Book Title: Mahabal Malayasundarino Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 294
________________ ( १०१ ) मीपुंज मनोहरू, सुखनमाला अनुकार रे लाल ॥ ॥ ज० ॥ १२ ॥ सूतो निरखी कुमरनें, तेह पण ह रियो निशिमांहिं रे लाल ॥ व्यंतरीयें मंदिरथकी, संजारी वैर थाह रे लाल || जां० ॥ १३ ॥ गतज व बहिनी प्रीतथी, थाप्यो जई कनका कंठ रे लाल ॥ कोमी जवें पण रस दीये, है विषमी प्रेमनी गंव रे लाल ॥ ज० ॥ १४ ॥ चोथे खंसे सुंदरू, घई सत्तावी शमी ढाल रे लाल || कांति कहे हवे पूशे, इहां वी रधवल भूपाल रे लाल ॥ ज० ॥ १५ ॥ || दोहा अवसर विस्मित हीये, वीरधवल भूपाल ॥ पूढे म केवल प्रत्यें, थापी करतल जाल ॥ १ ॥ स्वयंवर मंरुप विना, महबल प्रथम कदाच ॥ मध्यो नहीं मलया प्रत्यें, तो हार दियो क्रिम राच ॥ २ ॥ हसे. कुमर कुमरी मनें, निज चरित्रगत जाणि ॥ ज्ञातचरित्र विचित्र ते, जांखे गुरु तेणें वाणः ॥ ३ ॥ कुमर मली. पहेलो जई, चाव्यो पानी हार ॥ कनकायें जब वैर थो, विरच्यो कूरु प्रकार ॥ ४ ॥ मलया पुत्री उपरें, कोपाव्यो नृप व्यर्थ ॥ इत्यादिक धुरनी कथा, आखे सुगुरु सह ॥ ५ ॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only ני www.jainelibrary.org

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