवा-विवाहकी चाल नहीं है और पहले भी थी, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है । धर्मों के कारण पड़े हुए पोरवाड़ों के उक्त भेदों के दो दो भेद और हैं, जैन और वैष्णव । जैनोंमें भी मूर्तिपूजक और स्थानकवासी हैं। इनके सिवाय सूरती, खंभाती, कपड़बंजी, अहमदा बादी, मांगरोली, भावनगरी, कच्छी आदि स्थानीय भेद हो गये हैं और इससे बेटी व्यवहारमें बड़ी मुसीतें खड़ी हो गई हैं। क्योंकि ये सब अपने अपने स्थानीय गिरोहों में ही विवाह सम्बन्ध करते हैं । ऐसा जान पड़ता है कि पोरवाड़ जाति पहले दिग कई प्रबन्धों और पुस्तकों में लिखा है कि आबू के संसार प्रसिद्ध जैनमन्दिर बनवानेवाले महामात्य वस्तुपाल - तेजपाल की माता बाल-विधवा थीं। ये दोनों पुत्र उन्हें पुनर्विवाहसे प्राप्त हुए थे। इस बातको कोई जानता न था । पुत्रोंकी श्रोरसे एकवार तमाम वैश्य जातियोंको महाभोज दिया जा रहा था कि यह बात किसी जानकार की तरफ से प्रकट कर दी गई। तब जो लोग भोज में शामिल रहे वे दस्सा कहलाये और जो उठकर चले गये वे बीसा । कहा जाता है कि उसी समय तमाम जातिमें दस्सा- बीसा की ये दो दो तड़ें हो गई । * श्वेताम्बर जैन डिरेक्टरीके अनुसार बीसा पोरबाड़ों की संख्या १६०१० और दस्ता पोरवादोंकी ६२८१ थी और बम्बई अहाते की सन् १९११ की सरकारी मनुष्य गणना अनुसार वैष्णव पोरवादोंकी संख्या ७७४८ थी । सोरठिया वैष्णव इनसे अलग ११४४५ थे । Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [वैसाख, वीर निर्वाण पं०२४६६ म्बर सम्प्रदायको भी मानने वाली थी। 'नेमि-निर्वाण' कोई पात्र ऐसा नहीं मिलता जो इनमें से किसी जाति दिगम्बर सम्प्रदायका श्रेष्ठ काव्य है। उसके कर्ता पं० का हो । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शद्र, नामसे ही सब वाग्भट अहिच्छत्रपुरमें उत्पन्न हुए थे । अहिच्छत्रपुर पात्र परिचित किये गये हैं। इससे मालूम होता है कि नागौर (मारवाड) का प्राचीन नाम था । * गुजरा- उक्त कथा साहित्य जिस समय अपने मौलिक रूपमें तादिमें श्वेताम्बर सम्प्रदायका प्राधान्य था, इसलिए लिखा गया था, उस समय ये जातियाँ थीं ही नहीं। वहाँ पोरवाड़ श्वेताम्बर सम्प्रदाय के अनुयायी रहे और जैन साहित्यमें जातिका सबसे पहला उल्लेख मालवा बुन्देलखंड आदिमें दिगम्बर सम्प्रदायकी प्रधा- आचार्य अनन्तवीर्यने अपनी 'प्रमेयरत्न माला' नता थी इससे परवार और जाँगड़ा पोरवाड़ दिगम्बर हीरपनामक सजनके अनरोधसे बनाई थी। इन हीरपके रहे । जातियोंमें धर्म-परिवर्तन और सम्प्रदाय-परिवर्तन पिताको उन्होंने बदरीपाल' वंशका सूर्य कहा है ।। भी अक्सर होते रहे हैं। यह कोई वैश्य जाति ही मालम होती है। अनन्तवीर्यका परवार तथा अन्य जातियोंकी उत्पत्तिका समय समय विक्रमकी दसवीं शताब्दी है । जहाँ तक हम अब सवाल यह उठता है कि परवार जातिकी जानते हैं, जैन साहित्यमें जातिका यही पहला उल्लेख उत्पत्ति कब हुई ? इसका निर्णय करने के लिए यह है । दूसरा उल्लेख महाराजा भीमदेव सोलंकीके सेनाजानना जरूरी है कि अन्य जातियाँ कब पैदा हुई? पति और आबके आदिनाथके मन्दिर के निर्माता बिमअन्य जातियोंकी उत्पत्तिका जो समय है लगभग वही लशाह पोरवाड़का वि० सं० १०८८ का है। इनकी समय परवार जातिकी उत्पत्तिका भी होगा। इसके लिए वंशावलीमें इनके पहलेकी भी तीन पीढ़ियोंका उल्लेख पहले उपलब्ध सामग्रीकी छान-बीन की जानी चाहिए। है । यदि प्रत्येक पीढ़ीके लिये २०-२५ वर्ष रख लिये भगवजिनसेनका 'श्रादि-पराण' विक्रमकी दशमी जाँय तो यह समय वि० सं० १०२० के लगभग तक शताब्दीका ग्रन्थ हैं उसमें वर्ण-व्यवस्थाकी खुब विस्तार पहुंचेगा। से चर्चा की गई है, परन्तु वर्तमान जातियोंका वहाँ जैन प्रतिमा-लेखोंमें प्रायः प्रतिमा स्थापित करनेकोई जिक्र नहीं है । जैनोंका कथा साहित्य बहुत विशाल बालोंका परिचय रहता है । दिगम्बर सम्प्रदायकी प्रतिहै। उसमें पौराणिक और ऐतिहासिक सैकड़ों स्त्री मात्रओंके तो अब तक बहुत ही कम 'लेख प्रकाशित हुए पुरुषोंकी कथाएँ लिखी गई हैं परन्तु उसमें भी कहीं हैं * | + अहिच्छत्रपुरोत्पन्नः प्राग्वाटकुलशालिनः। । बदरीपालवंशालीच्योमधुमणिरूर्जितः'। "छाहडस्य सुतश्चके प्रबन्धं वाग्भटः कविः । वर्तमान जातियोंकी सूचीमें हमें इस जातिका नाम श्री ओझाजीके अनुसार अहिच्छत्रपुर नागौरका : नहीं मिला। या तो यह लुप्त हो गई है. या कुछ प्राचीन नाम था । बरेलीके जिलेका रामनगर भी अहि- नामान्तर हो गया है। छन्त्र कहलाता है, जो प्राचीन तीर्थ है। परंतु वाग्भट जहाँ तक हम जानते हैं बाबू कामताप्रसादजी नागौरमें ही उत्पन्न हुए होंगे, ऐसा जान पड़ता है। का एक छोटासा संग्रह और प्रो० हीरालालजीका जैन Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७] परवार जातिके.इतिहास पर कुछ प्रकाश ४५३ श्वेताम्बर सम्प्रदायके विद्वानोंने अवश्य ही इस प्राग्वाट बणिकोंमें श्रेष्ठ कहा हैछ । एक और शिलाश्रोर बहुत ध्यान दिया है । उनके प्रकाशित किये हुए लेख दुबकुंड ( ग्वालियर ) गांवमें सं० ११४५ का है। कई हजार लेखोंको मैंने देखा है परन्तु उनमें भी कोई जिसमें वहाँके दिगम्बर जैन मन्दिरके निर्माताको लेख ग्यारहवीं शताब्दीके पहिलेका ऐसा नहीं मिला 'जायसपूर्विनिर्गतवरिग्वंश' का सूर्य कहा है। इसका जिसमें किसी जातिका उल्लेख हो। अर्थ होता है पूर्वमें जायससे निकले हुए वैश्य वंशका इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वर्तमान जाति- प्रसिद्ध पुरुष । यह वह समय मालूम होता है जब याँ नौवीं-दसवीं शताब्दीमें पैदा हुई होनी चाहिएँ +। जातियोंको नाम प्राप्त हो रहा था अर्थात् उनके संघों और यही समय परवार जातिकी उत्पत्तिका भी होगा। या जत्थोंको उनके निकासके स्थानके नामसे अभिहित किया जाने लगा था । जातियोंकी उत्पत्तिके पहलेकी सामाजिक दक्षिण महाराष्ट्र और उससे और नीचेके भागके __ अवस्था-गोष्ठियाँ धर्मानुयायियोंमें तो उत्तर भारत के समान जाति-संस्था ग्यारहवीं सदीके कई लेख ऐसे मिले हैं जिनमें का विस्तार शायद हुआ ही नहीं। जैन शिलालेख मन्दिरों या प्रतिमाओं के स्थापित करनेवालोंको या तो संग्रहके शक स० १०४२ के नं. ४६ ( १२६ ) में केवल 'श्रावक' विशेषण दिया गया है या गोष्ठिक। चामुड नामक राजमान्यवणिक् की पत्नी देवमतीके इसीसे ऐसा मालम होता है कि जातियाँ निर्माण होने के समाधिमरणका उल्लेख है । उसमें किसी जातिका पहले गोष्ठियाँ थीं जिन्हें हम संघ, या जत्थे कह सकते निर्देश नहीं । शक १०५६ के लेख नम्बर ६८ (१५९) में चट्टिकव्वे नामक स्त्रीने अपने पति मल्लिसेहिकी निषद्या बनवाई। इसी तरह नं० ७८ (१८२), ८१ सिरोही राज्य के कायन्द्रागाँवके श्वेताम्बर जैन मन्दिरको एक देवकुलिका पर वि० सं० १०६१ का लेख (१८६), ६२ (२४२), ३२६ (१३७) के भी है जिनहै, जिसमें उसके निर्माताको 'भिल्लमालनिर्यातः प्राग्वाट में सबको सेट्टि (श्रेष्ठि) या व्यापारी ही लिखा है । इन से यह स्पष्ट है कि निदान विक्रमकी १३वीं शताब्दी वणिजांवरः' अर्थात् भिल्लमालसे निकाला हुआ तक कर्नाटकमें वैश्योंकी विविध जातियाँ नहीं थीं। लेखसंग्रह ये दो ही संग्रह प्रकाशित हुए हैं। पहलेमें असगकविका महावीर चरित सं० ६१० ( शायद मैनपुरी, एटा श्रादिके मन्दिसेंकी प्रतिमाओके लेख हैं शक संवत् ) चोल देशकी विरला नगरीमें बना है। और पिछलेमें श्रवणवेलगोला और उसके समीपके ही असगने अपने पिता पटुमतिको केवल श्रावक लिखा लेख है। है । अर्थात् चोल देशमें भी विक्रमकी म्यारहवीं सदी + स्वर्गीय इतिहासज्ञ पं० चिन्तामणि विनायक तक वैश्योंकी वर्तमान जातियाँ नहीं थीं। .. वैद्यने अपने 'मध्ययुगीन भारत में लिखा है कि विक्रमकी मुनि श्री जिनविजयजी सम्पादित 'प्राचीन नैव आठवीं शताब्दी तक ब्राहकों और सत्रियोंके समान लेखसंग्रह के द्वि० भागका ४२७वे नंबरका लेख । . वैश्योंकी सारे भारतमें एक ही जाति थी। एपित्राफिया इंडिका जिल्द २ पृ० २३०-४ Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५४ अनेकान्त [वैसाख, वीरनिर्वाण सं०२४६६ . स्थानों परसे जातियाँ बन जाने पर जब उनका प्रतिपादन करते हैं * और अनुलोम-विवाहोंसे अर्थात् फैलाव हुआ और वे दूर दूर तक फैल गई, तब यह ऊपरके बर्णं वालोंका नीचेकी वर्णकी कन्याके साथ भी लिखा जाने लगा कि अमुक जातिका अमुक स्थान सम्बन्ध होनेसे वर्णसंकरता होती ही है और यदि 'जाति में उत्पन्न हुआ या रहने वाला । जिस तरह नेमि- संकरता' में जातिका अर्थ वर्तमान जातियाँ हैं, तो वे निर्वाणके कर्ता वाग्भटने अपनेको 'अहिच्छत्रपुरोत्पन्नः तो इन्द्रनन्दिके कथनानुसार उस समय थीं ही नहीं। प्राग्वाटकुलशालिनः' लिखा है अथवा गिरनारपर्वतके आदिपुराणके मतसे तो वर्णसंकरताका अर्थ वृत्ति या नेमिनाथ मन्दिरकी सं० १२८८ की प्रशस्तिमें वस्तुपाल- पेशेको बदलना है, अर्थात् किसी वर्ण के श्रादमीका तेजपालको 'अहिल्लपुरवास्तव्य-प्राग्वाटान्वयप्रसूत' अपना पेशा छोड़ कर दूसरे वर्ण का पेशा करने लगना लिखा है अर्थात् अणहिलपुरके निवासी प्राग्वाट है और उस समय इस संकरताको रोकना राजाका जातिके । इसके बाद और आगे चलकर जातियोंके धर्म था + । ग़रंज़ यह कि जातियोंके स्थापित करने गोत्रादि भी लिखे जाने लगे। और वर्ण संकरताको मिटाने में कोई कारण-कार्य-सम्बन्ध . जातियोंकी उत्पत्तिके समयके बारेमें अन्य समझमें नहीं आता है। मतोंका खण्डन एक और प्रमाण जातियोंकी प्राचीनताके विषयमें चौदहवीं सदीके भट्टारक इन्द्रनन्दिने अपने नीति- यह दिया जाता है कि चंकि आचार्य गुप्तिगुप्त परवार सारमें लिखा है कि विक्रमादित्य और भद्रबाहुके स्वर्गः थे, कुन्दकुन्दस्वामी पल्लीवाल थे, उनके गुरु जिनचंद्र गत होने पर जब प्रजा स्वच्छन्दचारिणी होगई तब चौसखे परवार, वज्रनन्दि गोलापर्व और लोहाचार्य जातिसंकरतासे डरनेवाले महर्द्धिकोंने सबके उपकारके लमेच थे, इसलिए सिद्ध होता है कि कुन्दकुंदाचार्यसे लिए ग्रामादिके नामसे जातियाँ बनाई * परन्तु इसके भी पहले जातियाँ थीं । परन्तु जिस पट्टावलीके आधार लिए कोई विश्वासयोग्य प्रमाण नहीं है। विक्रम या से यह बात कही जाती है उसकी प्रामाणिकतामें घोर भद्रबाहुका समय भी एक नहीं है । इसके सिवाय सन्देह है और वह भी चौदहवीं सदीसे पहले की नहीं जातियोंका संकर न हो जाय अर्थात् मिश्रण न होजाय, है। उसके कर्ताको शायद इसके सिवाय कोई धुन ही इसका अर्थ भी कुछ समझमें नहीं आता है । जाति नहीं रही है, कि बड़े बड़े प्राचार्योंकी खास खास सकरताका अर्थ यदि वर्णसंकरता है तब तो प्राचीन * आदिपुराण पर्व १६ श्लोक २४७ । जैनधर्म इसका विरोधी नहीं था, क्योंकि भगवजिनसेन __+स्वामिमा वृत्तिाम्ब यस्त्वन्यां वृत्तिमाचरेत । अपने श्रादिपुराणमें अनुलोम-विवाहोंका स्पष्ट रूपसे सपाथिनियंतची वर्णसंकीर्णिरन्यथा ॥ + एपिप्राकि इंडिका जिक्द २ पृ० २३७.३० । -पर्व १६ श्लोक २४८ । * स्वर्गे गते विक्रमा मद्रबाही च योगिनि । अर्थात् जुदा जुदा वर्णोकी जो वृत्ति ( पेशा) प्रजाः स्वच्छन्दचारियो बभूवुः पापमोहिताः । नियत की गई है, उसे छोड़कर दूसरे वर्सकी वृत्ति करने तदा सर्वोपकारावं जाति संकरभीरभिः। लगनेको राजा लोग रोकें, अन्यथा वर्णसंकरता हो महर्दिक परंचके प्रामाभिधया कुखम् ॥-वीतिलार। जायगी। Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश वर्ष ३, किरण ७ ] जातियों में खतौनी करदी जाय । उस बेचारेने यह सोचने की भी श्रावश्यकता नहीं समझी कि जिस सुदूर कर्नाटक में कुंदकुंदादि हुए हैं वहाँ कभी पल्लीवाल, चौसखों और गोला पूर्वीकी छाया भी न पड़ी होगी । इसके सिवाय और किसी प्राचीन गुरु परम्परामें भी गुरुकी इन जातियोंका उल्लेख नहीं । जैन जातियोंकी उत्पत्तिकी सारी दन्त कथाओं में प्राय एक ही स्वर सुनाई देता है और वह यह कि अमुक जैनाचार्य ने अमुक नगरके तमाम लोगोंको जैन धर्मकी दीक्षा दे दी और तब उस नगरके नामसे मुक जातिका नाम करणं होंगया और उक्त सब श्राचार्य पहली शताब्दी या उसके आस पास के बतलाये जाते हैं। परन्तु ये सब दन्तकथायें ही हैं, और जब तक कोई प्राचीन प्रमाण न मिले तब तक इनपर विश्वास नहीं किया जा सकता। यह ठीक है कि कभी जत्थेके जत्थे भी जैनी बने होंगे, परन्तु यह समझ में नहीं श्राता कि उनमें सभी जातियोंके ऊँच नीच लोग होंगे और वे सब के सब एक ग्रांमके नामकी किमी जाति में कैसे परिणत हो गये होंगे। क्योंकि ऐसी प्रायः सभी जातियोंमें जो स्थानोंके नाममे बनी हैं जैनी - श्रजैनी दोनों ही धर्मोके लोग अब भी मिलतें हैं । जैनी अजैनी भी बनते रहे हैं और जैनी जैनी । गोत्र परवार जातिके बारह गोत्र हैं. परवारोंके इतिहास के लेखक के लिये जरूरी है कि गोत्रोंके बारेमें भी वह लिखे । गोत्रोंके विषय में कुछ लिखने के पहले हमें यह जानना चाहिये कि गोत्र चीज क्या हैं ? वैयाकरण पाणिनिने गोत्रका लक्षण किया है 'अपत्यं पौत्रप्रभूनि गोत्रम् । अर्थात् पौत्र से शुरू करके संतति या वंशजको गोत्र कहते हैं | वेद कालसे लेकर अब तक ब्राह्मणोंमें, चाहे ४२२ वे किसी भी प्रांत के हों, यह गोत्र-परम्परा अखण्डरूपसे चली आ रही है। महाभारत के अनुसार मूल गोत्र चार हैं- अंगिरा, कश्यप, वशिष्ठ और भृगु । इन्हींसे तमाम कुलों और लोगोंकी उत्पत्ति हुई है और आगे चलकर इनकी संख्या हजारों पर पहुँच गई है × । ज्यों ज्यों आबादी बढ़ती गई त्यों त्यों कुलों और परिवारोंकी संख्या बढ़ने लगी। किसी कुलमें यदि कोई विशिष्ट पुरुष हुआ, तो उसके नामसे एक अलग कुल या गोत्र प्रख्यात हो गया। उसके बाद आगे की पीढ़ियोंमें और कोई हो गया, सो उसका भी जुदा गोत्र प्रसिद्ध होगया । इसी तरह यह संख्या बढ़ी है । गोत्रोंके बारेमें वैश्योंकी अपनी विशेषता क्षत्रियोंकी गोत्र- परम्परा के विषय में इतिहासका कथन है कि वह बीच में शायद बौद्धकाल में विछिन्न हो गई और उसके बाद जब वर्णव्यवस्था फिर कायम हुई, तो क्षत्रियोंने अपने पुरोहितोंके गोत्र धारण कर लिये । अर्थात् पुरोहितका जो गोत्र था वही उनका हों गया । विज्ञानेश्वरने मिताक्षरामें यही कहा है कि क्षत्रियोंके अपने गोत्र-प्रवर नहीं है, पुरोहितोंके जो हैं वही भेद है। वैश्योंके विषय में भी यही कहा जाता हैं कि उनके हैं । परन्तु बहुतसे विद्वानोंका इस विषयमें मत उनकी गोत्र-परम्परा नष्ट हो चुकी थी और पुरोहितों के गोत्र उन्होंने भी हरण कर लिये होंगे । परन्तु अग्रवाल यदि जातियोंके गोत्र देखनेसे यह बात गलत मालूम होती है । उनके गोत्र पुरोहितोंसे जुदे हैं । बहुत-सी वैश्य जातियाँ ऐसी भी हैं जिनमें गोत्र * शांतिपर्व अध्याय २३६ । > गोत्राणां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । -प्रवराडी । Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५६ कान्त वैसाख, वीर निर्वाण सं०२४६६ हैं ही नहीं । श्रोसवाल श्रादि कुछ जातियाँ ऐसी हैं १० खोइल्ल (जैतल ) जिनके गोत्र ग्रामों या पेशों आदिके नामसे पड़े हैं और ११ माडिल्ल (कासव ) बहुतोंके ऐसे अद्भुत हैं कि उनके विषयमें कुछ कल्पना १२ फागुल्ल (सिंगल ) सिंहलं ही नहीं हो सकती। उनकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें तरह · ऊपरकी सूचीमें परवारोंके और गहोइयोंके नौ गोत्र तरह की कथायें भी गढ़ ली गई हैं। बिलकुल एक जैसे हैं और अग्रवालोंके चार गोत मिलते परवारोंके गोत्र और उनका अन्य जातियोंके हुए हैं। गहोइयोंके परवारोंके ही समान बारह गोत्र है परंतु . गोत्रोंसे मिलान अग्रवालोंके अठारह गोत्र हैं। . हमारा अनुमान है कि परवारोंके गोत्र गोत्रकृत् गहोई कौन हैं ? या वंशकृत् पुरुषोंके ही नामसे प्रारम्भ हुए होंगे और अग्रवालोंका थोड़ा परिचय ऊपर दिया जा चुका उनकी परम्परा बहुत पुरानी होनी चाहिए। है। अब हम परवारोंके अतिशय सामीप्यके कारण परवासेंके बारह गोत या गोत्र हैं। इनमेंसे कुछ गहोइयोंका थोड़ा परिचय देना ज़रूरी समझते हैं । गोत्र गहोइयों और अग्रवाल आदि जातियों जैसे हैं। संस्कृत लेखोंमें गहोई बशको 'गृहपति-वंश' लिखा इसका कारण शायद यह हो कि मूलमें ये एक ही रहीं गया है। गृहपतिसे गहवइ और फिर गहोई हो गया हों और आगे चलकर अलग हो गई हों। जो गोत्र है। बौद्ध ग्रंथों में गृहपति शब्द बहुत जगह वैश्यके मिलते नहीं है, भिन्न हैं, वे शायद अलग होने के बादके नाम अर्थमें आता है * । हमारा ख्याल है कि जिस समय वैश्योंमें भेद नहीं हुए थे, आम तौरसे सभी, वैश्य लोग' - "श्रामे हम परवार, गहोई और अग्रवाल जातिके गहवई कहलाते होंगे, पीछे जातियोंके बनने पर एक गोत्र दे रहे हैं समूह गहवई या गहोई ही कहलाता रहा, उसने अपना परवार गहोई अग्रवाल नाम नहीं बदला जब कि दूसरे समूह नगर स्थानादिके नामोंसे आपको परिचित कराने लगे।. १ गोहिल्ल. गांगल गोभिल २ गोहल्ल, गोइल, गोयल या गोल गोयल गहोइयोंका बुंदेलखण्डमें प्रवेश ३ वाछल्ल .. - वाछिल वत्सिल - गहोई जातिके पटिया एक दन्तकथा कहा करते हैं ४ कासिल्ल, काछिल ... कासिल __ कि. पवाँया या पद्मावती नगरीके कई द्वार थे । ५ वासिल्ल वासिल एक दिन अम्बिका देवी एक द्वार छेक कर लेटी ६ भारिल्ल भारल या भाल * देखो महाबोधिसभा द्वारा प्रकाशित दीवनि७ कोछल्ल काय पृ० ११, १४३, ११४ १७५ । पउमचरिय (२०. ८वाझल्ल बादल ११६) में गृहस्थ, गृही, संसारीके अर्थमें भी 'गहवई' १ कोइ.कोइल, कोहिल शब्द पाया है। कोछिल ......... Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण • ] परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश . . ...४२७ हुई थीं। नगरकी स्त्रियाँ उनकी परवा किये बिना ऊपर- स्पष्ट प्रमाण है कि वर्तमान सरावगी गहोइयोंके पुरखा से निकल गई, परन्तु पटियोंके पूर्वज बीघा-पाडेकी श्रावक या जैन थे। पत्नी सम्मानपूर्वक बचकर निकली, इससे प्रसन्न होकर झाँसी, चिरगाँव श्रादिमें परवारों और गहोइयों में अम्बिकाने पांडेजीको स्वप्न में कहा कि मैं अन्य स्त्रियों- पक्की रसोईका व्यवहार 'अब तक है, यह भी इस बातका की अशिष्टताके कारण इम नगरीको नष्ट करने वाली सुबूत है कि पूर्वकालमें इन दोनों जातियोंमें घनिष्टता हूँ, तुमसे जितनी दूर भागा जा सके भाग जाओ। थी और इन दोनोंका मूल स्रोत एक ही होगा। पद्मा आखिर पांडे जी अपने ग्यारह शिष्योंके साथ भाग वति नगरीसे. गोइयोंके निकलनेकी दन्तकथा भी इस निकले । श्रागे उन्हींकी सन्तान गहोई हुए और पौड़े बातको पुष्ट करती है। .... : . . .. जी की सन्तान पटिया । इस कथासे यह मालूम होता है परवारों, गहोइयों और अग्रवालोंके गोतोंकी समी कि परवारों के समान गहोई भी पद्मावती छोड़कर नता इस बातका भी संकेत करती है कि पर्वमें वैश्य बुन्देलखंडकी तरफ श्राबाद हुए थे और इन दोनों जाति एक ही थी और ये सब भेद 'स्थानस्थिविविशेजातियोंका बहुत पुराना सम्बंध है । षतः' बहुत बादमें हुए हैं। . .......... समस्त वैश्य जातियोंकी मौलिक एकता परवारोंके मूर .. . गहोई और परवार जाति के नौ गोत्र एकसे होना ऊपर जो बारह गोत्र बतलाये गये हैं, उनके प्रत्येक के बहुत अर्थपूर्ण है । हमारे बहुतसे पाठक शायद यह न बारह बारह मूर बतलाये जाते हैं । इस तरह सब मिला जानते होंगे कि पूर्वकालमें गहोई भाई भी 'जैनधर्मके कर १४४ मूर हैं। अनुयायी थे । इस जातिके बनाये हुए कई जैन मंदि- गोत-मरोंका मिलान किये बिना परवारों में कोई रोंका पता लगा है । इसके सिवाय गहोइयोंका एक विवाह सम्बन्ध नहीं होता है, फिर भी दुर्भाग्य देखिए मूर या आँकना 'सरावगी' नामका है, जो इस बातका कि इन मूर-गोतोंकी एक भी प्रामाणिक सूची उनके - पास नहीं है । एक तो उनके नाम ही अतिशय अपभ्रष्टे । ___ * प्रहार क्षेत्र (टीकमगढ़से १० मील पूर्व) में . होगये हैं और दूसरे जो मूर एक सूचीमें एक गोत्रके श्रीशान्तिनाथकी प्रतिमाके आसन पर एक लेख वि. अन्तर्गत है, वही दूसरी सूची में दूसरे गोत्रमें गिना गया सं०१२३७ का है। उसमें 'गृहपतिवंशसरोरुहसहस्ररश्मि' (गहोई वंश रूपी कमलके सूर्य) देवपालका वर्णन है है। किसी गोत्रके मूर बाहरसे कम हैं और किसीके ज्यादा। डावडिम, रकिया, पद्मावती, कुत्रा, मारू, जिन्होंने बाणपुर (अहारके १६ मील) में सहस्रकूट खौना श्रादि मूर ऐसे हैं जो दो दो गोतोंमें आते है। नामका जैनमन्दिर बनवाया था, और फिर जिनके उत्तम पुरुषोंमेंसे एकने यह शान्तिनाथका मन्दिर बन हमारे सामने इस समय मूर-गोतोकी चार वाया और प्रतिष्ठा कराई । यह लेख प्रो. हीरालाल सूचियाँ हैं एक जैनमित्रके पौष सुदीर सं०१६ के अंक जैन द्वारा नागरी प्रचारिणी-पत्रिकामें प्रकाशित हो में प्रकाशित पं० नम्बप्रसाद शास्त्रीकी भेजी हुई, दूसरी दो भिन्न सूचियाँ माधवदी' सं० १६' के नैनमित्रमें . . . Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८ अनेकान्त इस बात का पता लगाने की भी कभी कोशिश नहीं की गई है कि इस समय इन १४४ मूरोंमें से कितने जीते जागते हैं और कितनोंका नाम शेष हो चुका है। परवारोंके मूर और गोइयोंके आँकने गोइयों में भी मूर है, परन्तु उन्हें वे आँकने कहते है । कहा तो यह जाता है कि प्रत्येक गोत के छह छह मिला कर ७२ आँकते हैं; परन्तु अब इनका परिवार बढ़ कर सौके पास पहुँच गया है । इन आँकनोंकी सूची देखने से मालूम होता है कि खेड़ों या गाँवोंके नामसे इनका नामकरण हुआ होगा जैसे बड़ेरिया, रूसिया नगरिया, बजरंगढ़िया आदि। कुछ श्रकने पेशोंके कारण भी बने हुए जान पड़ते हैं जैसे सोनी, आदि । 