Book Title: Taporatna Mahodadhi
Author(s): Bhaktivijay
Publisher: Atmanand Jain Sabha
View full book text
________________
तषोरत्नमहोदधि ॥१३॥
तपमहिमातप विधान
SHARESHOBHADANA
वखतना तपना प्रारंभमां पण तजवो.१६
शुभे मुहूर्ते प्रारब्धे कांडान्यायांतु यान्तु च । पक्षमासदिनाद्वानि न पश्येत्तत्र दूषणम् ॥१७॥ &ा अर्थ-शुभ मुहूर्ते तपनो प्रारंभ कर्या पछी पखवाडीयु, महिनो, दिवस के वरस अशुभ आवे ने जाय तोपण तेमां कांड | दोष नथी. १७.
मृध्रवचरक्षिरे वारे भौम शनि विना | आघाटनतपोनन्द्यालोचनादिषु मं शुभम् ।।१८॥ ॐा अर्थ-प्रथम विहार, तप, नंदी अने आलोयणने विषे मृदु, ध्रुव, चर अने क्षिप्रं ए संज्ञावाळा नक्षत्रो शुभ छ, तथा | मंगळ अने शनि सिवायना बीजा वारो शुभ छे. १८.
क्रियमाणे तपस्यन्तस्तपः पुण्यतिथौ यदि । आयाति नियमात्कार्य दुर्लध्यो नियमः सताम् ॥ १९॥ प्रवर्धमानं संस्थाप्य पश्चात्तत्क्रियतां तपः । तपोमध्ये तपाकार्ये गरिष्ठं तप आचरेत् ॥ २० ॥
अवशेषं लघुतपः कार्य पश्चात्ततोऽपि हि।। अर्थ-तप करतां वचमां जो पर्वतिथिनो तप आवे तो वधता (मोटा) तपने राखी मूकीने ते पर्वतिथिनो तप अ. वश्य करवो. अने चालतो आवतो मोटो तप पछीथी करवो. कारण के सत्पुरुषनो नियम दुलंध्य छे. वळी एक तपना मध्यमां
१ मृगशिर, चित्रा, अनुराधा, रेवती. २ रोहिणी, उत्तरा त्रण. ३ पुनर्वसु, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा. ४ अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिनित.
CORRECECAP
Jain Education International
For Private
Personal Use Only
www.jainelibrary.org

Page Navigation
1 ... 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 ... 204