Book Title: Paumchariu Part 3
Author(s): Swayambhudev, H C Bhayani
Publisher: Bharatiya Gyanpith
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२२४
पडमचरित
एसह णर' पडेम्बउ पाणे हिं 1 एतह भिण्णु अणाहाँ वाहिं ॥३॥ एत्तहँ जाउ कसाएँ हि रुम्मा । एत्तहँ सुरय-सोक्स्यु कहि लब्भा ॥१॥ एसह दुक्खु टुकम्मही पासिड । एत्तहे जाणइ-क्यणु सुदासिउ ॥५॥ एत इय-सरारु चिलिमायणु । एतह सुन्दरु सीयह जोब्धणु ।। ६॥ एप्तहें दुलहई जिण-गुण-वयणई । एतह मुद्धई सीयह पयगई ॥७॥ एतहे जिणवर-सासणु सुन्दरु । एसह जाणइ-वयणु मगाहरु ॥८॥ एसह असुई कम्मु णिरु भावः । एत्तरं सांय-भहरू को पावह ॥६॥ एत्तहे णिन्दिउ उत्तम-जाहों । पुतहें केस भार वरु सोयह ॥१०॥ एस. गरड रउन्दु दुरुत्तरु । एसह सीयह कन्तु सु-सुन्दर ॥३१॥ एतह गारइयहुँ गिर मरु मरु' । एतह सामहे मणहरु थणहरु ॥१२॥ गुप्तहें जम-गिर लइ लइ धरि धरि'। एसह जागा लाह-किसोयरि ॥१३॥ एत्त दुक्खु अणन्नु दुणियरु । एत्सहें सीयह रमणु स-विधरु ॥१४|| पसहें जम्मन्तरें सुहु घिरलउ । एसह सुललिय-ऊरुन-जुवलउ ॥१५|| एत्तहें मणुब-जम्मु अड्-विरल3 । एतह बंधा-जुअलग सरल उ ।।१६।। एतह एड कम्मु ण वि विमलउ 1 एतह सीयह वरु कम-जुअल ॥१७॥ एत्तहँ पाउ अणोत्रमु पउझइ । एतह विस हि मणु परिरुझिह ॥ १८॥ एत्तहें कुविउ कयन्न सु-भासणु । एत्तहे दुसरु मयणहाँ सासणु ॥१६॥ कवणु लएमि कवणु परिसंसमि । तो वरि वहिँ गरए पडेसमि ॥२०॥
पत्ता जाणमि जिहण घि सोक्नु पर-तिय पर-दव लयन्तहाँ । जं रुपा त होउ तहाँ रामहाँ सीय अ-देन्तहाँ ॥२१॥

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