Book Title: Taporatna Mahodadhi
Author(s): Bhaktivijay
Publisher: Atmanand Jain Sabha

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Page 157
________________ RECE पोरत्नमहोदधि ॥१२५॥ अष्टकर्मोत्तर प्रकृति तप. ८० अगुरुलघुनामकर्मरहि. ८१ तीर्थकरनामकर्मरहि. ८२ निर्माण नामकर्मरहि. ८३ उपघातनामकर्मरहि. ८४ त्रसनामकर्मरहि. ८५ बादरनामकर्मरहि. ८६ पर्याप्तिनामकर्मरहि. ८७ प्रत्येकनामकर्मरहि. ८८ स्थिरनामकर्मरहि. ८९ शुभनामकर्मरहि. ९. सौभाग्यनामकरहि. ९१ सुस्वरनामकर्मरहि. | ९२ आदेयनामकमरहि. ९३ यशोनामकर्मरहि ९४ स्थावरनामकर्मरहि. ९५ सूक्ष्मनामकर्मरहि० ९६ अपर्याप्तिनामकर्मरहि० ९७ साधारणनामकर्मरहि. ४.९८ अस्थिरनामकर्मरहि. ९९ अशुभनामकर्मरहि. १०० दौर्भाग्यनामकर्मरहि. दुःस्वरनामकर्मरहि १०२ अनादेयनामकमरहि. १०३ अयशेनामकर्मरहि० अथवा " श्रीअरूपिनिरंजनगुणसंधुताय सिद्धाय नमः" एटलुज गणवं. साथीया विगरे १०३-१०३ __ गोत्रकर्मनी प्रकृति २. १ उच्चैर्गोत्ररहिताय श्रीगुरुलघुगुणसंयुताय सिद्धाय नमः। २ नीच्चैगोत्ररहिताय श्रीगुरु० अथवा मात्र " श्रीगुरुलघुगुणसंयुताय सिद्धाय नमः" एटलं गणवू. साथीया विगरे चे बे करवा. अंतरायकर्मनी प्रकृति ५. १ दानान्तरायकर्मरहिताय श्रीअनन्तवीर्यगुणसंयुताय सिद्धाय नमः । २ लाभान्तरायकर्मरहि • RRIEREGNOCRECRECORRECE maraGUSTITUTERam e Jain Education interna For Private & Personal use only www.jainelibrary.org

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