Book Title: Mahabal Malayasundarino Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 295
________________ (२) ॥ ढाल श्रद्वावीशमी ॥ जीरे जीरे स्वामी ॥ ॥ समो सख्या ॥ एदेशी ॥ ॥ ॥ वचन सुणी केवली तयां, बोल्या परषद लोको रे || कंदल कंद वधारवा, विष जलधर जोको रे ॥ १ ॥ धिग धिग चित्त नारी तणुं, अनरथ फल आपे रे || कुमति कदाग्रह पोषीनें, रस रीतें उच्चापे रे ॥ धि० ॥ २ ॥ कहे वली या केवली, महबल निशि मांहीं रे ॥ व्यं तरीयें इणवा जणी, अपहारयो नष्ठाहीं रे ॥ धि० ॥ ॥ ३ ॥ महबल मूर्ती श्रहणी, नागे विकराली रे ॥ विषम चरिता व्यंतरी, न करे वली आली रे ॥ धि० ॥ ४ ॥ सेवक सुंदर ते मरी, थयो नूत उदंगो रे ॥ बाहिर पुहवी गणने, ते वममां प्रचको रे ॥ धि० ॥ ५ ॥ जमतो महबल विधिवशे, आव्यो वरुतरु देव रे ॥ ते नूतें तिहां उलव्यो, निरखी गतजव देव रे ॥ धि ॥ ६ ॥ वम कालें पग एहना, बांध्यो माथे नीचे रे ॥ जिम धरणी के नहीं, कंटक नवि खुंचे रे ॥ ॥ ७ ॥ वचन संजारी एहवं, प्रिय मित्रनुं तेणें रे ॥ क रवा पीमा कुमरनें, संच मांन्यो एणें रे ॥ धि० ॥ ८ ॥ शवना मुखमां अवतरी, इंभ बोल्यो हसंतो रे ॥ मूढ इसे कां मुझनें, देखी बांध्यो एकतो रे ॥ धि० ॥ ॥ धि० For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org Jain Educationa International

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