'पूर' का शुद्ध रूप 'मूल' होता है । मूरको एक रूढ़ शब्द ही मानना पड़ता है जो गोत्रोंके अन्तर्गत मैदोंको बतलाता है और शायद उनसे मूल गोत्रोंका ही बोध होता है । किसी मूरमें पेशेकी गन्ध नहीं मिलती। मूरोंके जो अपभ्रष्ट नाम हमें इस समय उपलब्ध ॐ हैं, उनसे उनकी उत्पत्ति बिठाना कठिन है । यही ख्याल होता है कि गोइयोंके समान खेड़ों या गांवोंके नामोंसे . [ वैसाख, वीर निर्वाण सं० २४६६ ही इनका नाम करण हुआ होगा । पद्मावती, सकेसुर, बड़ेरिया, डेरिया, बैसाखिया, बहुरिया आदि मूरोंमें ग्रामों या नगरीका श्राभास मिलता भी है । इस समय इस विषय में इससे और अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि गोत्र प्रख्यात पुरुषोंके नामसे स्थापित हुए हैं, और मूर गावों या खेड़ोंके नामसे । गोत्र और मूरोंके विषयमें हमें यही मालूम होता है । मास्टर मोतीलालजी की भेजी हुई, और चौथी बा० अकुस्दासजी बी. ए द्वारा भेजी हुई सौ डेड़सौ वर्ष पकी हस्तलिखित पिछली सूचीमें दो गोलों में तेरह तेरह से में ग्यारह ग्यारह, एक में दस और एकमें नौ कसूर हैं। देखो 'गहोई वैश्ववस्थ' के दिसम्बर १६३८ के वशेषांक में श्रीक्त मंडीलाल वकीलका विस्तृत लेख जिसमें प्रत्येक मोठ्के भाँकनों पर विचार किया गया, है । पोरवाड़ोंके गोत चूंकि परवार और पोरवाड़ हमारे ख्यालसे एक ही हैं इसलिये हम पोरवाड़ों के गोत्रों की भी यहाँ चर्चा कर देना चाहते हैं । पोरवाड़ोंके चौबीस गोत्र बतलाये जाते हैं परन्तु उनमें गोत्र-परम्परा एक तरहसे नष्ट हो गई है। जो चौबीस नाम मिलते हैं वे पुस्तकों में ही लिखे हैं उनका कोई उपयोग नहीं होता है। गुजरातकी तो प्रायः सभी जातियोंने अपने गोत भुला दिये हैं । यहाँ तक कि मारवाड़ में जिन श्रोसवालों श्रीमालोंमें गोत्रका व्यवहार भी होता है, वे ही ओसवाल, श्रीमाल गुजरात में आकर गोत्रोंको बिलकुल ही भूल चुके हैं। इसी तरह पद्मावती पोरवाड़ों में भी गोत्र नहीं रहे हैं । कमसे कम उनका उपयोग नहीं किया जाता है । क्या परिवार क्षत्रिय थे ? वर्तमानकी अनेक वैश्य जातियाँ अपनेको क्षत्रिय * १ चौधरी, २ काला, ३ धनदाद, ४ रतनावत, ५ धन्यौत, ६ मनावर्या, ७ खवकरा, ८ भादल्या, कामल्या १० सेठिया, ११ अधिया, १२ वरवयद, १३ भूत १४ फरक्या, १५ बमेपर्या, १६ मंदावर्या, १७ सुनियां १८ छांटा, १३ यलिया, २० भेस्पैदा २१ नवेपर्या, २२ दानगढ़, २३ मेहता २४ खरडया | Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७] . परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश बतलाती हैं । यह संभव भी है। जैसा कि प्रारम्भमें वीर मन्त्री और सेनापति हुए हैं, जिससे यदि पोरवाड़ोंलिखा जा चुका है, बहुतसी वैश्य जातियाँ प्राचीन को क्षत्रिय कहा जाय तो अनुचित न होगा । गणों या संघोंकी अवशेष हैं और वे गण 'वार्ता- पोरवाड़ और परवार मूलमें एक ही हैं यह ऊपर शस्त्रोपजीवी' ये अर्थात् कृषि, गोपालन, वाणिज्य और सिद्ध किया जा चुका है। परन्तु परवारोंका इतिहास शस्त्र उनकी जीविकाके साधन थे । गणराज्य नष्ट हो अभी तक अन्धकारमें ही है। हम सिर्फ मंजु चौधरी जाने पर यह स्वाभाविक है कि उन्हें शस्त्र छोड़ देने नामक परवार वीरको ही जानते हैं जिन्होंने नागपुरके पड़े और केवल कृषि, गोपालन और वाणिज्य ही उन- भोंसला राजाको श्रोरसे उड़ीसा पर चढ़ाई की थी और की जीविकाके साधन रह गये। कालान्तरमें अहिंसा जिनके वंशके लोग अब भी कटकमें रहते हैं। .. की भावना तीव्र होने पर खेती करना भी उन्होंने छोड़ परवारोंके इतिहासकी सामग्री दिया, जिसके साथ साथ गोपालन भी चला गया और तब उनकी केवल वाणिज्यवृत्ति रह गई । लेख समाप्त करनेके पहले मैं अपने पाठकों के समक्ष यह निवेदन कर देना चाहता हूँ कि साधन - इसके सिवाय इतिहासके विद्यार्थी जानते हैं कि प्रख्यात गुप्तवंश मूल में वैश्य ही था जिसमें समुद्रगुप्त, सामग्रीकी कमीसे यह लेख जैसा चाहिये वैसा नहीं लिखा जा सका । मित्रोंका अत्यन्त श्राग्रह न होता तो. चंद्रगुप्त जैसे महान् सम्राट हुए हैं । सम्राट हर्ष वर्धन भी शायद मैं इसके लिखनेकी कोशिश भी न करता । वैश्य वंशके ही थे । ऐसी दशामें बहुतसी वैश्य जातियाँ लिखते समय जिन जिन साधन-सामग्रियोंकी कमी यदि अपनेको क्षत्रियोंका वंशज कहती हैं, तो कुछ अनु महसूस हुई, उनका उल्लेख भी मैं इसलिए यहाँ कर चित नहीं है । वृत्तियाँ तो सदा ही बदलती रही हैं। देना चाहता हूँ कि परवार-समाज यदि वास्तवमें . प्राग्वाटों या पोरवाड़ोंमें तेरहवीं सदी तक बड़े २ योद्धाओंका पता लगता है । प्राचीन काल में इस जाति अपना प्रामाणिक इतिहास तैयार करना चाहती है को 'प्रकटमल्ल' का विरुद मिला हुआ था। पाटण तो इस ओर ध्यान दे और इस सामग्रीको लेखकोंके नरेश भीमदेव सोलंकी ( ई० स० १०२२ -१०६२) लिये सुलभ कर दे। के प्रसिद्ध सेनापति विमलशाह पोरवाड़ ही थे जिन्हें १ मूर-गोताक्लीका शुद्ध पाठ-इस समय मूर द्वादशसुर त्राणछत्रोत्पाटक (बारह सुलतानोंका छत्र __ गोतोंके जो पाठ मिलते हैं वे बहुत ही भ्रष्ट हैं उनमें छीनने वाला ) कहा जाता था और जो भाबके परस्पर विरोध भी है । इसलिए जरूरी है कि पुराने २ प्रसिद्ध श्रादिनाथके मन्दिरके निर्माता थे। इसी तरह लिखे हुए 'सकेसरा' जगह जगहसे खोजकर संग्रह आबके जगत् प्रसिद्ध जैनमन्दिरोंके निर्माता वस्तुपाल किए जाँय और फिर उन सबका मिलान करके किसी तेजपाल (वि० सं० १२८८) भी पोरवाड़ ही थे, जो इतिहासज्ञ विद्वान्से एक शुद्ध पाठ तैयार कराया महाराजा वीरधवल बाघेलाके मन्त्री और सेनापति जाय । थे । ये जैसे वीर थे वैसे ही दाता और धर्मोद्योतक थे। २ प्रतिमा-लेख-संग्रह-प्राक प्रत्येक धातु इनके बादमें भी पोरवाड़ोंमें अनेक राजनीतिज्ञ और पाषाणकी प्रतिमाओंके श्रासन पर कुछ न कुछ लेख Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १६. अनेकान्त [वैसाख, वीरनिर्वाण सं०२४६६ रहता है, जिसमें प्रतिमा स्थापित करने वालों और पटियोंके कागज-पत्रोंका अन्वेषण-प्राचीन प्रतिष्ठाचार्यका उल्लेख अवश्य रहता है। उसमें संघ, काल में वंशावलियों और कुलोंका इतिहास भाट-चारण गण, गच्छ, और जाति गोत्रादि भी लिखे रहते हैं। लोग रक्खा करते थे । प्रत्येक घरसे इन्हें व्याह शादीके नवीं-दसवीं शताब्दिसे इधर के ऐसे हजारों लेख संग्रह मौकों पर और दूसरे शुभ कार्यों पर बन्धी हुई दक्षिणा किए जा सकते हैं। कहीं कहीं उस समय के राजाओंका मिला करती थी। उसके बदलेमें वे लोग पीढ़ी दर की उलेख मिल जाता है । मध्यकालीन इतिहास पर पीढी यह काम किया करते थे। बुन्देलखण्ड में इन्हें इन लेखोंसे बहत प्रकाश पड़ सकता है। इन लेखोंके 'पटिया' कहते हैं। वंशावलीको पट्टावली भी कहते प्रकाशित हो जाने पर वर्तमान सभी जातियोंका इति- हैं। इन पट्टावलियोंके कारण ही शायद इनका नाम हास लिखा जा सकेगा, उन जातियोंका भी पता लगेगा 'पटिया' प्रसिद्ध हश्रा हे । इन लोगोंका अब पहन्तेके जो पहिले जैन धर्म धारण करती थीं परन्तु अब छोड़ समान सम्मान नहीं रहा. - इनको दक्षिणा भी लोग बैठीं हैं । इससे जैनाचार्योंकी भी. गण-गच्छादि-सहित नहीं देते, इसलिए अब यह जाति नष्ट प्राय है । गहोई एक सिलसिलेवार सूची समय-क्रमसे तैयार हो जायगी और परवार दोनों जातियों के पटिया' हैं जिनमेंस जो जैन साहित्यके इतिहास के लिए भी अत्यन्त उप- गहोइयोंके पटिये अब भी अपने पेशेसे किसी कदर योगी सिद्ध होगी। चिपटे हुए हैं। बन्धुवर सियारामशरण गुप्त के पत्र इनके लेखोंके समक्ष होने पर हम बड़ी आसानीसे से मालूम हुआ कि गहोई जातिके पटिया कहते हैं कि बतला सकेंगे कि जातियोंका अस्तित्व कबसे है । इन- उनके पास 'गृहपतिवंशपुराण' है जिसमें गहोइयोंका का विकास और विस्तार किस क्रमसे हुआ, अठसखा, इतिहास है परवारजाति के पटियोंका भी अभीतक अस्तित्व चौसखा दो सखा आदि भेद कब हुए, असली गोत्र- है। बहुत सभव है कि उनके पास परवार वंश के सम्बन्धमें मूर आदि क्या थे, उनमें प्रसिद्ध और प्रभावशाली भी कोई पुस्तक हो । उनके पासके कागज़ पत्रों और पुरुष कौन कौन हुए और किस किस जाति की बस्ती पुरानी बहियोंकी छानबीन करनी चाहिए। उनके पासस किन किन प्रांतोंमें और कब तक थी। और कुछ नहीं तो पुरानी वंशावलियाँ, किंवदन्तियाँ और ' ये लेख शुरूसे लेकर अब तक के संगृहीत किए मूर-गोत्रावलियाँ संग्रह की जा सकती हैं। मूगें और जाने चाहिए और सभी जातियों के होने चाहिए। इस खेड़ोंके सम्बन्धकी जानकारी भी उनसे मिल सकती है। कार्य में अन्य सब जातियोंका सहयोग भी वांछनीय विविध सामग्री-अनेक भारतीय और यरोपियन लेखकोंने जातियों के सम्बन्धमें बीसों ग्रन्थ लिखे है, जो ३ लेख और दान-पत्रादि संग्रह-प्रतिमाश्रोंके अंग्रेजीमें हैं । मर्दुशुमारीकी रिपोर्टोंमें भी जाति भेद अतिरिक्त मन्दिरोंको दिए हुए दानोंके भी सैकड़ों लेख सम्बन्धी अध्याय रहते हैं, इसके सिवाय प्रत्येक जिले मिलते हैं । बहतसे इन्डियन एण्टिक्वेरी, एपिग्राफिाइ- के गैजेटियरों में भी वहाँकी जातियोंके विषयमें साधारण डिया श्रादि में प्रकाशित हो चुके हैं । वे सब भी संग्रह मा इतिहास और किंवदन्तियाँ लिखी रहती हैं, ये सब किये जाने चाहिए। पुस्तकें संग्रह की जानी चाहिए। हिन्दीमें प्रथक प्रथा ४ ग्रन्थ-प्रशस्तियाँ और लिपि कराने वालोंकी जातियों पर और समग्र जातियों पर अनेक पुस्तकें प्रशस्तियाँ-प्रत्येक ग्रन्थके अन्तमें जो लेखकोंकी लिखी गई हैं। कुछ पुराण भी उपयोगी हो सकते हैं ! और ग्रन्थ लिखने वालोंकी प्रशस्तियाँ रहती हैं, उनमें इतिहासके अन्य ग्रन्थोंका संग्रह तो होना ही चाहिए। भी जातियोंका तथा दूसरी बातोंका परिचय रहता है। उनकी चर्चा करनेकी ज़रूरत नहीं। इन सबका संग्रह भी बहुत उपयोगी होगा। Mr. Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अहिंसाके कुछ पहल (लेखक-श्री० काका कालेलकर ) शरीर-धारण और दण्ड के लिये हिंसा अहिंसाका दूसरा पहलू था। अत्याचारी और __गुनहगारको सज्रा न देकर केवल उसे दोषी जाहिर दिसा-अहिंसाका सवाल हमारे बचपनमें करके ही संतोष मानना अहिंसाका तीसरा पहलू ॥ ८ खाने-पीनेके संबंधमें ही उठता था । जब शाफिर नहगारने गनाह किया. हत्या करनेवैष्णवोंका दया धर्म और प्रेम-धर्म हमारे जीवनमें में वह सफल हुआ, या निष्फल हुआ, किन्तु व दाखिल हुआ तब किसी भी व्यक्तिको अपने अन्तमें वह राजपुरुषोंके हाथमें आगया। अब क्रोधसे या कठोर वचनसे दुःख पहुँचानेमें भी कानूनकी दुहाई देकर हम उसका बदला लें यह हिंसा है और प्रिय और पथ्यवचनसे और सेवासे उचित है ?-या केवल उसे दोषी ठहरा कर छोड़ सबको राजी रखनेमें अहिंसा है-इतना हम दें यही अच्छा है" ?- यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न, स्थूल रूपसे समझ गये। या पहलू , हमारे सामने आया। इसके बाद इस प्रश्नने एक नया ही रूप पकड़ा। 'जालिमको सजा देने के लिये, गुनहगार इससे आगे बढ़कर 'आत्मरक्षाके लिये भी को दण्ड देनेके लिये, भी हम हिंसाका आश्रय न हम किसीकी हत्या करें या न करें, कहीं पर प्रतिकरें-यह खयाल गांधीजीने हमारे सामने पेश हिंसाका प्रयोग करें या न करें'- यह महत्वका किया । जलियानवाला बारा के बाद जो राष्ट्रव्यापी सवाल है। आन्दोलन गांधीजीने शुरू किया, उसमें यह आत्मरक्षणार्थ हिंसा खासियत थी कि गांधीजी जनरल डायरको सजा नहीं दिलाना चाहते थे। हिन्दुस्तानके पैसेसे जो ___ कुछ लोग यह कहते हैं कि पेट पालने के लिये पेन्शन डायरको मिलती थी उतनी बन्द करानेसे जो हिंसा करनी पड़ती है उसे तो सदोष नहीं और सरकारके डायरका दोषी होना स्वीकार समझना चाहिये, कम-से-कम उसे क्षम्य तो करनेसे गांधीजीको संतोष था। इसी द्रष्टि और समझना ही चाहिये। यह दृष्टि बहुतसे लोगोंकी वृत्तिको गांधीजीने देशसे भी स्वीकार कराया। है। अगर भरण-पोषणके लिये हिंसा जायज है, तो आत्म-रक्षाके लिये वह जायज़ क्यों नहीं है ?? अहिंसाके चार पहलू -यह सवाल स्वाभाविकतया उठता है। और निरामिष आहार करके पशु-पक्षियोंकी हिंसा आत्म-रक्षाका सवाल इतना गूढ़ है कि आत्मन करना अहिंसाका एक पहलू था। कठोरताको रक्षण किसे कहें और आक्रमण किस कहें, इसका छोड़कर सभोंके साथ कोमलतासे पेश आना निर्णय बड़े बड़े धर्मज्ञ पंडित भी नहीं कर सकते। Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त ४६२ ] अगर एक सांप मेरे बगीचेमें या घर में घुस जाये, तो मैं उसे मारूं या नहीं ? न तो उसने किसीको काटा है, न किसी पर आक्रमण किया है । तो भी लोग उसे मार डालते हैं और कहते हैं कि शायद वह काट ले, शायद वह आक्रमण करे । 