Book Title: Vaidyasara
Author(s): Satyandhar Jain
Publisher: Jain Siddhant Bhavan

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Page 132
________________ वैद्य-सार जीवंतिकाबालुकमेघनादाः एषां रसानां सुरसैः सुपिष्य / कस्तूरिकाचंदनकेन सार्ध निधाय शुल्वे वहुशोषयेत्तथा // 2 // निक्षिप्य भांडोदरके पिधाय पचेत् क्षणं मंदहुताशनेन। टीका-रस सिन्दूर, 5 भाग, समुद्रफल 8 भाग, शुद्ध विषनाग 1 भाग, इन तीनों को मिलाकर नीचे लिखी वस्तुओं के रस से मर्दन करे:-जंबीरी नींबू, गाय का दूध, नारियल का पानी, चंदन का काढ़ा, अडूसा का स्वरस, जीरे का काढ़ा, जीवंतीका-स्वरस, सुगंधबाले का काढ़ा, चौलाई का स्वरस इन सब के स्वरस से अलग-अलग भावना देकर कस्तूरी करके मन्द-मन्द अग्नि से पकावे। जब वह अत्यन्त शुष्क हो जावे तब तैयार हुआ समझे। यह शीतज्वर में हितकारी है। इसकी मात्रा 1 माशे की है। नोट-यह मात्रा अधिक है। वैद्य महाशयों को चाहिये कि रत्ती के प्रमाण में देखें। १७२-पारदादि-योगः . पारदं द्विरदं गंधं सद्धिमं क्रमवृद्धिना। सर्व च मर्दयेत् खल्वे कनकस्वरसेन च // 1 // विजयास्वरसैर्वापि व्योषस्य क्वथनेन वा / सप्तवारं पृथक्कृत्य मर्दयेत् गुंजमात्रया // 2 // आर्द्रकैः मधुपिप्पल्या विदोषं सन्निपातकम् / / सर्वज्वरहरश्वाशु सर्वव्याधि विनाशनः // 3 // शीतोपचारः कर्तव्यः मधुराहारसेवनम् / योगोऽयं ज्येष्ठसिद्धश्च पूज्यपादेन भाषितः // 3 // टीका-शुद्ध पारा 1 भाग, शुद्ध हिंगुल 2 भाग, शुद्ध गंधक 3 भाग, शुद्ध विष 4 भाग लेकर इन सब को खरल में डालकर धतूरे के रस से 7 बार, भांग के स्वरस से 7 बार, त्रिकटु के स्वरस से 7 बार भावना देवे और 2 रत्ती के प्रमाण से अदरख तथा पीपल के साथ देवे तो त्रिदोष सन्निपात भी शांत हो। यह सब प्रकार के ज्वरों एवं सर्व व्याधियों को नाश करनेवाला है। इसके सेवन करने के बाद शीतोपचार करना चाहिये। यह श्रेष्ठ तथा सिद्धयोग पूज्यपाद स्वामी ने कहा है। . Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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