Book Title: Vaidyasara
Author(s): Satyandhar Jain
Publisher: Jain Siddhant Bhavan

View full book text
Previous | Next

Page 43
________________ वैद्य-सार २८ - श्वासकासादौ सुतका दियोगः सूतकं गंधकं भाङ्ग चामृतं चित्त्रपत्त्रकं । विडंगरेणुका मुस्ता चैलाकेशर थिका ॥१॥ फलत्त्रयं कटुत्त्रयं शुल्वभस्म तथैव च । पतानि समभागानि गुडं द्विगुणमुच्यते ॥२॥ सर्वेषां गुटिकां कृत्वा मात्रां चरणकमात्रिकां । एकैकां भक्षयेन्नित्यं तेषां चैव विचक्षणः ॥३॥ श्वासकासक्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे । तृष्णायां ग्रहणीदोषे शूले पांड्रामये तथा ||४|| मूढगर्भे बातरोगे कृच्छ्ररोगे च दारुणे । कृमिरोगेषु मन्दाग्नौ मांसोदररुजासु च ॥५॥ कंठग्रहे हृद्ग्रहे हिक्कामूर्धरुजासु च । अपस्मारे तथोन्मादे रक्तवृद्धौ च दारुणे ॥६॥ सर्वागेषु च कुष्ठेषु सर्वस्मिन्नश्मरीगदे । लूतायां सन्निपाते च दुष्टसर्पे च वृश्चिके ॥७॥ हस्तपादादिरोगेषु सर्वषु गुलिका मता । सूतकादिरयं योगः पूज्यपादेन भाषितः ||८|| टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, भारंगी, शुद्ध विष, चित्रक, तेजपत्त्र, वायविडंग, रेणुकाबीज, नागरमोथा, छोटी इलायची, नागकेशर, पीपरामूल, त्रिफला, सोंठ, मिर्च, पीपल, ताम्रभस्म, इन सबको समान भाग लेकर कूट कपड़छन करके सब चूर्ण से दूना गुड़ लेकर एक चना के बराबर गोली बनावे और एक एक गोली प्रतिदिन प्रातः काल सेवन करे, तो इससे श्वास, खांसी, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, तृष्णा, ग्रहणी, दोष, भूल, पांडु रोग, मूढ गर्भ, बातरोग, कठिन मूत्रकृच्छ्र, कृमिरोग, मंदाग्नि, नासिका रोग, कंठरोग, हद्रोग, हिचकी शिरोरोग, अपस्मार, उन्माद, रक्तवृद्धि, सर्वाङ्ग में होनेवाला कुष्ठ रोग, पथरी रोग, मकड़ी के विष में, सन्निपात में, सर्प के काटने पर, बिच्छू के काटने पर, हाथ-पैर के किसी भी रोग में यह सूतकादि योग बहुत उत्तम है ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है । २६ - क्षयकासादौ अग्निरसः सूतं द्विगुणगंधेन मदयेत् कज्जलीं यथा । तयोः समं तीक्ष्णचूर्ण कुमारीवारिणाद्भुतम् ॥१॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat २१ www.umaragyanbhandar.com

Loading...

Page Navigation
1 ... 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132