1 यह बात तो ऐसी ही हुई कि हलवाईकी दूकान के सामने जो बच्चे खड़े हैं, वे मिठाई उठाकर खा जायेंगे इतनी संभावनाके लिये उन्हें पकड़ कर क़दमें भिजवा दिया जाये ! आज इङ्गलेण्ड और जर्मनी — दोनों - आत्म रक्षा के लिये लड़ रहे हैं । जापान भी शायद चीनसे आत्म-रक्षा ही के लिये लड़ रहा है । गांधीजी कहते हैं कि आत्म-रक्षाका प्रयत्न भी हिंसक पद्धति से ही करना चाहिये । अपवादके रूपमें उनका इतना ही कहना है कि कायर बनकर भाग जाना और मनसे हिंसा करते रहना ज्यादा बुरा है । इसकी अपेक्षा निर्भय और बहादुर होकर हिंसा करना भी अच्छा है; क्योंकि उस रास्ते किसी न किसी दिन मनुष्य अहिंसा तक पहुँच जायगा । [ वैसाख, वीर - निर्वाण सं० २४६६. होते हुए भी उसमें जीवनकी कृतार्थता नहीं है । हिंसाको स्थान होते हुए भी उसका समर्थन नहीं हो सकता | Violence is the fact of Life, Non-Violence is the Law of Life. Violence sometimes makes for Life, Nonviolence is the fulfilment of Life. जीवन में हिंसा और हिंसाका स्थान जब मैं अहिंसाका विचार करने लगता हूँ, दो मुझे गीताका वह वचन याद आता है, जहाँ anar कहा है कि यह दुनिया सत और दोनों, तत्वोंसे बनी हुई है; दोनों भगवान् की ही विभूतियाँ हैं । उसी तरह जीवन में हिंसा और अहिंसा दोनोंको स्थान हैं; किन्तु दोनों में यह भेद है कि हिंसाको जीवनमें स्थान असत्, ( हिंसा जीवनकी एक वास्तविकता है, अहिंसा जीवनका धर्म है। हिसा कभी कभी जीवनको निबाहती है; हिंसा में जीवनकी परिपूर्णता है ।) ऐसी हालत में जिस प्रकार हम यह प्रार्थना करते हैं कि "हे प्रभो ! हमें असत से सतका और अंधकार से प्रकाशकी ओर और मृत्युसे अमृतक ओर ले जाओ", उसी तरह हमें यह भी प्रार्थना करनी होगी कि "हे भगवन, हमें हिंसा से अहिंसा की ओर ले जाओ" । प्रारंभ तो हिंसामें ही है, उसपर विजय पाकर हमें अहिंसा की ओर बढ़ना है । हिंसाका प्रथम उदय जब मैं सोचता हूँ कि इतिहास- पूर्वकाल में, जब कि मनुष्य प्राणी अग्नि सुलगाना भी नहीं जानता था और जब हाथीसे भी बड़ी छिपकली दुनिया में घूमती थी और बड़े बड़े अजगर गाय, बैल जितने बड़े जानवरोंको खा जाते थे तब मनुष्य अपनी रक्षा किस अहिंसा से कर सकता था ? वहाँ जीनेके लिये हिंसा अपरिहार्य ही थी ? अहिंसाका खयाल तक लोगोंको नहीं था । उस जमाने में दिन-रात एक ही बात हर एकके दिलमें उठती थी कि हम अपनी जान कैसे बचावें ? हमें Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७ अहिंसाके कुछ पहलू [४६३ पाहार कैसे मिले ? औरोका नयाल करनेके वे मकान जलाने लगते हैं, तब भी उन परगोली न दिन थे ही नहीं। किन्तु ऐसे वायुमण्डलमें भी चलानेकी सलाह जो गांधीजी देते हैं और कहते हैं माता के दिलमें अपने बच्चों के प्रति प्रथम अहिंसा कि ऐसी हालतमें चन्द शूरवीरोंको अपने प्राणों का खयाल पैदा हुआ, बादमें स्वार्थ-त्यागका और की परवाह न कर मतवाली जनताके सामने बलिदानका। उस जमानेमें अगर हम सांप, सिंह, अपना बलिदान देने के लिये जाना चाहिये, वे ही हाथी आदि जानवरोंसे बचनेके लिये अहिंसाका गांधीजी चोर और डाकुओंके साथ वैसा करनेकी ही प्रयोग करतेतो कौन जाने क्या नतीजा सलाह नहीं देते। उन्मत्त जनता चाहे जितनी आता ? पागल क्यों न हो, आखिर वह समाजकी ___आज हम मांसाहार के बिना जी सकते हैं। प्रतिनिधि है। किन्तु चोर और डाकू समाजकी एक ज़माना था जब मनुष्यको यह विश्वास ही न केवल विकृति ही हैं। इसलिये चोरों और डाकुओं था कि मांसाहारके बिना भी जिया जा सकता है। को समाज-प्रतिनिधि सरकारके द्वारा सजा दिल आज हम मानते हैं कि 'वनस्पतिको मार कर खाये वाना जायज माना जाता है। बिना हम जी ही नहीं सकते, और इस लिये हमें । वनस्पतिकी हिंसाको हिंसा नहीं समझना . स्वाभाविक हिंसाका निग्रह चाहिये। अब जो लोग लूट-खसोट ही का धन्धा करते हैं, हिंसाके कुछ समाज-मान्य रूप आजीविकाका दूसरा कोई साधन जानते ही नहीं, उनके द्वारा जो हिंसा होती है वह उसी कोटिकी इसी तरह आज हम सामाजिक जीवन हिंसा है, जो बिल्ली चूहेको मारते समय करती सुरक्षित करनेके लिये प्लेग आदि रोगोंके जन्तुओं है। बिल्लीको यह खयाल तक नहीं होता कि वह का नाश करनेमें कोई दोष नहीं देखते । मच्छरोंको चूहेको दुःख दे रही है । इसी तरह लूट-खसोट और खटमलोंको मारते समय किसीको यह करने वाले लोग और मनुष्यका अपहरण करके खयाल नहीं होता कि ऐसा करनेका हमें कोई उसका धन छीनकर उसको छोड़ देनेवाले पठान अधिकार नहीं है। भी हिंसा-अहिंसाका खयाल ही नहीं कर सकते। __ गांधीजीने भी इस बातको स्वीकार किया है जिसकी समझ में हिंसाका दोष आ सकता है, कि राष्ट्र-राष्ट्र के बीच अहिंसाका पालन करनेका जिसके मनमें अहिंसाका उदय हो सकता है, उसी इतना आग्रही प्रचार करते हुए भी चोरों और के लिये सत्याग्रहका मार्ग है । हिटलर, मुसोलिनी लुटेरों के उपद्रवसे बचनेका और उनपर अहिंसाका और स्टेलिन अपनी संहार-लीला भले ही चलाते प्रभाव डालनेका उनके पास कोई उपाय या हों; किन्तु वे भी अहिंसाको समझ सकते हैं। तरकीब नहीं है। आदमी जब मतवाले होकर इतना ही नहीं; किन्तु अहिंसासे प्रभावित भी हो किसी शहर में खून-खराबी करने लगते हैं, या सकते है । किन्तु शेर या भालूके खिलाफ हम Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त | वैसाख, वीर निर्वाण सं० २४६६. चाहे जितना सत्याग्रह क्यों न करें, वे हमारी बात करने में राजकीय परिस्थितिके कारण कामयाब समझ ही नहीं सकते। न हो सकें, तो हिजरत करके अपनी शक्ति बढ़ानी घर में जब बिल्ली घुस जाती है तब हम उसे चाहिये और साथ साथ सरकारको भी ठीक करने बाहर जानेके लिये मुँह से नहीं कहते, किसीके की कोशिश करनी चाहिये। द्वारा सूचना भी नहीं देते, किन्तु उसे प्रयत्न-पूर्वक जब तक ऐसा कोई इलाज हाथमें नहीं आया भगा देते हैं। उसी तरह जो लोग स्वभावतः है, तब तक या तो सब तरहके कष्ट सहन कर लेने अत्याचारी हैं और जिनके पास दूसरा कोई पेशा चाहिये, सब तरहकी यन्त्रणायें बरदाश्त करनी ही नहीं है ऐसे लोगोंको सामाजिक संगठन द्वारा चाहियें, या फिर आत्महत्या करनी चाहिये । रोकना बहुत ही जरूरी है और ऐसे रोकने के प्रयत्नमें थोड़ी हिंसा भी हो जाय तो भी हमें उसे सरकार जिम्मेवार है अहिंसा ही समझना चाहिये। कहा जाता है कि काठियावाड़के बहास्वटिया बागी लोग जब किसी राजासे न्याय नहीं पा सरहद में क्या उपाय करें ? सकते थे, तो निर्दय होकर उस राजाकी बेकसूर सरहद से जब मनुष्यके अपहरणकी, जबर- रियायाको परेशान करते थे। अब जब सरहदकी दस्ती धर्मान्तर करानेकी और खून आदिकी खबरें मुसलमान प्रजासे हम बच नहीं पाते हैं, तब उनके हम सुनते हैं तब यह सोचने लगते हैं कि इसका साथ लड़नेकी अपेक्षा हमें अपनी सरकारको ही क्या इलाज करें? तङ्ग करना चाहिये । राजाके दोषके लिये जनतालोगोंके जान-मालकी रक्षा करनेका ठेका को दण्ड देना उतना न्याय नहीं है जितना कि जिसने लिया है वह सरकार इसका इलाज या तो जनताके दोषके लिये राजाको दण्ड देना है। अगर कर नहीं सकती है, या करना नहीं चाहती है। देशी राजा हमें परेशान करते हैं, तो हम और अगर चाहती भी हो, तो उसके लिये काफी इसका इलाज ब्रिटिश सरकारको ही ठीक करके प्रयत्न नहीं करती है। ऐसी हालत में हमें क्या कर सकते हैं । अगर सरहदके मुसलमान हिन्दुओं करना चाहिये ? जवाब स्पष्ट है। यदि हम अपना का अपहरण करते है, तो उसका इलाज उन बलिदान दे सकते हैं तो शुद्ध अहिंसक बनकर मुसलमानोंसे बैर करनेसे नहीं होगा; किन्तु ऐसी प्रसन्नता से बलिदान दे दें। यदि यह हमसे न बनें, हालतको मंजूर रखने वाली सरकारको ही दण्ड तो अपनी जानको खतरे में डालकर जिस तरह देने से हो सकता है । तब जाकर सरकार अपने हो सके, अत्याचारोंका प्रत्यक्ष विरोध करना कर्तव्यको पहचानेगी। * सीखें । और अगर यह भी न कर सकें या ऐसा * सर्वोदय' के वर्तमान मई मासके १०३ अंक से उद्धृत । Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ छोटे राष्ट्रोंकी युद्ध-नीति ( लेखक - श्रीकाका कालेलकर) हिटलरने टिलरने कितना बड़ा अत्याचार किया है । -अयुध्यमान नार्वे पर आक्रमण करके उस देश पर उसने कब्जा कर लिया ! नार्वे के लोगों का कुछ भी कसूर नहीं था । उनका दोष एक ही था कि वे पागल होनेसे इनकार करते थे । उनका तटस्थ रहना न इंगलैंडकों पसन्द था, न जर्मनी को । जबरदस्त लोगोंका एक सिद्धान्त अंग्रेजीमें बहुत सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया गया है Those who are not with us, are against us' (जो हमारे साथ नहीं हैं वे हमारे खिलाफ़ हैं । ) सत्ताभक्त इसीमें थोड़ा सुधार करके कहते हैं-""Those who are not under us, are against us.” (जो हमारे काबू में नहीं हैं वे हमारे दुश्मन हैं ।) नार्वेके कठिन काल में भी चर्चिल साहब उसकी हंसी करनेसे बाज नहीं आए। आप कहते हैं कि 'हम जब कहते थे, तब तुम हमारे साथ नहीं हुए। तुमने तटस्थ रहना मंजूर किया । अब भुगतिये उसका फल | !” हिटलर भी उनसे कहता होगा, “तुम्हारा तटस्थ रहना हमारे लिये खतरनाक है । तुम तटस्थ रह नहीं सकते । इंगलैंड आत्म-रक्षा के लिये तुम पर आक्रमण किये बिना नहीं रह सकता । देखो, ये सुरङ्ग तुम्हारे समुद्र में वे बोने लगे हैं । कहाँ रही तुम्हारी तटस्थता ? यह दुनिया या तो ईश्वर की रहे या शैतान की । इसमें तीसरा कोई भी रह नहीं सकता । या तो हमारे अधीन हो जाओ, या फिर हमारे विरोध में हो रहो । " I तमाम दुनियाका शस्त्रवाद एक मुखसे कहता है, ‘Woe to the neutrals ! (तटस्थोंका बुरा हाल है ! ) और दुनियाभर के तानाशाह प्रतिध्वनित करते हुए कहते हैं, Woe to इसी the small nationalities that dream of an independent existence. ' ( जो छोटे छोटे देश आजाद रहना चाहते हैं उनकी कज़ा है !) हम भी जरा अपने देशका इतिहास देखें | प्राचीन इतिहास नहीं, अंग्रेजों के आगमन के बादका । अंग्रेजों को अपनी फौज सिंघमें से लेजानी थी। सिंद्ध मीरोंका स्वतंत्र मुल्क था । अंग्रेजोंको अपनी फौज सिंधमें से लेजाने का कोई अधिकार नहीं था । सिंधके मीरोंने अंग्रेजोंका कोई भी नुकसान नहीं किया । उन्होंने अंग्रेजोंसे कहा, 'तुम्हारे झगड़े में हमें नहीं पड़ना है । हमें तटस्थ ही रहना है।' किन्तु अंग्रेजोंको अपनी फ़ौज लेही जानी थी उन्होंने कहा कि, 'अगर तुम हमारी आक्रमणकारी नीति में मदद नहीं करते, तो तुम हमारे दुश्मन हो' अंग्रेजोंने सर चार्लस् नेपीयरको हुक्म दिया कि वह सिंघपर धावा बोलदे और उस सूबेपर हमेशा के लिये कब्जा भी कर ले | और सिंध के मीरोंसे कहते, 'माफ़ कीजिये, राजअगर अंग्रेज जबरदस्ती अपनी फ़ौज लेजाते नीति में न्याय-अन्याय हमेशा नहीं देखा जा सकता। हमने जबरदस्ती तो की; किन्तु अब हमारा काम हो चुका है। आपका सिंध हड़प करनेका हमें कोई कारण नहीं है। आप अपने देश में अमन-चैन से राज कर सकते हैं' - तो भी हम उनकी बात समझ सकते। लेकिन बहाना मिलते ही - बल्कि असल बात तो यह थी कि बहाना नहीं; वरन् मौका मिलते ही- सर चार्लस्, नेपीयर ने सिंधपर कब्जा कर लिया। बेचारा Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७ ] छोटे राष्ट्रों युद्ध नीति [ ४६६ फौजका अफसर ठहरा । 