Book Title: Samaysar
Author(s): Kundkundacharya, 
Publisher: Bharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir

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Page 703
________________ ६५२ समयसार मोक्खपहे अप्पाणं ठवेहि तं चेव झाहि तं चेय। तत्थेव विहर णिच्च मा विहरसु अण्णदब्वेसु ॥४१२॥ शिवपथमें प्रात्माको, थापो ध्याओ व अनुभवो उसको । उस ही में नित्य विचर, मल विचसे अन्य द्रव्यों में ॥४१२॥ मोक्षपथे आत्मानं स्थापय तं चैव ध्यायस्व तं चेतयस्व । तत्रैव विहर नित्यं मा विहापरिन्यद्रव्येषु ।।४१२।। मा संसारात्परद्रव्ये रागद्वेषादौ नित्यमेव स्वप्रज्ञादोषिएावतिष्ठमानमपि स्व प्रज्ञागुगनव ततो यावर्त्य दर्शनशानचारित्रेषु नित्यमेवावस्थापय अतिनिश्चलमात्मानं । तथा समस्तचिन्तान्तरनिरोधेनात्यंतमेकाग्रो भूत्वा दानजारिश राय . राधा कानुक काफलचेतनासंन्यासेन शुद्धज्ञानचेतनामयो भूत्वा दर्शनशानचारित्राण्येव चेतयस्व । तया द्रध्यस्वभाववशतः प्रतिक्षणविज़म्भमाणपरिणामतया तन्मयपरिणामो भूत्वा दर्शनशानचारिश्रेश्वेव विहर । तथा - नामसंज्ञ-...मोक्लपह, अप्प, त, च, एव, त, तस्थ, एव, णिच, मा, अण्णदछ । धातुसंज्ञ- दुद स्थापनायां, ज्झा ध्याने, चेय स्मृत्यों चेत करणावबोधनयोः, वि. हर हरणे उपसर्गादर्थपरिवर्तनम् । प्राशिपदिक-मोक्षपथ, आत्मन्, तत्, च, एव, तत्, तत्र, एव, नित्यं, अन्यद्रव्य । मूलधातु-प्ठा गतिनिवृत्ती प्रवर्त रहे अपने प्रात्माको प्रपनी बुद्धिके ही गुगसे उन परद्रव्योंसे याने राग-द्वेषसे छुड़ाकर दर्शनज्ञानचारित्र में निरन्तर अति निश्चलरूपसे स्थापित कर । तथा समस्त अन्य चिंतानोंके निरोधसे अत्यन्त एकाग्नचित्त होकर दर्शनज्ञानचारित्रका हो ध्यान कर । तथा समस्त कर्म और कर्मफलरूप.. चेतनाका त्याग करके शुद्धशानचेतनामय होकर दर्शनज्ञानचारित्रका ही अनुभव कर । तथा द्रव्य के स्वभावके वश प्रतिक्षण उत्पन्न हो रहे परिणामपनेसे उन परिणामों में तन्मय होकर दर्शन ज्ञान चारित्रमें ही विहार कर । तथा एक ज्ञानरूपको ही निश्चलरूप अवलंबता हुमा ज्ञेयरूपसे ज्ञान में उपाधिपनेके कारण सब प्रोरसे फैले हये परद्रव्योंमें किचित्मात्र भी बिहार मत कर । भावार्थ-परमार्थरूप प्रात्माके परिणाम दर्शन, ज्ञान और चारित्र हैं, वे ही मोक्षमार्ग हैं, उनमें ही पाल्माको स्थापित करो, उनका ही ध्यान करो, उन्हीं का अनुभव करो, और उन्हीं में प्रवों, अन्य द्रव्योंमें नहीं प्रवर्ती । केवल व्यवहारमें ही मूढ़ न रही यह प्राचार्यदेवका यहाँ उपदेश है। अब इसी अर्थको कलशरूप काव्यमें कहते हैं—एको मोक्ष इत्यादि। अर्थ-दर्शन ज्ञान चारित्र स्वरूप यही एक मोक्षका मार्ग है। जो पुरुष उसी में ठहरता है, उसको निरंतर ध्याता है, उसीका अनुभव करता है और अन्य द्रव्योंका स्पर्शन नहीं करता, उसीमें निरंतर प्रवर्तन करता है, वह पुरुष थोड़े हो कालमें जिसका नित्य उदय रहे, ऐसे समयसारके स्वरूप

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