Book Title: Vaidyasara
Author(s): Satyandhar Jain
Publisher: Jain Siddhant Bhavan

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Page 106
________________ ८४ वैद्य-सार चतुरशीतिवातेषु योजयेन्नान संशयः॥ अमृतसंजीवनो नाम पूज्यपादेन भाषितः॥४॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म, शुद्ध घिष, चित्रक, तेजपत्र, पायविडंग, रेणुका बीज, नागर मोथा, छोटी इलायची, पीपरामूल, नागकेशर, सोंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, तामे की भस्म, इन सबका बराबर-बराबर लेकर सबके दुगुना पुराना गुड़ लेकर गोली बनावे तथा प्रातःकाल में अनुपान-विशेष से सेवन करे तो श्वास, खांसी, राजयक्ष्मा, प्रमेह, शूलोदर, पांडु रोग, बवासीर तथा ८४ प्रकार के वायु रोग शांत होते हैं । यह अमृतसंजीचन रस भी पूज्यपाद स्वामी ने कहा है। १२३-विबंधे नाराचरसः अष्टौ निस्तुषदंतिवीजशुद्ध भागत्रयं नागर । द्वे गंधे मरिचं च टंकणरसौ भागैकमेकं पृथक् ॥ गुआमात्रमिदं विरेचनकर देयं च शीतांबुना । गुल्मप्लीहमहोदरादिशमनो नाराचनामा रसः॥१॥ टीका-आठ भाग शुद्ध जामालगोटाके वीज तीन भाग सोंठ, दो भाग शुद्ध गन्धक, काली मिर्च, सुहागा, शुद्ध पारा एक-एक भाग खरल में डाल कर खूब घोंटे तथा एक-एक रत्ती की मात्रा से शीतल जलके अनुपान से सेवन करावे तो इस से गुल्म, प्लीहा और उदररोग शांत होता है। १२४-शीतज्वरे शीतमातंगसिंहरसः रसविषशिखि तुत्थं खर्परं चैकभागम् । अनलद्विकसमानभागमेतत्क्रमेण ॥ कनकदलरसेन पीतगुंजैकमात्रः । परिमितगुटिकः स्यात् शीतमातंगसिंहः ॥ १ ॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध विषनाग तूतिया की भस्म, खपरिया भस्म एक-एक भाग, चित्रक दो भाग इन सब को एकत्रित करके धतूरेके रस से .घोंटै तथा एक-एक रप्ती प्रमाण सेवन करे तो इससे शीतज्वर दूर होवे। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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