'Theirs not t() नहीं थे । नसीबवादी चीन देशके लोगोंने तोquestion why, Theirs not to make चन्द वीर रीकी सारी जनता reply. ने-जो वीरता बताई है, उसे भविष्यका इतिहास ____उसको बहुत बुरा लगा। लेकिन उसने सिंध आश्चर्यचकित होकर अंकित करेगा और उसे पर कब्जा तो किया ही। जब उसे सरकारको यह स्वीकार करना पड़ेगा कि दैववादमें ईश्वरयह लिखना था कि सिंध मेरे हाथमें आगया है, निष्ठा से कम शक्ति नहीं है। लेकिन केवल बहातो उसने लिपिसे लाभ उठाकर अपने दिलका दुरी से कुछ नहीं होता । धन-जनकी बहुतायत, दर्द भी व्यक्त किया। I have Sind लिखने विज्ञानका वैभव और दंभ-मिश्रित अधार्मिक वृत्तिकी जगह उसने लिखा I have Sin's, इतनी तैयारीके बिना दुनियामें स्वतन्त्र रहना ही ___ कोई भी अंग्रेज, अमलदार या इतिहासकार, अशक्य-सा हो गया है। और अगर इतनी तैयारी इस अत्याचारका समर्थन नहीं कर सका है। है तो आपस में लड़े बिना चल ही नहीं सकता। चन्द निर्लज्ज लेखक लिखते हैं कि हमारे अत्या शान्तिके दिनोंमें ये छोटे राष्ट्र आपसमें लड़ चारके फलस्वरूप सिंधके लोगोंको अच्छी राज- - , नहीं सकते, क्योंकि बड़े राष्ट्र उनका नियंत्रण करते व्यवस्था मिलगई, यही सिंध लूटनेका समर्थन है ! , रहते हैं, और बड़ोंका कभी सवाल ही नहीं यूरोपका वर्तमान युद्ध अभी खतम तो नहीं उठता । पोलैण्ड बननेके लिये अलबत्ता लड़ हुआ है । अगर फ्रांस या इङ्गलेण्ड आक्रमणके सकते हैं। मगर पोलैण्डक जैसा अनुभव कोई रास्ते और सख्तीकी राजी खुशीसे बेलजियनोसे भी राष्ट्र दो दना नहीं ले सकता। उनका देश ले लें. तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं है। तब छोटे राष्ट्रोंकी फौज किस कामकी ? हमें हिटलरके राक्षसी कृत्यका समर्थन बिल फ़ौज़के पीछे जो खर्च किया जाता है, वह किस कुल नहीं करना है। हमें तो इतना ही कहना है कामका ? "कुत्ते की ताक़त शिकारीकी मददके कि- 'यद्धातराणां न नयो न लज्जा'-जा लिये." इसी न्यायसं जेक-प्रजा और ऑस्ट्रीयन युद्धातुर होते हैं वे न धर्मको पहचानते हैं, न लोक- प्रजा नॉर्वे पर आक्रमण करनेके ही काम आलज्जाका नियन्त्रण जानते हैं। सकती है। . एबेसीनियासे लेकर नार्वे तकका इतिहास जो क्या इससे बेहतर यह नहीं है कि ऊपर बताए हम अपनी आंखोंके सामने बनता देख रहे हैं, हुए राष्ट्रसप्तकको ही लड़नेका सारा ठेका देकर उससे सिद्ध होता है कि युद्धका रास्ता इङ्गलेण्ड बाकीके सब के-सब राष्ट्र अपनी अपनी फौज फ्रांस, जर्मनी, रूस, इटली, अमेरिका और जापान तोड़कर. या विसर्जन कर, अहिंसक नीतिका के लिये है। बाकीके जितने राष्ट्र हैं उनके लिये प्रयोग करें और अपना एक बड़ा अहिंसक संगठन फौज रखना और न रखना बराबर ही है । युद्ध करके हिंसावादको ही निर्वीय कर डालनेकी करके देशके बहादुर से बहादुर नवयुवकोंका कोशिश करें ? युवकोंका नव दिनका बलिदान देकर गुलाम बनो, अब देखना यह है कि इसपर अमल कैसे हो अथवा “Think God we urender सकता है ? इस हिटलर-युद्धके अन्तमें दुनियाके ( भगवानको धन्यवाद, हम शरण गये ! कहके सामने सबसे महत्वका सवाल यही रहेगा ।* बिना लड़े गुलाम बन जाओ। ऐबीसीनिया, स्पेन, पोलेण्ड आदि देशोंके लोग कुछ कम बहादुर ___*सर्वोदय' के वर्तमान मई मासके १० अंकम उधृत । Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भारतीय दर्शनों में जैन दर्शन का स्थान (लेखक-श्री०हरिसत्य मट्टाचार्य B.A.,B.L.) __ अनुवादक-श्री रामेश्वरजी बाजपेई [अनेकान्त वर्ष ३ किरण २ में "बंगीय विद्वानोंकी जैन साहित्यमें प्रगति” शीर्षक लेख छपा है, उसमें भी हरिसत्य भट्टाचार्यजीका परिचय दिया गया है । उन्हींके लिखित एक निबंधका यह हिन्दी अनुवाद पाठकोंकी सेवामें उपस्थित है। मूल लेख बगला भाषामें 'जिनवाणी' पत्रिका में प्रगट हुआ था, बादको उसका गुजराती में अनुवाद श्रीयुत् सुशील महोदयने स्वतंत्र रूपसे प्रकाशित किया था और फिर वह 'जिनवाणी' नामक ग्रन्थ में भी भट्टाचार्यजीके अन्य लेखों के गुजराती अनुवादोंके साथ प्रगट हुवा था । मुझे भट्टाचार्यजीका यह लेख बहुत पसंद आया और मेरे मित्र श्रीरामेश्वरजी वाजपेईको, जो कि जैनधर्मके परम अनुरागी हैं, अनुवाद करनेके लिये कहने पर उन्होंने काफी परिश्रम करके उसे सम्पन्न किया है। आशा है पाठकोंको भी यह जरूर पसंद आएगा । यदि मेरा यह प्रयत्न पसंद पड़ा तो भविष्यमें भट्टाचार्यजीके अन्य लेखोंका भी हिन्दी अनुवाद प्रकट करनेका प्रयत्न किया जायगा। अगरचन्द नाहटा] अतीतके दुर्भेद्य अन्धकारमें जितने भी है, अनेक पण्डितोंके मतानुसार वह परवर्ती तथ्य मौजूद हैं उनके प्रगट करनेके पक्षमें कालका प्रक्षेप-मात्र है; किन्तु तत्व-विचार क्रियाजो भी प्रयत्न आजतक तत्व-विद्गण करते आये काण्डके साथ एकत्र नहीं रह सकता, तत्व-विचार हैं, वे सब प्रशंसाके योग्य होते हुये भी कभी किस निर्दिष्ट निरूपण-योग्य समयमें अथवा किस कभी जिन घटना-समूहों या सामाजिक, विषयों शुभ मुहूर्तमें सहसा उठ खड़ा हुआ है, ऐसी का काल-निरुपण अङ्कपात-द्वारा- अर्थात ईसवी- बातोंके सोचनेका कोई भी हेतु नहीं है। जैन-धर्म सन्के पहले के हैं या उसके अन्तर्गत-नहीं किया पहलेका है या बौद्ध धर्म, इस विषयमें बड़ा जा सकता, उन्हें निरूपण करनके प्रसङ्गमें प्रायः झगड़ा या वाद-विसम्वाद चल रहा है। किसी देखा जाता है कि विद्वद्गण बड़े भ्रममें पड़ जाया किसी पण्डितके मतसे जैन धर्मकी उत्पत्ति बौद्धकरते हैं। वैदिक कर्मकाण्डके प्रति सबसे पहले धर्मसे है, पक्षान्तरमें किसी किसीके मतसे जैन किस समय युक्ति-चालित समालोचना अवतरित धर्म बौद्ध धर्मसे भी प्राचीन है । इन वादहुई थी, विद्वान लोग प्रायः उस समयको निर्दिष्ट- विसम्वादोंके मध्य जो सत्यान्वेषणकी स्पृहा रूपमें निरूपण करते हुये आपसमें वादानुवाद ही वर्तमान है वह अवश्य ही सम्मानके योग्य है। नहीं करते किन्तु लड़ तक बैठते हैं । वैदिक क्रिया- निःसन्देह जहाँतक अनुमान है, इन सब तर्कोका काण्ड और बहु-देववादके समीप कहीं कहीं जो अधिक अंश बहुधा रुचिकर होते हुये भी केवल जो अध्यात्मवाद और तत्व-विचार देखने में आता मूल्यहीन ही नहीं किन्तु किसी भी देशके तत्व Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४६८ ] चिन्ता-विकाशके क्रमके विषयमें उत्पन्न हुई भ्रान्तधारणा के ऊपर अवलम्बित जान पड़ता है 1 का [ वैसाख, वीर निर्वाण सं० २४६६. समक्ष प्रचार करना अवश्य ही गौरवमय व्रत था, इसमें कोई सन्देह नहीं है । हमारी समझ में इसके अतिरिक्त उनलोगों ने तो कुछ भी नहीं किया । मूलतत्व की दृष्टिसे बौद्ध और जैनमत बुद्ध और वर्द्धमानके जन्मकालके बहुत पहले से ही वर्तमान था, अतः उपनिषदकी तरहसे दोनों हो मत प्राचीन कहे जासकते हैं। कारण, विचार-वृत्ति, जब मनुष्य - प्रकृतिका एक विशिष्ट लक्षण माना जाचुका है, तब यह निस्सन्देह कहा जा सकता है कि, मनुष्य समाज में चिरकाल से कुछ न कुछ अध्यात्मचिन्ता या विचार होता ही चला आरहा है । यहाँतक कि जिस समय समाज अर्थहीन क्रियाकाण्डके जाल में फँसा हुआ जान पड़ता है उस अवस्था में भी कुछ न कुछ अध्यात्म चर्चा बनी ही रहती है । वस्तुतः क्रियाकाण्डके सम्बन्ध ही में यह कहा जा सकता है कि क्रियाकाण्ड भी सामाजिक शैशवकी सोई हुई मूढ़ताके ऊपर एक प्रकारकी आध्यात्मिकताकी अवतारणा है । सम्यकूरुपमें परिस्फुटन होने पर भी समाजकी प्रत्येक अवस्था में ही एक विचार-वृत्ति प्रचलित नीति-पद्धतिको अतिक्रम करनेकी तथा ऊँचेसे ऊँचे आदर्शकी ओर आगे बढ़ने की स्पृहारूपमें सदा बनी ही रहती है। इसीलिये दर्शनोंका जन्मकाल - निरुपण प्रायः असाध्य होजाता है । जो लोग भिन्न भिन्न दर्शनों के प्रतिष्ठाता माने जाते हैं, उनलोगों के पहले भी वे ही दर्शन-मत बीजरूपमें विद्यमान थे, यह कहने में अत्युक्ति न होगी । बौद्धमत बुद्धके द्वारा एवं जैनमत महावीर से पैदा हुआ है, यह भी एक प्रकारकी भ्रान्त धारण है । इन दोनों महापुरुषोंके जन्मग्रहण के बहुत पहले से बौद्ध तथा जैनशासन के मूलतत्त्व-समूह सूत्ररूपमें प्रचलित थे, उन तत्वसमूहको विस्तृतरूपमें प्रगट करके उनकी मधुरता तथा गम्भीरताको सर्व साधारण जनता के बौद्ध और जैन मतको उपनिषद् के समकालीन होनेका कोई निर्दशन नहीं मिल रहा, इसी कारण से इन दोनों मतोंको उपनिषद् की तरह प्राचीन नहीं कहा जा सकता, ऐसी युक्तियाँ कदापि समीचीन नहीं हो सकतीं । स्पष्टतया उपनिषदें वेदोंके प्रतिकूल नहीं थीं, इसीलिये उनकी शिष्य मण्डलीकी संख्या सबसे अधिक थी। पहले पहल अवैदिक भतसमूह किंचित् रूपमें सन्देहपूर्ण थे, इसी लिये उन्हें आत्मप्रकाशके लिये बहुत दिनों तक प्रतीक्षा भी करनी पड़ी; किन्तु अध्यात्मवादके रूपमें वे उपनिषद के समय में मौजूद थे, इसमें कोई सन्देह नहीं है । चिन्ताशील महापुरुषोंने तत्वचर्चाप्रसङ्ग में केवल उपनिषदों के बताये हुए मार्ग ही को एकमात्र मार्ग नहीं समझा जबकि चिन्ता गति वे रोक थी और तत्वलोचना के फलस्वरूप अवैदिक मार्ग भी आविष्कृत हो चुके थे। ऐसी दशा में अन्यान्य मतवादों की अपेक्षा उपनिषद् मतवाद भी कुछ ऐसा सहजबोध्य नहीं था कि यह अनुमान किया जा सके कि सबसे पहले यही आविष्कृत हुआ था । वैदिक या अवैदिक मतवादोंने यदि एक ही समय में पैदा होकर क्रमशः उत्कर्ष लाभ किया हो Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७ ] तो उनके अन्दर बहुत से तत्व समान भी रह गये होंगे, ऐसा अनुमान असङ्गत नहीं हो सकता । अतएव भारतीय किसी भी विशिष्ट दर्शनके अध्ययन करने के समय भारतवर्ष के अन्यान्य प्रसिद्ध दर्शनों की तुलना की भी बहुत बड़ी आवश्यकता है। भारतीय दर्शनों में जैन दर्शनका स्थान [ ४६९ में ही दो चार बातें बतानी हैं। जैनमत के निर्देशके लिए उसके साथ अन्यान्य मतवादोंकी तुलना नीचे लिखे गये ढङ्ग से ही की जा सकती है । वस्तुतः जैमिनीय दर्शनको छोड़कर भारतवर्ष के प्रायः सभी दर्शन खुले या छिपे रूपमें वेदोक्त क्रियाकलाप के अन्धविश्वास के प्रति विद्वेषभावापन्न देखे जाते हैं। सच पूछिये तो संसारमें प्रायः सर्वत्र अन्धविश्वास के प्रति युक्तिवादके अविराम संग्राम ही को दर्शनके नामकी आख्या दी जा सकती है । वर्तमान प्रबन्ध में हमें भारतीय दर्शन-समूहों को जो इसी दृष्टिकोण से उनके प्रत्येक प्रधानतत्वों की आलोचना करना है । स्मरण रहे भारतीय दर्शनसमूहों का जो क्रम विकास इस प्रबन्धमें दिखलाया जायगा वह मात्र युक्तिगत Logical है, कालगत Choronological नहीं । अनन्तकल्प, अर्थहीन वैदिक क्रियाकाण्डोंका पूर्ण प्रतिवाद उपस्थित चार्वाक - सूत्रों ही में प्रायः देखा जाता है । प्रत्येक समाजमें प्रतिवाद 1 करनेवाला एक स्वतन्त्र सम्प्रदाय सदासे चला आ रहा है, तदनुसार प्राचीन वैदिकसमाज में भी एक ऐसा सम्प्रदाय अवश्य था । वैदिक क्रिया. काण्डों पर भाषामें आक्रमण करना किसी समय में भी कठिन बात न थी । असल बात तो यह है कि कोई भी विचारशील या तत्वका जाननेवाला मनुष्य बहुत दिनों तक ऐसे कर्मकाण्डों में सन्तुष्ट नहीं रह सकता । ऐसी दशा में प्रतिवाद करनेका उच्छ्वास सारे यज्ञसम्बन्धीय विधि-विधानोंके लिये यदि एक निन्दाकर कारण बन जाय तो इसमें आश्चर्य ही क्या हो सकता है । यही चार्वाकदर्शन है, वैदिक कर्मकाण्डों का अविराम I बङ्ग देशमें जैन- दर्शनकी अधिक चर्चा या जैसा चाहिये वैसा उसका आदर न होने परभी यह तो मानना ही पड़ेगा कि भारतवर्षके यावतीय दार्शनिक मतवादों में इसका एक गौरवमय स्थान अवश्य रहा है, और आज भी हैं । तत्वविद्याके यावतीय अङ्ग इसमें विद्यमान होने के कारण जैन दर्शनको एक सम्पूर्ण दर्शन मान लेने में कोई मतभेद नहीं होना चाहिये । वेदोंमें तर्कविद्याका उपदेश नहीं है, वैशेषिक कर्माकर्म या धर्माधर्मको शिक्षा नहीं देता; किन्तु जैन-दर्शन में न्याय, विचार, धर्मविचार, धर्मनीति, परमात्मतत्व आदि सभी बातें विशदरूपमें विद्यमान हैं । जैनदर्शन प्राचीनकालके तत्वानुशीलनका सचमुच एक अनमोल फल हैं, क्योंकि जैन दर्शनको यदि छोड़ दिया जाय तो सारे भारतीय दर्शनोंकी आलोचना अधूरी रह जायेगी, यह अकाट्य सत्य है । तत्व किस ढङ्गसे जैन दर्शनकी आलोचना करनी चाहिये, ऊपर बताया जा चुका है। हम लोगोंकी लोचना तुलनामूलक हुआ करती है और ऐसी आलोचनायें निस्सन्देह एक कठिन विषय है, सुतरां इस प्रकार की आलोचनाओंके लिये जबतक