Book Title: Samaysar
Author(s): Kundkundacharya, 
Publisher: Bharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir

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Page 644
________________ सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार परिणामेनोल्पद्यमानमात्मनः स्वभावेन श्वेतयतीति व्यवहियते । तथा चेतषितापि ज्ञानदर्शनगुणनिर्भरपरापोहनात्मकस्वभाव: स्वयं पुद्गलादिपरद्रव्यस्वभावेनापरिणममानः पुद्गलादिपरद्रव्यं चात्मस्वभावेनापरिणामयन् पुद्गलादिपरद्रव्यनिमित्तकेनात्मनो शानदर्शनगुणनिर्भरपरापोहनात्मकस्वभावस्य परिणामेनोत्पद्यमानः पुद्गलादिपरद्रव्यं चेतयितृनिमित्तकेनात्मनः स्वभावस्य परिणामेनोत्पद्यमानमात्मनः स्वभावेनापोहतीति व्यवह्रियते । एवमयमात्मनो ज्ञानदर्शनचारित्रपर्यायापरं निश्चयव्यवहारप्रकारः । एवमेवान्येषां सर्वेषामपि पर्यायाणां द्रष्टव्यः ।। शुद्धद्रयनिरूपणाप्तिमतेस्तत्त्व समुत्पश्यतो नकद्रव्यगतं चकास्ति किमपि द्रव्यांतरं जातुचित् । ज्ञानं ज्ञेयमवैति यत्तु तदयं शुदस्वभावोदयः किं द्रव्यांतरचुंबनाकुलधियस्तत्त्वाचव्यवंते जनाः ॥२१५॥ शुद्धद्रव्यस्वरसभवनाकि स्वभावस्य शेष मन्यद्रव्यं भवति यदि वा तस्य कि स्यात्स्वभावः । ज्योत्स्नारूपं स्नपयति भुवं नैव तस्यास्ति भूमिनि ज्ञेयं कलयति सदा ज्ञेयमस्यास्ति नैव ॥२१६। रागद्वेषद्वयमुदयते तावदेतन्न यावद् ज्ञानं ज्ञानं भवति न पुनर्णोधतो याति बोध्यं । ज्ञानं ज्ञानं भवतु तदिदं न्यकृताज्ञानभाव भावाभावो भवति तिरयन्येन पूर्णस्वभावः ।।२१७।। ।। ३५६. भणित:-प्रथमा एक कृदन्त । अण्णेसु अन्येषु-सप्तमी बहु० । पज्जएसु पर्यायेषु-सप्तमी बहु० । एमेव एवमेव एवं एव-अव्यय । णायवो ज्ञातव्य:-प्रथमा एकवचन कृदन्त क्रिया ।। ३५६-३६५ ।। ११- प्रात्मा परद्रव्य परिग्रहको व्यवहारसे त्यागता है, किन्तु वह त्याज्य पदार्थसे तन्मय नहीं होता। १२-प्रात्मा परद्रव्यका श्रद्धाता है, किन्तु वह श्रद्धेय पदार्थ से तन्मय नहीं होता । १३-मात्माके सभी गुण पर्यायोंकी आत्मासे अनन्यता है, परसे नहीं । १४-मैंने भोजन भोगा, घर बनाया, घर छोड़ा प्रादि यह सब व्यवहारसे कहा जाता है । १५- वास्तवमें तो इसने अपने रागादि परिणामको ही भोगा, रागादि परिणामको हो किया, रागादि परिणामको हो छोड़ा । १६-- प्रश्न-यदि व्यवहारसे परद्रव्यका जानना है तब तो निश्चयसे कोई सर्वज्ञ नहीं हो सकता ? १४- उत्तर--सर्वपरद्रव्यविषयक जानना हो रहा प्रभुके, इस कारण सर्वज्ञता में कोई संदेह नहीं, किन्तु सर्वको जानकर भी प्रभु सर्व परपदार्थोंमें तन्मय नहीं होते, अतः प्रभुकों सर्वज्ञ व्यवहारसे कहा गया है। सिद्धान्त- १- परपदार्थविषयक ज्ञान प्रादि होनेपर परद्रव्यका शाता आदि व्यवहारसे कहा गया है । २- ज्ञानादि परिणमन स्वयंमें स्वयंकी परिणतिसे होने के कारण स्वज्ञाता प्रादि वास्तवमें कहा गया है । ३- स्वयं सहन परिपूर्ण आत्मा अनिर्वचनीय होनेके कारण सर्व भेदोंसे प्रतीत है।

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