Book Title: Lecture On Jainism
Author(s): Lala Banarasidas
Publisher: Anuvrat Samiti

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Page 366
________________ है, उतना फल श्रीआदिनाथ के स्मरण करने ही से होता है। ऋग्वेद । ओंत्रैलोक्य प्रतिष्ठितानां चतुर्विंशतितीर्थकराणां। ऋषभादिवईमानान्तानां सिद्धानांशरणंप्रपद्ये। अर्थ-तीनलोक में प्रतिष्ठित श्री ऋषभदेव से आदि लेकर श्री वर्द्धमान स्वामी तक चौवीस तीर्थ करों की श. रण प्राप्त होता हूं जो सिद्ध हैं। भावार्थ-जैन धर्म में प्रथम तीर्थंकर श्री श्रषमदेव और अन्तिम तीर्थंकर श्री बर्द्धमान अर्थात् श्री महावीर स्वामी को मानते हैं, इसप्रकार चौवीसतीर्थकर वर्णन किये हैं जोसिद्ध अवस्थामेंहैं उनको ऋग्वेद महान्ग्रंथमें नमस्कार किया है। ___ यजुर्वेद में ऐमा लिखा है। ओंऋषभपवित्रंपुरुहृतमध्वरं यज्ञेषुन परमंमाह संस्तुतंबारंशत्रुजयंतपुश्रुरिंद्रमाहुरितिस्वाहा । ओं त्रातारमिदंऋषभंवदंति अमृतारमिन्द्रहवेसुगतं सु पार्श्वमिन्द्रंहवेशक्रमजितं तहर्द्धमानपुरुहूतमिंद्रमाहु रितिस्वाहा। ओस्वस्तिनःइन्द्रोब्रदवास्वस्तिनः पू पाविश्ववेदाःस्वस्तिनस्तायोअरिष्टनेमिः स्वस्तिनो बहस्पतिर्दधातु । दीर्घायुस्त्वायवलायुर्वाशुभजातायु औरतरक्षअरिष्टनेमिस्वाहा ॥ अर्थ-ऋषभदेव पवित्र को और इन्द्ररूपी अध्वर को यज्ञों में नग्न को कर्मरूपी वैरी के जीतने वाले को आ

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