Book Title: Vividh Puja Sangraha
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek
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दादासाहेबनी पूजा.
ედე
॥ राग कल्याण ॥ तेरी पूजा बनी है इसमें ॥ ए चाल ॥ हो गुरु किया असुरको वशमें | ए कणी ॥ बम नगरीमें आप पधारे सांजेला धसमसमें ॥ ब्राह्मण लोक बडे अनिमानी मिलकर खाया सुसमें ॥ हो गु० ॥ १ ॥ महिमा देख शक्या नहीं गुरुकी जरे मिथ्यात्वी गुसमें ॥ मृतक गज जिनमंदिर आगे रख दी सनमुख चसमें ॥ हो गु० ॥ २ ॥ श्रावक देख नये याकुलता कहे गुरुसे कसमें ॥ चिंता दूर करी है संघकी ग उठ चाली इसमें || हो गुरु || ३ || मरी गलको जीती कीनी लोक रह्या सब इसमें ॥ जाके गाय पमी रुद्रालय संघ नया सब खुसमें ॥ हो गु० ॥ ४ ॥ ब्राह्मण पांव पडे सब गुरुके देख तमासा इसमें ॥ दुकम उठावेंगे शिर उपर तुम संततिकी दिशमें ॥ हो गु० ॥ ५ ॥ नमस्कार है चमत्कारको कीनी पूजा रसमें ॥ कहे रामद्धिसार गुरुकी आनंद मंगल जसमें ॥ हो गु० ॥ ६ ॥ श्लोक - बहुविधैश्वरुनिवटकैर्यकैः प्रचुरसर्पिषि पक्कसुखकैः ॥ सकल० ॥ ॐ ॐ श्री प० नैवेद्यं निर्वपामि ते स्वाहा ॥ ७ ॥ ॥ दोहा ॥ फलपूजा से फल मिले, प्रगटे नवे निधान ॥
वि० ३२
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