Book Title: Taporatna Mahodadhi
Author(s): Bhaktivijay
Publisher: Atmanand Jain Sabha
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कर्मचतुर्थ
तप.
तपोरत्न- दत्तिओनी संख्या थाय छे." महोदधि उद्यापनमां मोटी स्नात्र विधिपूर्वक जिनश्वरनी पूजा भणावची. विविध प्रकारनां पक्वात्र, फळ, रुपानाणुं विगेरे देव ॥१०९॥ पासे ढोकवा. संघवात्सल्य, संघपूजा करवी. आतपर्नु फळ मोक्षमार्गनी प्राप्ति थाय ते छे. आ श्रावकने करवानो आगाढ तप छे. "ॐ नमो अरिहंताणं " पदनी नवकारवाली वीश गणवी. साथीआ विगेरे बार बार करवा.
८४ कर्मचतुर्थ तप. उपवासत्रयं कुर्यादादावन्ते निरन्तरम् । मध्ये पष्टिमिताः कुर्यादुपवासांश्च सान्तरान् ।।१।। कर्मना खंडनने माटे जे चतुर्थ एटले उपवास करवो ते कर्मचतुर्थ तप कहेवाय छे. तेमा प्रथम त्रण उपवास (अट्ठम) करीने पारणुं करवू. पछी एकांतरा साठ उपवास करवा, पछी छेडे त्रण उपवास (अट्ठम ) आंतरा रहित करवा. ए प्रमाणे उपवास ६६ तथा पारणा दिन ६२ कुल १२८ दिवसे आ तप पूरो थाय छे. उद्यापनमा मोटी स्नात्र विधिपूर्वक रुपानुं वृक्ष तथा सुवणेनो कुहाडो करावी देव पासे ढोकवो. नाना प्रकारना पक्वान्न फळ विगरे ढोकवां संघवात्सल्य संघपूजा करवी. आ तपनुं फळ कर्मनो नाश थाय ते छे. "ॐ नमो अरिहंताणं" पदनी नवकारवाळी वीश गणवी. साथीया विगेरे बार बार करवा.
८५ नवकार तप (नानो). कृवा नवैकभक्तानि तदुद्यापनमेव च । शक्तिहीनैविधेयं च पूर्ववत्तत्समापनम् ॥ १॥ नवकारना फळने आपनार होवाथी आ नवकार तप कहेवाय छे. तेमां शक्तिहीन मागसे नंबर ४१ वाळा तपमा रह्या प्रमाणे
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