प्रायः सभी भारतीय दर्शनों के सम्बन्ध में पूरी अभिज्ञता या जानकारी न हो सफलता प्राय: असम्भव है । किन्तु हमें तो इस प्रबन्धमें मूलतत्व के विषय Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४७० ] प्रतिवाद, चार्वाक दर्शनको प्रतिवादका दर्शन कहना चाहिये । ग्रीक देशकं सोफिष्ट सम्प्रदायकी तरह चार्वाक दर्शन भी इस बिराट् विश्व-ब्रह्माण्डके विषय में कभी कोई मतामत नहीं प्रगट करता; तोड़ना, दोष मढ़ देना और न मानना यही तो चार्वाकदर्शनका सिद्धान्त है । प्रशंसा करना तो दूर, किसी भी वस्तुको गाड़देना ही चार्वाकोंका एकमात्र कार्य था । वेद परलोकको मानता था, चार्वाक उसे अस्वीकार करता था । कठोपनिषद्की द्वितीय बल्लीके छठे श्लोकमें इस प्रकार के नास्तिकवादका परिचय भी मिलता है । अनेकान्त न साम्परायः प्रतिभाति बालंप्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । लोको नास्ति पर ईति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ उक्त श्लोक परलोके प्रति विश्वासहीन मनुष्य के विषय में ही ऐसा कहा गया है। कठोप forest छठी बल्ली द्वादश श्लोक इस प्रकार नास्तिकवाद के दोष दिखलाये गये हैं । "अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते" कठोपनिषत्की प्रथम बल्लीके बीसवें श्लोक में भी परलोक अविश्वासी व्यक्तियोंकी ही भर्त्सना है“येयम्प्रेते विचिकत्सा मनुष्योस्तीऽत्यके [ वैसाख, वीरनिर्वाण सं० २६६४ थे। जिन उपनिषदों को वेदोंका अंश माना जाता है, उन्हीं उपनिषदों में भी यत्र-तत्र कर्मकाण्डों के दोष बतलाये गये हैं । बहुत से उदाहरणों में से नीचेका एक यह भी है: प्रवाह्येते दृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्रमबरं येषु कर्म ऐतत् श्रेयो येsभिनन्दति मूढा जरा मृत्युं ते पुनरेवापि यान्ति । तात्पर्य यह है मुंडक १२७ नायमस्तीति चेके" वेद यज्ञसम्बन्धीय कर्मकाण्डौंका उपदेश देता है, किन्तुस्तिगण न यज्ञ कर्मों की निःसारता बतलाते हैं, और न केवल उनका खण्डन ही करते थे किन्तु उन विधानोंको जनता के समक्ष हास्यास्पद बनाने में भी किंचित्मात्र कुण्ठित नहीं होते यज्ञसमूह और उसके अष्टादश अङ्ग व कर्म सभी अदृढ़ और नाशवान हैं। जो मूढ़ उन्हें श्रेय मानकर पालन करते हैं वे पुन: पुन: जरा-मृत्युको प्राप्त होते हैं। किन्तु उपनिषद और चार्वाक मतमें जो प्रभेद है वह यह है - उपनिषदोंमें एक ऊंचेसे ऊंचे और महानसे महान् सत्यका मार्ग दिखलानेके लिये कर्मकाण्डकी समालोचना की गई है, पर नास्तिक और चार्वाक केवल दोषान्वेषण और उन्हें बुरे. बतलाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करते थे । चार्वाक दर्शन विधिहीन निषेधवाद तथा वैदिक विधि-विधानों की निम्श करना ही अपना एकमात्र उद्देश्य समझता था । हाँ, यह तो अवश्य ही मानना पड़ेगा कि मुक्तिवादकी उत्पत्ति चार्वाक दर्शन से ही हुई थी और भारतवर्ष के अन्यान्य दर्शनों द्वारा इस युक्तिवादकी पुष्टि होती चली गई। नास्तिक चार्वाक मतकी तरह जैनदर्शन में भी वैदिक कर्मकाण्ड की असारता बतलाई गई है, जैनदर्शनने खुलमखुल्ला वेदकं शासनको न मानते हुए नास्तिकोंकी तरह यज्ञादिकी निंदा भी अवश्य की है, जहांतक अनुमान होता है, चार्वाक मतके Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७] भारतीय दर्शनमें जैन-दर्शनका स्थान [ ४७१ साथ इसीसे उसकी समता भी की जाती है। मतकी तरह बौद्ध-दर्शन भी अन्ध वैदिक क्रियाकिन्तु विचारपूर्वक यदि देखा जाय तो यह कहना कलापका विरोध करता है, किन्तु बौद्धोंका दोषाही पड़ेगा कि जैनदर्शन चार्वाक मतकी तरह रोप तर्क और युक्तिसे रहित नहीं कहा जा सकता। निषेधमय नहीं है, वरन एक सम्पूर्ण दार्शनिक बौद्धमतके अनुसार जीवनका दुःखमय अस्तित्व मतकी सृष्टि करना ही इस जैन दर्शनका एकमात्र एकमात्र कर्मनिमित्तिक है, जो कुछ किया गया मुख्य उद्देश्य था। सबसे पहिले ध्यान देनेकी है और किया जारहा है उसीके द्वारा ही हमारी बात तो यह है कि चार्वाकमतकी घृणाके योग्य अवस्थाका निरूपण हुआ करता है । असार और इन्द्रिय-सुख परमार्थताको जैनदर्शन बड़ी अवज्ञा अवस्तुका भोगविलास ही असावधान जीवगणोंके के साथ त्याग करता है । निःसार वैदिक क्रिया- हृदयमें मोह पैदा करता है, और उसी भोगकलापोंकी आवश्यकताओंको स्वीकार न करना लालसाके पीछे पीछे दौड़ते रहनेके कारण हम चार्वाक मतके लिये चाहे असङ्गत न हो, पर उन लोग जन्म-जन्मान्तर तक इस जन्ममरणरूपी लोगोंने कभी विषयकी गम्भीरता पर ध्यान नहीं संसारचक्रसे कभी छुटकारा पानेमें समर्थ नहीं दिया और मनुष्य प्रवृत्तिके 'प्रायः उसी अंशकी होते । इस अविराम दुःख और क्लेशसे छुटकारा ओर खिचे रहे जोकि पशुभाव पूर्ण है। उनके पाने के लिये कर्मवन्धनको अवश्य तोड़ना चाहिये । विषय में यह कहा जा सकता है कि वैदिक यदि कर्मके अधिकारको अतिक्रम करना है, तो क्रियाकाण्डके द्वारा लालसा दमन होती थी और कुकर्मोंको छोड़कर सुकर्मोंका अनुष्ठान, लालसाको बेरोक इन्द्रिय चरितार्थके मार्ग काँटोंकी सृष्टि होती त्याग करते हुए सन्न्यासका अभ्यास, हिंसाके थी, इसीलिये वे उसे स्वीकार नहीं करते थे यदि उस बदलेमें अहिंसाके आचरणोंको अपनाना ही होगा। क्रियाका प्रतिवाद करना ही मुख्य उद्देश्य है तो प्रतिवादका ढंग और ही किसी रूपमें होना उचित वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानसे मात्र बहुतसे है, नि:सार क्रियाकलापकं अन्ध-अनुष्ठान से प्रागियोंका, जो कि निरपराध है, जीवन नाश ही मनुष्यकी विचार बुद्धि तथा तर्क वृत्तिका मार्ग नहीं होता, वरन् उन कर्मोके अनुष्ठान करनेवालोंके बंद हो जाता है, केवल इसी खयालसे प्रतिवाद अच्छे किये हुये काँके फलस्वरूप स्वगोदि उचित समझा जाना चाहिये । पर बात तो यह है भोगमय स्थानमें भी अवश्य जाना पड़ता है, अतः कि इन्द्रियपरायण मनुष्य इस बातको नहीं वदिक क्रियाकलाप इसी प्रकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समझते, केवल इसीलिये बौद्धमतके अनुसार रूपमें जीवोंके दुःखपूर्ण जन्ममरणका एकमात्र अध्यात्मवादो जैनदर्शन चार्वाक मतको कोई कारण बन जाता है। इसीलिये बौद्धमतके अन. स्थान नहीं देना चाहता। सार वैदिक कर्मकाण्डको त्योज्य माना गया है, चार्वाक मतके बाद ही प्रसिद्ध बौद्ध-दर्शनके और यही मूलसूत्र है। कर्मकाण्डके राज्यको यदि साथ जैन-दर्शनकी तुलना की जा सकती है। नास्तिक अतिक्रम करना है तो हिंसाका त्याग अवश्य Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४७२ ] अनेकान्त (वैसाख, वीरनिर्वाण सं० २४६६ करना ही पड़ेगा। वैदिककर्मकाण्ड हिंसा-कलुषित जाँचकी दृष्टि से देखा जाय तो यह स्पष्टरूपमें होनेके कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपमें निर्वाणके प्रगट हो जायगा कि बौद्धमतकी इस सुहावनी मार्गमें रोड़े अटकाने वाला है, इसीलिये वैदिक नीतिके ऊँचे महलकी नींव कितनी दुर्वल है । विधि-विधानोंका त्याग परमावश्यकीय हो जाता वेदके शासनको न माननेका उपदेश ग्रहण योग्य है। यहाँ यह स्पष्ट हो रहा है, कि वेदके शासन- हो सकता है, अहिंसा या सन्यासका अनुष्ठान को न माननेके प्रसङ्गमें चार्वाक दर्शनसे मिलते- चित्तग्राही माना जा सकता है, कर्मबन्धनों के जुलते हुये, बौद्धदर्शनने चार्वाकोंकी इन्द्रिय तोड़नेका आदेश सारगर्भित स्वीकार किया जा परायणताके प्रति दृढ़ताके साथ आक्रमण कियो सकता है, किन्तु यदि बौद्ध दर्शनसे यह पूछा जाय है। वैदिक कर्मकाण्डको त्याग करते हुये कहीं कि हम क्या हैं, हमारा उद्देश्य और परमपद क्या लालसाके शिकार न बन जाय इसके लिये बड़ी है ? तो जो उत्तर कि बौद्ध-दर्शनकी ओर से सावधानीकी आवश्यकता है, इसीसे कठिन संयम हमें मिलेगा वह कदाचित बड़ा ही डरावना और सन्न्यासके द्वारा कर्मोंकी जंजीरको तोड़ और रोंगटे खड़े कर देने वाला होगा। यदि यह डालना ही बौद्ध दर्शनका मूल्यवान उपदेश है। उत्तर दिया जाता है, कि हम कुछ भी नहीं, ऐसी दशामें यह प्रश्न उठ खड़ा होता है तो क्या हम कर्मके बन्धनोंके कारण ही जीव संसारमें केवल अन्धकार ही में भटक रहे हैं ? सारहीन दःख और क्लेशको भोगते हैं, जैन दर्शन भी इस महाशून्यता ही क्या जीवोंका चरमस्थान है ? बातको मुक्तकण्ठ से स्वीकार करता है । स्मरण और क्या उसी भाँति पैदा करनेवाले महानिर्वाण रहे बौद्धमतके अनुसार जैन-दर्शन भी एक ओर और अनन्त कालकी महानिस्तब्धताको बुलानेक जैसे वेदके विधानोंको नहीं मानता वेसे ही दुसरी लिये ही यह जीव कठोर सन्यास व्रत ग्रहण करते ओर वह चार्वाककी इन्द्रियपरायणताकी भी हृदय हुए जीवनके छोटे से छोटे( ? ) सुख तकको त्याग से घृणा ही किया करता है। अहिंसा और विरति कर देगा? अनुष्ठानके योग्य हैं, इस बातको जैन और बौद्ध, दोनों ही समस्वरसे स्वीकार करते हैं, पर जैन मतके यह जीवन असार है, इसके अतिरिक्त जो अनुसार अहिंसा और विरतिका अनुष्ठान विशेष- कुछ भी है वह नहीं चाहिये, बौद्धदर्शनकं इस रूपसे तीव्रभाव वाला अनुमान किया जाता है। निरात्मवादसे साधारण मनुष्य कभी सन्तुष्ट नहीं हो सकते, यह तो निश्चितरूपमें मानना ही पड़ेगा। कुछ भी हो, जैन-दर्शन और बौद्ध दर्शन में किसी समय बौद्धदर्शनका प्रचार बहुत बड़े रूपमें बहुत कुछ समता होते हुए भी इन दोनोंमें बड़ा । हुआ था, इसमें कोई सन्दह नहीं; किन्तु वह अन्तर मौजूद हैं । बौद्ध-दर्शनकी नींव उतनी दृढ़ उसकी निरात्मवादिताके कारण नहीं प्रसिद्ध "मध्यनहीं जितनी कि जैन-दर्शनकी है। पथ" अर्थात बुद्धके बताये हुए मध्यमार्गकी सहज Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भारतीय दर्शनमें जैन- दर्शनका स्थान वर्ष ३, किरण ७ ] तपस्याके आकर्षण ही जैनों तकको बौद्धमत ग्रहण करने में प्रवृत्त किया था। मैं हूँ यह सभी अनुभव करते हैं, कौन इस बातको नहीं समझता कि मैं केवल निःसार छाया नहीं हूँ और सत्य हूँ । आत्मा अनादि अनंत है यह तो उपनिषदोंकी हर एक पंक्ति में बड़े ही चमकने वाले रूपमें अति हैं । वेदान्त दर्शन भी इस तत्वकी दिगन्त मुखरित करनेवाली आवाज से जोरोंके साथ प्रचार कर रहा है। आत्मा हैं आत्मा सत्य है, वह सृष्ट पदार्थ नहीं किन्तु अनन्त है, आत्मा जन्म-जन्मान्तर ग्रहण करता चला आरहा है, सुख और दुःखका भोक्ता है, ऐसा अवश्य प्रतीयमान होता है; किन्तु यह सत्ता है, असीम ज्ञान और आनन्दके सम्बन्ध में भी उसे असीम और अनन्त ही समझना होगा । वेदान्तका यही मूल प्रतिपाद्य विषय है । आत्माकी असीमता और अनन्तत्वको जैन-दर्शन भी स्वीकार करता है, इसीलिये यहाँ जैन-दर्शन और वेदान्त दर्शन में किसी प्रकारका विरोध नहीं पाया जाता । [ ४७३ और विश्व का उपादान "वह" मैं उससे भिन्न नहीं, कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं, यह दिखलाई पड़ने वाला अनन्त जगत यद्यपि मुझसे अलग सा जान पड़ रहा है, वह भी उससे अलग स्वतन्त्र कोई सत्ता नहीं, एक अद्वितीय सत्ता वह तुम हम चिदाचिद भाव उस 'सत्यस्य सत्यम्' से सम्पूर्ण रूपसे अपृथक ही हैं । बौद्ध दर्शनके निरात्मवादके प्रति आक्रमण और आत्मा अनन्त सत्ताको स्वीकार करने के कारण ही जैनमत और वेदान्तमत में कोई भेद नहीं जान पड़ता, फिर भी ये दोनों एक नहीं है । वदान्तिक जीवात्माकी सत्ताको केवल स्वीकार ही नहीं करते, बल्कि दर्शन जगत् में वे और भी कुछ आगे बढ़कर निर्भीक रूप में जीवात्मा और परमात्मा का अभेद प्रचार किया करते हैं । वेदान्तमतके अनुसार यह चिदचिन्मय विश्व उसी एक