Book Title: Sramana 1997 10
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 33
________________ 32 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ लिटरेचर आव जैनाज' में तद्सम्बद्ध विवरण अत्यन्त भ्रामक है। उनके द्वारा अलग-अलग अध्ययनों की दी गई गाथाओं का योग ६६ ही होता है। 'गवर्नमेण्ट कलेक्शन' में प्रदत्त अलग-अलग अध्ययनों की गाथाओं का योग १४४ ही है, १५४ तो मुद्रण दोष है । जो इस उद्धृत् विवरण से भी स्पष्ट है"This work ends on fel.5; 154 gathas in all; Verses of the different sections of this nijjutti corresponding to the ten sections of Daśāśrutaskandha are separately numbered as under: असमाहिट्ठाणनिज्जुत्ति सबलदोसनिज्जुत्ति आसायण निज्जुत्ति गणिसंपयानिज्जुत्ति चित्तसमाहिट्ठाणनिज्जुत्ति उवासगपडिमानिज्जुत्ति भिक्खु पडिमा निज्जुत्ति पज्जोसवणाकप्पनिज्जुत्ति मोहणिज्जठाणनिज्जुत्ति आयतिट्ठाण निज्जुत्ति 99 Verses ३ १० Jain Education International ७ ४ ११ ८ ६७ ८ १५ 11 11 11 For Private & Personal Use Only " of 11 11 सही योग..... (99+३+ . १४४) जैन साहित्य का बृहद् इतिहास भाग - १० का विवरण भी सम्भवतः इसी स्रोत पर आधारित होने से तथ्य से परे हो गया है। इस प्रकार १५४ गाथाओं का उल्लेख वस्तुतः १४४ गाथाओं का ही माना जाना चाहिए। 11 . आचारदसाणं निज्जुत्ती ११६ । । गाथा १५४ ।।” .+१५ = कापडिया का बाद में लिखा गया ( कैननिकल लिटरेचर) विवरण स्वाभाविक रूप से अपने पूर्ववर्ती (गवर्नमेण्ट कलेक्शन) विवरण पर ही आधारित होगा या दोनों की सूचनाओं का स्रोत एक ही होगा। परन्तु मुद्रण- दोष ने विवरण को पूरीतरह असंगत बना दिया है। प्रथम दृष्टि में उनके विवरण से इस नियुक्ति में १२ अध्ययन होने क भ्रम हो जाता है । " ६, ११, ३, १०, ७, ४, ११, ८, ६,७८, और १५ साथ ही इन www.jainelibrary.org

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