Book Title: Tirthankar 1978 11 12
Author(s): Nemichand Jain
Publisher: Hira Bhaiyya Prakashan Indore

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Page 249
________________ 'यह गणद्रोह नहीं, राज्य-द्रोह निश्चय है, क्योंकि राज्य जहाँ गण का नहीं, गण- राजन्यों का हो, वहाँ राजद्रोह अवश्यम्भावी है। और जानें चेटकराज, यह द्रोह नहीं, विद्रोह है । यह स्थापित जड़ीभृत वाद और व्यवस्था का प्रतिवाद है। जड़त्व के अवरोध को अनिर्वार चैतन्य सदा तोड़ेगा ही । इसी का नाम रक्त क्रान्ति है । यह सृष्टि और इतिहास का स्वाभाविक तर्क है । यह सत्ता की अदम्य प्रज्ञा और प्रक्रिया का प्रकटीकरण है । 'और जानें महाराज, महावीर पहल है, वह केवल परिणाम नहीं । जो नितान्त अकर्ता है, वही सर्वोपरि कर्ता है। वह अनायास, अकारण सिर्जनहार और विसर्जनहार है, एक ही बिन्दु पर । वह एक ही क्षण में उत्पाद, विनाश, ध्रुव तीनों है । 'और सुनें राजन्, महावीर स्वपक्षी भी नहीं, विपक्षी भी नहीं, वह प्रतिपक्षी है । जहाँ सारे पक्ष और वाद समाप्त हैं, वहीं महावीर का आरम्भ है । वह सर्वपक्षी है, समपक्षी है, और कोई पक्षी नहीं। वह कुछ करता नहीं, वह केवल होता है, जो उसे होना चाहिये, जो उसका स्वरूप है, स्वभाव है । और सहसा ही भगवान के स्वर में अंगिरा दहक उठे : 'लेकिन उस महासत्ता के सम को जो भंग करता है, वह उसके विस्फोट की ज्वाला में भस्मसात् हो कर ही रहता है । चैतन्य केवल शामक ज्योति ही नहीं, वह संहारक ज्वाला भी है। वही आत्मा को परम शान्ति में सुला देती है, और वही कर्म - कान्तार को जला कर ख़ाक कर देती है। श्रेणिक ने महासत्ता के मस्तक पर अपने अहंकार का सिंहासन बिछाना चाहा था । वह समत्वासीन यशोधर मुनि के रूप में महावीर के संहार तक को उद्यत हुआ । उसने परमसत्ता के ज्वालागिरि को ललकार कर जगाया । तो उसे सागरों पर्यन्त नरकाग्नि में जलना होगा । महासत्ता कुछ नहीं करती, अपना विनाश और नरक हम स्वयम् पैदा करते हैं । वैशाली ने अपना नरकानल स्वयम् भड़काया है । उसका दोष औरों पर डाल कर, कब तक अपने धर्मात्मापन को बचाते रहेंगे, राजन् ।' 'परचत्रियों ने ईर्ष्यावश हमारे युवानों को भड़का दिया है । युवानों ने गण को भड़का दिया है । क्रान्ति के नाम पर स्वच्छन्दाचार, भ्रष्टाचार, अनाचार फैल रहा है सारे जनपद में जन-जन भ्रष्ट और अनाचारी होता जा रहा है। घूसखोरी, कालाबाज़ारी, चोरबाज़ारी आज यहाँ आम दस्तूर हो गया है । इस भ्रष्टाचार का उत्तरदायी कौन ?' 1 श्री भगवान मेघ मन्द्र स्वर में गरज उठे : 'वे, जो सत्ता की मूर्धा पर बैठे हैं। वे ही यदि स्वच्छ न हों, तो शासन कैसे स्वच्छ रह सकता है, महाराज । और शासन स्वच्छ न हो, तो प्रजा कैसे स्वच्छ रह सकती है। पहले शासक भ्रष्ट होता है, तब प्रजा भ्रष्ट होती है । भ्रष्टाचार तीर्थंकर : अप्रैल ७९/२५ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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