________________
पूर्व रंग
एवमयमनादिमोह संतान निरूपितात्मशरीरं कत्वसंस्कारतयात्यन्तमप्रतिबुद्धपि प्रसभोजम्भिततत्वज्ञान ज्योतिर्नेत्रविकारीव प्रकटोद्घाटितपटलष्टसितिप्रतिबुद्धः साक्षात् द्रष्टारं स्वं स्वयंमेव हि विज्ञाय श्रद्धाय च तं चैवानुचरितकामः स्वात्मारामय्यास्यान्यदव्यासाप्रत्याख्यानं किं स्यादिति पृच्छनित्यं वाच्यः---
सव्वे भावे जम्हा पच्चक्खाई परेति णादणं । तह्मा पच्चक्खाणं गाणं यिमा सुव्वं ||३४||
८३
चूंकि सफल मावोंको, पर हैं यह जानि त्यागना होता । इस कारण निश्चयसे, प्रत्याख्यान ज्ञानको जानो || ३४||
सर्वान् भावान् यस्मात्प्रत्याख्याति परानिति ज्ञात्वा । तस्मात्प्रत्याख्यानं ज्ञानं नियमात् ज्ञातव्यं ||३४|| यतो हि द्रव्यांतरस्वभावभाविनोऽन्यान खिलानपि भावान् भगवज्ज्ञातृद्रव्यं स्वस्वभावभावाव्याप्यत्तया परत्वेन ज्ञात्वा प्रत्याचष्टे ततो य एव पूर्व जानाति स एव पश्चात्प्रत्याचष्टे न
नामसंज्ञ-- सब्व, भाव, ज, पर, इति, त, पञ्चकवाण, पाण, नियम । धातुसंज— पडि आ वखा कथने तृतीयगणे उपसर्गादर्थान्तरम, जाण अवबोधने, मुण ज्ञाने। प्रातिपदिक सर्वे, भाव, यत्, पर इति, तत् प्रत्याख्यान, ज्ञान, नियम । मूलधातु - प्रति आख्या प्रकथने उपसर्गादर्थं परिवर्तनम् नि यम परिवे
द्रव्यार्थिकनय ( २४ प्र ) ।
प्रयोग --- इन्द्रियविजय व मोहविजय करनेके लिये एकमात्र चैतन्यस्वभावकी आराधना का पौरुष करना चाहिये ||३३||
अनादिकालीन मोहसंतानसे निरूपित अप्रतिबुद्ध था, सो अब तत्त्वकिसी पुरुषके नेत्र में विकार
जैसेका तैसा दीखने लगा ) प्रतिबुद्ध हुआ तब माक्षात्
आगे कहते हैं कि इस तरह यह अज्ञानी जीव किये गये आत्मा और शरीरके एकत्वके संस्कारसे अत्यन्त ज्ञान स्वरूप ज्योति प्रकट होनेसे नेत्रके विकारकी तरह (जैसे या तत्र वर्णादिक अन्यथा दीखते थे, जब विकार मिट गया तब अच्छी तरह उघड़ गया है पटलरूप आवरण कर्म जिसका ऐसा देखने वाला अपने को अपनेसे ही जान श्रद्धान कर उसके आवरण करनेका इच्छुक हुआ पूछता है कि इस आत्मारामके अन्य द्रव्यों का प्रत्याख्यात ( त्यागना ) क्या है, उसका समाधान प्राचार्य करते हैं--- [ यस्मात् ] जिस कारण [सर्वान् भावात् ] अपने सिवाय सभी पदार्थ [परान्] पर [तस्मात् ] इस कारण [ज्ञानं ] प्रत्याख्यान है ।
हैं [इति ज्ञात्वा ] ऐसा जानकर [ प्रत्याख्याति ] त्यागता है पर हैं यह जानना ही [नियमात् ] निश्चयसे [ प्रत्याख्यानं ] तात्पर्य- अपने ज्ञानमें त्यागरूप अवस्था ही प्रत्याख्यान है ज्ञानका जाननरूप ही
--