Book Title: Taporatna Mahodadhi
Author(s): Bhaktivijay
Publisher: Atmanand Jain Sabha
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पोग्नमहादधि ।।१४४॥
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११८ नव निधान तप. (ला. वि.प्र.)
तनव निषान आ तप शुक्लपक्षनी नव नवमीने दिवसे उपवास करवाथी पूर्ण थाय छे. गणणुं नीचे प्रमाणे.
श्री नैसर्गनिधानाय नमः श्री सर्वरक्तकनिधानाय नमः श्री महाकालनिधानाय नमः श्री पांडुकनिधानाय नमः श्री महापद्मनिधानाय नमः श्री माणवनिधानाय नमः
श्री पिंगलनिधानाय नमः श्री कालनिधानाय नमः श्री शंखकनिधानाय नमः आ तपथी निधाननी प्राप्ति थाय छे. साथीया विगैरे नव नव करवा. उद्यापने प्रभुने नव अंगे तिलक चडाववा.
११९ मोटा दश पच्चख्खाण. (पं. त. विगेरे.) पहेले दिवसे तीविहारो उपवास करवो. बीजे दिवसे एकासगुं. श्रीजे दिवसे एक चोखार्नु आंबिल एटले एक चो-16 | खानो दाणो गळवो अने ठाम चोविहार. चोथे दिवसे नीवी. पांचमे दिवसे एक कवळ, ठाम चोविहार. छठे दिवसे एक अं.
गीयु एकास' एटले एक हाथ अने मोढा सिवाय बीजु अंग हलाववं नहीं. ठाम चोविहार करवो. सातमे दिवसे दचिर्नु आं. | बिल, ठाम चोविहार. आठमे दिवसे आंबिल तीविहार. नवमे दिवसे परघरीयुं एकासj. ठाम चोविहार. तथा दशमे दिवसे खाखरीयु आंबिल एटले मात्र खाखरा ज खावा, ठाम चोविहार करवो. गणणु साथिया विगेरे नीचे प्रमाणे.सा० ख. लो० नो०
सा० ख० लो• नो. १ श्री समकितपारंगताय नमः ६७-६७-६७-२० २ श्री अक्षयसमाकिताय नमः १७-१७-१७-२. है॥१४॥
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