Book Title: Lecture On Jainism
Author(s): Lala Banarasidas
Publisher: Anuvrat Samiti

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Page 387
________________ उतना और किसीमें नहीं है, और यह इसका एक मोटा सबूतहै कि जैनी शाजनादिर (कहुत कम ) जेलकी हवा खाते हैं विपरीत इसके अन्यजातियोंके मनुष्योंसे जेलखाने भरे रहते हैं और जहां कहीं छिपे छिपाये तीव्र चारित्र मोहके उदयकर विवेक शून्योंमें कुशीलादि असदाचारहै भी तो इससे यह मावश्यकीय नहीं हो सकता कि जिस बुरे कामको कोई मज्ञानताकर किसीकारण विशेषसे छिपे छिपाये डरता हुमा कर और उसमें पापभी समझे तो उसको जायज और खुल्लमखुल्ला करदिया जाय और डर दूरकर अधिक पापकी प्रवृत्तिको अवसर दिया जाय, क्योंकि यह स्वतः सिद्धहै कि जिस कामको कोई बुरा जानता हुमा छिपे छिपाये और डरता हुआ करताहै तो उसको बहुत कम अवसर उस कामके करनेका उसकी अपेक्षा मिलताहै जो कि उसमें दोष नहीं समझता और खुल्लमखुल्ला करताहै और श्रद्धान ठीक होनेसे प्रथमको निस्वत माशाहै कि वह एकदिन सर्वथा उस कामको छोडदे, विपरीत इसके दूसरेकी निस्वत कष्ट साध्य व असाध्यहै। इससे यह सिडहै और पाठकगण विचार कर सक्ते हैं कि विधवाविवाहमें बहुत हानिये और पापह, सजनोंको तो इसके नामसेही ग्लानि भाती हैं। जिनमतके करणानुयोग अर्थात् भूगोलपर तो संपादकजीका दिमाग बहुतही चक्करमें भाया और बहुत घबराये, सो युक्तिही है जितना पात्रहोताहै उतनीही वस्तु उसमें समाती है, यदि एक छोटीसी कुईका मेंडक मानसरोवरका अनुमान करने लगै सो कबहो सक्ताहै, सिवाय इसके कि वह उछल कूदकर स्वयं प्राणान्त होजावै; जब संपादकजीकी बाद्ध अत्यन्त संकोचको प्राप्त होगई और कछभी बश न चलातो उन्मत्तकीनांई आचार्यों और ऋषिमुनियोंको गालियां और कुबचन कहने तथा उनमें दोषान्वेषण ( ऐवजोई ) करने लगे और यही स्वभाव खलजनका नीतिमें कहाहै सो किसीकोभी अप्रगट नहीं है, और वे बिचारे क्या यदि करोड मनुष्यभी उन जैसे ख्यालके एकत्र हों तोभी उनसाधुओंमें दोषारोपण वा उनके मान्यका खंडन नहीं करसक्त । अरे भाई ! यदि अंधेको दीपक नहीं दीखै तो दीपकका अभाव नहीं हो जायगा, यदि उनकी नियमित (लिमिटेड ) तुच्छ बुद्धि पदार्थों को जानने न दे तो पदार्थोंका लोप नहीं होजायगा, मालूम होताहै कि संपादकजीने जिनमतके मुख्योपचार कथन, द्रव्यार्थिक, पर्यायार्थिक तया नैगमादिनय तथा सप्तभंगी वाणी और प्रमाण तथा निक्षेपादिकके कथनको हुआतक नहीं और विना इनके समझे जिनमतका रहस्य जानना कष्टसाध्यही नहीं किन्तु असाध्यहै, यदि ऐसा होता तो संपादक पत्रिकाका भ्रम स्वयंही निकलजाता और उनको ऐसा लिखकर अपनी जातिमें लजित होना नहीं पडता । अंगके धारी और पाठीमें ज्ञान संबंधी कोई भेद नहीं हैं केवल निसर्गज और अधिगमनका भेदहै, अंतरंग कारण दोनोंके समानहै, बाह्यकारणमें स्वतः परतःका भेदहै, और कुछभीहो यह बात युक्तिशास्त्रसे सिद्धहै और जोरके साथ कही जा सक्ती हैं कि उन आचायाँकी समान ज्ञानकाधारी आपके भूमंडलपर कोईभी नहीं है । विवाहपद्धतिके रचनेसेही यदि भाचायौंको दूषण लगैतो कदापि प्रथमानुयोगकी प्रवृत्ति नहीं होसक्ती, और फिर उनके जिनेन्द्र देवभी जिनकी दिव्य ध्वनिमें सर्व बातें खिरती हैं दूषणसे अलिप्त नहीं करसके, अतः ऐसे तार्किकोंको नय विभाग अवश्य समझना चाहिये और आशा है कि जब वे इसको समझ जावेंगे तो स्वयंही बरादिककी योग्य अवस्था तथा सीतादिक संबंधी प्रश्नोंके तो करनेमें समर्थ होजायेंगे। आचार्योंको कोई जरूरत नथी कि प्रयो

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