Book Title: Vaidyasara
Author(s): Satyandhar Jain
Publisher: Jain Siddhant Bhavan

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Page 121
________________ वैद्य-सार पूर्णचन्द्ररसो नाम मासैकं भक्षयेत् सदा । अश्वगंधापलाध च गवां क्षीरं पिबेदनु ॥ २॥ शाल्मलीपुष्पचूर्ण वा तौदैः कः लिहेदनु । दुर्बलो बलमादत्ते मासकेन यथा शशी ॥ टीका-पारे की भस्म, अभ्रक भस्म, लौह भस्म, शुद्ध शिलाजीत वायविडंग, माक्षिक भस्म, शहद तथा घी इन सब को बराबर लेकर एकत्रित कर के तैयार करले। यह पूर्णचन्द्ररस एक माह तक सेवन करने से तथा इसके ऊपर २ तोला असगंध गाय के दूध में डाल कर पीने से अथवा सेमल के फूल का चूर्ण १ तोला शहद के साथ खाने से दुर्बल मनुष्य बल को प्राप्त होता है। १५०-उन्मत्ताख्यनस्यम् रसगंधं समांशं तु धतूरफलजैवैः । मर्दयेहिनमेकं तु तत्समं त्रिकटु क्षिपेत् ॥१॥ उन्मत्ताख्यो रसो नाम्ना नस्यं स्यात् सन्निपातजित् । टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक दोनों बराबर-बराबर लेकर धतूरे के फलों के रस से एक दिन भर खूब घोटे, फिर पारा और गंधक के बराबर ही उसमें सोंठ, काली मिर्च तथा पीपल डालकर घोटे, जब आंख में आँजने के योग्य अञ्जन के सदृश हो जाय तब यह उन्मत्तरस नाम का नस्य तैयार समझे। इस नस्य को सन्निपात की दशा में सुंघाने से मूर्छा दूर हो जाती है। १५१-कृष्णादौ महारसायनः कांतमभ्रकचूर्णानि शिलामाक्षिकगंधकं । तालकं शुल्वचूर्णानि टंकणं कुनटीयुतं ॥१॥ पारदं नागभस्मानि त्रिफला तीक्ष्णलौहकं । बाकुचीबीजकं भृगं सर्व चूर्णसमं युतं ॥२॥ भक्षयेन्मधुसर्पिाम् विभिमंडलसंयुतं । अष्टादशानि कुष्ठानि सप्त चैव महातयाः॥३॥ स्नेहवातादिताः गुल्माः ते च सर्वभगंदराः। दशाष्ट योनिदोषाश्च त्रिदोषा यान्ति चान्तगं॥४॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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