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चालीसमो संधि साटुकड़े कर दिये। इसपर उस निशाचरीने गदा मारा मानो धरतीने समुद्र में गंगा ही प्रक्षिप्त की हो । हनुमानने अपने बाणोंसे उसी प्रकार उस खण्ड-खण्ड कर दिया जिस प्रकार संवर और निर्जरा दुर्मतिको नष्ट कर देती हैं। तब वह निशाचरी तमतमा उठी और उसने चक्र फका, परंतु हनुमानने से भी अपने तीरों से इसी प्रकार नष्ट कर दिया जिस प्रकार मनीषी आलोचक कुकवित्वको खण्डित कर देते हैं। इसफर निशाचरीने हनुमानके ऊपर शिला फेंकी, किन्तु वह भी पवनपुत्रके हाथमें उसी प्रकार आ गई जिस प्रकार खोटी स्त्री पर-पुरुषके आलिंगनमें आ जाती है । इस प्रकार लंका-सुन्दरी पवनपुत्रसे उसी प्रकार बंचित हुई जिस प्रकार किसी असती स्त्रीको दृढ़मन पुरुषसे वंचित होना पड़ता है। इस प्रकार नीर, गहा, अगानि. जियानो कुछ भी उम महिलाने छोड़ा, वह सब हनुमान ऊपर उसी प्रकार असफल हो गये जिस प्रकार कृषकके घर से यात्र असफल लौट जाते हैं ।।१-६॥
[१६ | जैसे-जैस हनुमान युद्ध में अजेय होता जा रहा था वसे. वैसे वह कन्या ब्याकुल होने लगी। कामके बाणोंने वह अपने उरमें पीड़ित हो उठी। किसी तरह दह संयोगसे धरतीपर नहीं गिरी। वह अपने मन में सोचने लगी कि हे भुवनेक-वीर हनुमान ! साधु-साधु ! तुम्हारा शरीर और वक्ष विजयलक्ष्मी से अंकित है। शत्रुसंहारक और शत्रुसेनाका ध्वंस करनेवाले, अस्खलित मान, साधु-साधु ! सौभाग्य की राशि, सत्पुरुषरत्न, साक्षात् कामदेव, साधु-साधु! कामके दर्प और बड़प्पनके निकेतन कपिकेतुतिलक साधु साधु ! दृढ़ विशाल वक्षःस्थल, प्रचंडबाहृदंड ततुतेजपिंड, साधु साधु ! यदिकोई उपमा न हो तब तुम्हारी