Book Title: Vaidyasara
Author(s): Satyandhar Jain
Publisher: Jain Siddhant Bhavan

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Page 127
________________ वैद्य-सार १०५ १६०-त्रिदोष-पारदादियोगः पारदं द्विरदं गंधं कृत्वा भागोत्तरं क्रमात् । नीलवीजश्च भागैकं मर्दयेत्खल्वके बुधैः ॥१॥ विजयाकनकव्योषैः सप्तवारेण मर्दयेत् । आर्द्रकैः मधुपिप्पल्ल्या दीयते वलमात्रया ॥२॥ त्रिदोषं सन्निपातं च नाशयेद्विषमज्वरम् । शीतोपचारः कर्तव्यः मधुराहारसेवनं ॥३॥ सर्वज्वरविषघ्नोऽयं पूज्यपादेन भाषितः। टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध गंधक क्रम से १, २, ३ माग, नील के बीज १ भाग लेकर खरल में भांग तथा धतूरा के पत्ते के स्वरस से तथा सोंठ, मिर्च, पीपल के काढ़े से अलग-अलग सात-सात बार मर्दन करे और अदरख, शहद् तथा पीपल के साथ तीन-तोन रत्ती को मात्रा से देवे तो त्रिदोष, सन्निपात, विषमज्वर को नाश करता है। यदि कुछ गर्मी मालूम हो तो ऊपरी शीतोपचार करना चाहिये और मधुर रस का आहार करना चाहिये। यह सब प्रकार के ज्वरों को नाश करनेवाला योग पूज्यपाद स्वामी ने कहा है। १६१-सर्वरोगे मृत्युञ्जयरसः भागैकं मरिचं च लौहकरसौ गंधस्य भागद्वयं । लौहे न्यस्य गवां घृतेन गुटिकामेतां पचेत्पावके ॥१॥ तालं वै समभागकं प्रविददेन म्लेच्छं शराशंविषं। सर्वार्ध जयपालकं च कुटकीक्वाथेन दध्यंबुना ॥२॥ भाव्यं सूर्यमितं तथाकरसैः त्रिसप्तकृत्वः दूदैः। संमतपशोषितं शतदलैः पुष्पैः समभ्यर्चयेत् ॥३॥ योज्यं गुंजमिते ज्वरे च सहसा सामे निरामेऽथवा । जीर्णे वा विषमे समीरणभवे पित्तोत्थिते श्लेष्मजे ॥४॥ द्वन्द्वोत्थेषु च संनिपातजनिते शोकज्वरे चोल्वणे । शैत्ये स्वेदयुदग्निमांद्यजनिते रोगे च शोफैर्युते ॥५॥ --- Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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