Book Title: Sambodhi 1977 Vol 06
Author(s): Dalsukh Malvania, H C Bhayani, Nagin J Shah
Publisher: L D Indology Ahmedabad
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तरंगलोला
अह रूव-विम्हिय-मई नाऊण कहाए अंतरं भणइ । घरिणी कयंजलि-उडा संजम-नियमुज्जय अज्जं ।।१४ भगवइ सुओ धम्मो इणमवर ता पसीयह कहेह । सुसमिद्धि-सूयगमिणं कत्थुप्पण्णं सरीरं च ॥१५ किं च सुहं अणुभूयं नियय-घरे पइ-घरे य अज्जियए । केण य दुक्खेण इमा गहियाइसुदुक्करा वज्जा(?) ॥१६ इच्छामि जाणिउं भे एहि सव्वं जहाणुपुव्वीए । तो भणइ तरंगवई निय-चरियावेयणमजुत्त ॥१७ तह वि ह संसार-दुगंछणं ति अहरिस-पओस-मज्झस्था । निय-कम्म-विवाग-फलं कहेमि निसुणेह तं तुब्भे ॥१८
अस्थि उ बच्छा-देसे कोसंबीए पुरीए रम्माए । वासवदत्ता देवी-कंतो राया उदयणो त्ति ॥१९ तस्सासि नगर-सेट्ठी वयंसओ उसभसेणओ नाम । सुस्सावओ समिद्धो सम-चित्ता से पिया लच्छी ॥२० तस्सासि बालिया हं ओवाइय-लद्धिया पिया घरिणि । अट्ठण्डं पुत्ताणं पट्ठीए कणिट्ठिया जाया ।।२१ सुह-वडूिढया य गभट्ठमम्मि वरिसम्मि गाहिया कला है । सयमणुसुयण्णुहि य पिउणा सुस्साविया विहिया ।।२२ नय-जोब्वणं च पत्ता निख्वम रूवं तिविम्हिया बहुया । देस-प्पहाणिआ णं मज्झ-कए मग्गिया एंति ॥२३ ते सव्बे पडिसेहिय सासोबीया(?)णुवत्तओ ताओ । कुल-सील-रूव-सरिसं मज्झ किर वरं अपेच्छंतो ॥२४ पुप्फ वस्थाभरण खेल्लणयं सुंदरा य जे भक्खा । अम्मा-पियरो [तह भायरो] य सव्वं महं देति ॥२५ वि(१४५A)णएण गुरु जणो मे तूसइ दाणेण भिक्खुय जणो य । सुह-सीलयाए(?) सहि-जणो सेसो य जणो महुरयाए ॥२६ पोसध-कालेसु अहं बहुसो सामाइयं करेऊणं । जिण-वयण भावणत्थं गणिणीओ पज्जुवासामि ।।२७

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