Book Title: Paumchariu Part 3
Author(s): Swayambhudev, H C Bhayani
Publisher: Bharatiya Gyanpith
View full book text
________________
२०5
पजमचरित
रावण मुहु भुञ्जन्ताह लकाउरि जिह णारि ।
आणिय साय ग ह प. णिय-कुल-वंसही मारि' ।।१|| अव मि जो दुग्गइ-गामिग हि । कुशलस - कुमन्ति कुमामिएँ हि ।।२।। परियण कुन्ति कुसेवाएँ हिँ । कुनिथ · कुथम्म • कुदेवाएँ हिं ॥३॥ आपमें असहि भावियद । सो कवष्णु ण आवइ पाश्रियर' ।।४।। नं वयणु सुणेवि कइन् ण । णिमच्छिउ बहाविद्धान ।।५।। 'किर काई इमाणण हसहि मई । अप्पणु सलाधु किट काई प ।।६।। परमाह होइ चिलिसावणउ । णाणाविह - भय - दरिपावणा ||७|| दुबहु पाहल कुल लड़छणउ । इहलोड - परत्त · त्रिणासणड IIEI दुजण - विकार - पहिच्छणउ । घर अयसही जम्महाँ लम्छणउ ||९
घत्ता संसारहो बारु दि कवाड सासय-घरहों। लह वि विणामु अकुसल अण्ण-भवन्तरहों ॥३०॥
जोठवाणु जीविउ धणिय घरु सम्पय-रिद्धि गरिन्छ ।
भावत्रि गुह णिच नुहुँ पट्टवि सीय णिसिन्द ।।१।। पर-धणु पर-नारु मनवमणु । आयरइ को त्रि जो मूढ-मणु ॥२॥ नहुँ घई सयालागम कल-कुसलु । मुणि-सुब्बय • घसण-कमल-मसलु ॥३ जाणन्तु ण अप्पहि जणय सुअ । अवधुव अणुनेम्व काइँ सुभ ||४|| को कामु सन्बु माया निमिरु । जल बिन्दु जेम जीविउ अ-धिरु ||५|| सम्पत्ति समुह - तरङ्ग - मिह । सिय चचल विजुल-लह जिह ॥६॥ जोवणु गिरि-पाइ पवाद-सरिमु । पेम्मु वि सुविणय-इंसण-सरिसु ॥३॥ धणु सुर-धणु-रिद्धि] अणुहरइ । खाणे होइ खणद्ध ओसरइ ॥८॥ झिसह सरीरु आउसु गलइ । जिह गउ जल-णिचहु ण संभवद ॥६॥

Page Navigation
1 ... 214 215 216 217 218 219 220 221 222 223 224 225 226 227 228 229 230 231 232 233 234 235 236 237 238 239 240 241 242 243 244 245 246 247 248 249 250 251 252 253 254 255 256 257 258 259 260 261