और अद्वितीय सत्ताका विकासमात्र है । "मैं," "वह" वेदान्तका एकमेवाद्वितीय' वाला सिद्धान्त निस्सन्देह बहुत गम्भीर और महान है, किन्तु साधारण मनुष्य के लिये इतने ऊंचे भावका ग्रहण एक कठिन विषय होजाता है। जीवात्मा एक सत्ता है, साधारण मनुष्य यह तो अवश्य अनुभव करते हैं; किन्तु एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में कोई भेद नहीं, मन, जड़ पदार्थ और अन्यान्य देख पड़नेवाली सभी वस्तुओंमें कोई भेद नहीं, इस बातको वे स्वीकार नहीं करना चाहते । यदि कोई ज्ञानी पुरुष ऐसा सिद्धान्त करना चाहे कि वह दूसरे मनुष्यसे या अन्यान्य अचे. तन और चेतन भावोंसे भी स्वतन्त्र है और यह संसार चिचित् गणितभावोंसे परिपूर्ण है, तो उसके इस सिद्धान्तको युक्तिहीन नहीं कहा जा सकता, हम भी यही कहना चाहते हैं कि ऐसे सिद्धान्त कदापि युक्तिहीन नहीं हो सकते, बल्कि संसार के अधिकांश मनुष्य इस प्रकार के अनुभवगम्य सुयोग्य सिद्धान्तों को ही ग्रहण किया करते हैं, इसीलिये प्रायः वेदान्तमतको बहुत से लोग ग्रहण नहीं करना चाहते । कपिलके प्रसिद्ध सांख्यदर्शन के मतवादका भी बिचार यहाँ करना आवश्यक है । वेदान्तकी तरह Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४७४] अनेकान्त [वैसाख, वीर-निर्वाण सं० २४६६. सांख्य भी आत्माके अनादित्व और अनन्तत्वको पवित्र आदर्श और पूर्ण ज्ञानवीर्य-आनन्दके अवश्य स्वीकार करता है, किन्तु सांख्य आत्माके आधार एक पुरुष प्रधानके होनेका विश्वास एकत्वको नहीं मानता। सांख्य और वेदान्तमें और मनुष्यकी प्रकृति-सिद्ध बात है, गहरी देवसत्तामें भी एक पार्थक्य है, सांख्यमतके अनुसार पुरुष विश्वास ही का नाम यदि धर्म है तो धर्मके प्रति या आत्माके साथ मिले हुये रूपमें क्रिया करने विश्वास या धार्मिक होना ही मनुष्यकी प्रकृतिगत वाली अचेतना प्रकृतिके नामकी एक विश्व- बात हुई। ऐसा भी कहा जा सकता है कि ज्ञान, रचना करनेवाली शक्ति विद्यमान रहती है। इस वीर्य, पवित्रता आदि सभी बातोंमें हमलोग क्षुद्र, प्रकारसे आत्माके अनादित्व अनन्तत्व और ससीम और बँधे हुए हैं, ऐसी दशामें जिन सब और असीमत्वको सांख्य मानता है और उस बातोंमें हम अधिकार पाना चाहते हैं वे सभी मतके अनुसार आत्मा अनेक है । कपिलके मता. बातें जिसमें उज्ज्वल या पूर्णरूपसे विद्यमान हों, नुसार पुरुषसे स्वतन्त्र और पृथक एक अचेतन ऐसे शुद्ध और पवित्र प्रभु या परमात्माके प्रति प्रकृति है, पुरुषसे पृथक होते हुए भी वह थोड़ी यदि हम स्वभावतः विश्वास रखते हैं तो इसमें देरके लिये पुरुषसे मिली हुई जान पड़ती है, इस आश्चय ही क्या हो सकता है। विजातीय प्रकृतिके अधिकारसे आत्माको पृथक रूपमें अनुभव करनेका नाम ही मोक्ष है। ___टीकाकारोंकी व्याख्याको यदि छोड़ भी दिया जाय तो स्पष्टरूपमें समझमें भाजायगा कि सांख्य जैन-दर्शन भी आत्माके अनन्तत्व और दर्शनमें ऐसे शुद्ध और पूर्ण परमात्माका कोई अनादित्वको मानता है। कपिल-दर्शनकी तरह स्थान नहीं है, ऐसे शुद्ध परमात्माके होनेमें जैन दर्शन भी स्वभावतः स्वतन्त्र आत्माको बन्धन विश्वास करनेकी जो जीवोंको स्वाभाविक प्रवृत्ति में लाने वाले एक विजातीय पदार्थका होना है भारतीय-दश नोंमें उसी आकांक्षाको पूरी करने स्वीकार करता है। सांख्य मतके अनुसार जैन की पूरी पूरी चेष्टा की गई है। मतमें भी आत्माको अनेक कहा गया है, साँख्य ___सांख्यकी तरह योगदर्शन भी आत्माकी और जैन इन दोनों ही दर्शनोंके मतानुसार विजातीय पदार्थके सम्बन्धसे आत्माको पृथक् करनेका __ सत्ता और अनेकत्वको स्वीकार करता है, किन्तु योगदर्शन थोड़ा सा और भी आगे बढ़कर नाम ही मोक्ष है। जीवात्माओंका अधीश्वर अनन्त आदर्शरूपी एक अब यहाँ देखना है कि, प्रत्येक मनुष्य अपने परमात्माको बतलाया है । यही योगदर्शन और जैन सामने अपने आप ऊँचेसे ऊँचा और बड़ेसे बड़ा दर्शनमें समता पाई जाती है । योगदर्शनकी तरह एक आदर्श रखना चाहता है। भक्तों का विश्वास जैनमत भी परमात्मरूपी प्रभुके अस्तित्व में है एक ऐसा पुरुष ईश्वर, प्रभु या परमात्मा है, विश्वास करता है, वह अर्हत पद वाच्य है। जो कि पूर्णताका अनन्त आधार है। महान् अहतरूपी ईश्वर जगत्का सृष्टिकर्ता नहीं है, वह Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण ७ } भारतीय दर्शनमें जैन-दर्शन का स्थान [४७५ पूर्णताका अनन्त आदर्श शुद्ध और पवित्र परमा- णुओंका अनादि और अनन्त होना नहीं स्वीकार स्मा हैं, उसी अनन्त पवित्र और पूर्ण परमात्माके किया। दिक्, काल और परमाणुओंकी प्रकृति बद्धजीव एकाग्र चित्तसे ध्यान करे । परमात्माके और लक्षण अलग अलग होते हुए भी वे समी सम्मुख होनेमें ही जीवोंकी उन्नति होती है, पर- उसी एक अद्वीतीय विश्वप्रधानके विकार हैं, यह मात्माकी भावनासे हृदय में निर्मल ज्ञान और बंधे धारणा अनुभवगम्य न होते हुये भी सांख्य और हुए जीव एक नवीन प्राण और नये तेजको प्राप्त योगमतके अनुसार तत्वके रूपमें मानी गई है। होते हैं । जैन और पातञ्जल उभय दर्शन इसी वशेषिकदशनमें भी परमाणु दिक् और सिद्धान्तको मानने वाले हैं। कालका अनादि और अनन्तत्व स्वीकार किया ___ अब यहाँ कणादके बताये हुए वैशेषिकदर्शन गया है । की बात आती है। वैशेषिकदर्शनका स्थान यों प्रत्यक्षवादी चार्वाक मतके श्रानुसार कदाचित दिखलाया जा सकता है-आत्मा या पुरुषसे जो दिक् कालादिका स्वभाव निर्णय अनावश्यक समझ कर उसके प्रति उपेक्षाकी दृष्टि की गई कुछ भी अलग है, वही सर्वग्रासी प्रकृतिके अन्त है। दिक् , कालादि हम लोगोंकी दृष्टि में सत्य गत है, यहो सांख्य और योगदर्शनका सूक्ष्म प्रतीत होते हुए भी, शून्यवादी वौद्ध उसे अवस्तुके अभिप्राय है। उनके मतानुसार सत् पदार्थमात्र आख्या ही देते आ रहे हैं। वेदान्तका सिद्धान्त विश्वप्रधानके बीजरूपमें वर्तमान थे, इसीलिये भी प्राय: इसी प्रकारका है। सांख्य और योगके कपिल और पतञ्जलने आकाश, काल और पर मतानुसार दिक् , काल ये अज्ञेय प्रकृतिके अन्दर माणुके तत्वनिर्णयमें विशेष ध्यान नहीं दिया। ही छिपे हुए, माने जाते हैं। केवलमात्र कणाद उनके कथनानुसार यह सब प्रकृतिका विकृतरूप है, किन्तु ऐसी धारणा कोई सहज बात नहीं है । के मतमें ही दिक् काल और परमाणु-समूहोंका नित्यत्व, सत्ता और स्वतन्त्रता स्वीकृत हुई है। साधारण मनुष्यकी दृष्टिम दिक, काल, परमाणु जैनदर्शनमें भी, ठीक उसी प्रकार जैसे कि सभी अनादि हैं और स्वतन्त्र सत् पदार्थ हैं। वैशेषिकदर्शनमें, उन सबोंके अनादि और जर्मनदार्शनिक काण्टेका कहना है कि दिक् और अनन्तत्वको स्वीकार किया गया है । सयुक्तिवादक काल मनके संस्कारमात्र हैं, किन्तु जहाँतक ये उपादेय फलसमूह भारतीय-दशनोंके अङ्गीभूत अनुमान है, इस मतकी उन्होंने आद्योपान्त रक्षा विषय है। नहीं कर पाई । मनसे दिक-कालकी सत्ता न्यायदर्शनमें प्रायः युक्तियोंके प्रयोगसे ही पृथक् है । जहाँ तहाँ काण्टने भी यही बात कही र काम लिया गया है। तकविद्याकी जटिल है। साथ ही डिमांक्रिटाससे लेकर आजकलके नियमावलि इसी दर्शन के अन्तर्गत है । हेतुज्ञानादि विषय गौतमदर्शन में विस्तृत रूपसे विशेष रूपसे वैज्ञानिक तक भी परमाणुओंके अनादित्व और __ वर्णन किये गये है । संसारके दार्शनिक तत्वसमूहों अनन्तत्वको स्वीकार करते आये हैं। किन्तु का समृद्ध-भण्डार जैन दर्शन ही है । तक कपिल आर पतञ्जलने दिक्, काल और परमा- तत्वादि भी इभी दर्शन में विशेषरूपसे Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४७६ ] आलोचित हुए हैं। अतः इस विषय में जैन और न्यायदर्शन में बहुत कुछ समता पाई जाती है । किन्तु यदि यह कहा जाय कि न्यायदर्शन के अध्ययन कर लेने पर जैनदर्शन के अध्ययनकी आवश्यकता ही नहीं, तो यह एक बहुत बड़ी भूल की बात होगी। कारण, ये दोनों दर्शन बहुत अंशों में मिलते-जुलते हुए भी एक दूसरे से सम्पूर्णतया पृथक पृथक हैं । स्याद्वाद और सप्ताङ्गीनय नामक प्रसिद्ध युक्तिवाद गौतमदर्शन में नहीं है, वह जैनदर्शनका ही गौग्व है. इस बातको मानना ही पड़ेगा । भारतीय दर्शन समूहों में जैन दर्शनका क्या स्थान है। यह उपर्युक्त वर्णनसे बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है। बहुतों का मत है कि जैनमत बौद्धमतके अन्तर्गत है । लासेन और वेबर ने जैन धर्मकी सत्ताको स्वतन्त्ररूप से स्वीकार नहीं किया । यहाँ तक कि ईसवी सन्के सप्तम शताब्दीक व्यक्ति हुएनसङ्गने भी जैनधर्मको बौद्ध धर्मकी एक शाखा मात्र ही माना है । वीलर और जैकोबीक मतानुसार जैनधर्म एक स्वतन्त्र धर्म है, और बौद्ध धर्म - के पहले भी यह मत वर्तमान था ऐसा स्पष्टरूप से स्वीकार किया गया है। कुछ भी हो हम लोग इस पुराने तत्व के विषय में किसी प्रकारका विवाद नहीं करना चाहते, यह तो हम पहले ही कह चुके हैं कि हम लोगों का यह दृढ़ विश्वास है कि बौद्ध तथा जैन धर्म उनके उस समय के प्रवर्तकगणो के बहुत पहले ही से वर्तमान थे । बौद्धमत बुद्धदेवसे उत्पन्न नहीं, उसी प्रकार जैनमत भी वर्द्धमानके द्वारा ही नहीं उत्पन्न हुआ । प्रतिवादोंके कारण [ वैसाख, वीर- निर्वाण सं० २४६६. जिस प्रकार उपनिषदों की उत्पत्ति मानी जाती है, ठीक उसी प्रकार वेदशासन और कर्मकाण्डों के विरुद्ध जैन तथा बौद्धदर्शनकी उत्पत्ति मानना चाहिये । हुएनसङ्गने जिन कारणोंस जैनधर्मको बौद्ध धर्म के अन्तर्गत माना है, वे यहाँ स्पष्टरूप से प्रगट हो रहे हैं । वे जिस समय यहाँ आये थे उस समय भारतवर्ष में बौद्धधर्म प्रबल हो रहा था । हम लोगोंने पहले भी कहा है कि अहिंसा और त्याग ये दोनों बौद्ध धर्मके मुख्य उपदेश हैं, वैदिक क्रिया कलापोंके विरुद्ध बौद्धों का जो युद्ध हो रहा था, उसमें आत्मरक्षा तथा आक्रमणके लिये अहिंसा और त्याग ये ही दो प्रधान अस्त्र थे । और अवैदिक सम्प्रदायमात्र अहिंसा और त्यागके पक्षपात में थे । वैदिक यज्ञादि हिंसालिप्त एवं परलोकके नाशशील सुख प्राप्तिके लिये ही अनुष्ठित हुआ करते थे। जैन धर्मको भी वेदका शासन श्रमान्य था । जहाँतक अनुमान है, त्याग और अहिंसाको जैन समाजमें इसीलिये इतना ऊँचा स्थान दिया गया है। कदाचित इसी दृष्टिसे बाहरी रूपमें जैनधर्म तथा बौद्ध धर्म एकसे प्रतीत होते थे, क्योंकि दोनों ही वेदविधिको न माननेवाले तथा सन्न्यास और अहिंसा के पक्षपाती थे। ऐसी दशा में बाहरी रूपको देखकर यदि कोई विदेशी पर्यटक इन दोनों धर्मोको एकही वस्तु समझले तो इस विषय में कोई आश्चर्यकी बात न होगी। पर इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि ये दोनों धर्म तत्वतः एकही हैं । इन दोनों धर्मोंके आचार-समूह प्राय: एकसे होते हुये भी तत्वतः वे एक दूसरे से पूर्ण भिन्न हो सकते हैं । दृष्टान्तके रूपमें कहा जा सकता है कान्त Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३, किरण . ] भारतीय दर्शनों में जैन-दर्शनका स्थान कि सँसारके क्षणिक. सुख-शान्तिको त्याग करते इन सबोंकी सत्ता मानी जाती है । बौद्धोंका कहना हुये कठोर संयममय शुद्ध जीवन व्यतीत करनेके है कि निर्वाण लाभ होते ही जीवशून्यमें विलीन फलस्वरूप मोक्ष लाभ होता है, भारतीय प्रत्येक हो जाता है, किन्तु जैन मतके अनुसार मुक्तजीव दर्शनकी यही राय है, इसमें सन्देह नहीं, पर का अस्तित्व चिर-आनन्दमय है और वही उसका प्रत्येक दर्शन एक दूसरेसे तत्वतः भिन्न ही है। सच्चा अस्तित्व हुआ करता है । यहाँ तक कि बौद्ध जैसे कि उत्तर तथा दक्षिण मेरुमंडल परस्पर दर्शनका कर्म भी जैनदर्शनके