Book Title: Taporatna Mahodadhi
Author(s): Bhaktivijay
Publisher: Atmanand Jain Sabha

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Page 14
________________ तपोरत्नमहोदधि ॥१२॥ SROAMRAP56 wwwwwww एवं समिल्य विद्वद्भिस्तपाश्रेणिः प्रदर्शिता । कार्य न साधुसाध्वीभिः प्रतिमावायुपासकैः तपमहिमाकृतोपधानः सम्यक्त्वधारिभिः फलदं तपः । नोह्या योगा गृहस्थैव शेषं सर्व तपोऽपि हि ॥१२॥ तपविधान विधेयं श्रावकै शान्तः श्राविकाभिस्तथाविधम् । शान्तोऽल्पनिद्रोऽल्पाहारो निःकामो निकषायकः॥ १३ ॥ धीरोऽन्यनिन्दारहितो गुरुशुश्रूषणे रतः । कर्मक्षयार्थी प्रायेण रागद्वेषविवर्जितः ॥ १४॥ दयालुर्विनयापेक्षी प्रेत्येहफलनिःस्पृहः । क्षमी नीरुक निरूत्सेको जीवस्तपसि युज्यते अर्थ-आ प्रमाणे विद्वानोए एकत्र थइने तपस्याओनो समूह बताव्यो छे. साधुओए, साध्वीओए तथा जेमणे प्रतिमा है वहन करी होय, जेमणे उपधान कर्या होय अने जेमणे समकित धारण कयु होय एवा श्रावकोए फळनी अपेक्षावाळी बप. स्याओ करवी नहीं. वळी गृहस्थाश्रमीओए योगोद्वहन करवू नहीं, (मुनिए करवू ) अने बाकीनां सर्वे सपो शांत गुणवाळा श्रावकोए तथा श्राविकाओए करवां. शांत, अल्पनिद्राबाळो, अल्पाहारी, कामना रहित, कषायवर्जित, धैर्ववान, अन्यनी निंदा नहीं करनार, गुरुजननी शुश्रूषा( सेवा )मां तत्पर, कर्मक्षय करवानो अर्थी, प्राये राग द्वेष रहित, दयालु, बिनयनी अपेक्षावाळो, परलोक तथा आ लोकना फलनी इच्छा रहित, क्षमावान, नीरोगी अने उत्कंठा रहित एवो जीव तप करवाने लायक छे. ११-१५. पाण्मासिके वार्षिके च मासोव॑तपसि स्फुटे । त्यक्तं प्रतिष्ठादीक्षासु कालं तस्मिन्नपि स्यजेत् ॥१६॥ अर्थ-प्रतिष्ठा तथा दीक्षामां जे का तजेलो छे, ते काळ छमासी तपमां, वर्षी तपमा, तथा एक मास करता अधिक ५ ॥१ RADINGSADRAKAR ww Jain Education For Private & Personal use only www.jainelibrary.org

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