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पूर्व रंग प्रतिपत्त्यात्मन्यध्यास्य शयानः स्वयमज्ञानी सन् गुरुणा परभावविवेकं कृत्वकौक्रियमाणो मक्षु प्रतिबुध्यस्वैकः स्वम्व समाधिमान्छौताह शृण्वन्नखिलश्चिन्हैः सुष्ठु परीक्ष्य निश्चितमेते परभावा इति ज्ञात्वा ज्ञानी सन् मुंचति सर्वान्परभावानचिरात् ।
अवतरति न यावद् वृतिमत्यंतवेगादनवमपरभावत्यागदृष्टांतहतिः ।
झटिति सकलभावरन्यदीयविमुक्ता स्वयमियमनुभूतिस्तावदाविर्वभूव ।।२६॥३५॥ पुरुषः-प्रथमा एक० कर्ता, परतव्यम्-प्रथमा एक० इदम्-प्रथमा एक०, इति-अव्यय ज्ञात्या-असमाप्तिकी किया, त्यजति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० क्रिया, तथा-अव्यय, सर्वान-द्वितीया बहु०, परभावान-हि० बहु०, ज्ञात्वा-असमाप्तिकी क्रिया, विमुंचति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० क्रिया, ज्ञानी--प्रथमा एकo कर्ता ॥३५॥ भेदविधिमें ज्ञान दर्शनादि गुणोंरूप व अभेदविधिमें चैतन्यस्वरूपमात्र अपनेमें अपनेको अनुभवना चाहिये ॥२५॥
आगे इस अनुभूतिसे परभाबका भेदज्ञान किस तरह हुग्रा, ऐसी माशंका करके प्रथम भावक जो मोहकर्मके उदयरूप भाव, उनके भेदज्ञानका प्रकार कहते हैं- [बुध्यते] जो ऐसा जाने कि [मोहः मम कोपि नास्ति] मोह मेरा कोई भी सम्बन्धी नहीं [एकः उपयोग एवं महं] एक उपयोग ही मैं हूं [तं] ऐसे जाननेको [समयस्य] सिद्धान्तके अथवा स्व-परस्वरूप के [विज्ञायकाः] जानने वाले [मोहनिर्मत्वं] मोहसे निर्ममत्व [विति] समझते हैं, कहते
तात्पर्य - मोहशून्य उपयोगमात्र अंतस्तत्त्वके जाननहारको मोहनिर्मम कहते हैं ।
टीकार्थ-मैं सत्यार्थरूपसे ऐसा जानता हूं कि यह मोह है, वह मेरा कुछ भी नहीं लगता है । निश्चयसे इस मेरे अनुभवमें फल देनेकी सामर्थ्य द्वारा प्रकट होकर भावकरूप हुए पुद्गलद्रव्य परमार्थसे परके भावके भावसे भाव्य नहीं कर सकते। यहां यह समझना कि स्वयमेव सब वस्तुओंके प्रकाश करने में चतुर विकासरूप हुई और जिसमें निरंतर हमेशा प्रताप सम्पदा पायी जाती है, ऐसी चैतन्यशक्ति, उस मात्र स्वभावभाव द्वारा भगवान प्रात्माको हो जाना जाता है कि मैं परमार्थसे एक चित्शक्तिमात्र हूं । इस कारण यद्यपि सब द्रव्योंके परस्पर साधारण एक क्षेत्रावगाह होनेसे मेरा पात्मा जड़के साथ श्रीखण्डकी तरह एकमेक हो रहा है तो भी श्रीखण्डकी तरह स्पष्ट स्वदमान स्वादभेदके कारण मोहके प्रति में निर्मम ही हूं, क्योंकि यह मात्मा सदाकाल ही अपने एकरूपताको प्रास हुमा अपने स्वभावरूप समय महलमें विराज रहा है । इस तरह भावकभावरूप भोहके उदयसे भेदज्ञान हुमा जानना ।।
भावार्थ-मोहकर्म जड़ पुद्गल द्रव्य है, इसका उदित कलुष (मलिन) भाव भी पुद्