कर्मसे भिन्नार्थ वाविभिन्न हैं उसी तरह ग्रीक देशीय सिमिक सम्प्र- चक ही हुवा करता है। दायके मूलसूत्र साईरेनके सम्प्रदायके मूलसूत्रोंसे । पृथक् थे। फिर भी कोई दिन ऐसा था जबकि । ___ उपर्युक्त कारणोंसे ही हम जैनधर्मको बौद्धदोनों सम्प्रदाय वालोंने सर्वत्यागको ही अपनी धर्मकी एक शाखा मानने के लिये तैय्यार नहीं हैं। अपनी आदर्श नीति मान रक्खा था। ऐसी दशामें बौद्धदर्शनकी अपेक्षा तो सांख्यदर्शनके साथ जैन "" दर्शनका निकट सम्बन्ध अधिक रूपमें प्रतीत होता आचारोंकी विभिन्नताको लक्ष्यमें रखते हुये, जैन और बौद्ध धर्मको अपृथक् समझ लेना समीचीन है। सांख्य और जैनदर्शन दोनों ही वेदान्तके नहीं होगा। वाह्यरूपमें जैन तथा बौद्धधर्ममें जो अद्वैतवादको त्याग करते हुये, आत्माके बहुत्त्रको कुछ भी समता पाई जाती है उससे वे एक दूसरे र स्वीकार करते हैं। ये उभय दर्शन जीवातिरिक्त से उत्पन्न हुये हैं, ऐसा कभी प्रमाणित नहीं होता। अजीव तत्वके पक्षमें पाये जाते हैं। फिर भी इन हाँ, यदि यह कहा जाय कि वैदिक सम्प्रदायके उभय दर्शनों में से कौनसा दर्शन किससे निकला निष्ठर क्रिया कलापोंके विरुद्ध उठ खड़े होनेवाले है है अथवा मूलतः इन दोनोंमें कहाँ समता है, यह युक्तिवाद ही इनके उत्पत्तिके एकमात्र कारण हैं * बतलाना कठिन होगा। साधारणतः यही देखने में तो अनुचित न होगा। आता है, कि सांख्य और जैनदर्शनमें बहुत कुछ समता है, पर हैं ये दोनों ही एक दूसरेसे पूर्ण विभिन्न। जैन तथा बौद्ध धर्मके तत्वोंकी यदि ठीक ठीक आलोचना की जाय तो यह स्पष्ट रूपमें प्रकट सबसे पहले यही देखने में आता है कि सांख्यहोजायगा कि ये दोनों धर्म एक दूसरेसे पूर्णतया दर्शनमें अजीव-तत्त्व या प्रकृति एक ही है, किन्तु पृथक है । बौद्धोंका कहना है कि शून्य ही एकमात्र जैन-दर्शनने अजीव-तत्वकी पांच संख्यायें की हैं तत्व है। जैनोंके मतानुसार सत्पदार्थ है एवं और उन पांच अजीवोंमें पुद्गलाख्य अजीव उसकी संख्यायें अगणित हैं। बौद्धमतके अनुसार असंख्यरूपमें विद्यमान हैं । अब इससे यही स्पष्ट आत्माका कोई अस्त्वित्व नहीं है, परमाणुका भी होता है कि सांख्य दो तत्वोंको ही मानता है, पर कोई अस्तित्व नहीं, दिक्, काल, धर्म (गति) ये जैन बहु-तत्वोंका मानने वाला है और भी इन कुछ भी नहीं हैं, ईश्वर नहीं है; किन्तु जैनोंके मतमें दोनों दर्शनोंमें बहुतसे भेद हैं। सबसे बड़ा भेद Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४७८ अनेकान्त [ वैसाख, वीर निर्वाण सं० २४६६ लेने ही से जगत विकाशन कार्य सम्भव हो सकता है । तो यह कि कपिल दर्शन अधिकांशमें चैतन्यवादी है और जैन-दर्शन विशेषरूपमें जड़वादी है । सांख्य दर्शनकी आलोचना करने वाले के हृदय में पहले ही यह उदय होगा कि प्रकृतिका स्वरूप क्या है ? वह जड़ है या चैतन्य ? स्वभावतः प्रकृति सम्पूर्णरूपमें जड़ है, यह नहीं कहा जा सकता । जिसे जड़ पदार्थ कहते हैं; साधारणतः वह प्रकृति की विकृत क्रियाका ही शेष परिणाम हुआ करता है, तो फिर प्रकृति क्या है ? भिन्नभावापन्न गुण समूहों की साम्यावस्था ही प्रकृतिका स्वरूप है । सांख्य दर्शन में स्पष्टरूप में प्रकृतिके ये ही लक्षण बताये हैं । इन्द्रिय- गोचर जड़ पदार्थ विभिन्न भाव वाले तीन गुणोंकी साम्यावस्था नहीं है । यह वो सहज ही में समभ् में आने वाली बात है । बहुमें जो कि एक है, वह नाना प्रकार के गुण पर्या रहकर भी जब कि अपने एकत्वकी रक्षा करने में समर्थ है, वह अवश्य ही कोई जड पदार्थ न होकर कोई अध्यात्म पदार्थ होगा, यह सभी समझ सकते हैं, भूयो दर्शन या तत्व विचारसे भी यह सिद्ध होने योग्य बात है । ऐसी दशा में विभिन्न भाषापन त्रिगुणात्मक प्रकृति के द्वारा यदि जगद्विवर्त - क्रिया सम्पन्न होती है ऐसा स्वीकार कर लिया जाय, तो प्रकृतिको एक अध्यात्म पदार्थ मानना ही पड़ता है, और भिन्न २ तीनों गुणों को उसी अध्यात्म पदार्थ प्रकृतिके स्वात्मविकाशके तीन प्रकार भी मानना पड़ता है, । यदि प्रकृतिको स्वभावतः एकान्त भिन्न तीन गुणों का अचेतन संघर्ष मात्र विवेचन किया जाय तो प्रकृतिके द्वारा किसी भी पदार्थका पैदा होना संभव नहीं होता । सुतर प्रकृतिको अध्यात्म पदार्थ के रूपमें स्वीकार कर प्रकृति से पैदा होने वाले, तत्व समूहों में पहले तस्व महतव बुद्धितत्व हैं । ये जड परमाणु पत्थर या किसी प्रकार के जड पदार्थ नहीं हैं, बल्कि ये एक अध्यात्म पदार्थ हैं, अहङ्कार कहलाने वाला दूसरा तत्व भी अध्यात्म पदार्थ ही है, उसके बाद इन्द्रिय, पंचतन्मात्रा, इसी प्रकार क्रमशः महाभूतों की सृष्टि देखने में आती है। यदि प्रकृतिको सम्पूर्ण जड प्रकृति ही स्वीकार कर लिया जाय, तो प्रकृतिकी यह विश्व सृष्टि-क्रिया एक बे मतलब और समझ में न आनेवाला विषय बन जाता है । महतव और अहङ्कार अध्यात्म पदार्थ हैं, कपिलके मतसे ही स्पष्ट है कि कार्य और कारण एक ही स्वभावके पदार्थ हैं। ऐसी दशा में पैदा हो चुकने वाले तत्त्र समूहों की तरह प्रसव करने वाली प्रकृतिको अध्यात्म पदार्थ कहना कोई युक्तिहीन बात नहीं हो सकती। यदि सचमुच प्रकृति सम्पूर्णतः जड स्वभाव वाली है, तो जङस्वभाव व पंचतन्मात्रा के पैदा होनेके पहले क्यों और कैसे दो अध्यात्म पदार्थों का समुद्भव होता है, यह समझके बाहरकी बात है। हाँ यदि प्रकृतिको अध्यात्म पदार्थ अनुमान कर लिया जाय, तो सभी बातें सुगम हो जाती हैं। इसमें कोई भी सन्देह नहीं । प्रकृति बीजरूपी चित्पदार्थ है, इसके पूर्णरूप से विकसित या विकाशप्राप्त होने की दशा में सबसे पहले आत्मज्ञान और लक्ष्यज्ञान की आवश्यकता होती है। बुद्धितत्व और Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भारतीय दर्शनों में जैन-दर्शनका स्थान वर्ष ३, किरगा ] अहंकार तत्वकी उत्पत्ति भी इसी से है । तदनन्तर प्रकृति अपने आत्मविकास के कारणस्वरूप आव श्यकतानुसार क्रमशः इन्द्रिय, तन्मात्रा, कहे जाने वाले जड़तत्वोंकी सृष्टि अपने आप ही करती रहती है । इस तरह प्रकृतिको अध्यात्मपदार्थ और उसमें पैदा होनेवाले तत्वोंको प्रकृतिके स्वास्म विकास का साधन मान लेनेसे सांख्यकी बताई हुई जगत्विवर्त-क्रिया बहुत कुछ समझ में आजाती है । प्रकृ तिको अध्यात्म पदार्थ के रूप में मानना वस्तुतः अपरिहार्य है । प्राचीन कालमें भी प्रकृति अध्यात्मपदार्थ के रूपमें न मानी गई हो ऐसा नहीं है । कठोपनिषदकी तृतीय वल्लीके निम्न श्लोक नं० १०, ११ में प्रकृतिको अध्यात्मस्वभाव के रूपमें प्रकाश करने एवँ उसके द्वारा साँख्य दर्शनको वेदान्त दर्शन में परिणत करने की जो चेष्टा की गई है वह सुस्पष्ट है: इन्द्रियेभ्यः परो हार्थ अर्थेभ्यश्च परो मनः । मनसश्चः परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ अर्थात-इन्द्रियोंसे अर्थ समूह श्रेष्ठ है, अर्थं समूहोंसे मन श्रेष्ठ, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ, बुद्धिसे महदात्मा, महदात्मासे अव्यक्त, अव्यक्त से पुरुष, पुरुष से बढ़कर कोई भी वस्तु श्रेष्ठ नहीं, पुरुष शेष सीमा है और वही श्र ेष्ठ गति भी है। जैन दर्शनका मत और ही कुछ है। जैन दर्शन ४७३ में अजीब तत्त्व केवल संख्यामें ही एकसे अधिक है, यही नहीं, बल्कि प्रत्येक अजीव तत्व अनात्म स्वभाव है । उपर्युक्त कथनानुसार सांख्य के अजीव तत्व या प्रकृतिको तो अध्यात्म पदार्थ के रूप में परिगत किया जा सकता है । किन्तु जैन दर्शन के अजीव तत्व समूहोंको किसी भी प्रकार से जीव स्वभावापन्न नहीं बनाया जा सकता। जैनमत के अनुसार जीव तत्त्र पंच संख्यक है - पुद्गलाख्य जड़ परमाणु पुंज, धर्माख्य गतितत्व, अधर्माख्य स्थैर्यतत्व, काल और आकाश । ये सब जड़पदार्थ अथवा उसके सहायक हैं, यहाँ तक कि आत्माको भी जैन दर्शनने अस्तिकाय माना है याने परिमाण अनुसार आत्माका "कर्मज लेश्या" या वर्णभेद है । जैनदर्शन में आत्मा अत्यन्त लघु पदार्थ और ऊर्द्धगतिशील कहा जाता है । सब बातें सांख्यमत के विरुद्ध हैं । हमने पहले ही कहा है कि सांख्य दर्शन बहुत कुछ चैतन्यवाद के निकटवर्ती है, और जैन दर्शन प्राय: जड़वाद की ओर झुकता रहता है । जैनदर्शन सांख्य दर्शनसे विभिन्न है, सुतरा सांख्य दर्शन से जैनदर्शनकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। बहुत से ऐसे विषय हैं कि जिनमें सांख्य और जैनदर्शन में परस्पर सम्पूर्ण विरोध है । उदाहरणार्थ यह कहा जा सकता है कि सांख्य के मातानुसार आत्मा निर्विकार और निष्क्रिय है, किन्तु जैनदर्शनका कहना है कि वह अनन्त उन्नति और परिपूर्णता की ओर झुकने वाला अनन्त क्रिया-शक्ति आधार है 1 हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि अहित Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८० अनेकान्त [ वैसाख, वीरनिर्वाण सं०२४६६ दर्शन सुयुक्तिमूलक दर्शन है, और इसकी उत्पत्ति करते हुए एक तत्त्ववादकी ओर कुछ अग्रसर है, वैदिक कर्मकाण्डके प्रतिवादसे ही हुई थी। नास्तिक किन्तु जैनदर्शन तो नानातत्ववादके ऊपर ही चार्वाक वादका इसके निकट कोई भी आदर पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है। .. नहीं। भारतीय अन्यान्य दर्शनोंकी तरह इसके भी अपने मूल सूत्र तत्व विचार और अपना मत ____ उपसंहारमें इतना ही कहना है कि जैनदर्शन अमत पाया जाता है। विशेष विशेष विषयोंमें बौद्ध, चार्वाक, वेदान्त, साँख्य, पातंजलि, न्याय, वैशेषिक दशनोंके सदृश . जैनधर्म और वैशेषिक दर्शनमें भी इतनी होते हुए भी, एक स्वतन्त्र दर्शन है । वह अपनी समता पाई जाती है कि यह बेधड़क कहा जा उत्पत्ति एवं उत्कर्ष के लिए अन्य किसी भी दर्शन सकता है कि इन दोनों में तत्वतः कोई प्रभेद नहीं। के निकट ऋणी नहीं है । भारतीय अन्यान्य परमाणु, दिक, काल, गति, आत्मा प्रभृति तत्व- दर्शनोंके साथ जैनदर्शन समता रखते हुए भी वह विचार इन उभय दर्शनोंका प्रायः एक ही प्रकारका बहुतसे विषयों में सम्पूर्ण, स्वतन्त्र और सविशेष है, किन्तु साथ ही पार्थक्य भी कम नहीं है। रूप से अनोखा है.। वैशेषिक दर्शन बहुतत्व वादी, ईश्वरको स्वीकार Page #59 --------------------------------------------------------------------------  Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Register No L 4328. ॐ विषय-सूची 1. श्रीकुन्दकुन्द स्मरण 2. उपासनाका अभिनय [ले. पं० चैनमुखदासजी 3. श्रीपाल-चरित्र-साहित्यके सम्बन्धमें शेष ज्ञातव्य [श्री० अगरचन्द नाहटा 4. अहिंसाका पतिवाद [श्री० 50 दरबारीलालजी 5. प्रभा चन्दका तत्वार्थसूत्र [ सम्पादकीय 6. परमाणु ( कविता )-[पं० चैनसुखदासजी 7. परवार जातिके इतिहास पर कुछ प्रकाश [ श्री पं० नाथूरामजी प्रेमी 8. अहिंसाके कुछ पहलू [ श्री काका कालेल कर ... 1. छोटे राष्ट्रोंकी युद्धनीति [ श्री. काका कालेल कर ... 10 भारतीय दर्शनों में जैन दर्शनका स्थान [ श्री. हरिसत्य भट्टाचार्य अनेकान्तके ग्राहक बनिये जो सज्जन 'अनेकान्त' की पिछली किरण न लेकर नवीन किरण - मई से ही ग्राहक बनना चाहते हैं / उन्हें सहर्ष सूचित किया जाता है कि वे 1 // ) रु० मनियार्डरसे भिजवा देने पर 7 वी किरणसे 12 वी / किरण तकके ग्राहक बनाए जासकेंगे। उन्हें नवीन प्रकाशित किरणें ही से भेजी जाएँगी और जो 1 // ) रु० के साथ चार आने पोस्टेजका अधिक भेज देंगे उन्हें समाधितन्त्र और जैन समाज-दर्पण दोनों उपहारी / - पुस्तकें भी भिजवाई जा सकेंगी। -व्यवस्थापक वीर प्रेम श्रॉफ इण्डिया, कनॉट सर्कस, न्य देहली /