Book Title: Swadhyay Dohanam
Author(s): Kanakvijay Muni
Publisher: Vijaydansuri Granthmala

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Page 206
________________ 178 अध्याय-३ ] [स्वाध्यायदोहनजनकिल्बिषपादपपर्युतरं, सुरनाथनतं जगदर्तिहरम् । घनकर्मकृशानुपयोनिकरं, विशदाऽत्रियुगं किलपद्मवरम् ॥५॥ क्षितिमेरुमहीधरधैर्यधरं, प्रणतासुरकिन्नरदेवनरम् । सुकृतव्रजनिर्जरसत्शिखरं, तनुदीप्तिपरिहतसूर्यमरम् ॥६॥ जनताम्बुजकाननसत्भ्रमरं, मदनोद्धतवारणसिंहपरम् । भवकर्दमनाशननीरधरं, सुयशःसुकृतैकगुणप्रकरम् ॥७॥ अवनीतलविश्रुतकीर्तिभरं, कमलापतिसेवितसाधुवरम् । जितमारमुद्गतशेषदरं, गुणनीरधिमानतदेवनरम् ॥८॥ इत्थं पार्श्वजिनोत्तमं शिवकरं भक्त्या नुतं सजिनं, दुःपापाम्बुधिशोषणे घटभवं, भास्वत्कलाभाजनम् ॥ श्रीमद्वाचकभानुचंद्रचरणद्वंद्वैकसेवावशात् । सद्यस्कंवरऋद्धिचंद्रशिशुना सत्पद्यबंधेन वै ॥९॥ याकिनीमहत्तरासूनु आचार्य श्री हरिभद्रसूरिकृतम् श्री जिनप्रतिमास्तोत्रम् नमिउणं सव्वजिणे, सिद्धेसूरी तहा उवज्झाए । साहू अ जुगप्पवरे, वुच्छं जिणकिलहं भत्तो ॥१॥ चुलसिलखसहसा, सगनवइतिवीसऊडलोगंमि । कोडीओ सत्तलरका, बावत्तरि भवणवासीसु ॥२॥

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