Book Title: Vaidyasara
Author(s): Satyandhar Jain
Publisher: Jain Siddhant Bhavan

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Page 117
________________ वैद्य-सार १४१-अर्शनाशकयोगः देवदाल्याश्च बीजानि सैंधवं निंबबीजकम् । तक्रण पेषितं सर्व मर्शरोगनिकृन्तनम् ॥ देवदाल्याः कषायेण चार्मोघ्न शौचमाचरेत् । गुडस्य स्वरसेनैव शांतिमाप्नोति निश्चितम् ॥ टीका-देवदाली ( यह बहुत कड़वी होती है, इसमें फल लगते हैं और बोज होते हैं ) के बीज, सेंधा नमक तथा नीमके बीज इन सब को बराबर-बराबर लेकर मही के साथ पीस कर इनको सेवन करे तो अवश्य ही बादी बवासीर को लाभ हो तथा देवदार का काढ़ा बना कर उससे एवं गुड़ के स्वरस से भी शौच (आबदस्तलेवे ) करे तो लाभ हो। १४२-ज्वरातीसारे आनंदभैरवरसः हिंगुलं वत्सनाभं च व्योषं टंकणं कां । मर्दयेच्चाकेणैव रसोऽह्यानंदभैरवः ॥१॥ गुंजैकं वा द्विगुंजं वा बलं ज्ञात्वा प्रयोजयेत् । मधुना लेहयेच्चानु कुटजस्य त्वचं तथा ॥२॥ तच्चूर्ण कर्षमात्रं तु त्रिदोषोत्थातिसारजित्। पूज्यपादप्रयोगोऽयं रसश्वानंदभैरवः ॥३॥ टीका-शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध वत्सनाभ सोंठ, मिर्च, पीपल, सुहागा इन सब को बराबर बराबर लेकर अदरख के रस के साथ गोली बांध लेधे और फिर इसको एक रत्ती अथवा दो रत्ती प्रमाण से रोगी का बलाबल देख कर देवे और उसके बाद कुरैया की छाल का चूर्ण १ तोला बलाबल के अनुसार कमी-बेशी मधु के साथ चटावे तो इससे विदोषजन्य अतीसार भी शांत होता है। यह आनंद भैरवरस पूज्यपाद का कहा हुआ है। १४३-अर्शरोगे अर्शनाशक-लेपः पोरनालेन संपिष्य सबीजां कटुतुंबिका । सगुडां हंति लेपेन चार्शीसि मूलतो गुढं ॥१॥ टीका-बीज सहित कड़वी तुमरियाको कांजी (मही-छांछ) के साथ पीसकर उसकी लुगदी में पुराना गुड़ मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लेप करने से मस्से जड़ से कट जाते हैं। .. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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