Book Title: Taporatna Mahodadhi
Author(s): Bhaktivijay
Publisher: Atmanand Jain Sabha
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तपोरत्नमहोदधि ॥१०६॥
८१ अखंड दशमी तप.
अखंड दशशुक्लासु दशसंख्यासु निजशक्त्या तपोविधिम् । विदधीत ततः पूर्ति तस्य संपद्यते क्रमात ॥१॥ 13मी तप तथा
अखंडित दशमीने दिवसे जे तप करवामां आवे तेनुं नाम अखंड दशमी तप कहेवाय छे. तेमां दश शुक्ला दशमीने दिवसे परत्र पाली पोतानी शक्ति प्रमाणे एकासणादिक तप करवो, तेथी ते तप पूर्ण थाय छे. (तपने दिवसे अखंड अन्ननु भोजन करवु. एटले
तप. के मुशळवडे नहीं खांडेला एवा चोखार्नु भोजन करवू.) उद्यापने दश दश पक्वान्न, फळ, रुपाना' विगेरे देव पासे ढोकवं. अखंड अक्षतर्नु नैवेद्य मूक. अखंड (नवू ) वस्त्र गुरुने वहोरावq. चैत्यनी फरती घीनी त्रण धारा अखंड करवी. (प्रभुनी हैं प्रतिमा एक मोटा तासमा बिराजमान करी, सवापांचशेर घी लई तेनी अखंड धारावाडी जरा मात्र पण धार त्रुटे नहीं ते रीते। प्रतिमाजी फरती करवी.) संघवात्सल्य, संघपूजा करवी. आतपर्नु फळ अखंड सुखनी प्राप्ति थाय छे. आ श्रावकने करवानो आगाढ तप छे. "नमो अरिहंताणं" पदनी नवकारवाळी वीश गणवी. साथीया विगरे बार बार करवा.
८२ परत्र पाली तप. : पञ्च वर्षाणि वीरस्य कल्याणकसमापितः । उपवासत्रयं कृत्वा द्वात्रिंशदरसांश्चरेत् ॥ १॥ परलोकने विष पालना जेवू जे तप ते परत्र पाली तप कहेवाय छे. तेमां श्री महावीरस्वामीना कल्याणकोनी समाप्तिथी १ नं.ब बिगेरे प्रतिओमां अखंड अन्न खावानुं लख्युं छे.
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