Book Title: Pratima Mandan Stavan Sangraha
Author(s): Amarvijay
Publisher: Chunilal Chagandas Shah

View full book text
Previous | Next

Page 19
________________ प्रतिमा मंडन रास. (१९) १ पाट संथारे गुरुतणे, बैसंतां आशातना थाय के। ते केहनी आशातना ? कहोने ए अर्थ समजायके । कु. ॥ १७ ॥ उंधी गति मति जेहनी, दीर्घ संसारी जे छे पीडके। समजाया समजे नहीं, जो समजावे श्री महावीरके. । कु.॥ १८ ॥ 'जिन प्रतिमा जिन अंतरो, कोइ नहीं आगमनी साखीके । तिणही त्यां जिन हीलिये,तिण वंद्यो जिन बंद्यो दाखिके । कु.॥१९॥ जिन प्रतिमा दरसण थकी, प्रति बुज्यो श्री आद्रकुमारके । शय्यंभव श्रुत केवली, दश वैकालिनो करतारके । कु. ॥२०॥ स्वयंभू रमण समुद्रमें, मछ निहाली प्रतिमा रूपके । जाति स्मरण समाकिते, मुरपदवी पामी तेह अनुपके । कु. ॥ २१ ॥ रायपसेणी उपांगमें, सूरयाभे पूजा किधके । शक्रस्तवन आगल कह्यो,हित सुख मोक्ष तणा फल लीधके ।कु.||२२॥ छठे अंगे द्रौपदी, विधिसुं पूज्या श्री जिन राजके । जिन प्रतिमा आगल कह्यो,शक्र स्तव ते केहने काजके?। कु.॥२३॥ १ प्रतिमाको नहीं मानते हो तो-गुरुके पाटकी, आसनकी आशातनासें गुरुकी आशतना हुइ कैसे मानते हो ? इति प्रश्न ॥ २ देखो सत्यार्थ पृष्ट. १४४ में-महा निशीथ सूत्रका पाठमेंअरिहंताणं, भगवंताणं । का पाठसें-मूर्तियांकाही बोध कराया है । इस वास्ते मूर्तिमें और तीर्थंकरोंमें भेद भाव नहीं है । जिसने प्रतिमाकी अवज्ञा कोई उसने तीर्थकरोंकी ही अवज्ञा करनेका दोष लगता है । वांदे उनको तीर्थंकरोकोही वंदनेका लाभ होता है. ॥ ३ द्रौपदीको-नमाथ्थुणका पाठ, कामदेवकी मूत्तिके आगे, ढूंढनी पढावती है ? ।। देखो नेत्रांजन प्रथम भाग. पृष्ट. ११० से ११४ तक॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

Loading...

Page Navigation
1 ... 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42