Book Title: Samaysar
Author(s): Kundkundacharya, 
Publisher: Bharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir

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Page 695
________________ ६४४ समयसार अत्ता जस्सामुत्तो ण हु सो याहारयो हवइ एवं । थाहारो खलु मुत्तो जह मा सो पुग्गलमयो उ ॥४०५॥ णवि सक्कइ घित्तु जंण विमोत्तुजं य ज परदव्वं । सो कोवि य तस्स गुणो पाउगियो विस्ससो वावि ॥४०६॥ तह मा उ जो विसुद्धो चेया सो णेव गिण्हए किंचि । व विमुचइ किंचिवि जीवाजीवाण दवाणं ॥४०७॥ जिसके अमृतं प्रात्मा, वह प्राहारक कमी नहीं होता। क्योंकि श्राहार मूर्तिक, होता पौगलिक होनेसे ॥४०५।। जो अन्य द्रव्य उसकी, ग्रहरण विमोचन किया न जा सकता। ऐसा ही द्रव्योंका, प्रायोगिक बैखसिक गुण है ॥४०६॥ तब जो विशुद्ध आत्मा, वह जीव प्रजीव द्रव्य परमें से। कुछ भी ग्रहण न करता, तथा नहीं छोड़ता कुछ भी ॥४०७।। - नामसंज्ञ - अत्त, ज, अमुत्त, ण, हु, त, आहारअ, एवं, आहार, खल, मुत्त, ज, त, गुग्गलमअ, उ, मा, वि, ज, ण, ज, य, ज परद्दब्व, त, क, वि, य, त, गुण, पाजगिअ, विस्सस, वा, वित, उ, ज, विसुद्ध, स्वरूप है, अत: सम्यग्दर्शन, ज्ञान, संयम प्रादि सर्व आत्मपरिणमनोंसे ज्ञानका प्रभेद है। (७) पुण्यपापभावरूप परसमयको त्यागकर दर्शनज्ञान चारित्रस्थितिस्वरूप स्वसमयको पाकर समयसारभूत एक ज्ञानमात्र अन्तस्तत्त्वका अनुभव करना चाहिये । (८) ज्ञानमात्रका संचेतन होनेपर पाने योग्य सब पा लिया व छोड़ने योग्य सब छूट गया । सिद्धान्त-(१) प्रात्मा अभेद ज्ञानस्वभावमात्र है । (२) प्रात्मा समस्त परद्रव्यों व परभाबोंसे रहित है। दृष्टि-- १- शुद्धनय (४६, १६८) । २- परद्रव्यादिग्राहक द्रव्याथिकन य (२६) । प्रयोग---ज्ञानमात्र अन्तस्तत्त्वमें अवस्थित होनेके लिये अपनेको सर्व परद्रव्योंसे तथा परभावोंसे निराला निरखना ।। ६६०.४०४ ।।। अब प्रात्माकी अनाहारकता गाया कहते हैं:---[एवं] इस प्रकार [यस्य आत्मा अमूर्तः] जिनके प्रात्मा अमूर्तिक है स खलु] वह निश्चयसे [आहारकः न भवति] माहारक नहीं है [यस्मात्] क्योंकि [आहारः खलु मूर्तः] पाहार मूर्तिक है [स तु पुद्गलमयः] वह तो पुद्गलमय है । [यत् यत् परद्रव्यं] क्योंकि जो पर द्रध्यको [गृहीतुं च विमोमतुं नापि

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